Monday, 29 June 2009

nijikaran

.......गतांक से आगे
दूसरा महत्त्वपूर्ण निजीकरण शिक्षा का हुआ। सरकारी स्कूलों में कथित रूप से घोर भ्रष्टाचार फैला हुआ था। यद्यपि परिणाम प्रतिशत फेल विद्यार्थियों का ही अधिक होता ,फिर भी कुछ तो उत्तीर्ण हो ही जाते।यही उत्तीर्ण छात्र आगे चलकर बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि करते और देश की प्रतिष्ठा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गिरती। न ढंग के कपड़े,न कापी न किताब,न तरीका। आखिर कब तक ढोए सरकार! सारे स्कूल ’पब्लिक स्कूल ’ हो गए।शिक्षा का स्तरोन्नयन हो गया।हाँ,अपवाद स्वरूप् कुछ राजकीय विद्यालय बचे रह गए थे। वस्तुतः इन स्कूलों का परीक्षा परिणाम अन्य विद्यालयों की तुलना में बहुत ऊँचा रह गया था। फलतः शिक्षकों एवं अभिभावकों ने आंदोलन कर दिया। बापू की समाधि पर धरना दे दिया। सरकार को झुकना पड़ा। समझदारी से काम लेना पड़ेगा। उन विद्यालयों के निजीकरण का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। उन दिनों सरकार के पास ठंडा बस्ता नामक एक अज्ञात एवं अतिगोपनीय उपकरण हुआ करता था। यह ठंडा बस्ता अलादीन के जादुई चिराग से भी चमत्कारी था। जब भी कोई राष्ट्रीय महत्त्व का मामला होता और सरकार उसे लटकाना चाहती तो उसे ठंडे बस्ते में डाल देती। वह उसी में पड़ा रहता। जब पुनः आवश्यकता होती या आम चुनाव आते, सरकार ठंडे बस्ते का मुँह खोलती और उस मामले को बाहर निकाल लेती। आवश्यकता पूर्ति होने पर मामला पुनः ठंडे बस्ते में। आवश्यक यह था कि किसी प्रकार ऐसे विद्यालयों का परिणाम भी शून्य के स्तर तक लाया जाए।अस्तु, तमाम योग्य एवं अनुभवी अध्यापकों को वर्ष पर्यन्त दूसरे विभागों मे उपनियुक्त का दिया गया।अधिकाँश को मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों की गणना में लगा दिया जिससे मच्छरजन्य बीमारियों से मुक्ति मिल सके। कुछ को टाइम- बेटाइम होने वाले चुनावों में लगा दिया गया। अब विद्यालय में वही अध्यापक बचे जो अध्यापक बने नहीं ,बनाए गए थे। यद्यपि इस प्रक्रिया में तीन वर्ष लगे ,परन्तु ऐसी स्थिति अवश्य आ गई कि इन विद्यालयों का निजीकरण निर्विरोध किया जा सके। निजी उर्फ पब्लिक स्कूलों ने शिक्षा को पहली बार आर्थिक आयाम प्रदान किया। राष्ट्रीय शिक्षा अधिनियम 1660 के नियमों ,उपनियमों एवं विनियमों में संशोधन किया । नई धाराएं ,उपधाराएं जोड़ी गई। प्रवेश नियम तार्किक एवं संगत बनाए गए।कुछ उल्लेखनीय नियम निम्नवत हैं-
प्रवेश 1- प्रवेश उसी छात्र या छात्रा को दिया जाएगा जिनके अभिभावकों के पास वैध पासपोर्ट एवं वीजा होगा। यह नितान्त आवश्यक है कि छात्र- छात्रा अपने अभिभावकों के साथ प्रत्येक महाद्वीप के कम से कम एक देश की यात्रा कर चुके हों।
2- छात्र-छात्रा के माता-पिता आयकर जमा करते हों और उसका विवरण देने को तैयार हों।
3-छात्र-छात्रा माता पिता की इकलौती संतान हो।यदि किसी अभिभावक के एक से अधिक सन्तान हो तो उसे दोगुना शुल्क जमा कराना होगा।
4- छात्र/छात्रा के दादा-दादी अनिवार्य रूप से छात्र/छात्रा के साथ न रहते हों ।
5-छात्र/छात्रा को अनिवार्य रूप से अंगरेजी में पेशाब करना आता हो। हिन्दी माध्यम में पेशाब करना अयोग्यता होगी।
परीक्षा - 1-प्रत्येक विद्यार्थी की प्रतिदिन परीक्षा ली जाएगी।
2- हर परिस्थिति में परीक्षा में सम्मिलित होना अनिवार्य होगा।दैनिक परीक्षा में पूर्णतः या आंशिक रूप से अनुपस्थित होने वाले छात्र/ छात्रा वर्तमान कक्षा से तीन कक्षा पीछे कर दिए जाएंगे।
3- परीक्षा शुल्क प्रश्न पत्र में मुद्रित प्रश्नों की संख्या के अनुसार अग्रिम लिया जाएगा।ऐसे विद्यार्थी जिनका शुल्क जमा नहीं होगा,उनके प्रश्नोत्तर अवैध माने जाएंगे और अंक निर्धारण परीक्षक के विवेकानुसार किया जाएगा। ऐसी दशा में एक गणित अध्यापक दो दूनी चार मानने को बाध्य नहीं होगा। सम्पूर्ण जिम्मेवारी अभिभावक की होगी।
ऐसे न जाने कितने नियम थे। अनुशासन एवं कार्यव्यवहार के नियम तो सर्वथा आदर्श थे। प्रवेश के समय ही अभिभावक से हजारों रुपये के स्टाम्प पेपर पर अनुबन्ध एवं घोषणापत्र भरवाए जाते थे। कोई भी अभिभावक अपनी संतान से विद्यालय कार्यावधि मे किसी भी परिस्थिति में मिल नही सकता था। माह में एक बार वह विद्यालय में आ सकता था। विद्यालय के प्रवेश द्वार पर दरवाजे में छोटे-छोटे छेद बनाए गए थे जिसमें से वह पांच सेकेण्ड तक अपने पुत्र या पुत्री को झांक सकता था।विद्यालय में दूरबीन सुविधा भी थी जिसका उपयोग एक हजार रुपये जमा कर एक मिनट तक संतान दर्शनाथ किया जा सकता था। एक बार प्रवेश मिल जाने पर छात्र/छात्रा को बारहवीं तक उसी स्कूल में पढ़ना पड़ता था। किसी भी परिस्थिति में उसे निकाल कर दूसरे स्कूल में नहीं पढ़ाया जा सकता था।यदि शिक्षा के दौरान ही छात्र की मृत्यु हो जाए तो उसे विद्यालय के श्मशान में सम्मान के साथ दफना दिया जाता।वहाँ हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थीं-चिकित्सालय,बुक शॉप ,पेन्सिल शॉप , यूनिफार्म शॉप , कैफे, रेस्टोरेण्ट आदि -आदि।
.......... आगे जारी .......

Saturday, 27 June 2009

vyangya

निजीकरण
(यह व्यंग्य उस समय लिखा गया था जब अपने देष में निजीकरण जोरों पर था । यह रचना समकालीन अभिव्यक्ति के अक्तूबर- दिसम्बर 2002 अंक में प्रकाषित हुआ था।)
अन्ततः चिरप्रतीक्षित और अनुमानित दिन आ ही गया।देष के समस्त समाचार पत्रों एवं पत्रकों के वर्गीकृत में सरकार के निजीकरण की निविदा आमंत्रण सूचना छप ही गई।
क्रमांक टी.टी./पी.पी./सी.सी./0000004321/पत्रांक सी.टी./एस. टी./00/जी.डी./प्राइ./99/निजी./010101/यूनि./86/ दिनांक............ के शुद्ध prshasnic shabdavali में निविदा का मजमून-
एक प्रतिष्ठित , अनिष्चित,विकृत एवं वैष्वीकृत सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र से वैयक्तिक क्षेत्र में हस्तांतरित करने के लिए प्रतिष्ठित एवं अनुभवी प्रतिष्ठानों/समूहों /संगठनों से मुहरबंद निविदाएं आमंत्रित की जाती है।निविदा प्रपत्र सरकार के मुख्यालय से किसी भी कार्यदिवस पर एक मिलियन यू.एस. डाॅलर का पटल भुगतान करके खरीदा जा सकता है। सामग्री एवं कर्मचारियों का निरीक्षण नहीं किया जा सकता है। निविदा की अन्य षर्तें निम्नवत हैं-
1-प्रत्येक बोलीदाता का प्रतिष्ठित ठेकेदार के रूप में पंजीकृत hona आवष्यक है।
2-बोलीदाता के पास किन्हीं पांच राज्यों में सरकार चलाने का अनुभव होना आवष्यक
है।
3-ऐसे व्यक्ति निविदा हेतु पात्र नहीं माने जाएंगे जिन्हें संगीन अपराध के जुर्म में
न्यायालयों के चक्कर काटने का अनुभव न हो।
4-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को उच्च प्राथमिकता दी जाएगी और यदि कोई बहुराष्ट्रीय
कम्पनी उच्चतम बोली अन्य राष्ट्रीय कम्पनियों से पचास प्रतिषत तक कम लगाएगी
तब भी निविदा उसी के नाम छूटी हुई मानी जाएगी।
5-बोलीदाता को समस्त सांसदों, विधायकों एवं प्रथम श्रेणी अधिकारियों का आजीवन
खर्च तथा सात पीढ़ियों तक का नफासत खर्च जमा कराना होगा।
6- समस्त भुगतान यू.एस डालर्स या स्विस बैंक के खातों में ही स्वीकार किए जाएंगे।
7-सरकारी इमारतों एवं कर्मचारियों का हस्तांतरण ’जहाँ है,जैसे है‘ के आधार पर
लेना अनिवार्य होगा।यदि कोई बोलीदाता इन्हें लेने से मना करता है तो उसकी
बोली स्वतः रद्द समझी जाएगी और जमानत राषि जब्त कर ली जाएगी।
8- अन्तर्राष्ट्रीय दबाव में निविदा को निरस्त करने का अधिकार सुरक्षित है।

किसी भी अन्य गोपनीय जानकारी के लिए उचित षुल्क के साथ अधोहस्ताक्षरी से सम्पर्क कर सकते हैं।
हस्ताक्षरित/-
निविदा अधिकारी
......... सरकार
( जनहित में जारी )
जनता ने एक अखबार में पढ़ा, फिर अनेक में पढ़ा। दरअसल मामला राष्ट्रीय
महत्व का था, इसलिए निविदा देष के हर अखबार में छपी, अनेक प्रकार से छपी। हिन्दी अखबार में अंगरेजी में छपी और अंगरेजी अखबार में हिन्दी मे छपी। पंजाबी पत्र में उर्दू में ,उर्दू अखबार में तेलुगु भाषा में। बांग्ला में मराठी में,मराठी में असमिया और कन्नड़ अखबार में गुजराती भाषा में। संस्कृत में कोई अखबार होता नहीं था इसके लिए अंगरेजी में माफी मांग ली गई।
भाषा कोई भी हो,अखबार दो प्रकार के होते थे।एक तो वे जो विज्ञापन दाताओं से पैसा वसूल कर अखबार फ्री बांटते,दूसरे वे जो पाठकों से पैसा वसूल कर विज्ञापन मुफ्त छापते।सबकी अपनी -अपनी नीति, अपनी - अपनी रीति।
बहरहाल,सरकार के निजीकरण की निविदा आ गई-जैसे कोई किसान-मजदूर अपनी बीवी की दवा के लिए घर का आखिरी बर्तन बेच रहा हो- इस विष्वास से कि कोई बड़ा अस्पताल उसकी बीवी को भर्ती करने के लिए तैयार हो जाएगा।
निजीकरण वर्ष और निजीकरण सप्ताह का आयोजन करके सरकार ने निजीकरण का लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर लिया था। बचा- खुचा तो केवल दषमलव में रह गया था।हाँ, अस्पतालों में निजीकरण कुछ कम रह गया था और निजीकरण से बचे अस्पतालों में कुछ विषेष व्यवस्था करनी पड़ गई थी।
दरअसल समस्त बड़े अस्पतालों का निजीकरण करने की निविदा आमंत्रित की गई थी किन्तु गलती यह रह गई कि इच्छुक पार्टियों को “ जहां है जैसे है” के आधार पर अस्पतालों के निरीक्षण की स्वतंत्रता प्रदान कर दी गई थी।यूँ तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उत्साहित थीं ,किन्तु निरीक्षण के उपरान्त उनका मन बदल गया। कम्प्यूटर पर हिसाब लगाकर देखा तो माथा चकरा गया।उन्होंने सरकार को बताया कि वे निविदा की जमानत राषि जब्त करवाना पसन्द करेंगी ,बजाय इन अस्पतालों को खरीदने के क्योंकि इन अस्पतालों को प्राइवेट लुक देने के लिए गन्दगी साफ कराने में जो खर्च आएगा, उससे कम में नया अस्पताल बन जाएगा। हाँ,यदि सरकार पूरी इमारत गिरवाकर और मलवा हटवा कर स्थान ही दे दे तो वे निविदा लगाने को तैयार हैं। सरकारी कम्प्यूटरों ने भी हिसाब लगाया। मलवे से बने अस्पताल को गिराने और मलवा हटाने मे जो खर्च आ रहा था वह अस्पताल की लागत का साढ़े सड़सठ गुना था। फिर गिराने की निविदा अलग से। लिहाजा सरकार ने सुधार हेतु कुछ आमूल-चूल परिवर्तन किए।
सरकार धर्म एवं संस्कृति की पोषक थी। नामकरण संस्कार में उसका अटूट विष्वास था। ज्योतिषी जी को बुलाया गया।उन्होंने विचार किया।अस्पताल के जन्मांग चक्र एवं ग्रह दषा के अनुसार प्रथम वर्ण ’मो’ या ’मौ’ आ रहा था।अस्पताल जिस प्रकार सुविधाग्रस्त था,उससे अधिकांष मरीज सहज ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे और ज्योतिष गणना के अनुसार उपयुक्त नाम ’मौतधाम’ या ’मौतकेन्द्र ’ हो सकता था, पर सरकार चूँकि आदर्ष परम्परा की प्रतिनिधि थी,इसलिए अस्पताल का नाम दिया गया ’मोक्षधाम’।व्यवस्थानुसार जहाँ नाम सार्थक था , वहीं इस मिथक को भी तोड़ता था कि मोक्ष के लिए अब काषी जाना और मृत्यु के लिए वर्षों संघर्ष करना आवष्यक ही है।आपके कर्म ठीक हैं तो आप कहीं भी मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। कबीर का मगहर!
दूसरा बड़ा सुधार यह किया गया कि प्रत्येक अस्पताल में दो-दो अत्याधुनिक ष्ष्मषान बनाए गए-हिन्दुओं के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग। अस्पताल में जितने बिस्तर ,उतनी ही क्षमता का ष्ष्मषान। दोनों ष्मषानों में वातानुकूलन,
वाटरकूलर,इण्डियन एण्ड चाइनीज रेस्टोरेन्ट, काफी हाउस एवं जनसुविधाएँ । टिकठी ,कफन, बतासे,फूल अगरबत्ती,तिल एवं पेट्रोल,कीकर से लेकर चन्दन तक की लकड़ी की सरकारी दूकानें ।स्पेषल चिता डिजाइनर निःषुल्क!धार्मिक कैसेटों की एक कम्पनी की तरफ से दाह संस्कार के कैसेट मुफ्त।दूसरी ओर कब्रों को पक्की करने के लिए लोकनिर्माण विभाग के सिविल इंजीनियर ,इक्जीक्यूटिव इंजीनियर एवं वास्तुषास्त्री चैबीस घंटे मुफ्त सेवा में ।सीमेन्ट,संगमरमर एवं अन्य सामान रियायती दर पर।पहले से बुक कराने पर पचास प्रतिषत तक छूट।चिकित्साधिकारी डा. क्रूर सिंह को हटाकर डा. निर्दय सिंह को लाया गया।
अब मोक्षधाम की बड़ी प्रतिष्ठा है। बड़े-बड़े लोग, बड़े-बड़े अधिकारी आज इस अस्पताल में अपने माँ- बाप को भर्ती कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं।एक बार भर्ती हो जाए तो समझो हमेषा के लिए छुट्टी!अभी संयुक्त सचिव ष्षर्माजी ने अपनी माँ को भर्ती कराया था।खुषी में अच्छी-खासी पार्टी भी दी। देते क्यों नहीं, कितनी मुष्किल से गरीबी रेखा के नीचे का प्रमाण पत्र बनवाया था ,तब भर्ती मिली। कहाँ- कहाँ दवा नहीं करवाई,पर झंझट यहीं से छूटा!
------आगे जारी ----

Friday, 26 June 2009

देवियों और सज्जनों

पता है मुझे
कौन है देवी
और कौन है सज्‍जन
सच तो ये है
न कोई देवी है
न कोई सज्‍जन
सच तो ये भी है
कि मैं भी सज्‍जन नहीं
न देवी, न देवता
यह तो लबादा है
जिसे ओढ़कर
हम सब सज्‍जन होने का
करते हैं नाटक
दरअसल,हकीकत तो नाटक ही है
ये दुनिया एक रंगमंच है
कुछ समझे बाबू मोशाय
अरे जम के करो नौटंकी
अपनी भूमिका सलीके से निभाओ
साफ-साफ और सलीके से बोलो
ऐसा बोलो कि मजा आ जाय
लोग कहें वाह-वाह
नाटक कम्‍पनी दे पुरस्‍कार
कुछ समझे देवियों और सज्‍जनों।।।।

संजय राय
21 जून,2009

Tuesday, 23 June 2009

kavita

तुम
तुम
तुलसी का एक बिरवा हो
जिसे
मेरी माँ ने दूर से लाकर
आँगन में लगाया था
और
चिकनी मिट्टी से लीपकर
सुन्दर सा थाला बनाया था ।
पहले
मैं तुम्हें यों ही
नोचकर फेंक देता था
तब मैंअबोध था,
बाद में
तुम्हारा प्रयोग
ओषधीय हो गया
तुम्हारी पत्तियों को चाय में डालने लगा
और कभी कभी काढ़ा भी बनाने लगा
छौंक लगाकर ।
तुम चुप रही तो मैं
सूर्य को अर्घ्य देने लगा
तुम्हारे थाले में
मां की देखा- देखी
और अब
धूप जलाकर पूजा भी कर लेता हूँ।
लगता है
तुम अभी भी तुलसी का एक बिरवा
हो सूखती हुई
मेरे आँगन में ।

Saturday, 20 June 2009

क्यों नहीं समझते इतनी सी बात?

लालगढ़ में माओवादियों को घेरने का क़रीब-क़रीब पूरा इंतज़ाम कर लिया गया है. मुमकिन है कि जल्दी ही उनसे निपट लिया जाए और फिलहाल वहां यह समस्या हल कर लिए गए होने की ख़बर भी आ जाए. लेकिन क्या केवल इतने से ही यह समस्या हल हो जाएगी? लालगढ़ में माओवादियों ने प्रशासन और सुरक्षाबलों को छकाने का जो तरीक़ा चुना है, वह ख़ास तौर से ग़ौर किए जाने लायक है. यह मसला मुझे इस दृष्टि से बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं लगता कि माओवादी क्या चाहते हैं या उनकी क्या रणनीति है. लेकिन यह इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है कि माओवादी जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके लिए उन्होंने यह जो रणनीति बनाई है वह सफल कैसे हो जा रही है. क्या उसका सफल होना केवल एक घटना है या फिर हमारी कमज़ोरी या फिर हमारी सामाजिक विसंगतियों का नतीजा या कि हमारी पूरी की पूरी संसदीय व्यवस्था की विफलता? या फिर इन सबका मिला-जुला परिणाम?
यह ग़ौर करने की ज़रूरत है कि माओवादी विद्रोहियों ने अपने लिए लालगढ़ में जो सुरक्षा घेरा बना रखा था उसमें सबसे आगे महिलाएं थीं और बच्चे थे. महिलाओं और बच्चों के मामले में केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं, पूरे भारत का नज़रिया एक सा है. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक. केवल उनके प्रति संवेदनशीलता और उनकी हिफ़ाज़त के मामले में ही नहीं, उनके प्रति हैवानियत के मामले में भी. कोई आसानी से अपने परिवार की महिलाओं, बच्चों या बुजुर्गों को कहीं भिड़ने नहीं भेजता. पर माओवादियों को बचाने के लिए वे यह भी करने को तैयार हो गए तो क्यों? अब यह एक अलग बात है कि माओवादी और नक्सली एक ही बात नहीं है, पर आम तौर पर इन्हें एक ही समझा जाता है. ख़ैर समझने का क्या करिएगा! समझने का तो आलम यह है कि मार्क्सवाद और माओवाद का फ़र्क़ भी बहुत लोग नहीं जानते, पर इससे मार्क्सवाद माओवाद नहीं हो जाता और न अगली पंक्ति के सभी मार्क्सवादियों के व्यवहार में धुर माओवादी या फासीवादी हो जाने से ही ऐसा हो जाता है. बहरहाल, समाज का शोषित-वंचित तबका जब इन्हें बचाने के लिए अपने और अपने प्रियजनों के प्राणों की बाजी तक लगाने के लिए तैयार हो जाता है तो उसके मूल में किसी मार्क्सवाद, माओवाद, स्टालिनवाद या नक्सलवाद का कोई खांचा नहीं होता है. दुनिया के किसी सिद्धांत से उसका कोई मतलब नहीं होता है.
फिर भी यह देखा जाता है कि वह अपना सब कुछ इनके लिए लुटाने को तैयार हो जाता है. यह बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है. नक्सली झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश और अन्य राज्यों में भी फैले हैं. सरकारी और पूंजीवादी मीडियातंत्र द्वारा दुष्प्रचार के तमाम टोटके अपनाए जाने के बावजूद इन्हें वहां की आम जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है. सिर्फ़ इन्हें ही नहीं, इनके जैसे कई दूसरे संगठनों-गिरोहों को भी जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है. भारतीय समाज में बहुत जगहों पर डकैत भी ऐसे ही अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल साबित होते रहे हैं, बावजूद इसके कि उनका ऐसा कोई वाद-सिद्धांत नहीं होता रहा है और न वे किसी बड़े-व्यापक परिवर्तन का सपना ही दिखाते रहे हैं. और हां, इसका मतलब यह भी न निकालें कि मैं डाकुओं, नक्सलियों और माओवादियों को एक समान मान रहा हूं. बुनियादी बात बस यह है कि जनसमर्थन उन्हें भी हासिल होता रहा है. और ऐसा केवल हमारे देश में होता हो, यह भी नहीं है. दुनिया का इतिहास पलट कर देखें तो ऐसे हज़ारों उदाहरण दूसरे देशों में भी मिल जाएंगे. इस तरह देखें तो हमारे समाज में जनसमर्थन हासिल करने का मतलब किसी दर्शन या सिद्धांत के प्रति लोगों का समर्थन या उनकी आस्था हासिल करना नहीं होता है. जब बहुत सारे लोग अपनी और अपने बाल-बच्चों की जान की परवाह छोड़ कर नक्सलियों-माओवादियों का साथ दे रहे होते हैं तो उनके मन में कुछ बहुत गहरे असंतोष होते हैं, रोष होते हैं. उनकी कुछ ज़रूरतें हैं, जिनको वे किसी न किसी तरह एक नियत हद तक शायद पूरी कर देते हैं. यह ग़ौर करने की बात है कि समाज का एक ही ख़ास तबका है जिसे अधिकतर नक्सली या माओवादी संगठन अपना निशाना बनाते हैं. नेपाल से लेकर चेन्नई तक फैले जंगलों में वे इसी ख़ास तबके को लेकर बढ़ते चले गए हैं. बावजूद इसके कि दोनों की हालत अभी तक जस की तस है, ये हक़ीक़त है कि पुलिस के लिए वनवासियों या ग्रामीणों से उनके बारे में किसी तरह का सुराग पाना आसान बात नहीं है. क्यों? क्योंकि आम जनता पुलिस पर ज़रा सा भी भरोसा नहीं करती, लेकिन नक्सलियों और माओवादियों पर पूरा भरोसा करती है. यहां तक कि डाकुओं और आतंकवादियों पर भी भरोसा कर लेती है, पर पुलिस पर वह भरोसा नहीं करती.
ख़ैर भरोसे पर बात बाद में. बुनियादी बात यह है कि उस एक ख़ास तबके को ही पकड़ कर ये आगे फैलते क्यों जाते हैं? क्योंकि यह हमारे समाज का वह तबका है जो बेहद शोषित और पूरी तरह वंचित है. विकास के नए उपादानों का तो उसे कोई लाभ नहीं ही मिल सका है, उसकी रही-सही ज़मीन भी उसके पैरों तले से छीन ली जा रही है. उनके संसाधनों की इस लूट को व्यवस्था की खुली छूट है.
इसका एहसास लूटने वाले हमारे तंत्र को हो न हो, पर भुगतने वालों को तो दर्द टीसता ही है. इसी टीस की पहचान उन्हें है. इसका लाभ वे उठा रहे हैं. और यक़ीनन, वे उसका सिर्फ़ लाभ ही उठा रहे हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे हमारा पूंजीवादी तंत्र वनवासियों के भोलेपन और संसाधनों का लाभ उठा रहा है. पर वनवासियों की मजबूरी यह है कि उन्हें इस तथाकथित सभ्य व्यवस्था के पेंचो-खम पता नहीं हैं. इसलिए वे इसके कई पाटों के बीच पिस कर रह जाते हैं. जब नक्सली आते हैं और उन्हें समझाते हैं कि उनके हक़ की लड़ाई वे लड़ेंगे, तो उनका सहज ही विश्वास कर लेना बहुत ही साधारण बात है. बिलकुल ऐसे ही ग्रामीण डाकुओं की बातों पर भरोसा कर लेते थे. कहीं-कहीं आज भी कर लेते हैं और आगे भी करते रहेंगे. यही बात है जो लालगढ़ में लोगों को माओवादियों की सुरक्षा के लिए आगे खड़े हो जाने के लिए विवश कर रही है.
हालांकि, ख़ास लालगढ़ के सन्दर्भ में यह मामला कई और मसलों पर सोचने के लिए विवश करता है. पर उन सब पर फिर कभी. अभी तो सिर्फ़ इस सवाल का जवाब मैं चाहता हूं कि मान लें लालगढ़ की हालिया समस्या हल कर लेंगे. मान लेते हैं कि वहां सारे माओवादियों को मार गिराएंगे. तो भी क्या इतने से यह समस्या हल हो जाएगी? क्या इसके बाद फिर माओवादी कहीं अपने पैर पसार नहीं सकेंगे? यह क्यों भूलते हैं कि जो लोग उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले हैं उनकी तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है. अब सिर्फ़ वनवासी ही नहीं, ग्रामीण किसान भी धीरे-धीरे उसी स्थिति में पहुंच रहे हैं जिस स्थिति में पिछली कई शताब्दियों से वनवासी हैं. गांव का किसान अपने को पूरी तरह लुटा-पिटा महसूस कर रहा है. व्यवस्था उसकी सिर्फ़ और सिर्फ़ उपेक्षा ही कर रही है. पिछले 20 सालों में देश में केंद्र या किसी राज्य की भी सरकार ने किसानों के हित में कोई नीति बनाई हो, ऐसा मुझे याद नहीं आता. ग़ौर से देखें तो शहरों में एक ऐसा ही तबका है, जो शेष आबादी से कटा हुआ है. शहर की ज़िन्दगी की जो मुख्यधारा कही जाती है उसके हाशिए से भी वह बाहर है. ये सभी जो वर्ग हैं, इन्हें पहले व्यवस्था ने शिकार बनाया है इनके भीतर की मलाई निकालने के लिए और आने वाले दिनों में माओवादी या ऐसे ही दूसरे संगठन इन्हें अपना शिकार बनाएंगे. इनका उपयोग कर व्यवस्था की मलाई हासिल करने के लिए.
वह स्रोत जिससे ऐसे संगठनों को ऊर्जा मिलती है आगे बढने की वह कोई मनुष्य नहीं, बल्कि आम आदमी के भीतर मौजूद भूख है. यह भूख सिर्फ़ पेट की नहीं है, यह भूख सामान्य मानवीय भावनाओं की भी है. आत्मसम्मान और स्वाभिमान की भी है. मनुष्य के सचमुच का मनुष्य बन कर जीने की भूख है. इसके लिए कुछ ज़्यादा करने की ज़रूरत नहीं है. सिर्फ़ इतना ही तो करना है कि व्यवस्था के शीर्ष पर जो लोग मौजूद हैं, उन्हें अपनी हबस थोड़ी कम कर देनी है. क्या यह बहुत मुश्किल बात है? अगर नहीं तो फिर सिर्फ़ इतना क्यों नहीं कर देते वे? या फिर उन्हें यह बात समझ में नहीं आती कि कल इसका नतीजा क्या निकलेगा?

Friday, 19 June 2009

kavita

अन्धकार
अन्धकार
एक शक्तिमान सत्य है
जो चढ़ बैठता है
तपते सूरज के ज्वलंत सीने पर
आहिस्ता आहिस्ता ।
अंधकार
बहुत कुछ आत्मसात कर लेता है
स्वयं में
और
सबको जरूरत होती है
अंधकार की
कुछ देर के लिए ।
हम ख़ुद भी
रक्षा करना चाहते हैं अंधकार की
उस पार देखना भी नहीं चाहते हैं
और
जिनकी दृष्टि
अंधकार के उस पार जाती है
उन्हें हम उल्लू कहते हैं ।

श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को आलोचना सम्मान

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा स्थापित प्रथम आलोचना सम्मान भागलपुर के डॉ श्री भगवान सिंह को दिया जायेगा. इसी तरह युवा आलोचना सम्मान बनारस के युवा आलोचक श्री कृष्ण मोहन को दिया जायेगा. श्री सिंह हमारे समय के उन सुप्रतिष्ठित और चर्चित आलोचकों में से है जिन्होंने अपने आलोचनात्मक लेखन से समकालीन साहित्यिक आलोचना और परिदृश्य पर एक अलग लक़ीर खींची है. लगभग सांप्रदायिक और विचाररूढ़ हो उठी आलोचना के बरक्स श्री भगवान सिंह एक स्वतंत्र वैचारिक आधार और जातीय दृष्टि लेकर आये हैं. ख़ास तौर से गतिशील राष्ट्रीय जीवन-प्रवाह और गांधी युग के मूल्यों को केंद्र में रखकर उन्होंने जो एक स्वाधीन आलोचनात्मक तेवर प्रदर्शित और रेखांकित किया है.

डॉ. कृष्ण मोहन की आलोचना में पिछली आलोचना की मध्यमवर्गीय चेतना की तुलना में एक उदग्र लोकतांत्रिकता और वैचारिक ऊष्मा है. वे हमारे समय के एक संभावनाशील आलोचक हैं.

वर्तमान में श्री भगवान सिंह तिलका माँझी, भागलपुर, बिहार में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं एवं श्री मोहन विश्वविद्यालय बीएचयू, वाराणसी में रीडर, हिन्दी के पद पर कार्यरत हैं.

ज्ञातव्य हो कि इस चयन समिति में कवि केदारनाथ सिंह, दिल्ली, डॉ. धनंजय वर्मा, भोपाल, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कोलकाता, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, गोरखपुर, विश्वरंजन एवं जयप्रकाश मानस थे.

यह सम्मान उन्हें 10-11 जुलाई को रायपुर में आयोजित दो दिवसीय प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में प्रदान किया जायेगा. सम्मान स्वरूप आलोचक द्वयों को क्रमशः 21 एवं 11 हजार रुपयों सहित प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, शाल एवं श्रीफल से विभूषित किया जायेगा.
(यह सूचना सृजनगाथा के संपादक जयप्रकाश मानस ने ईमेल के मार्फ़त दी है.)

Thursday, 18 June 2009

तो क्या कहेंगे?

सलाहू आज बोल ही नहीं रहा है. हमेशा बिन बुलाए बोलने वाला आदमी और बिना मांगे ही बार-बार सलाह देने वाला शख्स अगर अचानक चुप हो जाए तो शुबहा तो होगा ही. यूं तो वह बिना किसी बात के बहस पर अकसर उतारू रहा करता है. कोई मामला-फ़साद हुए बग़ैर ही आईपीसी-सीआरपीसी से लेकर भारतीय संविधान के तमाम अनुच्छेदों तक का बात-बात में हवाला देने वाला आदमी आज कुछ भी कह देने पर भी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है. मुझे लगा कि आख़िर मामला क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि माया मेमसाहब द्वारा बापू को नाटकबाज कह देने से उसे सदमा लग गया हो! पर नहीं, इस बारे में पूछे जाने पर उसने मुझे सिर्फ़ देखा भर. ऐसे जैसे कभी-कभी कोई बड़ी शरारत कर के आने पर मेरे

पिताजी देखा करते थे. चुपचाप.

पर मैंने ऐसी कोई शरारत तो की नहीं थी. ज़ाहिर है, इसका मतलब साफ़ तौर पर सिर्फ़ यही था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर क्या वजह है? बार-बार पूछने पर भी सलाहू चुप रहा तो बस चुप ही रहा. जब भी मैंने उससे जो भी आशंका जताई हर बात पर वह सिर्फ़ चुप ही रहा. आंखों से या चेहरे से, अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के ज़रिये उसने हर बात पर यही जताया कि ऐसी कोई बात नहीं है.

अंततः यह आशंका हुई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गूंगा हो गया हो. वैसे भी हमारे समाज में जिह्वा को सरस्वती का वासस्थल माना जाता है और उसने जिह्वा का दुरुपयोग बेहिसाब किया है. मुवक्किलों से लेकर मुंसिफों तक. सरकार से लेकर ग़ैर सरकारी लोगों तक किसी को नहीं छोड़ा था. मुझे लगा क्या पता शब्द जिसे ब्रह्म का रूप कहा जाता है उसने इसका साथ छोड़ दिया हो, नाराज़गी के नाते. पर आत्मा से तुरंत दूसरी बात आई. अगर ऐसा होता तब तो यह बात पहले अपने साथ होनी चाहिए थी. आख़िर शब्दों का व्यापार करते हुए ऐसा कौन सा अपराध है जो शब्दों के ज़रिये अपन ने न किया हो! पर नहीं साहब अपन के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. ऐसा मास्टर के साथ भी नहीं हुआ, जो केवल हिन्दी ही नहीं, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषाओं के साथ भी शब्दों से हेराफेरी करता आ रहा है, पिछले कई वर्षों से. पर ना, उसके साथ भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

हुआ तो बेचारे सलाहू के साथ. मुझे लगा कि हो न हो, यह किसी रोग वग़ैरह का ही मामला हो. मैं बेवजह पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में फंसा हुआ हूं और हर पढ़े-लिखे आदमी की तरह बेचारे अपने सबसे भरोसेमन्द मित्र के वैज्ञानिक इलाज के बजाय उसके और अपने पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में लग गया हूं. आख़िरकार उसके बार-बार इशारों से मना करने के बावजूद मैं उसे जैसे-तैसे पकड़-धकड़ कर डॉक्टर के पास ले ही गया. लेकिन यह क्या डॉक्टर तो उससे पूछने पर तुला है और है कि बोल ही नहीं पा रहा है. आख़िरकार डॉक्टर ने आजिज आकर पता नहीं कौन सा डर्कोमर्कोग्राम एपीएमवीएनेन कराने के लिए कह दिया. तमाम और डॉक्टरी क्रियाओं की तरह मैने इसका भी नाम तो सुना नहीं था, लिहाजा डॉक्टर से पूछ लेना ही बेहतर समझा कि भाई इसका कितना पैसा लगेगा. लेकिन यह क्या, जैसे ही डॉक्टर ने बताया, ‘कुछ ख़ास नहीं, बस बीस हज़ार रुपये लगेंगे और इस टेस्ट से पता न चला तो फिर अमेरिका जाना पड़ेगा. वैसे यह भी हो सकता है कि स्वाइन फ्लू हुआ हो....’

सलाहू चुप नहीं रह सका. एकाएक चिल्ला कर बोला, ‘अरे मेरी जान के दुश्मनों मुझे कुछ नहीं हुआ है. मैं बिलकुल ठीक हूं.”

’अबे तो अब तक बोल क्यों नहीं रहा था.’

’बस ऐसे ही.’

’क्या भौजाई ने कुछ कह दिया’

’उंहूं”

’फिर’

उसने फिर सिर हिलाया. न बोलने का नाटक करते हुए.

‘तो क्या कचहरी में कोई बात हो गई’

उसने फिर न में सिर हिलाया.

’तो फिर क्या बात हुई?’

अब वह एकदम चुप था. पुनर्मूषकोभव वाली स्थिति में आ गया था. न बोलने की कसम उसने लगता है फिर खा ली थी.

‘भाई क्या वजह है? बोल और बिलकुल सही-सही बता वरना ये जान लो कि अभी तुम्हारी डर्कोमर्कोग्रामी शुरू.’

डर्कोमर्कोग्रामी का नाम सुनते ही उसके होश फिर ठिकाने आ गए. आख़िरकार बेचारा बोल ही पड़ा, ‘देख भाई, ये न तो घर का मामला है और न कचहरी का. ये मामला असल में है पार्टी का. आज नहीं तो कल पार्टी में मुझे गूंगे होना ही पड़ेगा. लिहाजा उसकी प्रैक्टिस अभी से शुरू कर दी है.’

’वो क्यों भाई? भला तुझे पार्टी में गूंगा कौन बना सकता है?’ मैने पूछा, ‘मैडम का तू ख़ास भरोसेमन्द है?’

’सो तो हूं’, उसने बताया, ‘लेकिन आज ही से एक नया संकट आ गया है.’

’वह क्या’, मैंने फिर पूछा, ‘क्या तेरे बराबर भरोसा किसी और ने भी जीत लिया है?’

’नहीं भाई, ऐसी भी कोई बात नहीं है.’

‘फिर?’

’असल में आज ही एक नया फ़रमान जारी हुआ है.’

’वह क्या गूंगे होने का फ़रमान है.’

‘ना गूंगे होने का नहीं, वह गूंगे बनाने का फ़रमान है.’

’फ़रमान तो बताओ.’

‘बस यह कि अबसे कोई पार्टी और ख़ास तौर से पार्टी मालिकों के परिवार के सदस्यों के लिए सामंतवादी या कहें राजशाही सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा. अब कोई किसी को युवराज, राजा, राजमाता, महाराज ... आदि-आदि नहीं कहेगा.’

’तो?’

’तुम्ही बताओ, तब अब हम क्या कहेंगे? इस तरह तो हमारी पार्टी के 99 फ़ीसदी कार्यकर्ताओं का सोचना तक बन्द हो जाएगा. बोलने की तो बात ही छोड़ मेरे यार.’

इतना कह कर वह फिर से गहन मौन में चला गया. ऋषि-मुनियों की तरह.

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Wednesday, 17 June 2009

...तुम दौड़ पड़ती हो मेरे संग इंद्रधनुष की ओर

वोदका के घूंट के साथ तेरी सांसों में
घुलते हुये तेरे गले के नीचे उतरता हूं,
और फैल जाता हूं तेरी धमनियो में।

धीरे-धीरे तेरी आंखो में शुरुर बनके छलकता हूं,
और तेरे उड़ते हुये ख्यालों के संग उड़ता हूं।
कुछ दूरी के बाद हर ख्याल गुम सा हो जाता है,
और मैं बार-बार लौटता हूं, नवीणता के लिए।

ख्यालों के धुंधला पड़ते ही, तुम कोई सुर छेड़ती हो,
और मैं इस सुर में मौन साधे देर तक भीगता हूं।
सप्तरंगी चक्रो में घूमते और उन्हें घुमाते हुये
लय के साथ मैं ऊपर की ओर उठता हूं,
और तुम तरंगों में ऊबडूब करती हो।
तुम्हारी बेकाबू सासों में सात सूरों को तलाशते
तेरे दोनों आंखों के बीच अपनी बंद आंखे टिकाता हूं
......फिर तुम दौड़ पड़ती हो मेरे संग इंद्रधनुष की ओर।

Tuesday, 16 June 2009

vyangya

व्यंग्य
माइ डैड

मैं उसका नाम नहीं जानता ।जरूरत ही नहीं पड़ी ।उम्र बीस के आसपास होगी। एक दो साल कम या ज्यादा । पता नहीं कहाँ रहता है ।कहीं भी रहता होगा । ऐसे लोग हर जगह हैं ।उसके पिता का नाम ए.टी.एम. है । मैंने उससे पिता का नाम पूछा नहीं था । यह उसकी बनियान पर लिखा था । बनियान किसी कुर्ते कमीज़ या टीषर्ट के नीचे नहीं थी । उसके नीचे जाने की मेरी जुर्रत नहीं!उसने बस पहना ही यही था ।रंग बिलकुल काला! एकदम गहगह! मैं बनियान की बात कर रहा हूँ ,उसकी नहीं। वह तो गोरा चिट्टा था।बिलकुल देषी अंगरेज! धनाढ्य , क्योंकि अजूबे करने का लाइसेंस धनाढ्य के पास ही होता ही है !गोरे गदराए बदन पर काली धप्प बनियान।अच्छा कन्ट्रास्ट था ।
काले रंग का बोलबाला है।बस षरीर का रंग काला न हो।कृष्णवर्ण अमान्य है, कृष्णकर्म स्तुत्य है।कृष्णकर्म से द्वापर युगीन कृष्णवत कर्म का तात्पर्य यहाँ नही है।कालाधन एवं काला मन आर्थिक एवं बौद्धिक विकास का अकाट्य लक्षण है।कालिमा का यह तालमेल नया है।पहले कालावस्त्र विराध एवं ष्षोक प्रदर्षनार्थ ही मान्य था।जल्लाद वर्ग का युनीफार्म कुछ ऐसा ही था।धर्मग्रस्त मानसिकता में यमराज और भूतप्रेतों को भी काले वस्त्रों में ही स्वीकार किया गया था।कुछ लोग बिजूके को भी कृष्णवर्ण का ही परिधान प्रदान करते थे।अब बदलाव आया है और काला उत्तरीय सुन्दरता का प्रतिमान बना है।
मैं उसकी बनियान पर अंकित अभिलेख की बात कर रहा था।अंगरेजी के ब्लाॅक लेटर्स मे लिखा था..- माइ डैड इज ए.टी.एम. । मेैं प्रभावित हुआ।अभी तक आरोप लगाया जाते थे कि आदमी मषीन हो गया है।विचारधारा में परिवर्तन आया है।आरोप को अब सामाजिक मान्यता मिलने लगी है।पिताजी अब ए.टी.एम हों चुके हैं , यह बात सगर्व कही जा रही है -सीना ठोंककर।डैड अत्याधुनिक मषीन हो चुके है।पैसा देने के काम आते हैं।जब चाहें तब पैसा। राउण्ड द क्लाॅक।ट्वेण्टी फोर इन्टू सेवेन!
जब तक खुद दो पैसे न कमा सकें,ए.टी.एम. की जरूरत पड़ती ही रहती है।न जाने कब कौन सी आवष्यकता आन पड़े।कहीं गर्लफ्रेण्ड का फोन आ जाए-डेटिंग के प्रस्ताव स्वीकृति,कहीं काॅकटेल ड्यू हो जाए या सिगरेट वगैरह खत्म हो जाए।ऐसे षुभअवसरों का आनंन्द दूसरों की कमाई से ही लिया जा सकता है।अपने कमाए और खर्च कर दिए- स्वाद क्या खाक आएगा ?डैड की कमाई हो तो पूछना ही क्या?स्वाद एवं रुतबा दोनो ही हासिल!
डैड पहले ए.टी.एम. नहीं थे।भुगतान तब भी करते थे मगर मैनुअली।मैनुअल तरीके में तकलीफ होती है।क्लर्क हो या कैषियर,एक बार आपको घूरता जरूर है।उसे लगता है कि आप अपने पैसे निकालकर गुनाह कर रहे हैं।कम रकम निकालते हैं तो हिकारत की नजर से देखता है और ज्यादा निकालते हैं तो संदेह की नजर से। ए.टी.एम. में ऐसी बात नहीं है।आपका स्वागत करेगा।उसे तकलीफ नहीं होती।डैड को भी अब नहीं होती।आदत पड़ गई है। उनका काम पैसे गिनकर बाहर निकाल देना है।नोट भी बड़े -बड़े, राउण्ड फिगर में!चिल्लर का भुगतान बिलकुल नहीं।बस मषीन मे पैसे होने चाहिए।
ए.टी.एम. में पैसे डालने पड़ते हैं।डैड वाले ए.टी.एम.में लोग करेंसी डाल जाते हैं।बड़े अधिकारी हैं। लोग जमा करा जाते हैं।आहरण की व्यवस्था लम्बी है।कई विभागों से क्लीअरेंस आता है।वितरण लम्बा नहीं है।कुल तीन ग्राहक है।ए.टी.एम. डैड का बेटा, बेटी एवं भार्या। बेटे का करेण्ट एकाउण्ट है,बाकी दोनों का सेविंग।बेटी का खर्चा ज्यादा नहीं है। कभी-कभी ही विदड्रा करती है-लिप्स्टिक , क्रीम एवं अन्तर्वस्त्रों के लिए। सिनेमा, रेस्टोरेण्ट, क्लब और अन्य भुगतान के लिए दूसरे ए.टी.एमों के बेटे हैं।वे तो उसकंे लिप्स्टिक , क्रीम एवं अन्तर्वस्त्रों को खरीदने में जीवन को सफल मानते हैं। अब वे उसे पर्स मे हाथ ही नहीे डालने देते।
साहब नहीं होते तो जमाकर्ता श्रीमती जी की ब्रांच में जमा करा जाते है।वे राषि के अनुसार बट्टा काटकर षेष राषि ए.टी.एम. में लोड कर देती हैं।कभी-कभी केवल बाउचर ट्रांसफर कर देती है।बस एंट्री होना जरूरी है।
अभी भी कई बार ए.टी.एम. भुगतान करने से मना कर देता है।फिर उन्हें कई बार ट्राई करना पड़ता है।बिना पासवर्ड के प्राॅसेसिंग नहीं होती है।तब मम्मा पासवर्ड का काम करती हैं।इस पासवर्ड को ए.टी.एम. रिफ्यूज नहीं कर सकता, भुगतान करना पड़ता है।
डैड को मालूम है कि जब तक भुगतान जारी है, ए.टी.एम. का बोलबाला है।करेन्सी खत्म ,महत्त्व खत्म! बिजली काconnection भी कट जाएगा।रंगीन स्क्रीन लिए बैठे रहो।कितना भी आधुनिक क्यों न हो, ए.टी.एम. और ग्राहक अपने ही देष का है। मषीन नहीं चली तो जो भी जाएगा ,अगल-बगल से ठोंकेगा जरूर!क्या पता कोई तार वार ढीली वीली हो।ठोंकने से अपनी कबाड़ा मषीनें भी चल देती हैे, फिर यह तो आधुनिक मषीन है।इसमें दिमाग भी है।पैसे गिनना और हिसाब लगाना भी जानती है।
डैड ए.टी.एम. भुगतान का प्रिंट नहीं देती।प्रिंटर है लेकिन उसमें पेपर नहीं है।ए.टी.एम. के ये तीनों ग्राहक प्रिंट की आवष्यकता नहीं महसूस करते ।षुरू में एक रोल पड़ा था।कुछ दिन चला। न तो किसी ने प्रिंट लिया और न नया रोल डाला।अब एडजस्ट हो गया है।
कभी- कभी डैड भी खुष हो लेते हैं।बेटा कम से कम इतना तो सम्मान कर रहा है कि सार्वजनिक रूप से स्वीकार तो कर रहा है कि वे ए.टी.एम. तो हैं। यह उद्घोषणा इतना तो बताती है कि वे अपार धनी हैं,उदार दाता है वरना उनके अपने पिताजी पैसे भी नहीं देते और डाँट भी लगाते थे - बिलकुल ऋण खातेदार की तरह। काष! इस ए.टी.एम. के डैड भी ए.टी.एम. होते!

Friday, 12 June 2009

और तुम मुस्कराती हो कंटीली टहनियों में....

आधी रात को चुपके से तुम
मेरे कान के पास गुनगुनाती हो,
मौत के बाद जीवन के रहस्यों
की ओर ले जाती हो ।

हौले से अपनी आंखों को बंद करके
मैं मौत के सरहद को पार करता हूं,
गुरुत्वाकर्षण के नियमों को धत्ता बताते हुये
मैं ऊपर उठता हूं, और ऊपर- और ऊपर

शरीर के भार से मुक्त होने पर आर्बिट
के नियम बेमानी हो जाते हैं,
दूर से देखता हूं पृथ्वी को घूर्णन
और परिक्रमण करते हुये,
और रोमांचित होता हूं कुदरत के
कानून से मुक्त होकर ।


मौत के बाद की जीवन की तलाश
ग्रहों और नक्षत्रों के सतह तक ले जाती है,
और उन्हें एक अटल नियम के साथ बंधा पाता हूं
जिसके अनदेखे डोर सूरज से लिपटे हुये है।

रहस्यों के ब्रह्मांड में तुम भी गुम हो जाती हो
और तुम्हारा न होना मुझे बेचैन करता है,
फिर जीवन की तलाश में जलते हुये
सूरज में मैं डूबकी लगाता हूं,


चमकती हुई किरणे मुस्करा के फेंक देती है
मुझे फिर से पृथ्वी के सतह पर।
और ओस की चादर में लिपटी हुई धरातल पर
मैं तुम्हे दूर तक तलाशता हूं,
और तुम मुस्कराती हो कंटीली टहनियों में....