Friday, 30 October 2009

पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -4

तिरुअनन्तपुरम में अब कुछ खास नहीं बचा था इसलिए हमने सोचा कि हमें अब आगे चल देना चाहिए। दिल्ली में बैठे- बैठे हमने जो योजना बनाई थी उसके मुताबिक हम तिरुअनन्त पुरम में एक रात रुकने वाले थे। इसी योजना के अनुसार हमने 23 सितम्बर के लिए मदुराई पैसेन्जर में सीटें आरक्षित करवा ली थीं। यहां का सारा आवश्यक भ्रमण पूरा हो गया था और अब वहां केवल वे ही स्थान थे जो यूं ही समय बिताने के लिए देखे जा सकते थे, हमें काफी कुछ घूमना था इसलिए निर्णय लिया कि अगले दिन का आरक्षण निरस्त करवा कर आज ही इसी गाड़ी से मदुराई चल दें। वहां की गाड़ियों में भीड़ कम होती है और कोई खास परेशानी होने वाली नहीं थी।

स्वामी पद्मनाभ मंदिर से लौटकर सर्वप्रथम हमने आरक्षण निरस्त कराया । त्रिवेन्द्रम स्टेशन का आरक्षण कार्यालय हमें दिल्ली के सभी आरक्षण कार्यालयों से अच्छा और सुव्यवस्थ्ति लगा। स्वचालित मशीन से टोकन लीजिए और अपनी बारी की प्रतीक्षा कीजिए, लाइन में लगने की कोई आवश्यकता ही नही। एक डिस्प्ले बोर्ड पर आपका नंबर आ जाएगा और आपका काउंटर नंबर भी प्रर्दशित हो जाएगा। ऐसी व्यवस्था तो राजधानी दिल्ली में भी नहीं है जहां कि भारत सरकार का रेल मंत्रालय स्थित है। खैर, आरक्षण निरस्त करवा कर हम वापस आए । मदुरै पैसेन्जर सवा आठ बजे की थी । स्टेशन पर स्थित आई आर सी टी सी के रेस्तरां में हमने खाना खाया। यह इस दृष्टि से प्रशंसनीय है कि यहां खाद्य पदार्थ अच्छा और तार्किक दर पर मिलता है।हालांकि मुख्य उपलब्धता दक्षिण भारतीय व्यंजनो की ही होती है पर यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। अपना सामान क्लोक रूम से वापस लिया और गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

यहां हम एक बड़े संकट में फंसते- फंसते बचे! दरअसल हमने आरक्षण तो निरस्त ही करवा दिया था और अब हमें सामान्य दर्जे में सफर करना था , टिकट भी हमने ले ही लिया था। त्रिवेन्द्रम से मदुरै लगभग 300 किमी है और इस पैसेन्जर गाड़ी का किराया मात्र 41/- है। मेरे मित्र ने सुझाव दिया कि ट्रेन आ जाए तो हम लोग पहले सीटें ले लें और बाद में पत्नी और बच्चों को लिवा लाएं। सुझाव मुझे तो बहुत अच्छा नहीं लगा, एक साथ ही सवार हो लें तो अच्छा हो किन्तु दबे मन से सुझाव मैंने भी मान लिया। ट्रेन आई, जोरों की बारिश हो रही थी। भाषाई समस्या के कारण यह भी ज्ञात नहीं हुआ कि गाड़ी आएगी किधर से और सामान्य डिब्बे लगते किधर हैं ? गाड़ी आई तो हम दोनों एक तरफ दौड़े , उधर डिब्बे भरे हुए थे। लिहाजा हमें दूसरी ओर जाना पड़ा। सीटें खाली मिल गई तो सन्तोष हुआ। अपने साथ मैं बेटी को भी ले गया था। ऊपर की कई सीटें हमें आसानी से मिल गई थीं । बेटी और मित्र को सीटों की रक्षा का दायित्व सौंपकर मैं बाकी सदस्यों को लिवाने पहुँचा और बमुश्किल चला ही था कि गाड़ी चल पड़ी ! हमारा अनुमान था कि स्टेशन बड़ा है और ट्रेन देर तक रुकेगी । रात का वक्त और सुदूर अनजान देश ! अब क्या करें, मैं तो पिछले डिब्बे में चढ़ भी जाता किन्तु महिलाओं और बच्चों का क्या करें ? इस सारी घबराहट के बीच अब बस मोबाइल का ही सहारा थोड़ी सी ऑक्सीजन दे रहा था, भगवान का शुक्र कि मित्र बेटी को लेकर जल्दबाजी का परिचय देते हुए उतर गए थे और खिड़की से गाड़ी के अन्दर झांक रहे थे- इस आशंका से कि कहीं हम लोग पीछे के किसी कंपार्टमेन्ट में चढ़ न गए हों। इस बीच बेटी ने मुझे देख लिया और हम सभी एक दूसरे को एक साथ देखकर जैसे विश्वास करने की कोशिश कर रहे हों कि हम वास्तव में पुनः साथ हैं।

बारिश अभी भी जोरों से हो रही थी। राहत की सांस लेने और अपनी गल्ती एवं परिस्थिति की समीक्षा करने के बाद आगे के कार्यक्रम पर विचार करना शुरू किया । पूछताछ की तो पता चला कि अगली गाड़ी सुबह पौने चार बजे है। अर्थात लगभग 6 घंटे तक प्रतीक्षा ! बस में जाने के लिए न तो बच्चे तैयार और बारिश की वजह से बाहर निकलने और बस अड्डे तक जाने की गुंजाइश । वैसे 300 किमी की बस यात्रा के लिए पूर्णतः तैयार मैं भी नहीं था। अब या तो हम प्रतीक्षा करें -यहीं रेलवे के विश्रामालय में या होटल की तलाश करें । होटल के लिए भी बाहर जाना ही होता , अतः हमने मन मारकर यहीं रुकने का निर्णय किया और अगली ट्रेन जो प्रातः पौने चार बजे की थी ,की प्रतीक्षा करने का विकल्प स्वीकार कर लिया।

विश्रामालय में ही आसन लगा। मित्र सपरिवार निद्रानिमग्न हो गए। कोशिश मैंने भी की किन्तु सफलता नहीं मिली। घंटे भर लोट-पोट , अंडस -मंडस करता रहा , फिर हार मानकर बैठ गया। वैसे भी यात्रा में मैं कम सामान और कम भोजन के फार्मूले पर चलता हूँ और सुखी महसूस करता हूँ ।बहरहाल, रात निकलती गई और गाड़ी के आने का समय हो गया। सबको जगाया और चेन्नई एगमोर एक्सप्रेस में हम सवार हो गए।तुलनात्मक रूप से इसमें भीड़ थी । चूंकि हम इन बातों को स्वीकार कर के सवार हुए थे इसलिए कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई।आगे गाड़ी खाली होती गई और हमें आराम करने की जगह भी मिलती गई।

सुबह नौ-दस बजे तक हम थोड़ा आश्वस्त हो चुके थे और स्थानीय प्रकृति,टोपोग्राफी और भौगोलिक दृश्यों का आनन्द लेने लग गए थे। जो कुछ दक्षिणी पठार के विषय में किताबों में पढा था वह देख रहा था। वहां की मिट्टी और बनस्पतियां हमारे अध्ययन की केन्द्र में थीं । साथ चल रहे यात्रियों का ढंग, भोजन एवं तौर तरीका हमारे लिए आकर्षण था। ज्यादातर यात्री साथ में इडली और चटनी लेकर आए थे और मौका पाते ही चट करने में लग जाते थे । भाग्यवश कुछ सहयात्री ऐसे थे जो थोड़ी बहुत अंगरेजी समझ ले रहे थे । उनसे ही हम कुछ-कुछ जानकारी पा जा रहे थे।

मदुरै पहुंचाने में इस गाड़ी ने लगभग सात घंटे लिया । मदुरै तमिलनाडु का एक बड़ा रेलवे जंक्शन है । यहां से उत्तर भारत, दक्षिण के कई बडे नगरों, रामेश्वरम एवं कन्या कुमारी जैसी जगहों के लिए गाड़ियां मिलती है। यह दक्षिण भारत की एक प्रकार से सांस्कृतिक राजधानी है।अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं सिल्क उद्योग के लिए यह भारत में ही नहीं अपितु विदेशों तक मे विख्यात है ।

हम यहां लगभग 11बजे दिन में पंहुचे थे और थके हुए थे। हमारी प्राथमिकता थी यथाशीघ्र होटल लेना , नहा धोकर तरोताजा होना और फिर मीनाक्षी मंदिर का दर्शन करना। स्टेशन से बाहर आए तो ऑटो और टैक्सी वालों ने हमें धरा। दक्षिण भारत के दिल्ली स्थित एक मित्र ने सुझाया था कि परिवार स्टेशन पर ही छोड़कर पहले होटल तलाश लेना फिर परिवार ले जाना। साथ वाले मित्र का भी कुछ ऐसा विचार था । पर, मैं कुछ रात की घटना से और कुछ थकान से इस विचार से सहमत नहीं हुआ। एक साथ ही चलते है। जो भी सस्ता महंगा पड़ेगा , देखा जाएगा! एक बार कमरा ढूंढ़ो, फिर परिवार लेने आओ। ना भाई ना। और यह जानते हुए भी कि ऑटो वालों का कमीशन बंधा होता है, इनके साथ जाने से कमरा कमीशन जोड़कर ही मिलता है, हमने उन्हीं के साथ जाना उचित समझा। शायद यह भी एक परिस्थिति ही होती है कि आदमी जानते हुए भी ठगे जाने को तैयार होता है!

इस बार कोई भी पोंगापंथ अभी तक सामने नहीं आया। थोड़ा बहुत पोंगा मैं ही साबित हुआ। हां, मंदिर में ले चलूंगा तो पोंगापंथ जरूर दिखाऊंगा। यात्रा अभी जारी है............

Thursday, 22 October 2009

साहित्य की चोरी

[] राकेश 'सोहम'
विगत दिनों मेरे साहित्य की चोरी हो गई । आप सोच रहे होंगे, साहित्य की चोरी क्यों ? साहित्यिक चोरी क्यों नहीं ? साहित्य और सहित्यकारों के बीच साहित्यिक चोरियां देखी और सुनी जातीं हैं । एक साहित्यकार दूसरे साहित्यकार की रचना चुराकर छपवा देते हैं । मंच के कवि दूसरे कवियों की रचनाएं पढ़कर वाह-वाही लूटते हैं । आजकल साहित्यिक मंचों पर सर फुटौवल, टांग - खिंचौवल और साहित्यिक चोरियां फैशन में हैं ।

मैं अपनी इस चोरी को साहित्यिक चोरी इसलिए नहीं कह सकता क्योंकि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था । वैसे मेरे जैसे टटपूंजिया साहित्य सेवी की रचनाएं चुराकर कोई करेगा भी क्या ? यदि छोटे साहित्यकार की रचना चोरी हो जाए तो वह ऊँचा साहित्यकार हो जाता है । ये बात अलग है की छोटे साहित्यकार अपनी श्रेष्ठ रचनाएं बड़े साहित्यकारों के नाम से छपवाकर संतोष कर लेते हैं ।

जी हाँ, मैं कह रहा था की मेरे साहित्य की चोरी हो गई । मुझे अपनें कार्यालय से फायलों को ढोनें हेतु एक ब्रीफकेस मिला था । जिसका प्रयोग हम अपने साहित्य को घर से कार्यालय और कार्यालय से घर लाने-लेजानें में करते थे । हम जो भी रचनाएं लिखते उसे पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेज देते । जिसे सम्पादक सखेद फ़ौरन वापस भेज देते । हम दुखी होकर उन्हें इस ब्रीफकेस के हवाले कर देते । इस प्रकार हमारा ब्रीफकेस नई-पुरानी रचनाओं से भर गया था ।

एक दिन मैं बीफ्केस लेकर, ऑफिस से घर की ओर जा रहा था कि एक सूनी गली में एक लुटेरे ने छुरा दिखाकर मेरा ब्रीफकेस छीन लिया । उसका अनुमान रहा होगा कि इसमें नोट भरे हुए हैं । छीना - झपटी के दौरान मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि इस ब्रीफकेस में मेरी ऐसी अमूल्य-निधि है जो तुम्हारे किसी काम की नहीं है । इसे देखकर तुम सर फोड़ लोगे । लेकिन वह न माना । मेरे ब्रीफकेस को हर्षद का बैग समझकर चंपत हो गया ।

वैसे मेरे लिए मेरा साहित्य अमूल्य - निधि ही है । इस बात को वह ग़लत समझ गया । मैं परेशान ओर निराश होकर पुलिस थाने पहुँचा । रिपोर्ट लिखनी थी । पुलिस थानों की अवांछित परेशानी जो आम नागरिकों को झेलनी पड़ती है, मुझे भी झेलनी पड़ी । तब कहीं जाकर रिपोर्ट दर्ज कर्ता हमारी ओर मुखातिब हुआ ।

"बोलिए, क्या हुआ ?", पुलिस कर्मचारी ने कलम और रजिस्टर उठाते हुए पूछा ।

"मेरे साहित्य की चोरी हो गई ", मैंने निराश मन से कहा ।

"साहित्य की चोरी हो गई ?", पुलिस कर्मचारी ने आश्चर्य से पूछा और आगे कहा, "..फ़िर हमारे पास क्यों आए हो, सम्पादक के पास जाओ ।"

"जी, मेरा मतलब वो नहीं है । "

"फ़िर क्या मतलब है ?" वह गंभीर हो गया ।

"जिस ब्रीफकेस में मेरा साहित्य रखा था वह आज गुंडों ने रात्रि घर लौटते समय छीन लिया । ", मैनें स्पष्ट किया

"मूर्ख था ", वह बुदबुदाया ।

" जी !!" मैं चौंका ।

"कुछ नहीं .........और क्या-क्या था उसमें ?"

"एक बिना ढक्कन का पेन, कुछ सफ़ेद कागज़ कुछ अस्वीकृत रचनाओं सहित नई रचनाएं

"क्या फालतू सामन बता रहे हो ! कोई कीमती सामन था उसमें ?"

"हाँ"

"क्या ?"

"मेरा अमूल्य साहित्य । "

"पता नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं । " कर्मचारी पुनः बुदबुदाया और फ़िर मेरी ओर देख कर पूछाक्या कीमत रही होगी ?"

"साहित्य की ?" मैनें उतावलेपन से स्पष्ट करना चाहा ।

"नहीं, ब्रीफकेस की । "

"जी मालूम नहीं वह तो ऑफिस से मिला था ", मेरे लिए ब्रीफकेस की कीमत कुछ भी नहीं थी ।

"फ़िर क्यों परेशान हो रहेहो ?" उसने सलाह भरे लहजे में कहा , " खैर तुम्हारा ब्रीफकेस दिलाने की पूरी कोशिश करेंगे । वैसे ऐसी चीजें मिलती नहीं । आपकी रिपोर्ट हमनें दर्ज कर ली है । लिख कर दे देता हूँ । ऑफिस से दूसरा ब्रीफकेस मिल जाएगा ।"

"नहीं, मुझे ब्रीफकेस नहीं , अपना साहित्य चाहिए । "

"वो कहाँ से मिलेगा ? कुछ नाम-वाम है ? कोई प्रमाण है कि वे रचनाएं आपकी हैं । " शायद वह कर्मचारी रचना, साहित्य और रचनाधर्मिता से परिचित था ।

"बदमाश, आदमी हो कि पायजामा, शर्म नहीं आती, कमीनें, चोरी होनें का सुख ...."

"ये क्या बक रहे हो ? थाने मैं गाली-गलौंच की तो अन्दर कर दूँगा, समझे । " वह आग बबूला हो गया ।

"माफ़ करिए , ये मेरी रचनाओं के शीर्षक हैं जो उस बेग में थीं । "

"अच्छा-अच्छा ठीक है । आपकी रिपोर्ट दर्ज कर ली है, नमस्ते । " उस कर्मचारी नें ज़ोर से दोनों हथेलियाँ आपस में टकराई और मुझे विदा हेतु नमस्कार किया ।

मैं परेशान वापस आ गया ।

कई दिनों इंतज़ार किया । थानें जाकर पूछताछ कर्ता रहा किंतु कुछ पता न चला ।

अचानक तीन-चार माह बाद ।

हमारी रचना एक प्रतिष्ठित पत्रिका में पढ़नें को मिली । नाम मेरा नहीं था । जानकारी लेनें पर ज्ञात हुआ , नाम उस थाने के उसी कर्मचारी का था जिसने रपट लिखी थी । किंतु मैं कुछ न कर सका क्योंकि हमारे पास चोरी गई रचनाओं के सम्बन्ध में कोई प्रमाण न था ।

हाय , साहित्य की चोरी ।

Sunday, 18 October 2009

पोंगा पंथ अप टु कन्याकुमारी -3

दिये में तेल डालने का शुल्क देकर हम आगे निकले ही थे कि एक दूसरे कार्यकर्ता ने हमें रोका । उसके पास रसीदों की गड्डी थी । उसकी आज्ञानुसार हमें प्रति व्यक्ति पांच रुपये का टिकट लेना था । सामने एक बोर्ड पर क्षेत्रीय भाषा में पता नहीं क्या - क्या लिखा था जिसे वह हमें बार- बार दिखा रहा था । उसमें हम जो पढ़ सकते थे वह था अंगरेजी में लिखा हुआ - एंट्री-५/-। हमें लगा कि शायद यह मंदिर का प्रवेश शुल्क होगा । जब हमने टिकट ले लिया तो उसने इशारा किया कि हमें ऊपर जाना है । हालांकि हमारी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी , फिर भी जाना ही पड़ा । हमने सोचा कि शायद कोई दर्शन होगा । बहरहाल , सीढ़ियाँ चढ़कर प्रथमतल पर गए तो वहां एक हाल सा था जिसमें कुछ चित्र लगे हुए थे। प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी, सीलन भरी पड़ी थी और एक तरफ चमगादड़ों का विशाल साम्राज्य था - कुछ उल्टे लटके थे तो कुछ हमारे जाने से विक्षोभित हो गए थे और अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे। अब इसके ऊपर जाना हमने उचित नहीं समझा और नीचे आ गए। इस दरवाजे को पार कर हम आगे निकले और दर्शन की पंक्ति में लग गए। यहां हमें मालूम हुआ कि जिस प्रथम माले से हम वापस आए थे, उसके ऊपर छः माले और हैं तथा सातवें माले से पूरा शहर दिखता है और वे पांच रुपये इसी के एवज मे लिए जाते हैं। वस्तुतः मंदिर का गोपुरम सात मंजिल का है और मंदिर प्रशासन ने अपने व्यवसाय प्रबंधन कुशलता का परिचय देते हुए नगरदर्शन की यह सुविधा उपलब्ध करवाई है।
खैर, नगरदर्शन से वंचित होने का हमें कोई क्षोभ नहीं हुआ।हम सभी पंक्तिबद्ध थे।शाम के साढ़े चार बजे होंगे। अचानक कुछ लोग समूह में आए और पंक्ति को उपेक्षित कर आगे बढ़ गए। मैंने सोचा था कि कम से कम ऐसी जगह पर तो लोग स्वानुशासन में रहेंगे परन्तु शायद यह भी अपने देश की विविधता में एकता है ! चाहे उत्तर हो या दक्षिण, नियम तोड़ने में हम बराबर के हिस्सेदार है। पांच बजे के करीब दर्शन शुरू हुए होंगे । अब लाइन का नाम करीब-करीब मिट गया था। ढंग की -धक्का मुक्की थी। अन्दर न तो पुलिस की कोई व्यवस्था थी और न स्वयंसेवकों का कोई अता-पता !गनीमत यह थी कि चोरी -जेबतराशी जैसी महामारी वहाँ नही के बराबर है। वैसे भी हमारे पर्स हमारे हाथों में ही थे। भीड़ में दम घुट सा रहा था। बस, केवल दर्शन करके हम बाहर निकलने के प्रयास में लग गए और किसी तरह जल्दी ही सफल भी हो गए। कोई पूजा या प्रसाद के चक्कर में हम थे भी नहीं! हां, मंदिर बड़ा ही भव्य है और उसके स्थापत्य और विशालता को जितना देख और समझ सकता था, उतना प्रयास करता रहा।
स्वामी पद्मनाभ का यह मंदिर भी दक्षिण भारतीय शैली के स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। अत्यन्त विशाल यह मंदिर हिन्दू धर्म के वैभव का प्रतीक है और एक समृद्ध समाज का परिचायक है।दूर से ही इसका विशाल गोपुरम दर्शकों और श्रद्धालुओं को खींच लेता है।
समूचा मंदिर विशाल पत्थरों को तराश कर बनाया गया है।यह मंदिर पद्मनाभस्वामी क्षेत्रम् और अनन्तपुरी के नाम से विख्यात है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्वाभिमुख है और इसका गोपुरम सात मालों का है जिसकी उंचाई 100 फीट है। गोपुरम के सम्मुख एक विशाल सरोवर पद्मतीर्थम है जो मंदिर की सुंदरता में अभिवृद्धि करता है । यह बात अलग है कि इसकी साफ सफाई पर कोई ध्यान देने वाला मुझे नहीं लगा।
मन्दिर का गलियारा भी बहुत बड़ा है और 365 खंभो को बड़ी बारीकी से तराश कर लगाया गया है। गर्भगृह एक विशाल चबूतरे पर है जो एकमात्र पत्थर को काटकर बनाया गया है और इसे ओट्टकल मंडपम के नाम से जाना जाता है। इसके बारे में भी बहुत सी किंवदंतियां हैं। जैसा कि मंदिर के नाम से ही स्पष्ट है, मंदिर स्वामी पद्मनाभ को समर्पित है जो भगवान विष्णु का ही एक रूप है। विग्रह की मुख्य विशेषता यह है कि यह शयन मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह विग्रह कुल 12008 शालिग्राम को जोड़कर बनाया गया है जो नेपाल स्थित गंडकी नदी से लाए गये थे। इसके अतिरिक्त यहां श्री नरसिंह, श्री हनुमान, श्री कृष्ण ,श्री अइयप्पा और श्री गरुण की मूर्तियां भी स्थापित हैं। वस्तुतः यह 108 देवदर्शन में एक प्रमुख स्थल है।
मंदिर की संपूर्णता का आनन्द तो बस देखकर ही लिया जा सकता है । अगर पूरी जानकारी प्राप्त कर लेख लिखा जाए तो कई पृष्ठों में जाएगा। हां, मैं आपका ध्यान दर्शन के समय पर जरूर दिलाना चाहूंगा, जरा इस विचित्रता को गौर फरमाएं । देव दर्शन की यह समयबद्धता कम से कम मुझे तो बिलकुल नहीं सुहाई। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि ईश्वर को हम अपने नियमों में न बांधे और उसे तो श्रद्धालुओं के लिए मुक्त कर दें!
यह रही स्वामी पद्मनाभ के दर्शन की समय सारणी-
पूर्वाह्न -3:30 - 4:45
6:30 -7:00
8:30 -10:00
10:30-11:00
11:45-12:00
अपराह्न
5:00-6:15
6:45-7:20

Saturday, 17 October 2009

शुभकामनाएँ

इयत्ता के सभी सहयोगी बंधुओं एवं संवेदनशील पाठकों को ज्योति पर्व दीपावली की मंगल कामनाएँ !

हरिशंकर राढ़ी

Thursday, 15 October 2009

आस का दीया [दीवाली की शुभ कामनाएं]

सूनी
हर गली पर
एक आस का दीया,
नयनों की
एक झलक से
तुम ने जला दिया ।

मन की यह
अमावस
उजाली हो गई,
परम उज्जवल
पर्व सी
दीवाली हो गई ।

सूखे
इस ठूंठ को
आतिश बना दिया ।
० राकेश 'सोहम'

Sunday, 11 October 2009

पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -2

मैंने अपनी यह यात्रा हज़रत निज़ामुद्दीन से चलने वाली हज़रत निज़ामुद्दीन – त्रिवेन्द्रम राजधानी एक्सप्रेस (ट्रेन नं.2432) से शुरू की थी. इस गाडी को त्रिवेन्द्रम पहुंचने में पूरे सैंतालीस घंटे लगते हैं और यह कोंकण रेलवे के रोमांचक और मनमोहक प्राकृतिक दृष्यों से होकर गुजरती है. केरल प्राकृतिक रूप से बहुत ही समृद्ध है और केरल में प्रवेश करते ही मन आनन्दित हो गया. यात्रा लंबी अवश्य थी किंतु अच्छी थी –अनदेखी जगहें देखने की उत्कंठा थी अतः महसूस नहीं हुआ. मेरे साथ मेरे एक मित्र का परिवार था. पति- पत्नी और दो बच्चे उनके भी. बच्चे समवयस्क ,उन्होंने अपना ग्रुप बना लिया.
त्रिवेन्द्रम अर्थात तिरुअनंतपुरम केरल की राजधानी है. यहां कुछ स्थान बहुत ही रमणीय और दर्शनीय है. मैंने जो जानकारी इकट्ठा की थी, उसके अनुसार त्रिवेन्द्रम में दो जगहें हमें प्राथमिकता के तौर पर देखनी थीं.प्रथम वरीयता पर था स्वामी पद्मनाथ मंदिर और दूसरे पर कोवलम बीच. अधिकांश मन्दिरों के साथ दिक्कत उनकी समयबद्धता से है . दक्षिण भारत के मंदिर एक निश्चित समय पर और निश्चित समयावधि के लिए खुलते हैं. गोया सरकारी दफ्तर हों और भगवान के भी पब्लिक मीटिंग आवर्स हों . भगवान पद्मनाथ का यह विख्यात मंदिर भी मध्याह्न 12 बजे बंद हो जाता है. इसके बाद सायं चार बजे प्रवेश प्रारम्भ होता है और दर्शन पांच बजे से हो सकता है . हम त्रिवेन्द्रम सवा नौ बजे पहुंच गए थे और रेलवे के विशेष प्रतीक्षालय (यहां एक एसी प्रतीक्षालय है जिसमें प्रति यात्री प्रति घंटा दस रुपये शुल्क लिया जाता है) में नहा-धोकर ,तरोताज़ा होकर 11 बजे तक तैयार हो गए थे. वहां घूमने –देखने लायक इतना कुछ नही है ,इस लिए हमारी योजना उसी रात मदुरै निकल जाने की थी. सामान हमने क्लॉक रूम में जमा करा दिया था. मंदिर के विषय में मालूम था ,इस लिये पहले हम कोवलम बीच घूमने चले गए.
कोवलम बीच रेलवे स्टेशन से लगभग 13 किमी की दूरी पर है . हमने स्टेशन से ही प्रीपेड आटो ले लिया था. मजे की बात है कि वहां प्रीपेड के नाम पर केवल पर्ची कटती है,भुगतान गंतव्य पर पहुंचने के बाद ड्राइवर कोइ ही करना होता है. भुगतान की रकम पर्ची पर लिखी होती है और पर्ची का शुल्क एक रूपया मात्र होता है.
कोवलम बीच वास्तव में एक सुन्दर अनुभव है. अरब सागर की उत्ताल तरंगें नारियल के झुरमुट से सुशोभित तट की ओर भागती चली आती हैं , बस सबकुच भूल कर उसकी विशालताऔर अनंतता को देखते रहने को जी चाहता है.
बहरहाल , लगभग चार बजे हम स्वामी पद्मनाथ मंदिर पहुंच गए. मंदिर निःसन्देह बहुत विशाल और भव्य है. इसका गोपुरम दूर से ही मन को मोह लेता है. हम द्वार की तरफ बढे ही थे कि हमें सामान क्लॉक रूम में जमा कराने का इशारा मिला (भाषाई समस्या वहां प्रायः झेलनी पडती है ) और हम समीप स्थित क्लॉक रूम तक पहुंच गए. जैसा कि मैने पहले ही बताया कि मंदिर के लिए ड्रेसकोड निर्धारित है ,उसका पालन करना ही था. हालांकि हम स्थिति ठीक से समझ नही पाये थे. क्लॉक रूम के बाहर सामान जमा की दर भी लिखी हुई है.चलिए , अब आप सारे कपडे उतार दीजिए,बस एक मात्र अंतः वस्त्र को छोडकर. मोबाइल वगैरह तो जमा होता ही है .अब आपको वे एकलुंगी नुमा धोती दे देंगे, उसे लपेट लीजिए, अगर लपेटने में कठिनाई है तो वे मदद भी कर देंगे ! हाँ, इस धोती का किराया है रु.15/- . धोती बाद में लौटा दीजिएगा, पर किराया अभी जमा करा दीजिए. महिला के लिए शुद्ध भारतीय वेश-भूषा अर्थात साडी ही अनुमन्य है.महिला ने साडी नहीं कुछ और पहना है तो 15/ मे लुंगी नुमा धोती उपलब्ध है.उसे बस ऊपर से लपेट लीजिए, अन्दर का सब कुछ चल जाएगा !यह व्यवस्था बच्चों पर भी लागू है . इस धार्मिक सुविधा केन्द्र पर सात धोती (बच्चों के लिए लगभग हाफ लुंगी/धोती ) लेने और पैंट-कमीज़ मोबाइल देने के रुपये 208/ लगे. हाँ, हमारे पर्स नहीं जमा हुए, उन्हें हम ले जा रहे थे अन्दर. हर श्रद्धालु के हाथ में अब केवल पर्स था ,जैसे वह पर्स न हो, पूजा का फूल हो ! यह भी एक दृश्य था ,जिसे शायद महसूस कर रहा था.
अन्दर प्रवेश करते ही एक ‘सेवक ‘ दौडा. बडी लगन से उसने छोटे –छोटे चार दिये तेल के (क्योंकि चार सदस्य क परिवार था) पकडाए. यहां का कोई नियम मानकर हमने दिये ले लिए, बगल के एक बडे जलते दिये में उसे उडेला और उसके भी बीस रुपए हो गये . यह बात बाद में समझ पाया कि यह सब केवल दूर से आने वाले दर्शनार्थियों के लिए है, स्थानीय तो सब जानते है .ऐसी एक दो घट्नाएं और हुई6 जिनका जिक्र अच्छा नहीं होगा. मंदिर के अन्दर हम पंक्तिबद्ध थे. लोग हाथों में पर्स पकडे चले आ रहे थे. पता नहीं किसका कितना ध्यान स्वामी पद्मनाथ पर था , कितना पर्स की संभाल पर!
आगे जारी........

Monday, 5 October 2009

पोंगापंथ अप टू कन्याकुमारी

अभी पहली तारीख को दक्षिण भारत का एक लम्बा भ्रमण करके आया हूँ. त्रिवेन्द्रम, मदुरै, कोडाइकैनाल,रामेश्वरम और कन्याकुमारी तक फैले भारत की समृद्ध प्रकृति को देखा और महसूस किया. कितना अच्छा है अपना देश, शायद बयान नहीं कर सकता . यात्रा का वर्णन तो विस्तार में और बाद में करूँगा लेकिन पहले जो बातें बहुत चुभीं , उन्हें कहे बिना रहा नहीं जाता. अस्तु , आपसे क्षमा याचना करते हुए पहले कटु अनुभव ही!
दक्षिण भारत अपने विशाल और वैभवशाली मंदिरों के लिए विश्वविख्यात है। त्रिवेन्द्रम का श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर भी अपने वास्तु और धार्मिक महत्व के लिये अत्यंत प्रसिद्ध है।परंतु हिन्दू धर्म की पोंगापंथी यहीं से शुरू हो जाती है. पहली विडम्बना कि यह मंदिर हिन्दू मात्र के लिए(ही) खुला है जबकि इसका कोई निर्धारण नहीं किया जाता कि दर्शनार्थी कौन है! चलिए , यह अच्छी बात है किंतु क़्या ईश्वर का द्वार केवल धर्म विशेष के लिये ही खुला होना चाहिए ? आगे देखिए, मंदिर में प्रवेश के लिए ड्रेस कोड भी है- पुरुष केवल धोती में, सिर्फ धोती में ही अन्दर जा सकता है. उसे पैंट-शर्ट तो क्या बनियान तक उतारनी पडती है. बैग , मोबाइल , जूते –चप्पल और अन्य साजो सामान तो खैर हर बडे मंदिर में बाहर रखना ही होता है. हाँ, मजे की बात यह है कि आपको पर्स ले जाने की पूरी छूट है, उसे तो चेक भी नहीं किया जाता. उसे रखवा लिया तो दान-दक्षिणा अब हमारे दो परिवारों के उपरोक्त सामान मंदिर के क्लॉक रूम में जमा कराने का शुल्क 208/- बना. अब सामान के लिये आप ये न कहें कि ज़्यादा रहा होगा. चार बडे और चार बच्चों के शरीर पर जो भी रहा हो. मेरे दस साल के बेटे को भी शुद्धीकरण की इस प्रक्रिया से गुजरना पडा. औरत अगर साडी में है तो ठीक है नहीं तो उसे भी लुंगीनुमा एक धोती लपेटनी पडती है.हाँ, वे छोटी से लुंगीनुमा धोती का शुल्क 15/- प्रति नग लेते हैं. अन्दर के चढावे अलग हैं जिसमें दूर से जाने वाले श्रद्धालु ही शिकार बनते हैं.
मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर मदुरै में ऐसा कुछ विशेष तो नहीं है परंतु बाहरी लोगों ( जो अपने रंग-रूप और भाषा से पहचान लिए जाते हैं) को प्रवेश शुल्क जैसे संकटों से गुजरना पडता है.
अब आइए रामेश्वरम चलते हैं. यहाँ रामनाथ स्वामी का विश्वविख्यात मंदिर है. भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से यह एक है जिसे लंका विजय अभियान के पूर्व श्रीराम ने खुद स्थापित किया था और जिसकी यात्रा की कामना हर हिन्दू करता है, यह चार धामों में एक है. यहाँ का विधान है कि श्रद्धालु पहले सागर में नहाता है और फिर दर्शन के पूर्व मंदिर में स्थित अग्नितीर्थम के 22 कुंडों में उन्ही गीले कपडों में स्नान करता है. इसके लिये पंडे खूब मोलभाव करते हैं. सरकारी व्यवस्था है, 25/ प्रति व्यक्ति टिकट निर्धारित है पर कौन परवाह करता है इन नियमों की ?
कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानन्द जैसे मनीषी ने तपस्या की थी, ऐसे विवेकवान और उच्च विचारवान की तपः पूत धरती पर पोंगापंथ हावी है, कन्याकुमारी के मंदिर में आपको प्रवेश चाहिए तो आपको कमर के ऊपर पूर्णतया नंगा होना पडेगा ,जैसे सारी अशुद्धता वहीं बसी हो.यहाँ तक देखते-देखते मैं ऊब चुका था. मैंने तो दूर से ही हाथ जोड लिए और सोचता रहा कि क्या इक्कीसवीं सदी में भी हम इन आवरणों को नोच कर फेंक नहीं पाएंगे और हर श्रद्धालु को आत्मिक शांति के लिए मंदिरों में प्रवेश को सर्वसुलभ नहीं कर पाएंगे ? आखिर कब तक हम भगवान के एजेंटों को नियुक्त करते रहेंगे और उनकी सुनते रहेंगे?

Friday, 2 October 2009

उस रात !!!!

राकेश 'सोहम'

वर्ष 1980 ।
मुझे ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में दाखिला मिला था । होस्टल भर चुका था । फ़िर वार्डन से बार-बार अनुग्रह करने पर बताया गया की एक कमरा अब भी खाली है, लेकिन वह पूरा कबाड़खाना है और साफ़-सफाई कराना पड़ेगी । पिताजी ने सहमति देते हुए कहा - 'चलेगा । शहर से कॉलेज दूर पड़ेगा इसलिए हॉस्टल में रहना ज्यादा ठीक है । '
में हॉस्टल में रहने लगा । बाद में रूम-पार्टनर मोहन भी साथ रहने लगा । लगभग महीने भर होने को था । तभी एक दिन -
मेस के खानसामा ने खाने के दौरान राज खोलते हुए मुझसे पूछा, 'और कैसा लग रहा है हॉस्टल में ?'

'बहुत मज़ा आ रहा है ..बस मस्ती', ज़वाब मेरे रूम-पार्टनर ने दिया । मैंने हाँ में सर हिलाया ।
'चलो अच्छा है वरना उस रूम में कोई रहता नहीं था । दो साल से बंद था । उसमें दो वर्ष पूर्व एक स्टुडेंट ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी ।' यह सुनकर कुछ देर के लिए हम दोनों स्तब्ध रह गए । चूंकि हम लोग उस रूम में महीने भर आराम से रहकर गुजार चुके थे इसलिए फ़िर बेफ़िक्र हो गए ।
उस दिन मोहन हफ्ते भर का कहकर घर जाने के लिए निकला था लेकिन फ़िर तीसरे दिन शाम को लौट आया । अपने अंदाज़ में बोला, 'यार, तेरे साथ रहने में मज़ा आता है । आज मैं आ गया हूँ खूब मस्ती करेंगे ।'
उस रात हम दोनों गाते बजाते धूम-धडाम करते रहे । मैं गाता अच्छा था, वह टेबल ऐसे पीटता था मानो तबला बज रहा हो । फ़िर देर रात तक हम दोनों अपने-अपने बिस्तर पर बैठे बतियाते रहे । वह हाँ -हाँ करता रहा, शायद नींद में था इसलिए मेरी बडबड मज़े लेकर सुनता रहा ।
अचानक बाहर हवा बदहवास हो चली थी । बादलों की गडगडाहट के साथ बूंदाबांदी शुरू हो गई थी । मैं एक-बारगी चौंका, 'लो, अब बेमौसम बरसात .... हाय रे ऊपरवाले !' जैसे मोहन मेरे मन की बात समझ गया । उसकी रहस्यमयी मुस्कान मेरी नज़रों में खटक गईमैंने इस विचार को झटक दिया और नींद कब लगी पता नहीं चला ।
प्रातः प्रहार अचानक नींद खुल गयी । मोहन अंधेरे में ठीक उसी तरह अपने बिस्तर पर बैठा था जैसे मैनें उसे रात में सोने के पूर्व देखा था । मुझे आश्चर्य हुआ, 'क्यों बे डरा क्यों रहा है ? नींद नहीं आ रही क्या ?'
'नहीं', वह मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया, 'आज शाम बहुत मज़ा आया, सच तुम मेरे अच्छे मित्र हो ।'
'हूँ, अब सो जाओ सुबह बात करेंगे', मैंने करवट ली थी की किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी । 'अब इतनी सुबह कौनm आ गया ? ' मैनें लगभग चिढ़ते हुए कहा, 'मोहन, जा दरवाजा खोल दे ।'

'तू खोल दे', उसने कहा ।

'उफ़, तू भी यार, .....चलो मैं ही खोलता हूँ.....सबसे अच्छा मित्र जो माना है ।' मैं उठकर दरवाजे की ओर बढ़ गया। दरवाजे के ठीक ऊपर लगी घड़ी में ४ बजने को था । रात्री समाप्ति की थी ।

'इतनी सुबह कौन हो सकता है ?', मैंने जांच लेने की गरज से आवाज़ लगाई , 'कौन है बाहर ?'

बाहर से मोहन की चिर-परिचित अंदाज़ में आवाज़ आई, 'अबे स्साले ....दरवाजा खोल....मैं हूँ मोहन ...कब से दरवाजा पीट रहा हूँ...... ।'

मैं सिहर गया । दरवाजे की चटकनी पर हाथ रखते हुए पीछे पलटकर देखा, मोहन बिस्तर पर वैसे ही बैठा भय और आश्चर्य से मेरी ओर देख रहा था !!!

इधर मेरे हाथ, चटकनी खोलने और न खोलने की स्थिति में जड़ हो गए !!