Sunday, 27 September 2009

रावण के चेहरों पर उड़ता हुआ गुलाल

आलोक नंदन
पुश्त दर पुश्त सेवा करने वाले कहारों से बीर बाबू कुछ इसी तरह पेश आते थे, “अरे मल्हरवा, सुनली हे कि तू अपन बेटी के नाम डौली रखले हे ?”
“जी मलिकार”,  हाथ जोड़े मल्हरवा का जवाब होता था। “अरे बहिन....!!! अभी उ समय न अलई हे कि अपन बेटी के नाम बिलाइती रखबे..., कुछ और रख ले .... भुखरिया, हुलकनी ......  लेकिन इ नमवा हटा दे, ज्यादा माथा पर चढ़के मूते के कोशिश मत कर”, अपने  ख़ास अंदाज़ में बीर बाबू अपने पूर्वजों के तौर-तरीक़ों को हांकते थे. उनके मुंह पर यह जुमला हमेशा होता था, “छोट जात  लतिअइले बड़ जाते बतिअइले”.
इलाके में कई तरह की हवाएं आपस में टकरा रही थीं और जहां तहां लोगों के मुंह से भभकते हुए शोले निकल रहे थे.
“अंग्रेजवन बहिन...सब चल गेलक बाकि इ सब अभी हइये हथन .”
“एक सरकार आविते थे, दूसर सरकार जाइत हे, बाकि हमनी अभी तक इनकर इहां चूत्तर घसित ही.. ”
“अभी तक जवार में चारो तरफ ललटेने जलित थे, इ लोग बिजली के तार गिरही न देलन...अब मोबाइल कनेक्शन लेके घूमित हथन...सीधे सरकार से बात करित हथन ”
“एक बार में चढ़ जायके काम हे... ”
“बाकि अपनो अदमियन सब भी तो बहिनचोदवे हे...कई बार तो समझा चुकली हे कि अब इ लोग के चूत्तर सूंघे के जरूरत न हे.”
कहरटोला के कई-कई बूढे़ मर चुके थे, जो इन भड़कते शोलों  को दबाते थे. कुछ जवान लोगों के बालों में सफ़ेदी तो आई थी, लेकिन कुछ नई हवाओं ने भी उनके दिमागों में सूराग किया था और ये नई हवा लाने वाले कहारों के नए लौंडे थे, जो कमाने-खाने के लिए पर फरफड़ाते हुए बाहर निकले थे. बाहर निकलने के बाद उन्हें तमाम तरह के कपड़े, जूते, कोट, चप्पल, बेल्ट आदि बनाने वाले कारखानों ने चूसा तो था, लेकिन नई हवाओं ने इनके दिमाग़ को फेरा भी था. इलाके में बुदबुदाहट  इन्होंने ही शुरु की थी. इनकी यही बुदबुदाहट  हवाओं में घुलती चली गई.
ये लोग ज़मीन और ज़मीन की परतों की बात करते थे. आसमान की बात करते थे. ग्रहों और नक्षत्रों की बात करते थे. पेड़ पौधों और खेत-खलिहानों की बात करते थे. बहुत सारे लोगों की लड़ाइयों की भी बात करते थे और उन लड़ाइयों से सीखने की बात करते थे. ऐसी कोई भी ग़लती नहीं करने की बात करते थे, जिसका जवाब उन्हें ख़ुद देना पड़े.
दशहरे में कहार टोली की एक काली बुढ़िया झूम के नाचती थी. उस पर माई आती थी. पूरा कहरटोली उसके सामने हाथ जोड़े रहती थी. कोई फूल देता था, कोई नारियल, कोई लड्डू, तो कोई सिंदूर. वह माई सिर्फ़ मैतू दुसाध से ही मानती थी. वह उसके सामने खस्सी को लाता था और एक बार में ही उसका गला उतार देता था. इसकी तैयारी उसे सुबह से ही करनी होती थी .  दिन भर वह अपने हंसिये को पजाता रहता था.
पिछले कुछ वर्षों से वह दशहरा के दिन नए कहारों को देखकर बुदबुदाने लगी थी, “खून पीएगा, खून पीएगा. कितना खून पीएगा धरती तो पहले ही खून से लाल है. और मेरी प्यास अभी तक नहीं बुझी, तो तेरी कैसे बुझेगी.” उसकी इस बुदबुदाहट से वहां मौजूद सभी लोगों की हड्डियों तक से पसीने छूट जाते थे, लेकिन नए कहारों के साथ आने वाले बाहर के कुछ लोग इसे नौटंकी बताते थे. इसको लेकर भ्रम और विभ्रम के नियमों पर बहस करते थे, और फिर उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखते थे. उनकी यह बहस दशहरे के पंद्रह दिन पहले से लेकर पंद्रह दिन बाद तक चलती थी. इस बार के दशहरा को ख़ून में डुबोने की बात वह महीनों पहले से करती आ रही थी. पूरे टोले में कंपकंपी छूटी हुई थी.
उसकी बुदबुदाहट हवाओं में तैरते हुए बभनटोले के आंगनों, कमरों और दलानों तक पहुंच गई  थी.  बीर बाबू के कान खड़े थे. बहुत दिनों से बाहरी हवाओं की चरमराहट उन्हें भी सुनाई दे रही थी. कुछ पैसे लेने के बाद अपनी ज़मीन उनको देकर बाहर जाके दो-दो हजार की नौकरी करने वाले बाभन के नए लौंडे भी दशहरा मनाने के लिए जुट रहे थे.
इधर विजयदशमी का नगाड़ा बजा, उधर बंदूकें कस गई. ऐलान हुआ, “हम अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे, यह ज़मीन हमारी है. हम अपनी ज़मीन लेंगे.”
उस दिन माई चिल्लाती रही,“ख़ून चाहिए, ख़ून चाहिए.” कल रात को ही कहारों की बस्ती में आने वाला एक बाहरी छोकरा उसकी ओर देखते हुए बोला, “तुम्हारी तरह हर किसी को ख़ून की प्यास हो जाएगी, तो फिर दुनिया किधर जाएगी? पकड़ो इसे और खाट में बांध दो.” कुछ नए कहारों ने उसे खाट में बांधने की कोशिश की तो कहारटोली में हो-हल्ला शुरू हो गया. बभनटोली से भी लोग दौड़ दौड़ कर आने लगे. तमाशा बढ़ता गया. माई ख़ून-ख़ून चिल्ला रही थी.
जिस समय बभनटोला से लोग भाग-भाग कर इधर आ रहे थे, उसी समय अगल-बगल से कई दस्ते गांव में घुसने के बाद घरों में घुस कर सभी महिलाओं और बच्चों को अपने क़ब्ज़े में ले रहे थे.
बभनटोले के सारे मर्द कहारटोली में फंस गए. माई को एक शिमर के पेड़ के नीचे बिठा दिया गया और पूरे टोले को लिबरेट घोषित कर दिया गया. बाभनों के बीच में बीर बाबू भी फंसे हुए थे. उनको भी पकड़कर माई के सामने खड़ा किया गया.
एक बाहरी नौजवान सामने आया और बीर बाबू से बोला, “हम ख़ून नहीं चाहते हैं, हम बस ज़मीन चाहते हैं. फ़िलहाल जिनके पास घर है, वो उनके पास ही रहेगा, बाक़ी ज़मीन स्वतंत्र हुई.  हर परिवार के पीछे तीन एकड़ मिलेगा. हमें ख़ून नहीं चाहिए.”
बीर बाबू चौंधियाए हुए थे, गुर्राते हुए बोले, “लेकिन हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे.”
“ज़मीन तो छोड़नी ही होगी”, उस नौजवान की गुर्राहट कुछ अधिक थी.
माई फिर चिल्लाई, “मुझे ख़ून चाहिए... मुझे ख़ून चाहिए.”
मैतू भीड़ को चीरता हुआ सामने आया. उसके हाथ में हंसुआ चमक रहा था. कोई दौड़कर एक खस्सी को सामने ले आया. वह तेज़ी से खस्सी की ओर लपका, लेकिन दो हथियारबंद लोगों ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया और खस्सी को उसके हाथ से छुड़ा लिया. वह ज़ोर-ज़ोर से मेमिया रहा था.
नौजवान बाबू सिंह की आंखों में झांकते हुए बोला, “हमें ख़ून नहीं चाहिए. हम पर विश्वास करो. हम वही कर रहे हैं, जो सभी लोगों के हित में है.” दो लोगों की ओर देखते हुए बोला, “इस माई को कमरे में बंद कर दो और तब तक पीटो नगाड़ा जब तक सब साथ मिल कर मदहोश न हो जाएं. ”
किसी ने जोर से नगाड़ा पीटा, फिर देखते ही देखते एक ही लय ताल में चारों ओर से नगाड़ों की आवाज़ आने लगी.  दूर-दूर से लोग नगाड़ा पीटते आ रहे थे.
सभी मैदान की ओर चलो. मैदान में रावण का दसमुंहा सिर और धड़ रखा हुआ था. कई टोलों की भीड़ दसों दिशाओं से वहां जुट रही थी. कौन बाभन था, कौन भुईयां, कौन चमार, कौन डोम, कौन कुर्मी, कौन कोयरी, कौन लाला, कौन अहिर, कौन राजपूत, कौन मिया....सब के सब एक भीड़ में दूर तक फैले हुए अजगर की तरह नज़र आ रहे थे.
नौजवान ने इशारा किया और नगाड़ों की आवाज शांत हो गई. वह एक ऊंचे टीले पर चढ़ा और अजगरी भीड़ की तरफ़ देखकर जोर से चिघाड़ा, “आज के बाद हम रावण नहीं जलाएंगे. रावण को जलाने के लिए इसे ज़िंदा करना पड़ता है. बुराई को एक बार में मार डालो, बार-बार नहीं. झूमो,  नाचो और गाओ.....”
नगाड़ों, तुतही, सारंगी, ढोल-छाल की आवाज़ों के साथ उड़ते हुए गुलाल से आसमान लाल हो गया.  ज़िंदा होने के लिए कसमसा रहे रावण के चेहरों पर भी उड़ता हुआ लाल गुलाल पड़ रहा था.
समाप्त

Friday, 25 September 2009

आकृतियां (कहानी)

आलोक नंदन
आसमान में काफी ऊंचाई पर मंडराते हुये चीलों के झूंड पर उसकी नजरे टिकी हुई थी, दिमाग के परतों के तह में अचिन्हित प्रतिबंबों के रूप में कई आकृतियां एक दूसरे से उलझते हुये जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रही थी। नजरें जितनी दूर तक जा रही थी, दिमाग की परतें उतनी ही गहराई से खुलती जा रही थी।
आकृतियों ने एक पतली सी तीखी नाक नक्शे काली लड़की का वजूद अख्तियार किया। एक बंद कमरे में पिछले तीन घंटे से वह कैलकुलस के सवालों को हल कर रहा था, अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, फिर हौले से दरवाजा खुला। अपने बांह में कुछ कपड़े समेटे हुये कमरे में दाखिल हुई थी और मुस्कराते हुये कहा था, “मेरे घर के नल में पानी नहीं आ रहा है, तुम कहो तो तुम्हारे बाथरूम में स्नान कर लूं।”
“लेकिन अभी मेरे यहां कोई नहीं है’’, कलम को उस कापी के ऊपर पटकते हुये थोड़ी खीज में वह बोला था, जिस पर कैलकुलस के एक सवाल को वह आधा हल कर चुका था।
“कोई बात नहीं, मैं नहा के चली जाऊँगी”, यह बोलते हुये वह काली लड़की कमरे से सटे हुये बाथरुम की ओर चली गई थी। बाथरूम के अंदर से शरीर पर पानी उड़ेलने और गुनगुनाने की आवाज आती रही और वह आधा हल किये हुये सवाल पर बेतरतीब तरह से कलम चलाता जा रहा था। पियर्स साबुन की खुश्बू फेंफड़े के अंदर दूर तक धंसती जा रही थी। अपने भींगे बालों को तौलियों में समेटते हुये बाहर निकलते हुये उस काली लड़की ने कहा था, “तुम बुद्धू हो,”। और फिर खिलखिलाते हुये चली गई थी। कैलकुलस के सवालों को धड़ाधड़ हल करने वाला उसका दिमाग कई दिनों तक लड़की खिलखिलाहट और उसके शब्दों में उलझा रहा था।
दूर आसमान में चीलों के झूंड वृताकार गति में एक लय और ताल के साथ उड़ान भर रहे थे। बीच-बीच में कोई चील अपने पंखों को एक दो बार हिला डूला देता था।
अपने घर के सामने खुले छत पर जाड़े की गुनगुनाती धूम में तल्लीनता के साथ पढ़ती हुई गोल चेहरे वाली उस गोरी लड़की की आकृति ऊभरी, जो उससे उम्र में बहुत बड़ी थी। उसके कहने पर शहर के एक प्रसिद्ध नाटककार के लिए वह सरकारी कैंटिन से थोक भाव में रसगुल्ले खरीद कर ले जाता था। इन रसगुल्लों को ले जाने के लिए वह अपने बड़े भाई की साइकिल की चाभी उसे दे दिया करती थी। मुस्कान के साथ उस गोरी लड़की के आग्रह और साइकिल चलाने के लोभ के कारण वह अक्सर उस नाटककार के लिए रसगुल्ले लेकर जाया करता था। एक दिन वह अपने अपने परिवार के साथ शहर के बाहर किसी की शादी में गई थी। कुछ दिन के बाद खबर आई थी की वह जलकर मर गई। इसके बाद यह खबर उड़ी की उसे जलाकर मार दिया था। वर्षों वह लड़की उसके सपनों में आती रही थी...कुछ कहना चाहती थी,लेकिन क्या ?
दोनों पंखों को समेटकर एक चील ने नीचे की ओर गोता लगाया और फिर अपने पंख फैला कर घेरा को तोड़ते हुये एक नई दिशा में उड़ान भरने लगा। उसकी नजरें उसी चील का अनुसरण करने लगी, और इसके साथ ही मस्तिष्क के एक अन्य परत में हरकत हुई।
“राब्सपीयर एक दयालु जज था, अपनी डायरी में लिखता है, किसी भी चोर बदमाश के खिलाफ सजा सुनाने हुये मेरा दिल रोता है। वही राब्सपीयर फ्रांस में जैकोबिन क्ल्ब की कमान संभालते हुये गिलोटिन का सूत्रधार बनता है, और हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है। एक दयालु जज पूरे फ्रांस को बचाने के लिए एक खौफनाक शासक के रूप में तब्दील जो जाता है,” एक अधनंगे प्रोफेसर की आवाज उसके कानों में गुंजने लगी, और उसकी भद्दी सी आकृति मानसिक पटल पर उभर आई। एक चौड़े चेहरे वाले युवक की आकृति तेजी से प्रोफेसर की आकृति को धक्का देते हुये सामने आती है, और उसकी ऊंची आवाज गूंज उठती है, “जिंदगी की मौलिक जरूरतों को भी मैं पूरा नहीं कर पा रहा हूं। दस बाई दस के एक कमरे में मैं तीन लोगों के साथ रहता हूं। घर वाले पांच साल से पड़े हुये हैं कि शादी कर लो, अब खुद का खर्चा तो चल नहीं रहा है, ऊपर से बीवी ले आऊ? पता नहीं अपनी जिंदगी इतनी कठिन क्यों है, लेकिन मैं हारा नहीं हूं, बहुत धैर्य है मेरे अँदर, जरूर प्रकृति ने मेरे बारे में कुछ अजूबा सोच रखा होगा, फिलहाल तो सफरिंग का दौर है। मैं फिल्म बनाना चाहता हूं, फिल्म...”
उसके हटने के पहले ही एक महिला की अस्त पस्त आकृति हौले से सामने आती है और मद्धिम स्वर में कहती है, “तुम्हे प्यार करना नहीं आता। तुम कभी नही समझ सकते कि एक औरत कैसा प्यार चाहती है। तुम सोचते ज्यादा हो, दिल नाम की चीज तुम्हारे अंदर नहीं है। प्यार दिल से किया जाता है, दिमाग से नहीं।”
अकेला उड़ता हुया चील एक आवारा बादल को चीरते हुये उसके अंदर समा गया । और फिर उसे एक झटके में बादलों की ओट से बात करने वाला बिना आकृति वाले मूसा के ईश्वर का अहसास हुआ था। फराओ के सम्राज्य से भूखे नंगे निकलने वाले एक बड़े काफिले की पदचाप सुनाई देने लगी, नया झरना, नई जमीन और नये कुएं का वादा...फिर लुट-खसोट, चित्कार और कत्लेआम..ओह, क्या ईश्वर की भी अलग-अलग जाति है...और एक जाति का ईश्वर दूसरी जाति को नष्ट करने की शक्ति देता है। फिर भरी दोपहरी में हाथ में जलता हुआ लालटेन लेकर लोगों से सवाल करता हुआ एक आकृति, “कहां है ईश्वर है, दिन में लालटेन की रोशनी में मैं उसे खोज रहा हूं।”
बादलों को भेद कर वह अकेला चील दूसरी ओर निकला। विकृत आंखों वाले एक हांफते हुये हिरण कि आकृति दूसरे पटल पर तैरने लगी, फिर छम छम कर दौड़ते हुये मोर।.......मुझे नीला रंग बहुत पसंद है, बड़ी-बड़ी नीली आंखों वाली एक लड़की आवाज उसके कानों में गूंजी। एक सवाल छटक कर इधर से उधर हुआ, तूम ?... तुम मेरे अंदर बैठी थी और मैं तुम्हे यहां वहां खोज रहा था ? लड़की खिलखिला उठी...तुम भी तो मेरे अँदर बैठे रहे....
चील आसमान में लंबा घेरा बनाते हुये फिर आपस अपनी झूंड में आ मिला। और अचेतन में धंसी सारी आकृतियों ने घेरे का रूप ले लिया.........हौले से उसने अपनी आंखे बंद कर ली...और परतो का अंतर खत्म हो गया...चीलों के झूंड और अंदर की आकृतियां आपस में उलझने लगे.....और नींद की चादर में वह सिमटता चला गया।
समाप्त

भारत के दिल की भाषा है हिंदी


भारतीय दूतावास में आयोजन, चीनी मूल के सात हिंदी विद्वान सम्मानित
हिन्दी पखवाड़े के तहत आयोजनों का क्रम केवल देश के भीतर ही नहीं, बाहर भी चल रहा है. भारत से बाहर हिंदी की अलख जगाने के इसी क्रम में चीन में पेकिंग स्थित भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र के तत्वावधान में एक आयोजन किया गया. इस आयोजन में चीन के सात वरिष्ठ हिंदी विद्वानों को सम्मानित किया गया.
चीन से यह सूचना पेकिंग विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़ में प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र शुक्ल ने दी. सम्मानित किए गए विद्वानों में प्रो. लियोऊ आनवू, प्रो. यिन होंयुवान, प्रो. चिन तिंग हान, प्रो. च्यांग चिंगख्वेइ, प्रो. वांग चिंनफङ, प्रो. छङ श्वेपिन, प्रो. चाओ युह्वा शामिल हैं. इसके अलावा इस अवसर पर हिंदी निबंध प्रतियोगिता भी आयोजित की गई.
इस प्रतियोगिता में चाइना रेडियो की थांग य्वानक्वेइ को प्रथम, पेकिंग विश्वविद्यालय के ली मिन (विवेक) को दूसरा, कुमारी रोशनी को तीसरा तथा चन्द्रिमा और ह्वा लीयू को सांत्वना पुरस्कार प्राप्त हुए. जबकि इसी आयोजन भारतीय मूल वर्ग में हेमा कृपलानी को प्रथम, हेमा मिश्रा को द्वितीय और आरुणि मिश्रा को सांत्वना पुरस्कार मिला.
आयोजन के मुख्य अतिथि एवं भारतीय दूतावास के मिशन के उप प्रमुख जयदीप मजूमदार ने कहा कि हिंदी भारत की केवल राजभाषा या राष्ट्र भाषा ही नहीं है, यह भारत के ह्वदय की भाषा है. यह सांस्कृतिक समन्वय और मानसिक आजादी की भाषा है. अन्तरराष्ट्रीय जगत में हिन्दी के लोक प्रियता बढ़ रही है. विशेष रूप से चीन में हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन की विशिष्ट परंपरा है. हिन्दी दिवस पर चीनी विद्वानों का यह सम्मान चीन और भारत के प्राचीन सम्बंधों के सुदृढीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. चीन के हिन्दी प्रेमियों की आज इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति हिन्दी की लोकप्रियता और आप के हिन्दी एवं भारत प्रेम का प्रमाण है.
पेकिंग विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अतिथि प्रोफेसर डॉ देवेन्द्र शुक्ल ने कहा कि आज हिन्दी का राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय संदर्भ दोनों बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. आज हिन्दी विश्व भाषा का रूप धारण कर रही है. भारतीय दूतावास का यह आयोजन हिन्दी के लिए एक शुभसंकेत. हिन्दी भारत और विश्व की संस्कृति के संवाद का मंच बने. तभी हम विश्व हिन्दी का विश्व मन रच सकेंगे.
चायना रेडियो इंटरनेशनल के सलाहकार एवं वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार प्रो. वांग चिनफ़ङ ने कहा कि हिन्दी हमें विश्वबंधुत्व और प्रेम का संदेश देती है. हिन्दी उस सुगंध की तरह है जो विश्व के सामान्य जन को संबोधित है. चीन के लोगों को उस में प्रेम और आत्मीयता का अनुभव होता है.
हिन्दी दिवस कार्यक्रम का कुशल संयोजन एवं संचालन सांस्कृतिक सचिव चिन्मय नायक ने किया उन्होंने कहा कि यह हिन्दी दिवस केवल एक कार्यक्रम मात्र नहीं है, बल्कि यह हिन्दी के मंच पर चीन और भारत के मिलन का सौहार्द-प्रतीक भी है.

थ्री फिफ्टीन (कहानी)

आलोक नंदन
बाहर के लौंडे कैंपस के अंदर रंगदारी करने आ ही जाते थे। सभी झूंड में होते थे, इसलिए उनसे कोई उलझता -नहीं था। किसी की भी साइकिल को छिन लेना और लप्पड़ थप्पड़ कर देना उनके लिए मामूली बात thi, सिगरेट के छल्ले उड़ाने जैसा।
श्रेया पूरे कालेज की माल थी, चुपके-चुपके हर कोई उसको अपने सपनों की हीरोईन समझता था। कुछ ज्यादा बोलने वाले लौंडे ग्रुपबाजी में बैठकर आपस में ही श्रेया की खूब ऐसी तैसी करते थे, उसके नाकों में पड़ी नथ से लेकर उसके रूमाल तक की चर्चा होती थी। अब ये लौंडों की औकात पर निर्भर करता था कि कौन क्या बोलता है। उनकी बातों को सुनकर एसा लगता था कि कोका पंडित से लेकर कालीदास तक श्रेया के मामले में फेल हो जाते।
प्रैक्टिकल रूम में हाथों में दस्तानों के साथ जार लिये लौंडों की बातें श्रेया की रेटिना से शुरू होकर कहां-कहां घूमती थी कोई नहीं जानता था।
भोलुआ बाहरी था, लेकिन छूरा और गोली चलाने का उसका हिस्ट्री रिपोर्ट अंदर के प्रैक्टिकल से लेकर स्पोर्ट्स तक के लौंडों पर भारी पड़ता था। यदि गलती से वह किसी क्लास में घुस जाता था तो प्रोफेसर और लड़के यही सोचते थे कि कैसे जल्दी क्लास खत्म हो। और गलती से भोलुआ को प्रोफेसर की कोई बात समझ में नई आती थी तो वो सकता था कि क्लास अगले तीन चार घंटे तक चलता रहे। उसके कमर में हमेशा दो थ्री फिफ्टीन की देसी पिस्तौल होती थी, जिसमें एक बार में सिर्फ एक ही गोली लोड की जा सकती थी। पूरे इलाके को पता होता था कि उसके कमर में समान (देसी पिस्तौल) लगा रहता है।
राशि को भी बकबक करने की आदत थी, एक बार शुरु हो जाता था तो पता नहीं कहां से कहां पहुंच जाता था। उसके दोस्तों ने कहा, साला तूम इतना बकर बकर करता है, कोई बैनर बनाके बक बक कर...नहीं तो कोई बैनर के नीचे बक बक कर.....। एक बार वह एक बैनर के नीचे बक बक करने गया था और रौ में बोलता चला गया, बैनर बना के समाज का ठेका उठाने वाले जितने भी लोग वही सारी समस्याओं की जड़ है। बैनरों को हटा दो और समाज को स्वतंत्ररूप से शिक्षित करो और होने दो...फिर सबकुछ ठीक हो जाएगा। मिर्ची तो बहुत लोगों को लगी थी लेकिन ऊपर से सब ने उसकी तारीफ की थी। और बाद में कई बैनर वाले कह रहे थे कि हमारी बैनर में आ जाओ, मिलकर काम करेंगे। लेकिन वह अपनी धुन पर अपनी ही चाल में चलता था।
उस सुबह बलुअरिया मार लिया था, वो भी आधा लबनी....टेनिस कोर्ट में चौकड़ी लगी हुई थी। सभी लौंडे इधर उधर लेटें हुये थे, कोर्ट से दूर। बलुअरिया के नशे में वो पिंगल मार गया था, कि आज श्रेया को प्रोपेज करने जा रहा है। पूरा कालेज इंतजार कर रहा था कि अब आगे क्या होने वाला है। सामने से श्रेया आती हुई दिखाई दी, और वो आगे बढ़ गया, प्रपोज करने के मूड में हालांकि उसकी हवा खराब थी।
श्रेया के सामने आते ही उसके मूंह से निकला, हमलोग एक बोलने वाला प्रोग्राम रख रहे हैं उसमें आपको इनवाइट कर रहे हैं, अभी कार्ड नहीं है लेकिन जल्द ही कार्ड भी दे देंगे... ...थैंक्यू....। श्रेया को समझने का मौका दिये बिना वह उसका हाथ लपक लिया और मिलाकर चलता बना। सबकुछ पलक झपकते हुआ। सभी लौंडे देख रहे थे। उसके जाते ही सभी लौंडो के बीच में दिन भर उड़ाता रहा कि उसने कैसे प्रोपोज किया, और उड़ते हुये यह खबर भोलुओ के कानों में पड़ गई। और कुछ देर के बाद इसके कानों में भी कि भोलुओ उसे पिस्तौल के खोज रहा है।
पंद्रह दिन तक डर से घर में पड़ा रहा। जिस दिन पहुंचा उसी दिन सभागार में कोई बोलने का कार्यक्रम चल रहा था। हौल में घूसते ही उसको बोलने के लिए वाली सूची में सभी लौंडो ने डलवा दिया। मंच पर चढ़ने के कुछ देर बाद उसकी नजर तीसरे रो में बैठी श्रेया और पांचवे रो में बैठे भोलुओ पर पड़ी....उसके मुंह से निकला....ले लोटा...यह समान लगाये हुये होगा.....अब उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, उसने मन ही मन कहा, हे भगवान कृष्ण बचा ले....और फिर माइक के सामने शुरु हो गया, दुनिया में एसा कौन भाई है जो अपनी बहन से कहेगा तू किसी के साथ भाग जा....लेकिन कृष्ण ने कहा था। क्या आज के समय कृष्ण जैसा कोई कर सकता है। क्या मैं अपनी बहन को कह सकता हूं कि वह किसी के साथ भाग जाये, क्या आप यह अपनी बहन से कह सकते हैं। बोलने के दौरान उसकी नजर भोलुआ पर ही थी, और भोलुआ की उस पर। आज कृष्ण जैसे भाइयों की जरूरत है जो अपनी बहन को समझे और उनके जीवन को खुशहाल बनाये।
सभा खत्म हुई तो वह बाहर निकला। एक लौंडा उसके पास आया और बोला, भोलुआ बुलइतै हथुन, चलअ।
उसके मूंह से निकला, लेकिन उनका पास त समान रहता है, हम न जायब.......कहीं उड़ा देलन त....आज पंद्रह दिन बाद तो कालेज अइली हे, ईहां से सीधे ऊपरे चल जाई का ? हम न जायब....
लौंडा बोला, भोलुआ भईया खुश हथुन, चलआ. बड़ी मुश्किल से वह समझा पाया कि जब तक वह भोलुआ के थ्री नटा को देख नहीं लेता तब तक उनका दर्शन कैसे कर सकता है। थोड़ी देर बाद भोलुआ का थ्रीनटा लेके वही लौंडा वहां खड़ा था। राशि ने उसके हाथ से पिस्तौल लेकर उसे खोला और नली से गोली बाहर निकालकर पाकेट में रख लिया। थोड़ी देर के बाद कैंपस के एक कोने में वह भोलुआ के सामने खड़ा था। उसकी ऊपर की सांसे ऊपर और नीचे की सांसे नीचे लटकी हुई थी। उसको देखते ही भोलुआ ने कहा, अरे राशि भाई तु तो बहुत ही बढ़िया बोल ह...आज तो एकदम हिला देलअ...कोई दिक्कत न न हव....कुछ होतव त बतइह....मन गद गद कर देल...भोलुआ को वाकई में खुश पाकर उसकी हवा ठीक हुई।
उसने पिस्तौल निकाल कर भोलुआ को देते हुये कहा, इ ल....ई तोरे पास ठीक रह तव......
अरे आज यही खुशी में तोरा सलामी देवे के मन करी थे...इतना कहने के साथ भोलुआ ने पिस्तौल में गोली भरा और नली को आसमान की ओर करके घोड़ा दबा दिया। धमाके की आवाज से कैंपस में हड़कंप मच गया। सभी लौंडो के बीच हल्ला हो गया कि भोलुआ ने राशि का पोस्टमार्टम कर दिया।
यह खबर कैंटिन में बैठी श्रेया के कानों भी पड़ी और वह भी भागती हुई उस स्थान पर पहुंची जहां पर भोलुआ ने हवा में गोली चलाई थी। भोलुआ श्रेया को देखकर भौचक था। और राशि के समझ में भी नहीं आ रहा था कि अभी-अभी क्या हुआ है, और क्या होने वाला है। इसके पहले कि श्रेया कुछ कह पाती भोलुआ के मुंह से निकला, तू राशि भाई से आई लव कह हहू ??? कोई बात न हई खूब कर....राशि भाई के बात हम समझ गईली हे....कौन भाई अपन बहिन से कहत कि ऊ भाग जाये...तू हमर बहिन रहतल हल त हम यही कहती हल...
थ्री नटा को अपनी कमर में खोसकर वह राशि के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुये आगे बढ़ गया।
(समाप्त)

Tuesday, 22 September 2009

सत्मेव जयते!!!!....लेकिन सच से कोई मरता है तो ?

पल्लवी की मौत की खबर फेसबुक पर दिखी। पुरी खबर को पढ़ा। खबर में लिखा था कि आगरा की रहने वाली पल्लवी ने सच का सामना में रुपा गांगुली वाला एपिसोड देखने के बाद आत्महत्या कर लिया। पूरे खबर को पढ़ कर यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि पल्लवी ने सच का सामना देखने बाद ही आतमहत्या किया है या नहीं। खबरों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के संदर्भ में पल्लवी का मामला मुझे एक गंभीर मामला लग रहा था। इसलिये इस खबर को और जानने के लिए मैंने नेट पर इधर-उधर सर्च करना शुरु कर दिया। नेट पर पल्लवी से संबंधित जितने भी खबर थे, सब की हेडिंग में इस बात का जिक्र था कि पल्लवी ने सच का सामना देखने के बाद आत्महत्या के लिए कदम उठाया। किसी कार्यक्रम को देखकर जब लोग मनोवैज्ञानिक तौर पर आत्महत्या करने के लिए प्रेरित होते हैं तो जनहित में उस कार्यक्रम पर सवाल उठना जरूरी है।
इस घटना से संबंधित दो तथ्यों से स्थापित हो रहा है कि पल्लवी आत्महत्या करने के कगार पर सच का सामना में रूप गांगुली को देखने और सुनने के बाद पहुंची। अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है कि एक अच्छी मां, और अच्छी पत्नी नहीं बन सकी। खबरों के मुताबिक इसी तरह की बात रुपा गांगुली ने भी इस कार्यक्रम में कहा था। पल्लनी ने अपने सुसाइड खत में यह नहीं कहा है कि वह आत्महत्या सच का सामना देखने के बाद कर रही है, और सामान्यतौर पर वह एसा लिख भी नहीं सकती थी। पल्लवी महेंद्र नाम के किसी व्यक्ति के साथ रह रही थी। महेंद्र का कहना है कि सच का सामना में रुपा गांगुली वाला एपिसोड देखने के बाद वह डिप्रेशन में चली गई थी। पल्लवी का सुसाइड खत और महेंद्र के बयान सच का सामना के औचित्य को कठघड़े में करने के लिए काफी है।
डिप्रेशन के कई स्टेज होते हैं। यदि इनका सही समय पर पता चल जाये तो विधिवत इलाज करके व्यक्ति को डिप्रेशन से निकाला जा सकता है। डिप्रेशन एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। अपने जीवन की व्यक्तिगत उलझनों के कारण पल्लवी पहले से ही डिप्रेशन में थी। अब वह डिप्रेशन के किस स्टेज में थी, इस संबंध में कोई खबर नहीं लिखी गई है। यह भी पता लगाने की कोशिश नहीं की गई है कि वह अपने डिप्रेशन का इलाज किसी मानसिक चिकित्सक से करा रही थी या नहीं। लेकिन इतना तय है कि वह डिप्रेशन में थी। और जब सच का सामना में पैसों का लालच देकर रुपा गांगुली को अपने जीवन से संबंधित कुछ कट्टू निजी स्मृतियों को याद करने के लिये कुरेदा गया तो इसका सीधा रिफ्लेक्शन पल्लवी पर हुया। वह सीधे डिप्रेशन के उस स्टेज में पहुंच गई जहां उसे अपना जीवन निरर्थक लगने लगा।
निसंदेह उस समय सारी दुनिया अपनी गति में चल रही थी। लेकिन ठीक उसी समय पल्लवी के दिमाग में अपने वजूद को खत्म करने का जद्दोजहद भी चल रहा था। हो सकता है यह जद्दोजहद उसके दिमाग में बहुत पहले से चल रहा हो, लेकिन सच का सामना ने उसे जद्दोजहद से निकल कर सीधे आत्महत्या करने के निर्णय तक पहुंचा दिया। पल्लवी के लिए सच का सामना ने उद्दीपक का काम किया है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सच का सामना को लोग पसंद कर रहे हैं। एक झूठ पकड़ने वाली मशीन के सामने लोगों को बैठा कर उनके निजी जिंदगी को कूरेदा जा रहा है। हर व्यक्ति के निजी जीवन के अपने अनुभव और सच्चाईयां होती हैं। पैसों का लालच देकर उन्हें हौट सीट पर बैठाया जा रहा है और फिर एसे सवाल पूछे रहे हैं,जिनका सीधा संबंध उनके निजी अतीत और मनोविज्ञान से है। और पूछे गये सवालों के जवाब का इफेक्ट पल्लवी की मौत के रूप में सामने आ रहा है। अब प्रश्न उठता है कि जब लोग किसी कार्यक्रम को देखकर आत्महत्या करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं तो उस कार्यक्रम का औचित्य क्या है ? एसे सच का औचित्य क्या है, जो लोगों के दिमाग को नकारात्मक दिशा में सक्रिय कर रहे हैं?
जनहित में किसी भी कार्यक्रम का मूल्यांकन उसकी लोकप्रियता और रेवेन्यू एकत्र करने की उसकी क्षमता से होता है। सच का सामना इन दोनों मापदंडों पर ठीक जा रहा है। इसकी मार्केटिंग स्ट्रेजी भी उम्दा है, और शायद प्रस्तुतिकरण भी। लेकिन इफेक्ट के स्तर पर यह कार्यक्रम लोगों के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। पल्लवी की मौत से हो सकता है इस कार्यक्रम की लोकप्रियता में थोड़ा उछाल आये, लेकिन पल्लवी की तरह की दो चार और लोगों ने आत्महत्या कर लिया तो क्या होगा।
इसके पहले शक्तिमान सीरियल को लेकर भी कुछ इसी तरह का इफेक्ट बच्चों में देखने को मिला था। बच्चे शक्तिमान की तरह ही गोल-गोल नाचते हुये हवा में उड़ने की कोशिश करते हुये यहां वहां से छलांग लगा रहे थे। इसके बाद बच्चों में शक्तिमान के इफेक्ट को रोकने के लिए मुकेश खन्ना को बार-बार अपील करना पड़ा था। यहां तक कि कार्यक्रम के पहले ही वह शक्तिमान के ड्रेस में आते थे और बच्चों को समझाते थे कि वह शक्तिमान जैसी हरकतें नहीं करे।
सच का सामना बच्चों पर नहीं, बड़ों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। शक्तिमान में तो बच्चे अति उत्साह में आकर शक्तिमान की तरह नकल कर रहे थे, लेकिन सच का सामना तो बड़ों के दिमाग में कुलबुलाने वाले नकारात्मक किटाणुओं सक्रिय कर रहा है। शक्तिमान का प्रभाव आत्मघाती था, लेकिन दिमाग को नकारात्मक दिशा में नहीं ढकेलता था। वह बच्चों के दिमाग को फैन्टसी की दुनिया में ले जाता था। लेकिन सच का सामना बड़ों में अवसाद को और बढ़ा रहा है।
फेसबुक पर पल्लवी के खबर पर मैंने अपनी प्रतिक्रया में सच का सामना का मूल्यांकन इफेक्ट के आधार पर करते हुये इसे जनहित में रोके जाने की बात कही थी। इसमें लोगों के लालच का फायदा उठाकर उनके जीवन को उघाड़ा जा रहा है। हौट सीट पर बैठने के लिए किसी को फोर्स नहीं किया जा रहा है, लेकिन यहां पर बैठाने के लिए भरपूर चारा डाला जा रहा है। आज दोबारा जब फेसबुक खोला तो वहां पर से मेरी प्रतिक्रिया वाली पल्लवी की खबर गायब थी, शायद डिलिट कमांड मार दिया गया। अपनी प्रतिक्रिया को वहां न पाकर मैं इसे फिर से लिखने के लिए प्रेरित हुया हूं। अपनी प्रतिक्रिया को फेसबुक पर डिलिट करने के लिए अपने फेसबुक के उस साथी को कोटि कोटि धन्यवाद देता हूं। सत्मेव जयते!!!!....लेकिन सच से कोई मरता है तो ?

Saturday, 19 September 2009

शब्द का संगीत

पिछले दिनों सम (सोसायटी फॉर एक्शन थ्रू म्यूजिक) और संगीत नायक पं0 दरगाही मिश्र संगीत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक सुरूचिपूर्ण सादगी भरे समारोह में पद्मभूषण डा0 शन्नो खुराना ने दो महत्वपूर्ण सांगीतिक ग्रंथों का लोकार्पण किया. पहली पुस्तक भारतीय संगीत के नये आयाम - पं0 विजयशंकर मिश्र द्वारा संपादित थी, जबकि दूसरी पुस्तक पं0 विष्णु नारायण भातखंडे और पं0 ओंकारनाथ ठाकुर का सांगीतिक चिंतन डा0 आकांक्षी (वाराणसी) द्वारा लिखित. इस अवसर पर आयोजित पं0 दरगाही मिश्र राष्ट्रीय परिसंवाद में विदुषी शन्नो खुराना, पं0 विजयशंकर मिश्र (दिल्ली), मंजुबाला शुक्ला (वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान), अमित वर्मा (शान्ति निकेतन), डा0 आकांक्षी, ऋचा शर्मा (वाराणसी) एवं देवाशीष चक्रवर्ती ने संगीत शिक्षा के क्षेत्र में पुस्तकों की भूमिका विषय पर शोधपूर्ण सारगर्भित व्याख्यान दिए.

पं0 विजयशंकर मिश्र ने परिसंवाद की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए बताया कि सबसे पहले प्रयोग होता है, फिर उस प्रयोग के आधार पर शास्त्र लिखा जाता है और फिर उस शास्त्र का अनुकरण दूसरे लोग करते हैं. अक्षर शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि जिसका क्षरण न हो वह अक्षर है. मंजुबाला शुक्ला ने भरत मुनि, शारंगदेव, नन्दीकेश्वर, दत्तिल और अभिनव गुप्त आदि की पुस्तकों का हवाला देकर स्पष्ट किया कि पुस्तकों की भूमिका कभी भी कम नहीं होगी. इस समारोह में प्रो0 प्रदीप कुमार दीक्षित नेहरंग को संगीत मनीषी एवं मंजुबाला शुक्ला को नृत्य मनीषी सम्मान से पद्मभूषण शन्नो खुराना ने सम्मानित किया.

परिसंवाद की अध्यक्षता कर रहीं रामपुर-सहसवान घराने की वरिष्ठ गायिका विदुषी डा0 शन्नो खुराना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि इसमें कोई शक़ नहीं है कि संगीत गुरूमुखी विद्या है. लेकिन इसमें भी कोई शक़ नहीं होना चाहिए कि संगीत के क्षेत्र में पुस्तकों की भूमिका को कभी भी नकारा नहीं जा सकता है. डा0 खुराना ने लोकार्पित पुस्तक भारतीय संगीत के नये आयाम की और उसके संपादक पं0 विजयशंकर मिश्र तथा उनके द्वारा स्थापित दोनों संस्थाओं-सोसायटी फॉर एक्शन थ्रू म्यूजिक (सम) और संगीत नायक पं0 दरगाही मिश्र संगीत अकादमी (सपस) की प्रशंसा की. उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक की भूमिका पद्मभूषण डा0 शन्नो खुराना ने लिखा है. इस समारोह में विदुषी शन्नो खुराना का अभिनंदन किया गया. कार्यक्रम का संचालन पं0 विजयशंकर मिश्र ने किया.

( पंडित अजय शंकर मिश्र से मिली सूचनानुसार)


Thursday, 17 September 2009

दिल्ली में बैठे-बैठे यूरोप की सैर


गोथिक कला की बारीकियां बताने के लिए प्रदर्शनी 23 तक
गोथिक कला की बारीकियों से दुनिया को परिचित कराने और इस पर अलग-अलग देशों में काम कर रहे लोगों को आपस में जोडऩे के लिए इंस्टीच्यूटो सरवेंटस ने दिल्ली में प्रदर्शनी आयोजित की है। 23 अक्टूबर तक चलने वाली इस प्रदर्शनी संबंधी जानकारी एक प्रेसवार्ता में स्पेन शासन से जुड़े इंस्टीच्यूटो सरवेंटस के निदेशक ऑस्कर पुजोल ने दी।
इस प्रदर्शनी में पांच भूमध्यसागरीय देशों की प्राचीन गोथिक स्थापत्य कला को देखा और समझा जा सकता है। ये देश हैं स्पेन, पुर्तगाल, इटली, स्लोवेनिया और ग्रीस। इन देशों के 10 भव्य आर्किटेक्चरल मॉडल यहां दिखाए जा रहे हैं। ऑडियो विजुअल प्रस्तुति में पैनल्स और विडियो के जरिये यूरोप की इस कला को दिल्ली में जिस भव्यता से पेश किया जा रहा है उसे देखकर लगता है कि आप सीधे यूरोप में बैठे भूमध्यसागरीय स्थापत्य कला के भव्य निर्माण निहार रहे हैं। आम लोग इस प्रदर्शनी में दिन के साढ़े 11 से शाम साढ़े 7 बजे तक आ सकते हैं।
प्रदर्शनी का उदघाटन करते हुए संरक्षक आरटूरो जारागोरा ने कहा कि भूमध्यसागरीय निर्माण में गोथिक कला का असर साफ नजर आता है। भारत से पहले इस प्रदर्शनी का आयोजन वैलेनेसिया और इटली में भी हो चुका है। इसमें अलग-अलग श्रेणी की कला को दर्शाने के लिए अलग-अलग निर्माणों का प्रदर्शन किया जा रहा है। किलों की श्रेणी में सिसली (इटली के टापू) बेलेवर ऑन मेजोरका (स्पैनिश टापू) नेपल्स का कैस्टलनुओवो (इटली) शामिल हैं तो कैथेड्रल की श्रेणी में निकोसिया, पाल्मा डे मेजोरका, गिरोना या एल्बी (फ्रांस), चर्चों की श्रेणी में रोडास, स्लोवेनिया, इवोरा (पुर्तगाल) और प्लेरमो (इटली) और 14 वीं सदी के महान महलों में रोडास (ग्रीस), डबरोवनिक (क्रोएशिया), माल्टा या वेलेनेसिया (स्पेन)।
स्थान : द इंस्टीच्यूटो सरवेंटस नई दिल्ली में कनॉट प्लेस स्थित श्री हनुमान मन्दिर के पीछे है.

Monday, 14 September 2009

हिन्दी भूखड़ों की भाषा है

मेरे एक पत्रकर मित्र हैं, हिन्दी में एम किया है। अक्सर वह बोलते थे, अच्छा होता प्रेमचंद के बजाय शेक्सपीयर को पढ़ा होता। हिंदी पढ़कर तो किसी घाट के नहीं रहे। शुरु-शुरु में तो जिस भी अखबार में नौकरी करने गया, यही पूछा गया कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर लेते हो,कई जगहों पर तो अंग्रेजी न आने की वजह से नौकरी ही नहीं मिली। और मिली भी तो पैसे इतने कम मिलते थे कि समझ में नहीं आता था कि उससे घर का किराया दूं या फिर रोटी का जुगाड़ करूं। सौभाग्य से उस मित्र की शादी एक ऐसी लड़की से हो गई जो अंग्रेजी में एम ए कर रखी है। कभी-कभी फोन पर बात होती है तो उन्हें छेड़ देता हूं कि अब तो आपकी अंग्रेजी ठीक हो जानी चाहिये। वह हंसते हुये जवाब देते हैं कि अब अंग्रेजी ठीक करके ही क्या करूंगा। फिर वह थोड़ा गंभीर होकर कहते हैं कि आप मानिये या ना मानिये लेकिन हिंदी में पैसे नहीं है। यह भूखड़ों की भाषा है।
मुंबई में बहुत सारी कंपनियां हैं। इनमें से अधिकतर अपना काम अंग्रेजी में करती हैं। जनसंपर्क वाले अभियान में यह हिंदी का तो इस्तेमाल करती हैं, लेकिन अंग्रेजी से अनुवाद की गई हिंदी का। नीति निर्धारण और प्रचार प्रसार के मसौदे अंग्रेजी में तैयार होते हैं, और फिर उन्हें अनुवाद के लिए किसी ट्रांसलेशन एंजेसी के पास भेजा जाता है। मजे की बात है कि ट्रांसलेशन एजेंसी में अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने का दर अंग्रेजी से गुजराती, मराठी व अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने की दर की तुलना में काफी कम है। इस तथ्य से उस मित्र की बात की पुष्टि ही होती है कि वाकई में हिन्दी भूखड़ों की भाषा है।
यह सच है कि हिंदी फिल्मों और धारावाहिकों का एक व्यापक बाजार है, लेकिन इसमें काम करने वाले लोग अंग्रेजीजदा हैं। वे सोचते अंग्रेजी में हैं, लेकिन उत्पाद हिंदी में देते हैं। अधिकतर धारावाहिकों और फिल्मों के स्क्रीप्ट अंग्रेजी में लिखे जाते हैं, तर्क यह दिया जाता है कि फिल्म में काम करने वाले सभी लोग देश के विभिन्न कोने से आते हैं और उन्हें हिन्दी समझ में नहीं आती है। ऐसे में यह जरूरी है कि स्क्रीप्ट अंग्रेजी में ही लिखे जाये। इसके साथ-साथ डायलाग भी रोमन हिन्दी में लिखे जाते हैं, कम से कम धारावाहिकों के डायलाग तो रोमन हिन्दी में तो लिखे ही जाते हैं। ऐसे में यदि आप अंग्रेजी नहीं जानते हैं तो निसंदेह आपको फिल्म जगत में काम करने में मुश्किलों का सामना करना होगा। यदि इनका बस चले तो हिन्दी के गीत भी ये लोग रोमन हिन्दी में ही लिखवाये। हिन्दी के साथ निरंतर बलात्कार किये जाने का मुख्य कारण यही है कि हिन्दी को अभी भी आर्थिक तौर पर बाजार के मुख्य भाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है। विभिन्न स्तरों पर हिन्दी का नेतृत्व वही लोग कर पाने में सक्षम है, जिनकी अंग्रेजी भी सामान्यरूप से दुरुस्त है, और जिनको हिन्दी नहीं आती है और अंग्रेजी पर अधकचड़ी पकड़ है वे तो हिन्दी को कुत्ते की तरह दुत्कारने वाली मानसिकता से पीड़ित है। उन्हें यही लगता है कि हिन्दी बोलने वाले लोग अव्वल दर्जे के मूर्ख हैं, और उनकी काबिलियत दो कौड़ी है।
आप किसी भी नगर या कस्बे में चले जाइये। जगह जगह आपको अंग्रेजी सीखाने वाले संस्थान मिलेंगे। मानसिकतौर पर लोगों के दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि अंग्रेजी जानने के बाद उन्हें जल्दी काम मिल जाएगा या फिर काम में तरक्की मिलेगी। और यदि ऐसा नहीं भी है तो अंग्रेजी बोलने के बाद उनका सामाजिक रूतबा तो बढ़ ही जाएगा। यानि अंग्रेजी हिन्दी की तुलना में आर्थिक लाभ के साथ-साथ सामाजिक सम्मान की गारंटी देने का भ्रम पैदा करता है।
हिन्दी में विज्ञान और गणित की पुस्तकों का अभाव मैंने कालेज के दिनों में महसूस किया था। हिन्दीं में इन विषयों पर किताबें थी लेकिन अंग्रेजी इस मामले में कहीं ज्यादा समृद्ध था। वैसे हिन्दी में छपे गेस पेपरों की बिक्री अंग्रेजी की किताबों से अधिक थी। मामला स्पष्ट था, सस्ते में गेस पेपर खरीदो और अंदर परीक्षा हाल में बैठ कर छाप दो। भौतिक, रसायन और जीव विज्ञान की किताबों के साथ भी यही हाल था। इन विषयों में हिन्दी की तुलना में अंग्रेजी कहीं ज्यादा समृद्ध था। इसका एक मात्र कारण तीन सौ वर्षों तक भारत पर अंग्रेजों का शासन है। व्यवस्थित स्कूल और कालेज अंग्रेजों की ही देन है। अत यह स्वाभाविक है कि शिक्षण संस्थाओं में अंग्रेजी का वर्चस्व रहेगा ही।
नेट दुनिया में हिन्दी का प्रदर्शन वाकई में मन को मोहने वाला है। लोग ताबड़ तोड़ हिन्दी लिख रहे हैं, और अब तक हिन्दी में लिखी गई अच्छी चीजों को भी सामने ला रहे हैं। अभिव्यक्ति के स्तर पर दुनिया का प्रत्येक भाषा अपने आप में समृद्ध होता है, रुकावट कम्युनिकेशन के स्तर पर है। नेट जगत तेजी से इस रूकावट को दूर कर रहा है। हिन्दी को प्रोफेशनल भाषा के रूप में स्थापित करने की जरूरत है। हिन्दी में काम का यदि ऊंचा दाम मिलेगा तो लोग इसे स्वत ही स्वीकार करेंगे। तब शायद कोई यह नहीं बोले की हिन्दी भूखड़ो की भाषा है।



'सच का सामना' का सच



कुछ दिनों से टेलीविजन पर एक धारावाहिक दिखाया जा रहा है, जिसका नाम है ‘सच का सामना’। जिस प्रकार भारतीय संविधान में राजनेताओं के योग्यता की कोई लक्षमण रेखा नहीं निर्धारित की गई है उसी प्रकार टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों के स्तर की कोई सीमा नहीं होती, वे किसी भी स्तर के हो सकते हैं, उसी स्तर का यह भी धारावाहिक है। किंतु जैसा कि बाजार में बिकाऊँ होने की शर्त विवादित होना है, न कि उच्च स्तरीय होना, उसी तरह यह भी धारावाहिक विवाद का केन्द्रविन्दु बनाया गया, जिसकी गूँज संसद तक पहुँची और जिसको सभी टी.वी. चैनलों ने तेज़ी से लपका।संसद में बहस छिड़ गई कि इस पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।क्यों कि सच का सामना करने से सबसे ज्यादा अगर कोई घबराता है तो राजनेता । जिस दिन सरकार बदलती है उसी दिन विपक्ष को एक साथ ढेरों सच का सामना करने की आशंका सताती है। सत्ता पक्ष के पिटारे से कई ऐसे जाँच के विषय निकलते हैं, जिससे न केवल सत्ता का संतुलन बनाने में सहायता मिलती है बल्कि वे समर्थन जुटाने के भी काम आते हैं । यह आशंका जताई गई कि यदि किसी दिन राजीव खंडेलवाल ने मंत्री या सत्ता पक्ष के राजनेता को सच का सामना करने के लिए तलब कर लिया तो हाथ पाँव फूल जाएंगे । प्रश्न कुछ इस तरह के हो सकते हैं, जैसे कि – स्विस बैंक में किसका पैसा जमा है, और किन लोगों का खाता है?वे किस उद्योग से सम्बन्ध रखते हैं या किसी समर्पित जनसेवी के हैं ? उनके नाम आपको पता हैं किंतु आप बताना नहीं चाह्ते हैं आदि आदि--- उसके बाद पोलीग्राफ टेस्ट के लिए झूठ पकड़ने वाली मशीन के पास लाया जाएगा और मशीन बताएगी कि नेता जी सच बोल रहे हैं या झूठ। किंतु जैसा कि कैबिनेट में एक वकील साहब हैं, जो ऐसे अवसरों पर सलाहकार की भूमिका निभाते हैं या यूँ कहें कि हर सरकार में ऐसे लोगों की आवश्यकता का अनुभव की जा रही है जो सम्विधान की अपने सुविधानुसार व्याख्या कर सकें, उनका दिमाग बहुत तेज़ी से काम करता है। उन्होंने कहा कि डरने की कोई बात नहीं है, स्थिति नियंत्रण में है। टी.वी. चैनलों के पास न्यायालय की शक्ति थोड़े ही है, जो गिरफ्तारी वारंट निकालेंगे और आरोप का सामना करने जाना पड़ेगा। वैसे भी राजनेता के गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावज़ूद उसे न्यायालय में आरोप का सामना करने के लिए प्रस्तुत करना कठिन कार्य होता है तो राजीव खंडेलवाल किस खेत की मूली हैं। वैसे तो हमारे निजी सूत्रो ने इस कार्यक्रम के बारे में कुछ शर्तें तय कर रखी हैं । जैसे कि इस कार्यक्रम में किसी सत्ता पक्ष के राज नेता को सच का सामना करने के लिए नहीं बुलाया जाएगा । यदि गलती से उसे टी वी चैनल पर बुला ही लिया गया है तो उसे एकांत में समझा दिया जायेगा कि सच का सामना न करना दोनों के हित में है। यदि इस पर भी वह नहीं समझता है और लोकतंत्र का सजग प्रहरी होने का दम्भ रखता है, तो उसे कार्यक्रम दिखाने के पहले एक स्पष्टीकरण या माफीनामा दिखाना होगा कि इस घटना का दूर-दूर तक सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्टीकरण देना होगा कि झूठ पकड़ने वाली मशीन नेताओं पर काम नही करती है, इस लिए यह निर्णायक नहीं है। जो नेता कहेगा वही सच माना जाएगा न कि मशीन। क्योंकि मशीन में गड़बड़ी की सम्भावना भी हो सकती है, यह और बात है कि डी.डी.ए. के फ्लैटों के आबंटन के समय कम्प्यूटरीकृत लॉटरी और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें निष्पक्षता पूर्वक सन्देह से परे कार्य करती हैं ।
अगली शर्त यह है कि इस कार्यक्रम में सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों को नहीं पूँछा जा सकता,क्योंकि जबसे हमें स्वतंत्रता मिली है तब से यह भी स्वतंत्रता मिली है कि किसी राजनेता से सार्वजनिक महत्व के प्रश्न का उत्तर देना या न देना उसके निर्भर है । क्योंकि इससे उसके चरित्र पर आक्षेप आ सकता है और मानहानि का भी मुकद्मा दायर कर सकता है क्यों कि वह न्याय का आर्थिक भार उठाने मे भी सक्षम है। किंतु अन्य लोगों से चरित्र पर आक्षेप लगाने वाले प्रश्न भी पूंछे जा सकते हैं। जैसे राजीव खंडेलवाल किसी राजनेता से यह प्रश्न नहीं पूँछ सकते कि आप ने अब तक कोई घपला किया है या नहीं ?सच बोल रहे हैं कि झूठ इसका निर्णय पोलीग्राफ टेस्ट करेगा । जैसे कि यह पूँछा जा सकता है कि “शादी से पहले आप ने किसी स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं या नहीं?” “शादी के बाद किसी स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्पर्क बनाया है या नहीं?” “यदि बनाया भी है तो उंगली पर गिना जा सकता है या नहीं?” यदि हाँ बोलेंगे तो पूरा परिवार सुन और देख रहा है, प्रतिष्ठा और पत्नी दोनों खोने की आशंका है और वह सच बोल रहा है या झूठ इसका निर्णय झूठ पकड़ने वाली मशीन करेगी, जिसे अंतिम माना जाएगा। जैसे “‘गे राइट्स’ के बारे में आप का क्या ख्याल है?” “क्या आप ने पुरुष होते हुए किसी पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं?” “इस आर्थिक मन्दी के दौर में जबकि हर व्यक्ति महंगाई से त्राहि त्राहि कर रहा है,सोंच कर बताइए यदि आपके विवाह के पूर्व धारा 377 समाप्त कर दी जाती, तो क्या आप स्त्री से विवाह करके बाल बच्चों के फिजूल के खर्चीली झंझट के चक्रव्यूह में फँसना पसन्द करते या किसी ‘गे’ से विवाह कर सभी खर्चों पर पूर्ण विराम लगा देते?” इस प्रश्न पर आपको दो लाइफलाइन दी जाएगी, जिससे आप अपने शुभ चिंतकों से विचार-विमर्श कर सकते हैं। किंतु घोर परम्परावादी माता पिता से फोन पर विचार मत माँगिएगा वर्ना आपकी शारीरिक सुरक्षा और पैतृक सम्पत्ति को खतरा भी उत्पन्न हो सकता है ।
राजीव खंडेलवाल को समझा दिया गया है कि प्रश्न किस स्तर के होने चाहिए। उनसे यह भी कह दिया गया है यदि समझ न आये तो उदाहरण के रूप में सलमान खान के धारावाहिक ‘दस का दम’ से कुछ प्रश्न लिए जा सकते हैं, जैसे कि-“कितने प्रतिशत भारतीयों को घर वाली से बाहर वाली ज्यादा आकर्षित करती है?” “कितने प्रतिशत भारतीय विवाहित होने के बावज़ूद घर के बाहर अपनी प्यास बुझाते हैं?” “कितने प्रतिशत भारतीय ऑफिस जाने से पहले अपनी पत्नी को पार्टिंग किस देते हैं?” “कितने प्रतिशत भारतीय अपने पत्नी की पसंद का धारावाहिक देखते हैं?” आदि आदि................

-विनय कुमार ओझा 'स्नेहिल'

Friday, 11 September 2009

मेरा चैन -वैन सब

(दूसरी और अन्तिम किश्त )
दसवीं जमात में नम्बरों के चक्कर में एक निबन्ध याद किया था- “साहित्य समाज का दर्पण होता है।परीक्षा में साहित्य समाज..... धोखा दे गया नम्बर नहीं आए पर यह रट्टा अब काम आया है। बरात में खाना ज्यादा खाया था , सो नींद नहीं आई।अन्ततः सीरियस होना पड़ा और देश की दशा पर चिन्ता होने लगी। साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिए चैन-वैन असलियत में उजड़ा होगा! आगे का वर्णन सच्चाई से बिलकुल मेल खाता है- बरबाद हो रहे हैं जी ये तेरे हर वाले ...... अभी पूरी तरह बरबाद नहीं हुए हैं। हाँ, कुछ दिन में हो जाएंगे। अभी मकान के पहले माले ही तोड़े गए हैं, ताले उन्हीं दुकानों में जड़े गए हैं जिनका राष्ट्रीय विकास में कोई विशिष्ट योगदान नहीं है। और तो और , हेराफेरी और जमाखोरी में भी निकम्मे साबित हुए हैं।
गर्मी ठीक से नहीं पड़ रही है इसलिए पानी कभी-कभी आ ही जाता है। वर्मा जी मूली खरीदने गए थे; अत्याधुनिक आविष्कारों का लाभ प्राप्त हो गया-आर डी एक्स की भेंट चढ़ गए। शहर के लोग बहुत जिन्दादिल होते हैं, साहसी होते हैं। मूली की विक्री पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कोई भी मर जाए, शहर वाले विचलित नहीं होते। यह सत्य टी वी वालों ने सिद्ध कर दिया है।वे बताते हैं कि मूली खरीदने वाले उसी अदम्य उत्साह से आ रहे हैं। कई चैनलों पर ग्राहकों का साक्षात्कार भी तत्काल दिखाया गया है।
पर, शहर वाले बरबाद हो रहे हैं। इस तथ्य की संगीतमय अभिव्यक्ति के बाद संदेह की गुंजाईश नहीं रह जाती ।गांववालों का क्या हाल है , इसका विवरण यहां सुलभ नही है।वैसे बरबाद होने और चैन-वैन उजड़ने का जश्न वहां भी मनाया जा रहा है। कइयों को इस पर आपत्ति है कि "बरबाद सूची " में गांववालों का जिक्र क्यों नहीं ? गांव और शहर में इतना भेदभाव क्यों ? और सुविधाओं की बात तो छोड़िए, क्या गांव वालों को अब बरबाद होने का भी हक नहीं ?
इन सभी प्रश्नों ने मुझे निष्प्राण ही कर दिया होता , परन्तु शर्मा जी ने एक लम्बा भाषण ठोंका -“यह जानते हुए भी कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और संगीत ईश्वर की भक्ति, आप ऐसी शंका कर रहे हैं ?गांववाले क्या खाकर शहर वालों का मुकाबला करेंगे ? वे तो इस बरबाद प्रतियागिता में शामिल होने की भी अर्हता नहीं रखते !यहां एक ऐसी अंगड़ाई का वर्णन है जो टूटने न पाए...... यानी लम्बी खिंचे। ऐसी अंगड़ाई उसे ही आ सकती है जो देर तक सोने का माद्दा रखता हो। चार बजे सुबह ही उठ जाने वाला क्या खाक बरबाद होगा ? पूरे के पूरे कपड़े पहन लिए , अब किसी का चैन उजाड़ना तुम्हारे वश का होगा ? कर भला तो हो भला !एक दो मुकदमे खड़े कर देने से अब किसी का चैन- वैन नहीं उजड़ता ! नाखून कटा के शहीद बनने चले।
ये ऊँची चीजें हैं , बड़े लोगों पर फबती हैं! उसी का जश्न है। शहरी समाज सभ्य होता है संगीत से इसका पुराना रिश्ता है जो समय-समय पर प्रकट होता रहा है।गीतकारों ने उच्च समाज की नब्ज पकड़ लिया है और उन्होंने सबको स्वर दे दिया है। कभी पूरे देश के अरमां आंसुओं में बहे थे, कभी दीदी का देवर दीवाना हो गया था, थोड़े दिनों पहले होठ भीग गए थे और बहुत से लोगों कोकांटाचुभ गया था......तब भी खुशी का माहौल था।
मुझे भी अपना चैन-वैन उजड़ा-उजड़ा सा लग रहा था। शर्मा जी अभी कुछ और बोलते पर उनके मोबाइल का चैन- वैन उजड़ने लग गया था। पता नहीं कब सेटल होगा चैन और कब टूटेगी अंगड़ाई.....? आओ , तब तक बरबाद हो लें।

रंगकर्मी श्री संजय खन्ना का निधन

इयत्ता के ब्लोगर और पाठक मेरे पूर्व के पोस्ट ३१ अगस्त २००९ 'परसाई जन्मोत्सव' को पुनः पढ़े । मैंने उसमें रंग मंडल के कलाकारों द्वारा परसाई की प्रसिद्द कृति ‘इंसपेक्टर मातादीन’ का खूबसूरत मंचन खुले मैदान पर' की सूचना दी थी, जिसमें शहर के रंगकर्मी ने खूबसूरत प्रस्तुति दी थी ।

आज बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि जबलपुर ही नही देश के युवा रंगकर्मी, निर्देशक, नर्तक एवं कोरियोग्राफ़र श्री संजय खन्ना का गुरुवार को पश्चिम बंगाल में हृदयाघात से निधन हो गया । वे ४३ वर्ष के थे। वे एक समारोह में भाग लेने हुबली गए थे ।

उन्होंने अपनी रंग प्रतिभा को सामजिक विसंगतियों के विरोध के लिए प्रयोग किया । उन्होंने रचना संस्था की स्थापना की । विवेचना और वेवेचना रंगमंडल के साथ कई नाटकों में काम कर अपनी अभिनय दक्षता की स्थापित किया ।

श्री संजय खन्ना लोकनृत्य एवं लोक नर्तकों में फूजन पैदा कर उसे कोरियोग्राफ करने के लिए जाने जाते थे । २५ मई १९९९ में मुंबई चले गए और वहां अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं । सासाराम बैंडर, मिटटी की गाड़ी, हुई वे वाही जो राम रची राखा, मोटेराम का सत्याग्रह, इसुरी, भगवत अज्जुकम, दुलारी बाई, भेडिया तंत्र, राजा का बाजा, जंगीराम की हवेली, इंसपेक्टर मातादीन चाँद पर जैसे तमाम नाटकों में काम किया ।

उन्होंने अपनी संस्था रंगटोली बनाई और ख्यातिलब्ध व्यंग्यशिल्पी हरिशंकर परसाई की कृतियों का रोचक मंचन किया । वे परसाई की कृतियों में एसे रच-बस गए थे कि देश के किसी भी कोने में, शहर के किसी भी मंच पर, गाँव की किसी भी गली में या मैदान में समयानुकूल परसाई की करती की प्रस्तुति कर देते थे । श्री खन्ना परसाई की रचनाओं के मंचन के लिए जाने जाते हैं ।

दो वर्ष पूर्व वे मेरे एक प्रकाशित व्यंग्य के साथ मिले और परिचय हुआ । बाद में मेरे व्यंग्यों को भी उनका स्नेह मिला । उनके द्बारा मेरे व्यंग्य की तारीफ़ आज मेरे लिए धरोहर के समान है । गत वर्ष एक विशिष्ठ कार्यक्रम के दौरान श्री संजय खन्ना जी ने मेरे एक व्यंग्य ' टांग अड़ाने का सुख ' का वाचन अपने खूबसूरत रोचक अंदाज़ में किया (ऊपर मेरे साथ चित्र में वाचन करते श्री संजय खन्ना) तो हाल तालियों से गूँज उठा ।

श्री संजय खन्ना जी ड्रामा कॉम्पिटिशन में भाग लेने गए हुए थे वहाँ उन्हें बेस्ट डांसर, बेस्ट एक्टर, स्पेशल जूरी एवं स्क्रीन प्लेयर अवार्ड से नवाजा गया था । समारोह से वापसी के समय उन्हें अचानक सीनें में दर्द हुआ । साथी कलाकार उन्हें नज़दीक के अस्पताल ले गए, लेकिन युवा कलाकार सदा के लिए दुनिया के रंगमंच से विदा हो चुका था ।

अपनी और इयत्ता परिवार की ओर से उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि । ॐ शांतिः ।

[] राकेश 'सोहम'

Tuesday, 8 September 2009

चेहरा-विहीन कवि नहीं हैं दिविक रमेश : केदार


कविता संग्रह 'गेहूं घर आया है' का दिल्ली में लोकार्पण
‘आधुनिक हिंदी कविता में दिविक रमेश का एक पृथक चेहरा है. यह चेहरा-विहीन कवि नहीं है बल्कि भीड़ में भी पहचाना जाने वाला कवि है. यह संकलन परिपक्व कवि का परिपक्व संकलन है और इसमें कम से कम 15-20 ऐसी कविताएँ हैं जिनसे हिंदी कविता समृद्ध होती है. इनकी कविताओं का हरियाणवी रंग एकदम अपना और विशिष्ट है. शमशेर और त्रिलोचन पर लिखी कविताएं विलक्षण हैं. दिविक रमेश मेरे आत्मीय और पसन्द के कवि हैं.’ ये उद्गार प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने किताबघर प्रकाशन से सद्य: प्रकाशित कवि दिविक रमेश के कविता-संग्रह गेहूँ घर आया है के लोकार्पण के अवसर पर कहे। विशिष्ट अतिथि केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह को रेखांकित करने और याद करने योग्य माना. कविताओं की भाषा को महत्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने कहा कि दिविक ने कितने ही ऐसे शब्द हिंदी को दिए हैं जो हिंदी में पहली बार प्रयोग हुए हैं. उन्होंने अपनी बहुत ही प्रिय कविताओं में से ‘पंख’ और ‘पुण्य के काम आए’ का पाठ भी किया.
इस संग्रह का लोकर्पण प्रोफेसर नामवर सिंह, प्रोफेसर केदारनाथ सिंह और प्रोफेसर निर्मला जैन ने समवेत रूप से किया. कार्यक्रम की मुख्य अतिथि निर्मला जैन को यह संग्रह विविधता से भरपूर लगा और स्थानीयता के सहज पुट के कारण विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण भी लगा. उन्होंने माना कि इस महत्वपूर्ण कवि की ओर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना नहीं दिया गया. स्वयं मैं नहीं दे पाई थी. उन्होंने ध्यान दिलाया कि केवल ‘गेहूँ घर आया है’ ही में नहीं, बल्कि जगह-जगह इनकी कविताओं में ‘दाने’ आए हैं. दिविक रमेश के पास एक सार्थक और सकारात्मक दृश्टि है साथ ही वे सहज मानुश से जुड़े हैं. ऐसा नहीं लगता कि इस संग्रह में उनकी आरंभिक कविताएँ भी हैं. सभी कविताएँ एक प्रौढ़ कवि की सक्षम कविताएं हैं. एक ऊँचा स्तर है. न यहाँ तिकड़म है और न ही कोई पेच. दिविक रमेश किसी बिन्दू पर ठहरे नहीं बल्कि निरन्तर परिपक्वता की ओर बढ़ते चले गए हैं.

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा कि वे किसी बात को दोहराना नहीं चाहते और उन्हें कवि केदारनाथ सिंह के विचार सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगे. उन्होंने यह भी कहा कि वे केदारनाथ सिंह के मत पर हस्ताक्षर करते हैं. उनके अनुसार एक कवि की दूसरे कवि को जो प्रशसा मिली है उससे बड़ी बात और क्या हो सकती है. संग्रह की ‘तीसरा हाथ’ कविता का पाठ करने के बाद उन्होंने कहा कि दिविक की ऐसी कविताएँ उसकी और हिन्दी कविता की ताकत है और यही दिविक रमेष है. ऐसी कविता दिविक रमेष ही लिख सकते थे और दूसरा कोई नहीं. इनकी शैली अनूठी है. उन्होंने माना कि इस संग्रह की ओर अवश्य ध्यान जाएगा. कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रेम जनमेजय ने आरंभ में दिविक रमेश को उनके जन्मदिन की पूर्व-संध्या पर सबकी ओर से बधाई दी. उन्होंने कहा कि दिविक उन्हें इसलिए पसंद हैं कि उनमें विसंगतियों को इंगित करने और उन पर सार्थक प्रहार करने की ताकत है. उनकी कविताओं में घर-पड़ोस के चित्र, गाँव की गंध है तो शहर की विसंगतियां भी हैं. दिविक की सोच व्यापक है. अपने आलेख पाठ में दिनेश मिश्र ने कहा कि जिन राहों से दिविक गुजरे हैं वो अटपटी हैं. कवि कहीं भी उपदेशक के मुद्रा में नहीं दिखाई देता है. प्रोफेसर गोपेश्वर ने इन कविताओं को बहुत ही प्रभावषाली मानते हुए कहा कि ये कविताएं खुलती हुई और संबोधित करती हुई हैं. अकेलेपन या एकान्त की नहीं हैं.
दिविक रमेश ने काव्य-भाषा में एक नई परंपरा डाली है. उसे रेखांकित किया जाना चाहिए. उन्हें ये कविताएँ बहुत ही अलग और अनूठी लगीं. उन्होंने इस बात का अफसोस जाहिर किया कि इस समर्थ एवं महत्वपूर्ण कवि की ओर इसलिए भी अपेक्षित ध्यान नहीं गया क्योंकि साहित्य जगत के उठाने-गिराने वाले मान्य आलोचकों ने इनकी ओर ध्यान नहीं दिया था. सार्वजनिक जीवन की ये कविताएँ निष्चित रूप से अपना प्रभाव छोड़ती हैं. उन्होंने अपनी अत्यंत प्रिय कविताओं में से एक ‘पंख से लिखा खत’ का पाठ भी किया.
प्रताप सहगल के अनुसार दिविक कभी पिछलग्गू कवि नहीं रहा और उनके काव्य ने निरंतर ‘ग्रो’ किया है. ये कविताएँ बहुत ही सशक्त हैं. प्रणव कुमार बंदोपाध्याय ने संग्रह की तारीफ करते हुए बताया कि वे इन कविताओं को कम से कम 15 बार पढ़ चुके हैं. उनके अनुसार इन कविताओं में समय के संक्रमण का विस्तार मिलता है. संग्रह को उन्होंने हिन्दी कविता की उपलब्धि माना. यह आयोजन भारतीय सांस्कृति संबंध परिषद और व्यंग्य-यात्रा के संयुक्त तत्वावधान में आजाद भवन के हॉल में सम्पन्न हुआ. इस अवसर पर अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकार और गणमान्य पाठक उपस्थित थे. प्रारंभ में भारतीय सांस्कृति संबंध परिषद के अजय गुप्ता ने सबका स्वागत किया.

(व्यंग्य-यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय से मिली सूचनानुसार)

Sunday, 6 September 2009

मेरा चैन -वैन सब

( थोड़ा सा भूतकाल में चलें ,चार - पाँच साल पहले जब इस मुखडे की धूम थी .तब यह व्यंग्य लिखा गया था और प्रकाशित हुआ था .)
मैं पिछले कई महीने से असमंजस की स्थिति में हूँ। मैं ही क्या , पूरा देश ही ऐसी स्थिति में है। अन्तर सिर्फ इतना है कि देश को ऐसी स्थिति में रहने का लम्बा अनुभव है , जबकि मेरे लिए यह नया अवसर है।इसीलिए कुछ बेचैनी हो रही है मुझे।वस्तुतः इस बेचैनी के पीछे मेरे अज्ञान का ही हाथ है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस समय अपना देश, अपना समाज खुश है या दुखी ?

भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जिधर देखिए, एक ही स्वर गूंज रहा है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा.......। इस स्वर के गूंजते ही चेहरे पर रौनक आ जाती है- गोया बहुत बड़ी खुषखबरी मिल गई हो! क्षण भर को भागम-भाग,रेलम-पेल ठहर जाती है।सारी ताकत बटोरकर बन्दा अपने आप को नियन्त्रित करता है,अर्थात फिर भीड़ में घुसता है तो उसकी भी रागिनी फूट पड़ती है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा।

चैन उजड़ने जश्न पूरे जुनून पर है। यह सिद्ध करना है कि मेरा चैन सबसे ज्यादा उजड़ा है। आप इस बात को सिद्ध भी कर सकते हैं ,बशर्ते आप गर्दभ राग के विशेषज्ञ हों। सभी का चैन उजड़ा है, शिकायत सबको है किन्तु प्रश्न यह है कि किसका चैन उजड़ना प्रकाश में आ सकता है ?

पिछले मौसम में टूटू की शादी थी- कुमार साहब की सौभाग्यकांक्षिणी कन्या सेक्सी के साथ। उसी अवसर पर यह मार्मिक प्रश्न मेरे मानस पटल पर उभरा था। टूटू के दोस्त- दोस्तनियां समूह में पधारे थे। ऊँचे समाज के लोग हैं। उचाई का अन्दाजा मुझे इस बात से लगा कि अधिकांश दोस्तनियां कच्छा-बनियान में थीं और “अरे यार!” को छोड़कर शेष वार्तालाप अंगरेजी में कर रही थीं। वहीं इनका चैन भी उजड़ने लगा।

धरातल पर चार बड़े-बड़े तख्त पड़े थे। रस्सी से जकड़ दिया गया था उन्हें।नीचे लाल-पीली बत्तियां जल रही थीं। शर्माजी ने बताया कि इस प्रकार की व्यवस्था को डी जे कहते हैं। वर-कन्या के बिना विवाह सम्पन्न हो सकता है,परन्तु डी जे के बिना कतई नहीं।तख्तों के पीछे आधा दर्जन ध्वनि विस्तारक यंत्र अपनी पूरी शक्ति से कर्मयोग का पालन कर रहे थे- गोया सभी अतिथि बहरे हों। क्या पता आज के झटके से उनके कान खुल जाएं !

अपने यहां की शादियों में अब दो खण्ड भारी भीड़ लेते हैं। यह विभाजन मुख्यतः आयुवर्ग के अनुसार हो रहा है।खींचते- खांचते आप पच्चीस तक के हैं तो आप इसी डी जे के पास होंगे- हाँ, शर्त यह है कि आस-पास कच्छा बनियानधारी कन्याएं भी हों। चुस्त जींस और लघु उत्तरीय भी थोड़ा बहुत स्वीकार्य है। यदि आप पच्चीस से ऊपर हैं तो भोजन पंडाल की तरफ प्राप्य हैं । कुछ वियाग्राभोगी वानप्रस्थी भी आपको प्रथम समूह में दृष्टिगोचर होंगे। अब डी जे स्थल पर तिल फेंकने की जगह नहीं है। सबका चैन उजड़ना शुरू हो गया है। अदम्यशक्ति और उत्साह के पुंज ब्रह्मचारीगण तख्त पर ऐंड़े-बैंड़े लात चला रहे हैं । गधा पास में खड़ा हो तो दुलत्ती मारने के नए-नए तरीके वह भी सीख ले।

कुछ ज्ञानी कलाकारों ने मूल गीत को कई बार ”देख“ रखा है। ऊपरी नशा कम है। ऐसे कलाकार मूल गीत में बाप-बेटे के पद संचालन का अनुसरण कर रहे हैं। कहीं एकाध पद संचालन भी मूल कलाकारों से अलग हुआ तो कला खतरे में पड़ सकती है या अमिताभ- अभिषेक की श्रेणी से नीचे की श्रेणी में परिगणित हो सकते हैं। कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक है।कइयों को लगता है कि मूलगीत में सुधार की काफी गुंजाइश है। ऐसे कलाकारों को प्रयोगधर्मी कहा जाता है।वे फिल्म निर्देशक को उसकी गलतियों का एहसास कराना चाहते हैं।मसलन, जब चैन-वैन का उच्चारण हो तो अपनी छाती पर घूंसा मारना है, ”उजड़ा” पर दोनों टांगों के बीच एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाना है और फिर अचानक उठकर अभिनेत्री की चोली की रस्सियां खोलनी हैं।

रहने भी दो भाई साहब! एक तो नैतिक पतन के इस युग में बेचारी ने परम्परावादी रस्सीयुक्त चोली पहन रखा है। आधुनिकता की पोषक होती तो जींस-टॉप नहीं पहनती ? चलो, चोली ही पहनी तो हुक या बटन नहीं लगवा लेती ?

दस-बारह साल वालों ने मंच खाली कर दिया है। शायद उन्हें अनुमान हो गया है कि कुछ देर और टिके तो फ्रैक्चर हो सकता है। बालक का मन ब्रह्मा होता है। बच्चे मन के सच्चे! भैया पहले से नाच रहे थे।बड़ा होकर मैं भी ऐसा ही उच्च कोटि का नर्तक बनूंगा। अब दीदी की इच्छा रोके नहीं रुक रही है।दो -तीन कृशकाय हैं। उन्हें कुछ भय लग रहा है। मोटी वाली दीदी बोल्ड हैं। वे मंचस्थ हो गई हैं। उनके लिए स्थान रिक्त हो गया है। अब और नृत्यांगनाएं मंचस्थ हो रही हैं। तब तक आइसक्रीम खा आते हैं।

कुछ वानप्रस्थी भाई भी प्रयास में हैं। इस भीड़ में प्रवेश पा सकने में सफल हो गए तो स्पर्श सुख का सौभाग्य मिल ही जाएगा। किसी नौजवान ने जोर का धक्का मारने की कृपा कर दी तो ”किसी“ के ऊपर गिरने का सुख भी लूट सकते हैं। जिन्दादिली इसे ही कहते हैं। कुछ लोग गम्भीर किस्म के हैं। परिधि के बाहर से ही कला का सम्मान कर रहे हैं। बड़ी कृपा की ईश्वर ने जो दो आँखें दे दीं। गालिब का शेर इनकी समझ में कुछ ज्यादा ही आ गया है-

गो हाथ में जुम्बिश नहीं ,आँखों में तो दम है

रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे ।

चैन-वैन जोर-शोर से उजड़ने लग गया है। अब मेरा आत्मविश्वास साझा सरकार की तरह हिल रहा है। यहां तो चैन उजड़ते ही लोग खुश हो रहे हैं। डी जे है न , कोई भी गीत पूरा नहीं हो सकता । बीच से कटता है। लोग चिल्लाते हैं, फरमाइश करते हैं। थोड़ा सा चैन फिर उजड़ता है। सरकारी परियोजना की तरह कार्यक्रम रुक-रुक कर चलता रहता है, खुशी बढ़ती रहती है।

कभी- कभी न जाने क्यों डी जे अचानक ही चुप हो जाता है। लगता है कि हम कुछ सुन भी सकते हैं; हमारे दो कान भी हैं। परन्तु यह सुविधा ज्यादा देर तक टिक नहीं सकती। रणभेरी सी बजने लग गई है। पद संचालन पुनः शुरू हो गया है । स्थिति और विषम हो गई है। शहर वाले बरबाद हो रहे हैं।

(अभी यहीं तक , अंत अगले किसी दिन )

Saturday, 5 September 2009

गुरुओं को अक्सर लठैतों की भूमिका में ही देखा

स्कूल में गुरुओं को मैंने अक्सर लठैत की भूमिका में ही देखा, कब किस बात पर ठोक दे पता ही नहीं चलता था, ऊपर से तुर्रा यह कि गुरु की पिटाई को आर्शिवाद समझना चाहिये। मैथ का एक लंगड़ा टीचर तो इतना मरखंड था कि बाप रे बाप....आज भी उसके बारे में सोंचता हूं तो हड्डी में सिहरन होती है। एक मोटा सा रूल हमेशा उसके हाथ में होता था, और जिस गति से उसका रूल चलता था उसे देखकर यही लगता था कि बचपन में इसके गुरू ने भी इसकी खूब धुलाई की होगी, बिना तोलमोल के। मारकूट के बच्चों को पढ़ाने की अदा निराली थी। लेकिन चकचंदा के दिन उसकी नरमी देखते बनती थी। छोटे से कस्बे में गुरुदक्षिणा के नाम पर यह सार्वजनिक वसूली का दिन होता था। सुबह से उसके होठों पर रसगुल्ले टपकते रहते थे। सभी छात्रों को इकठ्ठा करके द्वार-द्वार जाता था और मोटा धन समेटने की जुगाड़ में रहता था। आंटा, चावल, दाल, चना, साग-सब्जी जो कुछ मिलता था सब समेट लेता था और उसे गधे की तरह ढोने के काम पर बच्चों को लगा देता था। अब शिक्षक दिवस पर एसे गुरुओं की याद आने लगे तो, मैं क्या कर सकता हूं, सिवाये ब्लोगियाने के।
कस्बा छूटा, शहर छूटा और नये शहर में गया। स्कूल के नाम पर ही नानी मरती थी, लेकिन घर वाले तोड़पीट के शिक्षित करने पर तुले हुये थे। एक दिन जबरदस्ती स्कूल में ले जा के ठूंस दिया। पढ़ाई के नाम पर गुरुओं का अत्याचार बढ़ता ही रहा। मेरे पड़ोस में चार लड़के रहते थे, और उनका बाप तो महा कसाई था। शिक्षा के नाम पे तोड़ कुटाई में उसकी गहरी आस्था थी। स्कूल से आने के बाद अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए उसने एक शिक्षक रख छोड़ा था, विकराल पंडित। अपने नाम के अनुकूल ही विकराल पंडित विकराल था, उन चारों की भरपूर तोड़ कुटाई होती थी। विकराल पंडित के नाम पे वे चारों सूखे पत्ते की तरह कांपते थे। इधर मैं घर से स्कूल के लिए निकलता था और मजे से सचिवालय के सामने जाके अल्हा सुनता था, सुबह दस बजे से शाम चार बजे तक। गायक का नाम बैजू था, उसके सूर में मैं पूरी तरह से डूब जाता था। अल्हा उदल के सारे चरित्र मेरे आंखों के सामने तैरते रहते थे। 52 किला की लड़ाई मुझे कच्ची उम्र में ही याद हो गई थी, अकेले में बैठकर मैं बैजू के स्टाईल में गाता था। उस समय स्कूली किताब के अक्षर मेरी समझ के परे थे, लेकिन मोहबा गढ़ के बांके लड़ाकों को मैं अपनी बंद आंखों से भी देख सकता था। एक दिन स्कूल के एक काने मास्टर ने चार लड़कों को मुझे पकड़ लाने के लिए छोड़ा और भरी सभा से दबोच कर मुझे उस काने मास्टर के पास लाया गया। फिर विधिवध मेरी खाल उधेड़ी गई और उसके बाद मुझे धूप में सूखाया गया।
उस दिन के बाद से स्कूल में अनमने ढंग से जाता था और हर समय यही सोचता रहता था कब छुट्टी की घंटी टनटनाएगी। मुहल्ले कुछ बड़े लड़के उन दिन कामिक्स के दीवाने थे। वर्मा जी की एक दुकान थी गायत्री स्टोर। अपने यहां वो थोक भाव से कामिक्स की किताबें लाते थे और तीन रूपया जमा करने के बाद तीस पैसे की दर से प्रति किताब पढ़ने के लिए देते थे। बड़े बच्चों से किताबें मांग के मैं घर में लाता था और फिर उनके चित्रों को पलट पलट के देखता था। आधी से अधिक कहानी चित्रों के माध्यम से ही समझ में आ जाती थी। लेकिन पूरी कहानी समझ न पाने का मलाल जरूर होता था। पूरी कहानी समझने के लिए किसी बड़े लड़के को पकड़ता था और फिर वह पढ़ पढ़ के सुनाता था। फिर कहानी को पूरी तरह से समझने की चाहत के कारण ही बहुत जल्दी ही मै पढ़ना सीख गया। शुरु शुरु में आ आ ई ई की मात्रा में थोड़ी बहुत कठिनाई होती थी लेकिन बहुत जल्द ही इस पर भी काबू पा लिया और सहजता से समझने लगा। प्रतिदिन पांच कामिक्स पढ़ता था, इंद्रजाल कामिक्स में वेताल, जादूगर मैंड्रेक्स की कहानियां अच्छी लगती थी। वेताल अपने साथ अफ्रीका की घने जंगलों में ले जाता, लुटेरों का वह दु्श्मन था, और उसकी प्रेमिका डायना सभ्य अमेरिकी समाज की रहने वाली थी। अमर चित्र कथा खासकर पौराणिक कथाओं के कारण अच्छी लगती थी। बहुत सारे भारतीय नायकों और नायिकाओं के बारे में अमरचित्र कथा से पता चला। मधु मुस्कान, मोटू पतलू,
मुझे लगता है कि उस समय स्कूल के अन्य बच्चों के बजाय पौराणिक कथाओं के विषय में मेरी जानकारी कहीं ज्याद समृद्ध थी। और इस जानकारी में शिक्षकों का कहीं कोई योगदान नहीं था। एक बार कामिक्स की लत पड़ जाने के बाद इतिहास, नागरिक जीवन,हिन्दी, भूगोल आदि की किताबें तो एसे ही अच्छी लगने लगी थी। इन्हें बड़ी सहजता से पढ़ने और समझने लगा था।
हाई स्कूल में आने के बाद राम रहीम और राजन इकाबल के छोटे-छोटे उपन्यास पढ़ने का चस्का लग गया था। हालांकि शिक्षकों का रवैया अभी पहले जैसा ही था। मैथ के टिचर यहां पर भी काफी मरखंड था। इतनी पिटाई करता था कि मैथ का कोई भी फार्मूला दिमाग में घुसता ही नहीं था। हिंदी की टिचर सूखी हुई लकड़ी की तरह थी। क्लास में घुसते ही किताब खोल लेती थी और पढ़ाना शुरु कर देती थी। वह खुद ही पढ़ाती थी और खुद ही समझती थी। केमेस्ट्री का टिचर थोड़ा मूडी था और इतिहास का टिचर तो महा बोरिंग। इतिहास का किताब किसी बच्चे को पकड़ा देता था और कहता था कि रिडिंग मारने को कहता था। पीरियड खत्म होने तक बच्चा रिडिंग मारता रहता था, और सभी बच्चे अपनी किताब खोलकर उस बच्चे के रिडिंग के साथ अपनी अपनी किताब पर नजर दौड़ाते रहते थे। संस्कृत का टिचर थोड़ा गुस्सैल था। क्लास में अक्सर कहा करता था, सबसे पहले व्यक्ति को बातों का दंड देना चाहिये, उससे भी वह न माने तो आर्थिक दंड देना चाहिये, और उससे भी नहीं माने तो उसका सिर कलम कर देना चाहिये। स्कूल के अधिकतर शिक्षक छात्रों को अपने यहां आकर ट्यूशन पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे, लोभ यह दिया जाता था कि ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों को फेल नहीं होने दिया जाएगा, ट्यूशन के नाम पे मामला पूरी तरह से सेटिंग गेटिंग का था।
स्कूल की पढ़ाई खत्म होने पर कालेज में कुछ नये टोटकों से सामना हुया। यहां प्रोफेसर लोग नोट्स बेचा करते थे। डेमोंस्ट्रेटर लोग पैसे लेकर प्रैक्टिकल में नंबर बढ़ाया करते थे, और कालेज के होस्टल में रात भर तीन पतिया जुआ चलता था। कालेज के प्रिंसिपल शाम होते ही भांग का गोला खाके मस्त हो जाते थे और उनके दरबार में प्रोफसरों की गुटबाजी चलती रहती थी। शिक्षक दिवस के मौके पर आज उनलोगों की याद आ गई, तो थोड़ा सा ब्लोगिया दिया।




Friday, 4 September 2009

शहनाई भी होएगी

रतन

फूलों की महकेगी खुशबू
पुरवाई भी होएगी
तारों की बारातें होंगी
शहनाई भी होएगी

पतझड़ बाद बसंती मौसम
का आना तय है जैसे
दर्द सहा है तो कुछ पल की
रानाई भी होएगी

कोई नहीं आया ऐसा जो
रहा सिकंदर उम्र तलक
इज्जत होगी शोहरत के संग
रुसवाई भी होएगी

तन्हा रहते गुमसुम गुमसुम
पर यह है उम्मीद हमें
कुछ पल होगा साथ तुम्हारा
परछाई भी होएगी

मैंने जाना जीवन-दुनिया
सब कुछ आनी-जानी है
सुख का समंदर भी गुजरेगा
तनहाई भी होएगी