Monday, 31 August 2009

परसाई जन्मोत्सव

गत दिनांक 22 अगस्त 2009 को व्यंग्यशिल्पी स्वर्गीय हरिशंकर परसाई की कर्मभूमि जबलपुर शहर उनकी याद में सरावोर रही .

विवेचना और प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वाधान में शहर के रानी दुर्गावती संग्रहालय कला वीथिका में एक आयोजन किया गया . इस अवसर पर दिल्ली से पधारे मुख्या वक्ता लेखक विष्णु नागर ने कहा – हिन्दी कहानी और उपन्यास की लेखन शैली में बदलाव के लिए जैसे प्रेमचंद को याद किया जाता है , उसी तरह व्यंग्य की दुनिया को बदलने का योगदान हरिशंकर परसाई को जाता है .

इस अवसर पर सर्वप्रथम श्री वसंत काशीकर ने परसाई की चर्चित कृति ‘संस्कारों और शाश्त्रों की लडाई’ के एक अंश का वाचन किया . तत्पश्चात डा. अरुण कुमार ने परसाई के व्यक्तित्व, लेखन शैली और रचनाओं पर प्रकाश डाला . इस कार्यक्रम की अध्यक्ष्त डा. मलय ने की और अपने वक्तव्य में परसाई के साथ बिताये पलों को याद किया .

शहर के नई दुनिया संस्करण के कार्टूनिस्ट राजेश दुबे ने परसाई जी की रचनाओं पर आधारित कार्टून्स की प्रदर्शनी लगाई . विवेचना रंग मंडल के कलाकारों द्वारा परसाई की प्रसिद्द कृति ‘इंसपेक्टर मातादीन’ का खूबसूरत मंचन खुले मैदान पर किया गया .

कुल मिलाकर एक यादगार शाम परसाई के नाम रही . बड़ी संख्या में शहर के ख्यातिलब्ध साहित्यकार उपस्थित थे . इनमे मुख्या है ज्ञानरंजन [कथाकार ], कुंदन सिंह परिहार [कथाकार ], गुरुनाम सिंह रीहल [लघुकथाकार ]।

इस आयोजन में कुछ बातें जो सामने आई वो निम्नानुसार हैं .

१ आज लेखकों की गुटबाजी चल रही है । वे आपस में एक दुसरे की तारीफ़ करते हैं और किसी तीसरे की दाख्लान्दजी पसंद नहीं करते ।
२ कुछ बड़ी पत्रिकाओं में भी यही आलम है इसलिए वे दम तोड़ रहीं है । हर अंक एक सा । नए लेखकों की भागीदारी उनमे नहीं है .
३ हम निरंतर लिखें और बस लिखें निस्वार्थ ।

इस अवसर पर अनोपचारिक चर्चा में एक प्रश्न उभर कर सामने आया – ब्लॉग्गिंग -ब्लॉग्गिंग एक साहित्यिक ऐय्याशी है ।

हलाँकि ये बात इस आयोजन का हिस्सा नहीं है लेकिन महत्वपूर्ण है । इसलिए ये बात यदि आप सबसे न बांटूं तो तकलीफ में रहूँगा . अतः इस ब्लॉग पर आने वाले तमाम पाठकों का आव्हान करता हूँ की वे अपने विचार प्रतिक्रिया स्वरुप दे -

ब्लॉग्गिंग एक साहित्यिक ऐय्याशी है !

Friday, 28 August 2009

संघे शरणं गच्छामि....

लोकतांत्रिक भारत में पैदा हुए राजकुमार तमाम आर्यसत्यों को समझते-समझते ख़ुद मंत्री बन गए. असल में अब ईसापूर्व वाली शताब्दी तो रही नहीं, यह ईसा बाद की 21वीं शताब्दी है और ज़िन्दगी के रंग-ढंग भी ऐसे नहीं रह गए हैं कि कोई बिना पैसे-धेले के जी ले. वैसे तो उन्हें जब भी अपना पिछ्ला जन्म याद आता तो अकसर उन्हें यह सोच कर कष्ट होता था कि वे भी क्या दिन थे. मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी, अकसर तो बिन मांगे ही बड़े आराम से भिक्षा मिल जाती थी. जो लोग जान जाते कि यह तो राजपुत्र है, वे तो यह भी इंतज़ार नहीं करते थे कि उनके दरवाज़े तक पहुंचूं मैं. जहां जाता, अगर मेरे वहां पहुंचने या होने की सूचना मिल जाती तो राज परिवारों से जुड़े लोग बहुत लोग तो ख़ुद ही चलकर आ जाते थे भिक्षा देने नहीं, चढ़ावे चढ़ाने. कई राज परिवार तो तैयार बैठे रहते थे संन्यास दीक्षा लेने के लिए पहले से ही. एक ज़माना यह है, अब मांगो भी भीख नहीं मिलती. अब भीख सिर्फ़ तब मिलती है जब आप किसी बड़े बाप के आंख के तारे को उससे दूर कर दें. छिपा दें कहीं और फिर फ़ोन से सूचना दें कि भाई इतने रुपये का चढ़ावा इस स्थान पर इतने बजे रख जाएं. और ध्यान रखें, किसी प्रकार की समझदारी करने की कोशिश न करें यानी पुलिस-वुलिस को सूचना न दें, वरना आसपास मौजूद हमारे भदंत आपको वहीं से महापरिनिर्वाण को उपलब्ध करा देंगे. या फिर आप कोई लाइसेंस-वाइसेंस दिलाने की हैसियत में हों और उसे रोक दें. या फिर तब जब आप इनकम टैक्स विभाग से काला-सफ़ेद करने का पक्का परवाना रखते हों और दो लाख लेकर 10 लाख की रसीद दे सकें. अब जीवन की पृहा से मुक्ति के लिए संत नहीं बना जा सकता है, बल्कि तमाम संपदाएं अर्जित करने के लिए संत बना जाता है. संत बन कर वे सारी सुविधाएं हासिल की जाती हैं जो दिन-रात खटने वाले गृहस्थों को भी हासिल नहीं होती हैं.
लिहाज़ा इस जीवन में महापरिनिर्वाण पुराने वाले तरीक़े से तो नहीं मिलने वाला है, ये तो तय है. परिनिर्वाण प्राप्त करने के लिए तप का तरीक़ा दूसरा ही अपनाना होगा. तो सबसे पहले उन्होंने सरस्वती की ध्यान साधना की, देश के सबसे बड़े अगिया बैताल की छत्रछाया में. एक से बढ़कर एक चमत्कार किए उन्होंने ध्यान साधना के तहत. इसी दौरान कुछ नए देवताओं से उनका संपर्क हुआ और उन्होंने जान लिया कि जनता अब तक जिन देवताओं को पूजती आ रही है वे सब के सब बिलकुल ग़लत-सलत देवता हैं. जनता इन्हें झुट्ठे पूजती है, असली देवता तो दूसरे हैं. उन्होंने यह बात समझी और किसी ध्यान साधक की तरह बात समझ में आते ही नए मिले देवताओं की पूजा शुरू कर दी.
अब ज़ाहिर है जब आप किसी देवता को पूजिएगा तो चाहे नया हो या पुराना, वह फल तो देगा ही. बल्कि नए देवता थोड़ा ज़्यादा ही फल देते हैं. सो उन्होंने दिया भी. उन्होंने सबसे पहले तो इन्हें समझाया कि भाई देख सरस्वती की साधना से आज तक किसी को भी निर्वाण नहीं मिला है. निर्वाण मिलता है विष्णु भगवान की कृपा से और विष्णु जी मानते हैं लक्ष्मी जी को. उनकी ही सिफ़ारिश चलती है विष्णु भगवान के सामने. तो अब तू उन्हीं की साधना और साधना उस अगिया बैताल के यहां नहीं हो सकती. यह साधना तुझे करनी होगी हमारी छत्रछाया में, तो चल ये ले मंत्री पद और संभाल अपनिवेश का कारोबार.
राजकुमार ने तुरंत यह साधना शुरू की और अबकी बार इतने मन से की कि कुछ भी बक़ाया नहीं छोड़ा. अपनिवेश का काम उन्होंने इतने मन से किया कि उनके देवराज का सिंहासन डोलने लगा. ऐन वक़्त पर उनके हाथ से जान छुड़ाकर भाग गया देश, वरना उन्होंने उसे भी नहीं छोड़ा होता. ख़ैर उनके सपने अधूरे नहीं रहेंगे, इसका भरोसा उनके बाद उनके मार्ग के साधकों ने दिला दिया. इसीलिए बाद में कुछ विकल्पहीनता की त्रासदी और कुछ ईवीएम की कृपा ने जनता से उन्हें ऐज़ इट इज़ कंटीन्यू भी करवा दिया. बहरहाल, मंत्रालयी दौर में ही राजकुमार राष्ट्र अपश्रेष्ठि के ऐसे प्रिय हुए कि हवाई अड्डे पर उनके गुरुभाई इंतज़ार ही करते रहते और राजकुमार स्वयं विमान के पिछले दरवाज़े निकल अपश्रेष्ठि के कलाकक्ष में पहुंच जाते.
पर इसके बाद से बेचारे राजकुमार का मन उखड़ गया. उनकी समझ में एक तो यह बात आ गई कि राष्ट्र ऐसे चलने वाला नहीं है. राष्ट्र में अब दुख ही दुख है और दुख से उबार सकने की ताक़त रखने वाले इकलौते विहार में अब कोई दम नहीं रह गया है. यहां तक कि इसके जो देवता हैं, उन्हें उनके ही कुछ भक्तों ने अंतर्ध्यान यानी कि नज़रबन्द कर दिया है. तब? अब क्या किया जाए? यह प्रश्न उठा तो उन्होंने एक बार फिर ध्यान लगाया और पाया कि इस विहार के पीछे एक संघ है. वैसे तो विहार में प्रवेश का रास्ता ही संघ से होकर आता था, लेकिन राजकुमार को राजकुमार होने के नाते उसकी ज़रूरत शायद नहीं पड़ी थी. पर अभी उन्हें अचानक उसकी अहमियत पता चल गई और इसीलिए उन्होंने एकदम से घोषणा कर दी.
हालांकि घोषणा जो उन्होंने की, वह अंग्रेजी में की और अब क्या बताएं! यह कहते हुए मुझे बड़ी शर्म आती है कि वह मेरी समझ में बिलकुल वैसे ही ज़रा भी नहीं आई, जैसे 6 साल पहले उनके विहार का इंडिया साइनिंग और फील गुड़ वाला नारा पूरे देस की अनपढ़ जनता के समझ में नहीं आया था. ख़ैर, हमने सोचा कि अपन मित्र सलाहू किस दिन काम आएगा. सों हमने उससे पूछ लिया. उसने जो बताया और उसका जो लब्बोलुआब मेरी समझ में आया वो ये कि अब ये जो अपना विहार है इसकी स्थिति बिहार जैसी हो गई है और राजा साहब की हालत लालू और रामबिलास पासवान जैसी हो गई है. विहार के जो और भदंत हैं ऊ त बेचारे सब ऐसे हो गए हैं जैसे पंचतंत्र का वो सियार जो एक बछड़े के बाप के पीछे-पीछे लगा था.
ज़ाहिर है, अब ऐसे में ये सवाल तो उठना ही था कि फिर क्या किया जाए. कैसे मिलेगा निर्वाण. सवाल उठते ही उन्होंने तुरंत ध्यान लगाया. ध्यान में नारद मुनि आए. देवर्षि को राजकुमार ने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने तुरंत उन्हें सूतजी से मिलवाया. भला हो सूतजी का कि उन्होंने इस घोर कलिकाल में कथाओं पर उमड़ते-घुमड़ते शंकाओं के बादलों को देखते हुए कथा सुनने का कोई उपाय नहीं बताया. उन्होंने लौकिक उपाय बताते हुए राजकुमार को संघ के शरण में जाने का उपाय सुझाया. वही बहुमूल्य उपाय कुछ दिनों पूर्व उन्होंने मृत्युलोक के वासियों को बताया है. नया उपाय जानकर लोकवासियों में धूम मचनी ही थी, सो वो मची हुई है. सभी जाप कर रहे हैं : संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि...... आप भी कर के देख लीजिए. क्या पता दुख के जिन्न से पीछे छूट जाए.

Thursday, 27 August 2009

सस्ते से सस्ती दिल्ली

लीजिए जनाब! ख़ुश हो जाइए. क्या कहा? क्यों ख़ुश हों? अरे भाई ख़ुश होने के लिए भी आपको कोई कारण चाहिए? असली आदमी हमेशा ख़ुश होना चाहता है, बस इसलिए आप भी ख़ुश हो जाइए. और कोई ख़ास कारण चाहिए तो आपको बता दूं कि दिल्ली और मुंबई नाम के जो शहर इस धरती पर हैं, वे दुनिया के सबसे सस्ते शहर हैं. यह कोई भारत सरकार नहीं कह रही है, जिसकी हर बात को आप सिर्फ़ आंकड़ों की रस्साकशी मानते हैं. और न किसी भारतीय एजेंसी ने ही जिनके बारे में आप यह मानकर ही चलते हैं कि उसे सर्वे का ठेका ही मिल जाना बहुत है. एक बार उसे ठेका दें और बेहतर होगा कि सर्वे से आप जो निष्कर्ष चाहते हैं वह उसे पहले ही बता दें. फिर आप जिसे जैसा देखना या दिखाना चाहते हैं, उसे वैसा ही देखने और दिखाने का पूरा इंतज़ाम सर्वे एजेंसियां कर देंगी. अब तो लोकतंत्र के मामले में भी वे इसे सच साबित कर देने में भी सक्षम हो गई हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं रह गई है.
लेकिन नहीं साह्ब यह बात उन भारतीय एजेंसियों ने भी नहीं कही है. यह कहा है एक अतयंत प्रतिष्ठित स्विस बैंक ने. और आप तो जानते ही हैं ईमानदारी के मामले में हमारे देश ही क्या, दुनिया भर के बड़े-बड़े लोग स्विस बैंकों की ही क़समें खाते हैं. अभी हाल ही में चुनाव के दौरान अपने आडवाणी जी खा रहे थे. उनके पहले 89 के चुनाव में आपने राजा साहब को खाते हुए देखा होगा. अरे वही राजा साहब जो दरसल फ़क़ीर थे और बोफोर्स घोटाले के सारे दस्तावेज़ प्रधानमंत्री बनने के पहले तक अपनी जेब में ही लेकर घूमा करते थे. ख़ैर छोड़िए भी, अब इन सब बातों से क्या फ़ायदा? अपने ही स्तर की बात करें तो भी यह तो हम-आप जानते ही हैं कि दुनिया भर की ग़रीब जनता की ख़ून-पसीने की कमाई स्विस बैंकों में ही रखी है. तो भला सोचिए, ईमानदारी का उनसे बड़ा जीवंत प्रतीक और क्या हो सकता है! ख़बर यह है कि स्विस बैंक ने दुनिया भर के 73 बड़े शहरों का सर्वे कराया है. इसी सर्वे के आधार पर उसने दुनिया के सबसे महंगे शहरों की सूची जारी की है. यह जो सूची जारी हुई है उसमें दिल्ली और मुंबई का नाम सबसे नीचे हैं. यूं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार-अराजकता जैसे कुछ महत्वपूर्ण मामलों की बात छोड़ दी जाए तो समूचे भारत का ही नाम अकसर किसी भी सूची में सबसे नीचे ही होता है. तो जी हम तो इतने से ही संतुष्ट हैं. इससे ऊपर जाने का अपन का कोई इरादा ही नहीं है. ओस्लो, ज्यूरिख, कोपेनहेगन इस सूची में पहले, दूसरे, तीसरे नम्बर पर हैं तो रहा करें. मॉस्क़ो, मेक्सिको सिटी और सिओल भी उप्पर हैं तो बने न रहें, हमारा क्या जाता है. अब यह अलग बात है कि उस ख़बर में यह बात कहीं नहीं बताई गई है कि ये सर्वे किया किसने है. कराया तो है ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले स्विस बैंक ने, पर किया किसने ये बेचारे आम आदमी को पता ही नहीं चल पाया.
ख़ैर, जिसने भी किया हो, यह बाद की बात है. इससे एक बात तो हुई है कि जो लोग अभी तक महंगाई-महंगाई चिल्ला रहे थे बार-बार और अपनी बेचारी सरकार की इस बात पर भी यक़ीन नहीं कर रहे थे कि मुद्रास्फीति दर घटी है और महंगाई भी घट गई है, अब उनकी बोलती बंद हो गई है. जो लोग इसे सरकार की ओर से आंकड़ों की बाजीगरी मान रहे थे, वे सोच नहीं पा रहे हैं कि अब क्या तर्क़ दें. वैसे तर्क़ तो उनके पास पहले भी नहीं थे.
बहरहाल, अपन चूंकि दिल्ली में रहते हैं और ये देख रहे हैं कि पांच-छह साल जो मकान दो हज़ार रुपये महीने के किराये पर उपलब्ध था, वह अब 8 हज़ार में भी मिलने वाला नहीं है. ख़रीदने पर जो फ्लैट 5 लाख में आसानी से मिल जाता था, वह अब सीधे 20 लाख का हो चुका है. लेकिन जनाब यह भी तो देखिए, कि अब मकान आपको सफ़ेदी कराके मिलेगा. तो जब घर सफ़ेदी कराके ख़रीदेंगे तो उसका दाम तो बढ़ ही जाएगा न. आलू 5 से 30 रुपये किलो हो गया, आटा 8 से 20 रुपये किलो पर पहुंच गया... तो क्य हो गया? आप यह क्यों नहीं सोचते कि देश में सिर्फ़ आलू-आटा और मकान-कपड़ा ही तो सबसे महत्वपूर्ण नहीं है. कई चीज़ें इनसे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. मसलन लैपटॉप, टीवी, मोबाइल..
आप कहेंगे इन चीज़ों की हमें बहुत ज़रूरत नहीं होती. जी कोई बात नहीं. रोज़गार की ज़रूरत तो आपको होती है. भारत में वह सबसे महंगी चीज़ों में शुमार है. यक़ीन न हो तो किसी पढ़े-लिखे नौजवान से पूछ कर देख लें. सरकारी दफ़्तर में चपरासी बनने के लिए भी दो लाख रुपये देने को तैयार हो जाएगा. ज़नाब दिल्ली में वह सबसे सस्ती चीज़ है. अगर आपको यक़ीन न हो बमुश्किल दो साल पहले हुई सीलिंग का दौर याद कर लीजिए. बहन-बेटियों की इज़्ज़त जिसके पीछे पूरा हिन्दुस्तान मरता है और राजस्थान में जौहर तथा सती प्रथा शुरू हो गई ... दिल्ली में सबसे सस्ती है. ब्लू लाइन बसों की कीर्ति तो कीर्ति आज़ाद से भी ज़्यादा है और बहुत पहले से है. नई आई मेट्रो रेल ने भी साबित कर दिया कि यहां आम आदमी की जान भी सबसे सस्ती है. फिर भी आप नहीं मानते. अरे अब का चाहते हैं माई-बाप?

Tuesday, 25 August 2009

जिन्न-आ मुझे मार

अब तो आपको विश्वास हो ही गया होगा कि जिन्न होते ही हैं और उनमें दम भी होता है। अब केवल दिखाने के लिए बहादुर मत बनिए, वैसे भी इस जिन्न का असर आप पर नहीं होने वाला। ये जिन्न बड़ा जबरदस्त है। जिन्न क्या है, समझिए जिन्ना है। ढूंढ़- ढूंढ़कर बड़े-बड़े नेताओं को मार रहा है , बिलकुल राष्ट्रीय स्तर और राष्ट्रवादी नेताओं को !मार भी क्या रहा है, न मरने दे रहा है न जीने। इस बार भी उसने बड़ा शिकार चुना है। मजे की बात तो यह है कि इस शिकार से किसी को सहानुभूति नहीं है, यहां तक कि ओझाओं और सोखाओं तक को नहीं जो कि इस के घर के ही हैं ! घर- परिवार वाले तो इसे देखना भी नहीं चाहते। इस शिकार से तो वे पहले से ही चिढ़े थे ,अब इसने एक जिन्न और लगा लिया अपने पीछे । दरअसल उन्हें शिकार से ज्यादा चिढ़ इस जिन्न से है । जिन्न इसने लगाया,चलो ठीक है, पर इस वाले जिन्न को क्यों लगाया ? और इस शिकार को क्या कहें ? इसे मालूम था कि इस जिन्न के प्रति माहौल खराब है,फिर भी इसे छेड़ा। पहले तो इसे कहते थे कि आ बैल मुझे मार , पर इसने तो कहा- आ जिन्न-आ मुझे मार !
ये जिन्न बड़ा राजनीतिज्ञ है, केवल चले बले राजनेताओं को मारता है। और मारता भी उसे है जो इसकी बड़ाई करने की कोशिश करता है।इसे धर्म निरपेक्षता से बड़ी चिढ़ है । कुछ भी कह लो पर यही मत कहो। पूरे जीवन धर्मनिरपेक्षता से ही लड़ने की कोशिश की और अब मरहूम होने पर भी उसकी रूह को दुखी कर रहे हो।इतनी मेहनत करके देश का बंटवारा करवाया और इसका श्रेय अभी तक अकेले एन्ज्वाय किया । अब तुम इसमें भी नेहरू-पटेल को शामिल करने लगे ?
साठ साल तो उस घटना के हुए होंगे , पर सठियाने आप लगे। क्या विडम्बना है आपकी भी। अभी चार पांच साल ही हुए होंगे, आपके दल के बहुत बड़े सदस्य के खिलाफ वह जिन्न उभरा था। पब्लिक को पता है, याद भी है। तब भी कुछ ऐसा ही हुआ था।उन्हें अपना सिर देकर जान बचानी पड़ी थी। अब भला जिन्न का मारा कहां तक संभले ? फिर भी आप जिन्न को छेड़ गए! वैसे वह जिन्न है तो शरीफ। यहां उसकी बुराई करो तो आपको पूछेगा भी नहीं, और बड़ाई की और गए। महोदय, आपने तो हद ही कर दी। बड़ाई को कौन कहे आप तो पूरी किताब लिख गए। छपवा भी ली और भाइयों को पढ़वा भी दी । अब होना तो यही था। घर तो आपका पहले से ही भुरभुरा हो रहा था। खंडहर जैसी दशा में आने वाला था, जिन्न और आपने छोड़ दिया- वह भी पड़ोसी का । पड़ोसी वैसे भी किसी जिन्न से कम नहीं होता, यह तो पूरा जिन्ना ही था।
खैर, इस उमर में जिन्न आपका बिगाड़ ही क्या लेगा ? किताब तो आपकी आ ही गई । हंस बिरादरी में आप शामिल हो ही गए हैं । इस उम्र में ही लेखकों को साहित्य के बडे-बड़े पुरस्कार मिलते हैं। लह- बन जाए तो साहित्य का नोबल पुरस्कार भी मिल सकता है। एक पुरस्कार ऐसा आया नहीं कि आप को फिर यही घरवाले सिर पर बिठाकर घूमेंगे। पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति की जैसी कद्र अपने देश में होती है वैसी और कहीं नहीं।
मुझे तो खुशी इस बात की हो रही है कि अभी भी इस देश में लोग किताबें पढ़ते है। अगर पढ़ते नही तो इतना बवाल कहां से होता ।परिचर्चा भी करते हैं लोग और एक्शन भी लिया जाता है। राजनैतिक दल इतने दृढ़ और नैतिक हैं कि अपनी विचारधारा के उलट जाने वाले को फौरन दंड भी देते हैं। यह बात अलग है कि यह सब पड़ोसी देश के बड़े जिन्न यानी जिन्ना की रूह के प्रभाव में होता है।

Thursday, 13 August 2009

विनिमय

कभी- कभी क्या
अब प्रायः लगने लगा है
कि यह विश्व
विनिमय पर टिका है
स्रष्टा की सुन्दरतम कृति
मानव
पूर्णतया विनिमय का विषय
हो गया है,
जन्म प्रभृति से ही
विनिमय उसका कर्तव्य
या फिर
लक्ष्य हो जाता है
अबोध शिशु के रूप में
अपनी निश्छल मुस्कान
स्वतः स्फूर्त किलकारी
एवं
सुकोमल कपोल का
चुम्बन
मां के प्यार ,चैन एवं वात्सल्य से
बदल लेता है
उसी ऊर्जा से विकसित हो
जवान हो जाता है
और माँ हो जाती है
बूढी.
बडा होने पर
उसका विनिमय क्षेत्र
बढ जाता है,
वह ऊर्जा , इमोशन एवं कौशल का
विनिमय करने लगता है .
प्रायः रूप , सौन्दर्य एवं लावण्य
को खुशामद ,गर्मी एवं काम से
विनिमित कर लेता है
इसे ही
सफलता मानता है .
पर
कभी- कभी
विनिमय तो होता है
किंतु अभीष्ट से नहीं
सदियों से
विनिमय में घाटा भी हुआ है-
मछुआरे ने जाल फेंका था
सुनहरी मछली नहीं
सांप फंस गया था
जाल भी गया
कभी- कभी तो
शेर भी फंस गया
परंतु
सबसे हानिप्रद विनिमय
उसने तब किया था
जब समुद्र मंथन हुआ था
अमृत चाहा था
हालाहल मिल गया था
श्रम के विनिमय में,
हाँ, वह देवता था
ऊँचे विचार थे उसके,
स्वयं के लिए
अमृत तलाशता रहा
और
विष दे दिया शिव को
पीने के लिए
आदरपूर्वक,
बस
यही एकमात्र विनिमय नहीं था
मुफ्त दे दिया था
शिव को
पीने के लिए
सिर्फ इतना ही
पर वह
आज भी देवता है .

Monday, 10 August 2009

अबकी बारिश में ये शरारत....

 

सलाहू इन दिनों दिल्ली से बाहर है. किसी मुकद्दमे के सिलसिले में कोलकाता गया हुआ है. भगवान जाने किस जजमान (चाहें तो उसकी भाषा में मुवक्किल कह लें) को कात रहा है, वह भी मोटा या महीन. अच्छे दोस्त न हों तो आप जानते ही हैं दुश्मनों की कमी खलने लगती है. कल वह मिल गया जीमेल के चैटबॉक्स में. इस वर्चुअल युग में असली आधुनिक तो आप जानते ही हैं, वही है जो बीवी तक से बेडरूम के बजाय चैट रूम में मिले. ख़ैर अपन अभी इतने आधुनिक हुए नहीं हैं, हां होने की कोशिश में लगे ज़रूर हैं. काफ़ी दिनों बाद मुलाक़ात हुई थी. सो पहले हालचाल पूछा. इसके बावजूद कि उसकी चाल-चलन से मैं बख़ूबी वाक़िफ़ हूं और ऐसी चाल चलन के रहते किसी मनुष्य के हाल ठीक होने की उम्मीद करना बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे ईवीएम और पार्टी प्रतिबद्ध चुनाव आयुक्त के होते हुए निष्पक्ष चुनाव और उसके सही नतीजों का सपना देखने की हिमाक़त दिनदहाड़े करना. चूंकि दुनिया वीरों से ख़ाली नहीं है, लिहाजा मैं भी कभी-कभी ऐसी हिमाकत कर ही डालता हूं.

सो मैंने हिमाकत कर डाली और छूटते ही पूछ लिया, 'और बताओ क्या हाल है?'

'हाल क्या है, बिलकुल बेहाल है.' सलाहू का जवाब था, 'और बताओ वहां क्या हाल है? तुम कैसे हो?'

'यहां तो बिलकुल ठीक है', मैंने जवाब दिया,'और मैं भी बिलकुल मस्त हूं.'

'अच्छा' उसने ऐसे लिखा जैसे मेरे अच्छे और मस्त होने पर उसे घोर आश्चर्य हुआ. गोया ऐसा होना नहीं चाहिए, फिर भी मैं हूं. उसका एक-एक अक्षर बता रहा था कि अगर वह भारत की ख़ानदानी लोकतांत्रिक पार्टी की आका की ओर से प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया होता तो अभी मेरे अच्छे और मस्त होने पर ऐसा टैक्स लगाता कि मेरी आने वाली सात पीढियां भरते-भरते मर जातीं और तब भी उसकी किस्तें क्रेडिट कार्ड के कर्ज की तरह कभी पूरी तरह चुक नहीं पातीं.

'ये बताओ, वहां कुछ बरसात-वरसात हुई क्या?'उसने पूछा.

'हां हुई न!' मैंने जवाब दिया, 'अभी तो कल रात ही हुई है. और वहां क्या हाल है?'

'अरे यार यहां तो मत पूछो. बेहाल है. नामो-निशान तक नहीं है बरसात का.'

'क्या बात करते हो यार! अभी तो मैंने आज ही टीवी में देखा है कि कोलकाता में क़रीब डेढ़ घंटे तक झमाझम बारिश हुई है!' मैंने उसे बताया.

'तुम मीडिया वाले भी पता नही कहां-कहां से अटकलपच्चू ख़बरें ले-लेकर आ जाते हो.' उसने मुझे लताड़ लगाई, ' ऐसे समय में जबकि ज़ोरों की बारिश होनी चाहिए कम-से-कम तीन-चार दिन तक तो एकदम लगातार, तब डेढ़ घंटे अगर बारिश हो गई तो उसे कोई बारिश माना जाना चाहिए?'

अब लीजिए इन जनाब को डेढ़ घंटे की बारिश कोई बारिश ही नहीं लगती. इन्हें कम-से-कम तीन-चार दिनों की झमाझम बारिश चाहिए और वह भी लगातार. 'भाई बारिश तो यहां भी उतनी ही हुई है. बल्कि उससे भी कम, केवल आधे घंटे की. तो भी मैं तो ख़ुश हूं कि चलो कम-से-कम हुई तो. और तुम डेढ़ घंटे की बारिश को भी बारिश नहीं मानते?'

'अब तुम्हारे जैसे बेवकूफ़ चाहें तो केवल बादल देखकर भी ख़ुश हो सकते हैं और लगातार मस्त बने रह सकते हैं.'

'सकते क्या हैं, बने ही रहते है. देखो भाई, ख़ुश रहना भी एक कला है, बिलकुल वैसे ही जैसे जीवन जीना एक कला है. जिन्हें जीने की कला आ जाती है उन्हें काला हांडी में अकाल नहीं दिखाई देता, अकाल राहत के प्रयास दिखाई देते हैं. उन्हें उस प्रयास के बावजूद पेट की खाई भरने के लिए अपने बच्चे बेचते लोग दिखाई नहीं देते, राहतकार्यों के लिए आए बजट से न केवल अपनी, बल्कि अपने रिश्तेदारों, भाई-भतीजों, दोस्तों और इक्के-दुक्के पड़ोसियों तक की ग़रीबी को बंगाल की खाड़ी में डुबे आते लोग दिखाई देते हैं. जिन्हें वह कला आती है, उन्हें बाढ़ राहत में धांधली नहीं, राहत कोश से अफ़सरों और मंत्रियों के भरते घर दिखाई देते हैं. उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी पर फ़ैसला कोर्ट का नहीं, चुनाव आयोग का काम दिखाई देता है. ठीक वैसे ही जिन्हें यह कला आती है, वे डेढ़ घंटे  की  बारिश की निन्दा नहीं करते, बादल देखकर भी प्रसन्न हो जाते हैं.'

'तो रहो प्रसन्न.' उसने खीज कर लिखा.

'हां, वो तो मैं हूं ही.' मैंने उसे बताया, 'तुम्हें शायद मालूम नहीं इतनी ग़रीबी और तथाकथित बदहाली के बावजूद दुनिया में खुशी के इंडेक्स पर भारत का तीसरा नम्बर है. जीवन जीने की कला के मामले में पूरी दुनिया हम भारतीयों का लोहा मानती है. जानते हो कैसे?'

'कैसे?'

'ऐसे कि ऐसे केवल हमीं हैं जो नेताओं से सिर्फ़ वादे सुनकर ख़ुश हो जाते हैं. उन्हे निभाने की उम्मीद तो हमारे देश की जनता कभी ग़लती से भी नहीं करती है. ऐसे समय में जबकि पूरा देश महंगाई और बेकारी से मर रहा हो, हम धारा 377 पर बहस करने में लग जाते हैं. अगर कोई न भी लगना चाहे इस बहस में और वह महंगाई-बेकारी की बात करना चाहे तो हमारे बुद्धिजीवी उसकी ऐसी गति बनाते हैं कि बेचारा भकुआ कर ताकता रह जाता है. गोया अगर वह गे या लेस्बी नहीं है, तो उसका इस जगत में होना ही गुनाह है.'

'हुम्म!' बड़ी देर बाद सलाहू ने ऐसे हुम्म की जैसे  कोई मंत्री किसी योजना की 90 परसेंट रकम डकारने के बाद 10 परसेंट अपने चमचों के लिए टरका देता है.

'अब बरसात का मामला भी समझ लो कि कुछ ऐसा ही है.' मैंने उसे आगे बताना शुरू किया, 'तुम्हें याद है न हमारे एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे. वह भी खानदानी तौर पर प्रधानमंत्री बनने की व्याधि से पीड़ित थे. इसके बावजूद उन्होंने कहा था कि हम जब किसी योजना के तहत 100 रुपये की रकम जनता के लिए जारी करते हैं तो उसमें से 85 तो पहले ही ख़त्म हो जाते हैं. मुश्किल से 15 पहुंच पाते हैं जनता तक.'

'हुम्म!' उसने चैटबॉक्स में लिखा और मुझे उसकी मुंडी हिलती हुई दिखी.

'अब वह स्वर्गीय हो चुके हैं, ये तो तुम जानते ही हो.' मैंने उसे बताया और उसने फिर चैट बॉक्स में हुंकारी भरी. तो मैंने आगे बताया, 'तुमको यह तो पता ही होगा कि बड़े लोग प्रेरणास्रोत होते हैं. असली नेता वही होता है, जो देश ही नहीं, पूरी दुनिया की जनता को अपने बताए रास्ते पर चलवा दे.'

उसने फिर हुंकारी भरी तो मैंने फिर बताया, 'अब देखो, वह अकेले ही तो गए नहीं हैं. उनसे पहले भी तमाम लोग वहां जा चुके थे और बाद में भी बहुत लोग गए हैं. वे सारे आख़िर वहां कर क्या रहे हैं! वही कला अब उन्होंने स्वर्ग के कारिन्दों को भी सिखा दी है. लिहाजा बारिश के साथ भी अब ऐसा ही कुछ हो रहा है. इन्द्र देवता बारिश का जो कोटा तय करके रिलीज़ कर रहे हैं उसमें से 90 परसेंट तो वहीं बन्दरबांट का शिकार हो जा रहा है. वह स्वर्ग के अफ़सरों और अप्सराओं के खाते में ही चला जा रहा है. जो 10 परसेंट बच रहा है, वह जैसे-तैसे धरती तक आ रहा है.'

'तो क्या अब इतने में ही हम प्रसन्न रहें.' उसने ज़ोर का प्रतिवाद दर्ज कराया.

'हां! रहना ही पड़ेगा बच्चू!' मैंने उसे समझाया, 'न रहकर सिर्फ़ अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाने के अलावा और कर भी क्या सकते हो? जब धरती पर एक लोकतांत्रिक देश में हो रही अपने ही संसाधनों की बन्दरबांट पर हम-तुम कुछ नहीं कर सके तो स्वर्ग से हो रही बन्दरबांट पर क्या कर लेंगे?'

पता नहीं सलाहू की समझ में यह बात आई या नहीं, पर उसने इसके बाद चैटबॉक्स में कुछ और नहीं लिखा. अगर आपको लगता है कि कुछ कर लेंगे तो जो भी कुछ करना मुमकिन लगता हो वही नीचे के कमेंट बॉक्स में लिख दें.

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Sunday, 9 August 2009

नारी-संविधान

नारी का
नारी के लिए
नारी के द्बारा
संविधान
गढ़ दिया गया,
बेटी का
बहू के लिए
सास के द्बारा
काम
मढ़ दिया गया!
[] राकेश 'सोऽहं'

Friday, 7 August 2009

रुदन

रुदन
एक कला है
और
आंसू एक कलाक्रिति .
कुछ लोग
इस कला के मर्मज्ञ होते हैं
उन्हें
शास्त्रीय रुदन से लेकर
पॅ।प रुदन का
विचित्र अभ्यास होता है .
यदा –कदा
कुछ अंतर्मुखी भी होते हैं
जो
नज़रें बचाकर रोते हैं
इस कला को
आत्मा की भागीरथी से धोते हैं.
किंतु,
’वास्तविक’ कलाकार
गुमनाम नहीं होना चाहते
उन्हें ज्ञान है-
कला का मूल्य होता है,
अतः
अपनी डबडबाई
ढलकती, छ्लकती आंखों के
खारे जल को
‘सहानुभूति‘ की कीमत पर
बेच देते हैं,
फिर
नया स्टॅ।क लाते हैं
और मैं
कलाहीन
उन्हें देखता रहता हूं
बस
आंखों में कुछ लिए हुए.

Thursday, 6 August 2009

मेघ : तीन चित्र

साथियों हालाँकि वर्षा नहीं हो रही है । मेघ बरसे न बरसें हर स्थिति में तरसाते हैं । अभी कल ही मेघ आए और ऑफिस से लोटते समय कुछ चित्र खींच गए कि -

उमड़ - घुमड़ कर आते मेघ
ओ मद में मादमाते मेघ ।
तुम बिन सब कुछ सूना है
आस मिलन की लिए हुए
रात चौगुनी-दिन-दूना-है
कसक भरी इस बिरहा में
क्यों मन को भरमाते मेघ ?
उमड़ - घुमड़ कर .....
छूटा घर छूटा चोबारा
छूटे संगी साथी जिन पर
निज- हारा, मन- हारा
पीया मिलन की बेला में
क्यों आंसू बरसाते मेघ ?
उमड़-घुमड़ कर .......
आभावों की लिस्ट बड़ी है
योवन की देहरी पर देखो
अरमानो की लाज खड़ी है
घास-फूस की झोपड़ पर
क्यों मदिरा बरसाते मघ?
उमड़-घुमड़ कर ....
[] राकेश 'सोऽहं'