Saturday, 30 May 2009

क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं

(माइक्रो-स्टोरी)
“तू है कौन?”
“जिंदगी”
“तो यहां क्या कर रही है।?“
“तुम्हारे साथ हूं?”
“क्यों?”
“क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं।”

Wednesday, 27 May 2009

तुम खुद मिटती हो और खुद बनती हो

समुद्र के छोर पर खड़े होकर लहरों के उफानों को देखता हूं
हर लहर तुझे एक आकार देते हुये मचलती है, तू ढलती है कई रंगों में
दूर छोर पर वर्षा से भरे काले बादलों की तरह तू लहराती है,
और बादलों का उमड़ता घुमड़ता आकार समुंद्र में दौड़ने लगता है
और उसकी छाया मेरी आंखों में आकार लेती है, उल्टे रूप से
विज्ञान के किसी सिद्दांत को सच करते हुये, तू मेरी आंखों में उतरती है
फिर समुंदर और आकाश में अपना शक्ल देखकर कहीं गुम हो जाती है।


ट्राय की हेलना में मैं तुम्हें टटोलता हूं, तू छिटक जाती है
जमीन पर दौड़ते, नाचते लट्टू की तरह, फिर लुढ़क जाती है निढाल होकर
तेरे चेहरे पर झलक आये पसीने की बूंदों को मैं देखता हूं
इन छोटी-छोटी बूंदों में तू चमकती है, छलकती है
इन बूंदों के सूखने के साथ, तुम्हारी दौड़ती हुई सांसे थमती है
ढक देती हैं समुंदर की लहरें तेरे चेहरे को, तू खुद मिटती है और खुद बनती है।
मैं तो बस देखता हूं तुझे मिटते और बनते हुये।

गहरी नींद तुझे अपनी आगोश में भर लेती है
और तू सपना बनकर मेरी जागती आंखों में उतरती है
ऊब-डूब करती, सुलझती-उलझती, आकृतियों में ढलती
पूरे कैनवास को तू ढक लेती है, व्यर्थ कविता की तरह
और अपने दिमाग के स्लेट को मैं साफ करता हूं, धीरे-धीरे
और फिर खुद नींद बनकर जागता हूं तोरी सोई आंखों में
तेरे अचेतन में पड़े बक्सों को खोलता हूं, एक के बाद एक
और लिखकर के काटी हुई पंक्तियों में उलझ जाता हूं...
तुम खुद मिटती हो और खुद बनती हो....कटी हुई पंक्तियां तो कही कहती है।

Sunday, 24 May 2009

---क्योंकि मुझे अमरत्व में यकीन है

सिगरेट की धुयें की तरह
तेरे दिल को टटोल कर
तेरे होठों से मैं बाहर निकलता हूं,
हवायें अपने इशारों से मुझे उड़ा ले जाती है।

तुम देखती हो नीले आसमान की ओर
मैं देखता हूं तुम्हे आवारा ख्यालों में गुम होते हुये।

तुम सिगरेट की टूटी को
जमीन पर फेंककर रौंदती हो,
और मैं बादलों में लिपटकर मु्स्कराता हूं।

मुझे यकीन है, तमाम आवारगी के बाद
इन बादलों में बूंद बनकर फिर आऊँगा
और भींगने की चाहत
तुझे भी खींच लाएगी डेहरी के बाहर।

हर बूंद तेरे रोम-रोम को छूते
हुये निकल जाएगी,
धरती पर पहुंचने के पहले ही
तेरी खुश्बू मेरी सांसों में ढल जाएगी

मैं बार-बार आऊंगा, रूप बदलकर
-------क्योंकि मुझे अमरत्व में यकीन है।

एनिमेशन की बारिकियों को बताया जा रहा है

मुंबई के पवई स्थित रेसीडेंस कन्वेनशन सेंटर में कल सुबह से ही लोग जुटे हुये हैं। एनिमेशन की दुनिया को नजदीक से समझने और जानने की ललक उन्हें यहां खींच लाई है। इसमें एनिमेशन जगत से जुड़ी कंपनियों के साथ-साथ कई शैक्षणिक संस्थाओं ने शिरकत किया है। विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से एनिमेशन, जगत की बारीक जानकारी दी जा रही है। एक एनिमेशन फिल्म कैसे बनता है, उसको बनाने की प्रक्रिया क्या है, चरित्रों को कैसे आकार दिया जाता है, और कैसे उनमें रंग भरे जाते हैं, उनकी लोच और गति कैसे निर्धारित की जाती है आदि को बहुत ही सरल तरीके से समझाया जा रहा है।
मेले में युवा छात्र-छात्राओं की भीड़ हैं। एनिमेशन की दुनिया को समझने के लिये युवाओं का झूंड लगभग सभी स्टालों पर नजर आ रहा है। हंसते-चहलकते हुये लोग एनिमेशन की बारिकियों को सीख रहे हैं। एनिमेशन से संबंधित कई विषयों पर सेमिनार का भी आयोजन चल रहा है।विभिन्न तरह के शैक्षणिक संस्थायें युवाओं को एनिमेशन तकनीक के प्रति आकर्षित करने के लिए अपना-अपना स्टाल लगाये हुये हैं, जैसे डिजिटल एशिया स्कूल आफ एनिमेशन, एफ एक्स स्कूल, जी इंस्टीट्यूट आफ क्रिएटिव आर्ट, सीआरईए स्कूल आफ डिजिटल आर्ट, फ्रेमबाक्स एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट, दि कालेज आफ एनिमेशन बायोइंजियनिरिंग, ड्रीम वर्क, ग्राफिटी स्कूल आफ एनिमेशन,पिकासो एनिमेशन कालेज आदि।
ये शैक्षणिक संस्थान एनिमेशन से संबंधित तमाम कोर्सों के बारे में आगंतुको को विस्तार से बता रहे हैं, साथ ही इस बात का भी यकीन दिला रहे हैं कि आने वाले समय में एनिमेशन उद्योग में पूरी संभावना है।
इस मेले में विभिन्न तरह के एनिमेटड फिल्मों का प्रदर्शन भी किया जा रहा है। निर्मित और अर्द्ध-निर्मित फिल्मों से जुड़ लोग फिल्म निर्माण के दौरान किये जाने वाले प्रयासों को रोचकता और बारीकी से रख रहे हैं। इसमें एनिमेटेड फिल्म की फिलोसफी से लेकर उसके निर्माण प्रक्रिया को पूरी मजबूती से रख जा रहा है। आगंतुकों को तकनीक के साथ-साथ इसके कला पक्ष को समझने में सहुलियत हो रही है। जैसे एनिमेशन फिल्म में एक चरित्र के निर्माण की प्रक्रिया क्या है, उसके लिए किस साफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है, कैसे उसमें रंग भरे जाते हैं आदि।
इस मेले में विदेशी कंपनियां भी शिरकत कर रही हैं, और एनिमेशन से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डाल रही हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाले प्रतिभाशाली लोगों के लिए यहां पर विदेशी कंपनियों में रोजगार पाने के भी अवसर उपलब्ध है।
इस मेले का आयोजन सीटी तंत्रा कर रहा है। कल रात सीजी तंत्रा की ओर से एनिमेशन के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को पुरस्कृत भी किया गया। कुल मिलाकर यह मेला देखने लायक है। एनिमेशन से संबंधित तकनीक को समझने का अवसर मिलेगा।

Friday, 22 May 2009

भाजपा का सत्यानाश तो होना ही था

लाख टके की सवाल है कि भाजपा हारी क्यों। अगले पांच साल तक भाजपा को लगातार इस प्रश्न को मथना होगा। त्वरित प्रतिक्रिया में टीवी वाले भाजपा की हार बजाय कांग्रेस की जीत को महत्व देते हुये राहुल गांधी को हीरो बनाने पर तुले हुये हैं, और यह स्वाभाविक भी है। टीवी वालों को परोसने के लिए खुराक चाहिये। भाजपा के नीति निर्धारण में शामिल लोगों को अपनी खोपड़ी को ठंडा करके इस हार के कारणों की पड़ताल करनी होगी।
भाजपा की हार का प्रमुख कारण है भाजपा की पहचान का गुम होना। पूरे चुनाव में भाजपा शब्द कहीं सुनाई ही नहीं दिया। भाजपा की एक पृथक पहचान हुआ करती थी, जो गठबंधन में पूरी तरह से गुम हो गई थी। अब जब पार्टी की पहचान ही गुम हो जाये तो जीतने का सवाल ही कहां पैदा होता है।
एक तरफ देश में जहां भाजपा की पहचान गुम हुई वहीं दूसरी तरफ देश के मुसलमान भाजपा को नहीं भूले थे। प्रत्येक मतदान क्षेत्र में वे लोग भाजपा के खिलाफ सक्रिय नकारात्मक मतदाता की भूमिका में नजर आये। भाजपा के खिलाफ तो उन्हें वोट करना ही था। साथ ही उन्होंने यह भी देखा कि किसी एसे व्यक्ति को उनका वोट न मिले जो जीतने के बाद भाजपा के खेमे में चला जाये। एसी परिस्थिति में वे कांग्रेस के वे स्वाभाविक मतदाता बन गये।
भाजपा की अंदरुनी राजनीति भी बुरी तरह से गडमगड रही। आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना एक बड़ी गलती थी। आडवाणी भाजपा कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास पैदा नहीं कर सके, क्योंकि उनके अंदर इस क्षमता का ह्रास बहुत पहले ही हो चुका था। एक बहुत बड़े हिन्दू समुदाय के बीच, जो भाजपा का कैडर था, पाकिस्तान में जिन्ना के कब्र पर माथा टेककर वह अपनी विश्वसनीयता खो चुके थे। इसके साथ ही मुसलमानों के बीच में आडवाणी की छवि में कोई बदलाव नहीं हुआ था। आडवाणी का दोहरा व्यक्तित्व भाजपा के लिये घातक साबित हुआ।
इसके अलावा भाजपा के प्रचारतंत्र में जुटे लोगों की भी नपुंसकता खुलकर दिखाई दी। जितने भी पोस्टर तैयार किये गये थे उनमें आडवाणी को प्रमुखता से दिखाया गया था, और भाजपा के विगत इतिहास की कहीं कोई झलक नहीं रखी गई। अटल बिहारी वाजपेयी को पोस्टरों से दूर रखा गया, जबकि भापपा की परंपरा को मजबूती के साथ रखने के लिए उन्हें प्रचार अभियान के तहत पोस्टरों में शामिल किया जाना चाहिये था। गांवों में एक बहुत बड़ा तबका आज भी अटल बिहारी वाजपेयी को न सिर्फ पहचानता है बल्कि प्यार भी करता है।
आडवाणी विदेशी मुल्कों में जमा भारतीय धन को वापस लाने की बात कर रहे थे,जबकि इस मुद्दे से ग्रामीण भारत का कही दूर दूर तक लेना देना नहीं है। इस मुद्दे से वे अपने आप को जोड़ ही नहीं पा रहे थे। इधर शहरी तबका को पता था कि आडवाणी की बातें खोखली हैं, क्योंकि यह संभव ही नहीं था। साथ ही इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि भाजपा के समर्थकों में एसे लोग भी थे जिनके पैसे विदेशों में रन कर रही हैं। इस मुद्दे पर ये लोग भी भाजपा से अलग हो गये।
भारत में एक बहुत बड़ा तबका दाल रोटी से ऊपर उठ चुका है। ये हाईटेक की ओर भाग रहा है। भाजपा ने जिस तरह से मेल, नेट और एसएमस का इस्तेमाल किया उससे यह वर्ग इरिटेट हुया। इस वर्ग की अपनी मानसिकता विकसित हो गई है और भाजपा को इस मानसिकता को समझकर प्रचार अभियान चलाना चाहिये थे। पिछले प्रचार नेट प्रचार अभियान से तो निश्चित रूप से इसे सबक लेना चाहिये था। पिछली बार ये लोग फीलगुड करा रहे थे, जो एक अस्पष्ट सी अवधारणा थी। और जिस तरह से भाजपा ने लोगों के ऊपर हाईटेक प्रचार हमला किया था उसका उल्टा ही असर पड़ा। इस बार भाजपा के हाईटेक प्रचार अभियान में भी सिर्फ और सिर्फ आडवाणी ही शामिल थे।
कांग्रेस की सफलता का श्रेय राहुल गांधी को देने वाले भारत में हुये मतदान पैटर्न को गलत तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि सही तरीके से कहा जाये तो मतदान पैटर्न को ये लोग प्रस्तुत ही नहीं कर रहे हैं। मतदाताओं पर राहुल गांधी का प्रभाव सिर्फ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रहा है, वो भी सिर्फ पांच प्रतिशत मतदाताओं पर। इससे ज्यादा कुछ नहीं है। इस चुनाव के सबसे निर्णायक कारकों में महत्वपूर्ण है मुस्लिम मतदाताओं का व्यवहार। बिहार में लालू का माई ध्वस्त हुआ। मुस्लिम मतदाताओं ने वहां पर जनता दल एस और कांग्रेस को अपना मत दिया। नीतिश कुमार का कभी कोई कौम्यूनल बैकग्राउंड नहीं रहा है। सुशासन की बात कह करके नीतिश ने अपनी छवि को मजबूत बनाया और मुस्लिम मतदाताओं का विश्वास जीतने में सफल रहे। गठबंधन में शामिल होकर भी नीतिश ने अपने आप को अलग तरीके से प्रस्तुत किया और इस रुप में उनकी मजबूरी को समझते हुये मुस्लिमों ने उन्हें अपना वोट दिया।
कांग्रेस ने अपने पुराने बागियों को साथ लेकर न सिर्फ डैमेज को रोका, बल्कि अन्य पार्टियों को डैमेज करते हुये इसका फायदा भी उठाया। उत्तर प्रदेश में मायावती के खिलाफ मुसलामानों के दिमाग में यह भ्रम फैलाने में कांग्रेस सफल रही कि जरूरत पड़ने पर मायावती भाजपा की गोद में बैठ सकती है। और अपने पिछले कारनामों के कारण मायावती मुसलमानों का विश्वास नहीं जीत सकी। उधर मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को मंच प्रदान करके हार्डकोर मुसलमानों को सकते में डाल दिया। चूंकि बाबरी डैमेज के समय कल्याण सिंह ताल ठोकनो वालों में शामिल थे। इसलिये हार्डकोर मुसलमान मुलायम सिंह के हाथ से फिसल गये। कांग्रेस को इसका पूरा फायदा मिला।
एक फिर दोहरा दूं कि भाजपा का उत्थान हिन्दुत्व के लहर पर हुआ था, और वह उससे कब विमुख हुई खुद उसे भी पता नहीं चला। सत्ता की चाहत उसकी पहचान को निगल गई और वह गठबंधनों के भीड़ में गुम हो गई। भारत के मुसलमान इस बात को महसूस कर रहे हैं कि कांग्रेस पूरी तरह से वंशवाद की चपेट में है, लेकिन उनके पास विकल्प नहीं है। भाजपा का बेस हिन्दुत्व रहा है, हालांकि अब बेस छिटक गया है। भाजपा को खुद पता नहीं है कि उसकी जमीन क्या है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व भाजपा गांव, चौपालों, खेतों और खलिहानों तक फैली थी। भाजपा इस चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी को भी भुला दी....सत्यानाश तो होना ही था।



Tuesday, 19 May 2009

पुरुख के भाग

‘हे दू नम्मर! अब का ताकते हो? जाओ. तुमको तो मालुमे है कि तुम्हरा नाम किलियर नईं हुआ. भेटिंगे में रह गया है.’
दो नंबर ने कहा कुछ नहीं. बस उस दफ्तर के चपरासी को पूरे ग़ुस्से से भरकर ताका. इस बात का पूरा प्रयास करते हुए कि कहीं उसे ऐसा न लग जाए कि वो उसे हड़काने की कोशिश कर रहे हैं, पर साथ ही इस बात का पूरा ख़याल भी रखा कि वह हड़क भी जाए. आंखों ही आंखों के इशारे से उन्होंने समझाना चाहा कि अबे घोंचू, बड़ा स्मार्ट बन रहा है अब. इसी दफ्तर में एक दिन मुझे देख कर तेरी घिग्घी बंध जाती थी. अब तू मुझे वेटिंग लिस्ट समझा रहा है और अगर कहीं उसमें मेरा नाम क्लियर हो गया होता तो आज तू दो हज़ार बार मेरे कमरे के कोने-अंतरे में पोंछा मारने आता कि कहीं से मेरी नज़र तेरे ऊपर पड़ जाए. ऐसा उन्होंने सोचा, लेकिन कहा नहीं. वैसे सच तो ये है कि यही उनकी ख़ासियत भी है. वो जो सोचते हैं कभी कहते नहीं और जो कहते हैं वो तो क्या उसके आसपास की बातें भी कभी सोचते नहीं हैं. वो वही दिखने की कोशिश करते हैं जो हैं नहीं और जो हैं उसे छिपाने में ही पूरी ऊर्जा गंवा देते हैं. ये बात बहुत दिनों तक उस दफ्तर में रहे होने के नाते उस चपरासी को भी मालूम थी. लिहाजा उसने ताड़ ली. पर उसने भी कुछ कहा नहीं. इतने लंबे समय तक सीधे सरकार के दफ़्तर में चपरासी रहने का बौद्धिक स्तर पर उसने यही तो फ़ायदा उठाया था. वो जानता था कि कभी भी कोई भी घोड़ा-गधा इस दफ़्तर में घुस सकता था. जो उसके जितनी भी क़ाबिलीयत नहीं रखता, वो पूरे देश के सारे अफ़सरों को हांकने का हक़दार हो सकता है. उसे इसी आपिस के सीनियर चपरासी रामखेलावन कका इयाद आते हैं. अकसरे कहा करते थे कि तिरिया के चरित्तर के थाह त हो सकता है कि कौनो जोगी जती पा जाए, लेकिन पुरुख के भाग के थाह कौनो नईं पा सकता.
वैसे दू नंबर से उसे बड़ी सहानुभूति है. वह देख रहा है कि दू नम्मर घर से लेकर संसार तक हर तरफ़ दुए नम्मर रह जा रहा है. एही दफ़्तर के बगल के दफ़्तर में बैठ के चला गेया, लेकिन ई दफ़्तर में नईं बैठ पाया. अब का बैठ पाएगा. अब तो इनके पीछे पूरी लाइन खड़ी है और उहो ऐसी कि बस इनही के धकियाने के फेर में है. एक-दू नईं पूरा तीन-तीन नौजवान. 50 साल से ले के 70 साल के उमिर तक का तो इनके घर ही में मौजूद है. और ई तो ऐसहूं चला-चली के बेला में है. एक बात ऊ और देख चुका है और परतिया चुका है कि जो-जो बगल वाले दफ़्तर में बैठा, ऊ ए दफ़्तर में कबे नईं आ पाया. इनके पहिले भी कुछ बड़े-बड़े लोग ओही दफ़्तर से निपट गए. एही भाग्य है. पर पता नईं कौन ज्योतिखी के ई दिखाते हैं हाथ और ऊ बार-बार बोल देता है कि तुम बन जाओगे. लेकिन का पता भाई, बनिए जाए कबो! ऐसे-ऐसे लोग भी बने हैं जो कभी उसे चाय पिलाते रहे हैं, अपने नाम की पर्ची पहुंचाने के लिए तो ई तो फिर भी...... इसके पहले कि वह दो नंबर को खिसकाता तीन नंबर वाली धड़धड़ाती नज़र आईं. आंख मुंह निपोरते हुए पूरे ग़ुस्से में. एकबारगी तो उसको लगा कि ई तो घुसिये जाएंगी. लेकिन तबे ऐन दरवाजे पर पहुंच गया, ‘जी मैडम! केन्ने जा रही हैं? आपको मालुम है न वेटिंग लिस्ट में आपका नाम अबकी पारी किलियर नईं हुआ है!’ ’हे चल हट तो. तू क्या समझता है मैं तेरी इजाज़त की मोहताज हूं? मुझे जब जाना होगा तो तेरे कहने से जाउंगी?’ एकदम से फायर हो गईं तीन नंबर, ‘अभी मेरा जाने का अपना मूड नहीं है. समझा? तेरी वेटिंग लिस्ट का इंतज़ार मैं नहीं करती.’ अच्छा हुआ कि मैडम इधर-उधर टहलते हुए दफ़्तर के अंदर उसकी नज़र बचा कर एक नज़र मारती हुई आगे बढ़ गईं. मैडम के जाते ही उसने राहत की सांस ली. लेकिन इसके पहले कि बतौर राहत ली गई सांस को बाहर निकाल पाता अपने भरपूर लंपटपन और उचक्केपने के तेवर के साथ फूंय-फांय करते चार नम्मर लौका गए. ऊ आना त चाहते हैं इस दफ़्तर में लेकिन उन्हें कौनो जल्दी नहीं है. जिस काम की इनको बहुत जल्दी हो, उसको भी ई तीन महीना के भेटिंग में डाल सकते हैं. और नाम को सार्थक करने में तो इनका कोई जवाबे नहीं है. इनका बस चले तो देश की पंचवर्षीय योजना का भी नाम बदल के तत्काल कर दें. लेकिन एह बार तो बेचारे इस लायक भी नहीं बचे कि ए दफ़्तर के एन्ने-ओन्ने भी कौनो कोने बैठें. पर ताक-झांक में बेचारे लग गए हैं.
हालांकि ताक-झांक ऊ इस बार भी कर रहे हैं, पर सबसे नज़र बचा के. ऐसे ही जैसे कोई लफंगा लड़कियों के कॉलेज की तरफ़ जाता है. वैसे ही वो नज़र बचा के बड़ी हसरत से चेंबर के अंदर झांक भी गया.
अब जब देख ही लिया तो वो मान भी कैसे जाता! सरकार के दफ्तर का चपरासी ही कैसा जो जो थोड़ा जबरई न कर दे. बोल ही पड़ा, ‘का साहब अबकी बेर त आप भेटिंगों से बाहर हो गए..........’ लेकिन इसके पहले कि उसकी बात पूरी होती चार नम्मर ने उसको अंकवार में भर लिया, ‘ह बुड़बक, अरे भेटिंग-फेटिंग के फेर में कौन पड़ता है जी? हम त तुम्है हेर रहे थे. अरे ज़रा आ जाना घर पे. मलकिन तुमको याद कर रही थीं. लाई-चना भी भेजवाई हैं बचवन के लिए.’ अब चपरासी हाथ जोड़ चुका था, ‘और मालिक गैया के लिए...हें-हें-हें..’
‘हां-हां चारा भी है. रखा है. आना ले जाना.’ चार नम्मर ई कह के अभी आगे बढ़ भी नईं पाए थे कि तब तक एक नम्मर का रेला आ गया. ई ओही एक नम्मर था जो न कभी अंदर झांकने का हिम्मत किया न बाहर खड़े होने का. लेकिन बाह रे भाग. इसे कहते हैं पुरुख के भाग. उसने मन ही मन सोचा और सलाम मारने के लिए बिलकुल अटेंसन की मुद्रा में खड़ा हो गया.

Friday, 15 May 2009

नेता और चेतना

हमारे देश में चीज़ों के साथ मौसमों और मौसमों के साथ जुड़े कुछ धंधों का बड़ा घालमेल है. इससे भी ज़्यादा घालमेल कुछ ख़ास मौसमों के साथ जुड़ी कुछ ख़ास रस्मों का है. मसलन अब देखिए न! बसंत और ग्रीष्म के बीच आने वाला जो ये कुछ-कुछ नामालूम सा मौसम है, ये ऐसा मौसम होता है जब दिन में बेहिसाब तपिश होती है, शाम को चिपचिपाहट, रात में उमस और भोर में ठंड भी लगने लगती है. आंधी तो क़रीब-क़रीब अकसर ही आ जाती है और जब-तब बरसात भी हो जाती है. मौसम इतने रंग बदलता है इन दिनों में कि भारतीय राजनीति भी शर्मसार हो जाए. अब समझ में आया कि चुनाव कराने के लिए यही दिन अकसर क्यों चुने जाते हैं. मौसम भी अनुकूल, हालात भी अनुकूल और चरित्र भी अनुकूल. तीनों अनुकूलताएं मिल कर जैसी यूनिफॉर्मिटी का निर्माण करती हैं, नेताजी लोगों के लिए यह बहुत प्रेरक होता है.

मुश्किल ये है कि ग्लोबीकरण के इस दौर में चीज़ों का पब्लिकीकरण भी बड़ी तेज़ी से हो रहा है. इतनी तेज़ी से कि लोग ख़ुद भी निजी यानी अपने नहीं रह गए हैं. और भारतीय राजनेताओं का तो आप जानते ही हैं, स्विस बैंकों में पड़े धन को छोड़कर बाक़ी इनका कुछ भी निजी नहीं है. सों कलाएं भी इनकी निजी नहीं रह गई हैं. रंग बदलने की कला पहले तो इनसे गिरगिटों ने सीखी, फिर आम पब्लिक यानी जनसामान्य कहे जाने वाले स्त्री-पुरुषों ने भी सीख ली. तो अब वह हर चुनाव के बाद इनकी स्थिति बदल देती है.

इन्हीं दिनों में एक और चीज़ बहुत ज़्यादा होती है और वह है शादी. मुझे शादी भी चुनाव और इस मौसम के साथ इसलिए याद आ रही है, क्योंकि इस मामले में भी ऐसा ही घपला होता है अकसर. हमारे यहां पत्नी बनने के लिए तत्पर कन्या को जब वर पक्ष के लोग देखने जाते हैं तो इतनी शीलवान, गुणवान और सुसंस्कृत दिखाई देती है कि वोट मांगने आया नेता भी उसके सामने पानी भरने को विवश हो जाए. पर पत्नी बनने के तुरंत बाद ही उसके रूप में चन्द्रमुखी से सूरजमुखी और फिर ज्वालामुखी का जो परिवर्तन आता है.... शादीशुदा पाठक यह बात ख़ुद ही बेहतर जानते होंगे.

चुनावों और शादियों के इसी मौसम में कुछ धंधे बड़ी ज़ोर-शोर से चटकते हैं. इनमें एक तो है टेंट का, दूसरा हलवाइयों, तीसरा बैंडबाजे और चौथा पंडितों का. इनमें से पहले, दूसरे और तीसरे धंधे को अब एक जगह समेट लिया गया है. भारत से जाकर विदेशों में की जाने वाली डिज़ाइनर शादियों में तो चौथा धंधा भी समेटने की पूरी कोशिश चल रही है. पर इसमें आस्था और विश्वास का मामला बड़ा प्रबल है. पब गोइंग सुकन्याओं और मॉम-डैड की सोच को पूरी तरह आउटडेटेड मानने वाले सुवरों को भी मैंने ज्योतिषियों के चक्कर लगाते देखा है. इसलिए नहीं कि उनकी शादी कितने दिन चलेगी, यह जानने के लिए कि उन दोनों का भाग्य आपस में जुड़ कर कैसा चलेगा. पता नहीं क्यों, इस मामले में वे भी अपने खानदानी ज्योतिषी जी की ही बात मानते हैं.

तो अब समझदार लोग डिज़ाइनर पैकेजों में ज्योतिषी और पुरोहित जी को शामिल नहीं कराते. होटल समूह ज़बर्दस्ती शामिल कर दें तो उनका ख़र्च भले उठा लें, पर पंडित जी को वे ले अपनी ही ओर से जाते हैं. इसलिए पंडित जी लोगों की किल्लत इस मौसम में बड़ी भयंकर हो जाती है. ऐसी जैसे इधर दो-तीन साल से पेट्रोल-गैस की चल रही है. यह किल्लत केवल शादियों के नाते ही नहीं होती है, असल में इसकी एक वजह चुनाव भी हैं. अब देखिए, इतने बड़े लोकतंत्र में सरकारें भी तो तरह-तरह की हैं. देश से लेकर प्रदेश और शहर और कसबे और यहां तक कि गांव की भी अपनी सरकार होती है. हर सरकार के अपने तौर-तरीक़े होते हैं और वह है चुनाव.
ज़ाहिर है, अब जो चुनाव लड़ेगा उसे अपने भविष्य की चिंता तो होगी ही और जिसे भी भविष्य की चिंता होती है, भारतीय परंपरा के मुताबिक वह कुछ और करने के बजाय ज्योतिषियों के आगे हाथ फैलाता है. तो ज्योतिषियों की व्यस्तता और बढ़ जाती है. कई बार तो बाबा लोग इतने व्यस्त होते हैं कि कुंडली या हाथ देखे बिना ही स्टोन या पूजा-पाठ बता देते हैं. समझना मुश्किल हो जाता है कि मौसम में ये धंधा है कि धंधे में ही मौसम है.

अभी हाल ही में मैंने संगीता जी के ज्योतिष से रिलेटेड ब्लॉग पर एक पोस्ट पढ़ा. उन्होंने कहा है कि ‘गत्यात्मक ज्योतिष को किसी राजनीतिक पार्टी की कुंडली पर विश्वास नहीं है.’ मेरा तो दिमाग़ यह पढ़ते ही चकरा गया. एं ये क्या मामला है भाई! क्या राजनीतिक पार्टियों की कुंडलियां भी राजनेताओं के चरित्र जैसी होती हैं? लेकिन अगला वाक्य थोड़ा दिलासा देने वाला था- ‘क्‍योंकि ग्रह का प्रभाव पड़ने के लिए जिस चेतना की आवश्‍यकता होती है, वह राजनीतिक पार्टियों में नहीं हो सकती.’ इसका मतलब यही हुआ न कि वह नहीं मानतीं कि राजनीतिक पार्टियों में चेतना होती है.

अगर वास्तव में ऐसा है, तब तो ये गड़बड़ बात है. भला बताइए, देश की सारी सियासी पार्टियां दावे यही करती हैं कि वे पूरे देश की जनता को केवल राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक रूप से भी चेतनाशील बना रही हैं. बेचारी जनता ही न मानना चाहे तो बात दीगर है, वरना दावा तो कुछ पार्टियों का यह भी है कि वे भारत की जनता को आध्यात्मिक रूप से भी चेतनाशील या जागरूक बना रही हैं. अब यह सवाल उठ सकता है कि जो ख़ुद ही चेतनाशील नहीं है वह किसी और को भला चेतनाशील तो क्या बनाएगा! ज़ाहिर है, चेतनाशील बनाने के नाम पर यह लगातार पूरे देश को अचेत करने पर तुला हुए हैं और अचेत ही किए जा रहे हैं.

लेकिन संगीता जी यहीं ठहर नहीं जातीं, वह आगे बढ़ती हैं. क्योंकि उन्हें देश के राजनीतिक भविष्य का कुछ न कुछ विश्लेषण तो करना ही है, चाहे वह हो या न हो. असल बात ये है कि अगर न करें तो राजनीतिक चेले लोग जीने ही नहीं देंगे. और राजनीतिक चेलों को तो छोड़िए, सबसे पहले तो मीडिया वाले ही जीना दुश्वार कर दें ऐसे ज्योतिषियों का, जो चुनाव पर कोई भविष्यवाणी न करें. आख़िर हमारी रोज़ी-रोटी कैसे चलेगी जी! जनता जनार्दन तो आजकल कुछ बताती नहीं है. फिर कैसे पता लगाया जाए कि सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा और अगर ये पता न किया जाए तो अपने सुधी पाठकों को बताया कैसे क्या जाए?

जब उन्हें पकड़ा जाता है तब समझदार ज्योतिषी वैसे ही कुछ नए फार्मुले निकाल लेते हैं, जैसे संगीता जी ने निकाल लिए. मसलन ये कि – ‘इसलिए उनके नेताओं की कुंडली में हम देश का राजनीतिक भविष्‍य तलाश करते हैं.’ अब इसका मतलब तो यही हुआ न जी कि नेताओं के भीतर चेतना होती है? पता नहीं संगीता जी ने कुछ खोजबीन की या ऐसे ही मान ली मौसम वैज्ञानिकों की तरह नेताओं के भीतर भी चेतना या बोले तो आत्मा होती है. मुझे लगता है कि उन्होंने मौसम वैज्ञानिकों वाला ही काम किया है. वैसे भी चौतरफ़ा व्यस्तता के इस दौर में ज्योतिषियों के पास इतना टाइम कहां होता है कि वे एक-एक व्यक्ति के एक-एक सवाल पर बेमतलब ही बर्बाद करें. वरना सही बताऊं तो मैं तो पिछले कई सालों से तलाश रहा हूं. मुझे आज तक किसी राजनेता में चेतना या आत्मा जैसी कोई चीज़ दिखी तो नहीं. फिर भी क्या पता होती ही हो! क्योंकि एक बार कोई राजनेता ही बता रहे थे कि वे अभी-अभी अपनी आत्मा स्विस बैंक में डिपॉज़िट करा के आ रहे हैं. इस चुनाव में एक नेताजी ने दावा किया है कि वे उसे लाने जा रहे हैं. पता नहीं किसने उनको बता दिया है कि अब वे पीएम होने जा रहे हैं. क्या पता किसी ज्योतिषी या तांत्रिक ने ही उनको इसका आश्वासन दिया हो. मैं सोच रहा हूं कि अगर वो पीएम बन गए और स्विस बैंक में जमा आत्माएं लेने चले गए तो आगे की राजनीति का क्या होगा?

Thursday, 14 May 2009

मुंबई में एनीमेशन पर महामेला अगले हफ़्ते


29 और 30 मई को इसका आयोजन दिल्ली में रामदा प्लाजा होटल में किया जाएगा
एनिमेशन, वीएफएक्स (विजुअल इफेक्ट्स) और गेमिंग पर भारत का सबसे बड़ा मेला सीजीटीईएक्पो (कंप्युटर ग्राफिक्स टेक्नोलाजी) 09 का आयोजन मुंबई के पोवई स्थित रेसिडेंस होटल और कन्वेंशन सेंटर में 23 और 24 मई को होने जा रहा है। इस आयोजन के साथ ही सीजीटीईएक्पो अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस मेले में कंप्युटर ग्राफिक्स से संबंधित तकनीक और व्यवसाय के विभिन्न पहलुओं का प्रदर्शन किया जाएगा। साथ ही एनिमेशन उद्योग में कैरियर की तलाश करने वाले छात्रों को भी यहां उचित मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।
सीजीटीईएक्पो 09 का आयोजन एनिमेशन, वीएफएक्स और गेमिंग पर भारत के सबसे बड़े कम्युनिटी पोर्टल सीजीटी तंत्रा द्वारा नाइन इंटरएक्टिव के तहत प्रबंधित विजुअल इफेक्ट्स एंड डिजिटल एशिया स्कूल आफ एनिमेशन के साथ मिलकर किया जा रहा है। इस मेले में एनिमेशन उद्योग को समग्र रूप से प्रस्तुत करने के लिए जाब फेयर,आर्ट गैलेरीज, मार्केट प्लेस, मास्टर क्लासेस, एडुकेशन फेयर, इंटरटेनमेंट और गेमिंग जोन, छात्र प्रतियोगिता, एक्सपो स्टेज प्रदर्शनी आदि का आयोजन किया जा रहा है। इस उद्योग से जुड़े व्यवसायी और पेशेवर एनिमेशन की नई तकनीक से लोगों को अवगत कराएंगे साथ ही छात्रों को सीधे उनके साथ रू-ब-रू होने का अवसर प्राप्त होगा। इस मेला का उद्देश्य नये विचारों का अदान प्रदान करते हुये सीखना, प्रेरित करना और आगे बढ़ना है।
इस मेले में भाग लेने वाली मशहूर तकनीकी इकाइयां हैं एनवीआईडीआईए, एचपी, एडाब, बिज एनिमेशन (आई), क्योस ग्रुप वी रे आदि। ये इकाइयां एनिमेशन उद्योग से संबंधित नई खोजों पर रोशनी डालेंगी। एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, और गेमिंग पर व्यापक शिक्षा मेले की मेजबानी सीजीटीएक्पो में फ्रेमबाक्स एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, डीएएसए, मनिपाल, डीएसके, सुपीनफोकाम, पिकासो, एआईजीए के साथ किया जाएगा, जो विविधता से भरे हुये इस उद्योग पर दर्शकों की जिज्ञासाओं को शांत करेंगे।
बिग एनिमेशन (आई) प्राइवेट लिमिटेड अपने हाल में रिलीज एनिमेटेड टीवी श्रृंखला लिटिल कृष्णा की गहन व्याख्या प्रस्तुत करेंगी। इसके तहत लिटिल कृष्णा से संबंधित विभिन्न पहलुओं की पड़ताल की जाएगी। इस श्रृंखला का निर्माण बिग एनिमेशन और बंगलोर स्थित इस्कान द्वारा अनुमोदित इंडियन हेरिटेज फाउंडेशन ने संयुक्त रुप से किया है।
इस मेले में कंप्युटर ग्राफिक्स में कैरियर की तलाश करने वाले लोगों को स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिनिधियों से बातचीत करने का अवसर प्राप्त होगा, जो इन्हें कैरियर के संबंध में अवसरों की जानकारी प्रदान करेंगे।
गेम डेवलपर्स के लिए नासकाम आईजीडीसी सेमिनार सत्र का आजोजन कर रहा है और इस वर्ष गेमिंग जोन एक प्रमुख आकर्षण होगा। बेहतरीन कलाकारों की पहचान करने के लिए इस वर्ष से सीजीटीतंत्रा कम्युनिटी अवार्ड का आयोजन किया जा रहा है।
इस मेले में दि लार्ड आफ रिंग्स से प्रेरित 40 मिनट के स्वतंत्र फिल्म दि हंट फार गोलुम को दिखाया जाएगा।
रेसिडेंस होटल में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में बिग एनिमेशन (आई) प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आशिष कुलकर्नी ने कहा कि एनिमेशन उद्योग को पूरी तरह से व्यवसायिक बनाने की जरूरत है। इस उद्योग में रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं। लोगों को इसके तरफ आकर्षित किया जाना चाहिये।
दि बांबे आर्ट सोसाइटी के प्रेसीडेंट विजय राउत ने कहा कि कला के नजरिये से यह एनिमेशन उद्योग अभी काफी पिछड़ा हुआ है। इसका मुख्य कारण यह है कि लोग इसे अभी कला के प्रारुप के तौर पर नहीं देखते हैं। इसे अभी स्वतंत्र कला का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत है। सरकार को चाहिये कि शैक्षणिक संस्थानों में इसकी विधिवत पढ़ाई शुरु करे ताकि छात्र इसकी तरफ आकर्षित हों और इसमें उन्हें एक उज्जवल भविष्य दिखाई दे।
एनविडिया के प्रोफेशनल बिजनेस सोल्युशन के प्रमुख प्रसाद फाड़के ने कहा कि एनिमेशन कला और तकनीक का संगम है। इसे दोनों नजरिये से समझा जाना चाहिये। इस अवसर पर प्राइम फोकस वल्र्ड के वाइस प्रेसीडेंड एजाज राशिद, फ्रेमबाक्स एनिमेशन के एमडी राजेश टुराकिया भी मौजूद थे।
मुंबई में सीजीटीएक्पो की सफलता का बाद 29 और 30 मई को इसका आयोजन दिल्ली में रामदा प्लाजा होटल में किया जाएगा।

Wednesday, 13 May 2009

जॉर्ज़ ओरवेल, संसद और वाराह पुराण

एक ब्लॉगर बंधु हैं अशोक पांडे जी. उन्हें सुअरों से बेइंतहां प्यार हो गया है. इधर कुछ दिनों से वह लगातार सुअरों के पीछे ही पड़े हुए हैं. हुआ यह कि पहले तो उन्होंने अफगानिस्तान में मौजूद इकलौते सुअर की व्यथा कथा कही. यह बताया कि वहां सुअर नहीं पाए जाते और इसकी एक बड़ी वजह वहां तालिबानी शासन का होना रहा है. इसके बावजूद किसी ज़माने सोवियत संघ से बतौर उपहार एक सुअर वहां आ गया था. उस बेचारे को जगह मिली चिड़ियाघर में. पर इधर जबसे अमेरिका में स्वाइन फ्लू नामक बीमारी फैली है, उसे चिड़ियाघर के उस बाड़े से भी हटा दिया गया है, जहां वह कुछ अन्य जंतुओं के साथ रहता आया था. अब उस बेचारे को बिलकुल एक किनारे कर दिया गया है, एकदम अकेले. जैसे हमारे देश में रिटायर होने के बाद ईमानदार टाइप के सरकारी अफसरों को कर दिया जाता है.
कायदे से देखा जाए तो दोनों के अलग किए जाने का कारण भी समान ही है. संक्रमण का. अगर उसके फ्लू का संक्रमण साथ वाले दूसरे जानवरों को हो गया तो इससे चिड़ियाघर की व्यवस्था में कितनी गड़बड़ी फैलेगी इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं. ठीक इसी तरह सरकारी अफसरी के दौरान भी ईमानदारी के रोग से ग्रस्त रहे व्यक्ति को अगर इस फील्ड में आए नए रंगरूटों के साथ रख दिया गया और उन्हें कहीं उसका संक्रमण हो गया तो सोचिए कि व्यवस्था बेचारी का क्या होगा? वैसे सुअर जब झुंड में था तब भी यह सहज महसूस करता रहा होगा, इसमें मुझे संदेह है. क्योंकि इसे सुअरों के साथ तो रखा नहीं गया था. वहां इसके अलावा कोई और सुअर है ही नहीं, तो बेचारे को साथ के लिए और सुअर मिले तो कैसे? इसे अपनी बिरादरी के बाहर जाकर हिरनों और बकरियों के साथ चरना पड़ता था.
अब सच तो यह है कि ईमानदार टाइप के सरकारी अफसर भी बेचारे अपने आपको ज़िंदगी भर मिसफिट ही महसूस करते रहते हैं. उन्हें लगता ही नहीं कि वे अपनी बिरादरी के बीच हैं. बल्कि उनकी स्थिति तो और भी त्रासद है. क़ायदे से वे सरकारी अफसर होते हुए सरकारी अफसरों के ही बीच होते हैं, पर न तो बाक़ी के असली सरकारी अफसर उन्हें अपने बीच का मानते हैं और न वे बाक़ी को अपनी प्रजाति का मानते हैं. हालत यह होती है कि दोनों एक दूसरे को हेय नज़रिये, कुंठा, ग्लानि, अहंकार और जाने किन-किन भावनाओं से देखते हैं. पर चूंकि सरकारी अफसरी में ईमानदार नामक प्रजाति लुप्तप्राय है, इसलिए वे संत टाइप के हो जाते हैं. अकेलेपन के भय से. दूसरी तरफ़, असली अफसर भी कुछ बोलते नहीं हैं, अभी शायद तब तक कुछ बोलेंगे भी नहीं जब तक कि समाज में थोड़ी-बहुत नैतिकता बची रह गई है.
यक़ीन मानें, सुअरों से मैं यहां सरकारी अफसरों की कोई तुलना नहीं कर रहा हूं. अगर कोई अपने जीवन से इसका कोई साम्य देखे तो उसे यथार्थवादी कहानियों की तरह केवल संयोग ही माने. असल बात यह है कि उस सुअर की बात आते ही मुझे जॉर्ज़ ओरवेल याद आए और याद आई उनकी उपन्यासिका एनिमल फार्म. यह किताब आज भी भारत के राजनीतिक हलके में चर्चा का विषय है. ‘ऑल मेंन आर एनिमीज़. ऑल एनिमल्स आर कॉमरेड्स’ से शुरू हुई पशुमुक्ति की यह संघर्ष यात्रा ‘ऑल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम एनिमल्स आर मोर इक्वल’ में कैसे बदल जाती है, यह ग़ौर किए जाने लायक है. इसे पढ़कर मुझे पहली बार पता चला कि सुअर दुनिया का सबसे समझदार प्राणी है. अब मुझे लगता है कि वह कम से कम उन दलों से जुड़े राजनेताओं से तो बेहतर और समझदार है ही, जहां आंतरिक लोकतंत्र की सोच भी किसी कुफ्र से कम नहीं है. बहरहाल इस बारे में मैं कुछ लिखता, इसके पहले ही अशोक जी ने जॉर्ज़ ओरवेल के बारे में पूरी जानकारी दे दी.
वैसे सुअर समझदार प्राणी है, यह बात भारतीय वांग्मय से भी साबित होती है. अपने यहां हज़ारों साल पहले एक पुराण लिखा गया है- वाराह पुराण. भगवान विष्णु का एक अवतार ही बताया जाता है – वराह. वाराह का अर्थ आप जानते ही हैं, अरे वही जिसे पश्तो में ख़ांनजीर, अंग्रेजी में पिग या स्वाइन तथा हिन्दी में सुअर या शूकर कहा जाता है. अफगानिस्तान में तो यह प्रतिबन्धित प्राणी है और हमारे यहां भी आजकल इसकी कोई इज़्ज़त नहीं है. पर भाई हमारी अपनी संस्कृति के हिसाब से देखें तो यह प्राणी है तो पवित्र.
अब मैंने ख़ुद तो वाराह पुराण पढ़ा नहीं. सोचा क्या पता कि मास्टर ने ही पढ़ा हो. उससे बात की तो उसने कहा, ‘यार तुम्हें बैठे-बिठाए वाराह पुराण की याद क्यों आ गई?’
ख़ैर मैंने उसे पूरी बात बताई. पर इसके पहले कि वह मेरा गम्भीर उद्देश्य समझ पाता उसने समाधान पेश कर दिया. क़रीब-क़रीब वैसे ही जैसे नामी-गिरामी डॉक्टर लोग मरीज़ के मर्ज को जाने बग़ैर ही दवाई का पर्चा थमा देते हैं. ‘अमां यार क्यों परेशान हो तुम एक सुअर को लेकर? आंय! बुला लो उसको यहीं. अभी नई लोकसभा बनने वाली है. जैसे इतने हैं, वैसे एक और रह लेगा. वैसे भी अभी पूरे देश में इनकी ही बहार है. अपने यहां तो इन्हें तुम चुनाव भर जहां चाहो वहीं देख सकते हो. हां, जीत जाने के बाद फिर सब एक ही बाड़े में सिमट कर रह जाते हैं.’
मास्टर तो अपनी वाली हांक कर चला गया. इधर मैं परेशान हूं. उसने भी वही ग़लती कर दी जो जॉर्ज ओरवेल ने की है. इतने पवित्र जंतु को भला कहां रखने के लिए कह गया बेवकूफ़. मैं उस सुअर के प्रति सचमुच सहानुभूति से भर उठा हूं. सोचिए, भला क्या वहां रह पाएगा वह? अगर उसे पता चला कि वह किन लोगों के साथ रह रहा है? जहां सभी किसी न किसी गिरोह के ज़रख़रीद हैं, जो अपने आका के फ़रमान के मुताबिक बड़े-बड़े मसलों पर हाथ उठाते और गिराते हैं, उसके ही अनुरूप बोलते, चुप रहते या हल्ला मचाते हैं और गिरोह का मुखिया पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही ख़ानदान से चलता रहता है और उस पर तुर्रा यह कि यह दुनिया का सबसे प्राचीन और सबसे बड़ा लोकतंत्र है ......... ज़रा आप सोचिए, उस पर क्या गुज़रेगी.

Monday, 11 May 2009

युवराज का संस्कार

महाराज का तो जो भी कुछ होना-जाना था, सो सब बीत-बिता गया. वह ज़माना और था. अब की तरह तब न तो नमकहराम जनता थी और न यह लोकतंत्र का टोटका ही आया था. अरे बाप राजगद्दी पर बैठा था, मां राजगद्दी पर बैठी थी, पुश्त दर पुश्त लोग राजगद्दी पर ही बैठते चले आए थे, तो वह कहां बैठते! यह भी कोई सोचने-समझने या करने लायक बात हुई? जिसका पूरा ख़ानदान राजगद्दी पर ही बैठता चला आया हो तो वह अब चटाई पर थोड़े बैठेगा! ज़ाहिर है, उसको भी बैठने के लिए राजगद्दी ही चाहिए. दूसरी किसी जगह उसकी तशरीफ़ भला टिकेगी भी कैसे? लेकिन इस नसूढ़े लोकतंत्र का क्या करें? और उससे भी ज़्यादा बड़ी मुसीबत तो है जनता. आख़िर उस जनता का क्या करें? कई बार तो महारानी का मन ये हुआ कि इस पूरी जनता को सड़क पर बिछवा के उसके सीने पर बुल्डोजर चलवा दें. जबसे लोकतंत्र नाम की चिड़िया ने इस इलाके में अपने पंख फड़फड़ाए हैं, जीना हराम हो गया. और तो और, जनता नाम की जो ये नामुराद शै है, इसका कोई ईमान-धरम भी नहीं है. आज इसके साथ तो कल उसके साथ. ज़रा सा शासन में किसी तरह की कोताही क्या हुई, इनकी भृकुटी तन जाती है. इसकी नज़र भी इतनी कोताह है कि क्या कहें! जो कुछ भी हो रहा है, हर बात के लिए ये सरकार को ही दोषी मान लेती है. स्कूलों की फीस बढ़ गई- सरकार दोषी, बिजली-पानी ग़ायब रहने लगे- सरकार दोषी, महंगाई बढ़ गई- सरकार दोषी, भ्रष्टाचार बढ़ गया- सरकार दोषी, बेकारी बढ़ गई-सरकार दोषी, यहां तक कि सीमा पार से आतंकवाद बढ़ गया- तो उसके लिए भी सरकार दोषी.
इसकी समझ में यह तो आता ही नहीं कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी थोड़े ही है, जो वह चलाए और सारी समस्याएं हल हो जाएं. और फिर सरकार कहां-कहां जाए और क्या-क्या देखे? अरे भाई महंगाई बढ़ गई है तो थोड़ा झेल लो. कोई ज़रूरी है कि जो चीज़ आज दस रुपये की है वह कल भी दस रुपये की ही बनी रहे. कहां तो एक ज़माना था कि तुम्हारे हिस्से सिर्फ़ कर्म करना था. फल पूरी तरह हमारे हाथ में था. हम दें या न दें, यह बिलकुल हमारी मर्ज़ी पर निर्भर था. फिर एक समय आया कि पूरे दिन जी तोड़ मेहनत करो तो जो कुछ भी दे दिया जाता था उसी में लोग संतुष्ट हो लेते थे. पेट भर जाए, इतने से ही इनके बाप-दादे प्रसन्न हो जाते थे.
ऐसा इस देश में सुना जाता था. वरना तो महारानी जिस देश से आई थीं, वहां तो मजदूरी देने जैसी कोई बात ही नहीं थी. मजदूर जैसा भी कुछ नहीं होता था. वहां तो सिर्फ़ ग़ुलाम होते थे. ये अलग बात है कि उनके पूर्वज कभी ग़ुलाम नहीं रहे और न कभी राजा ही रहे, पर उन्होंने सुना है. ग़ुलामों से पूरे दिन काम कराया जाता था और कोड़े लगाए जाते थे. रात में खाना सिर्फ़ इतना दिया जाता था कि वे ज़िन्दा रह सकें. क्योंकि अगर मर जाते तो अपना काम कैसे होता. और फिर वह पैसा भी नुकसान होता जो उन्हें ख़रीदने पर ख़र्च किया गया था. नया ग़ुलाम ख़रीदना पड़ता. और अगर उन्हें ज़्यादा खिला दिया जाता तो तय है कि वे आंख ही दिखाने लगते. इन दोनों अतियों से बचने का एक ही रास्ता था और वह यह कि साईं इतना दीजिए, जामे पेट भराय.
पर मामला उलट गया तब जब उसे इस पेट भराय से ज़्यादा दिया जाने लगा. इतना दिया जाने लगा कि ये खाने के बाद दुख-बिपत के लिए भी लेवें बचाय. तो अब लो भुगतो. यह ग़लती उनकी ससुराल में उनके पतिदेव के पूर्वजों ने किया था. जाने किस मजबूरी में. हालांकि उनसे पूर्व की पूर्व महारानी, यानी उनकी सासू मॉम ने, यह ग़लती सुधारने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी. पर वह पूरी तरह सुधार नहीं पाई थीं. उन दिनों निगोड़े विपक्षी बार-बार आड़े आ जाते थे. हालांकि विपक्ष के बहुत बड़े हिस्से को पालतू बनाने की प्रक्रिया भी उन्होंने शुरू कर दी थी. तो विपक्ष तो अब निपट गया, लेकिन ससुरी जनता ही बहुत बेहूदी हो गई. इतनी बेहूदी कि इसकी हिम्मत तो देखिए. यहां तक कि महारानी के लिए फ़ैसलों पर सवाल भी उठाने लगी है.
इसीलिए महारानी के हाथ में जब सत्ता की चाभी आई तो सबसे पहला काम उन्होंने यही किया कि उन सबको सत्ता से बिलकुल दूर ही कर दिया जिनकी पीठ में सात पुश्त पहले तक भी कभी रीढ़ की हड्डी पाई जाती थी. निबटा ही दिया महारानी ने उन्हें. यहां तक कि वज़ीरे-आज़म भी उन्होंने एक ग़ुलाम को बनाया और वह भी ऐसे ग़ुलाम को जो कभी यह सोच भी नहीं सकता था कि उसे कभी इस क़ाबिल भी समझा जा सकता है. वह ख़ुद ही अपने को इस क़ाबिल नहीं समझता था. पहले तो वह बहुत रोया-गिड़गिड़ाया कि महारानी यह आप क्या कर रही हैं? मुझ नाचीज़ को इतनी बेपनाह इज़्ज़त आप बख़्श रही हैं. मैं इसे ढो भी पाउंगा! अरे यह तो मेरे संभाले से भी नहीं संभलेगी.
कुछ परिजनों ने उसकी यह मुश्किल देख महारानी को सलाह भी दी कि मत करें आप ऐसा. कहीं नहीं ही संभाल पाया तो क्या होगा फिर? पर महारानी जानती थीं कि सत्ता में संभालने के लिए होता क्या है! और यह भी कि ऐसा ही आदमी तो उन्हें चाहिए जो सत्ता संभाले, पर उसमें इतना आत्मविश्वास कभी न आए कि वह सत्ता संभाल सकता है. जब कहा जाए कि कुर्सी पर बैठो तो वह हाथ जोड़ कर बैठ जाए और जब कहा जाए कि उठो तो कान पकड़ कर उठ भी जाए. ऐसा आदमी युवराज के रास्ते में कभी रोड़ा नहीं अटकाएगा. जब तक युवराज युवा होते हैं, तब तक राजगद्दी सुरक्षित रहेगी और चलती भी रहेगी. कहीं ग़लती से भी अगर किसी सचमुच के क़ाबिल आदमी को यहां लाकर बैठा दिया तो फिर तो मुसीबत हो जाएगी. वह क्या राजगद्दी सुरक्षित रखेगा हमारे युवराज के लिए? वह तो ख़ुद उस पर क़ाबिज होने की पूरी कोशिश करेगा.
आख़िरकार वज़ीरे-आज़म की कुर्सी का फ़ैसला हो गया. वहां उसे ही बैठा दिया गया जिसे महारानी ने सुपात्र समझा. और महारानी ने उसे कुर्सी पर बैठाने के बाद सबसे पहला काम यही किया कि जनता की भी रीढ़ की हड्डी का निबटारा करने का अभियान शुरू किया. इसके पहले चरण के तहत महंगाई इतनी बढ़ाई गई कि आलू भी लोगों को अनार लगने लगा. इसके बावजूद कुछ घरों में चूल्हे जलाने का पाप जारी रहा. तब चूल्हे जलाने का ईंधन अप्राप्य बना दिया गया. काम का हाल ऐसा किया गया कि लोगों की समझ में गीता का सार आ जाए. अरे काम मिल रहा है, यही क्या कम है! फल यानी मजदूरी की चाह का पाप क्यों करते हो? वैसे भी इस देश में पुरानी कहावत है – बैठे से बेगार भली. तो लो अब बेगार करो.
अब इस बात पर साली जनता बिदक जाए तो क्या किया जाए? पर हाल-हाल में महारानी को मालूम हुआ कि असल में ये जो जनता का बिदकना है उसके मूल में शिक्षा है. तुरंत महारानी ने सोच लिया कि लो अब पढ़ो नसूढ़ों. ऐसे पढ़ाउंगी कि सात जन्मो तक तुम तो क्या तुम्हारी सात पीढ़ियां भी पढ़ने का नाम तक न लें. बिना किसी साफ़ हक़्म के तालीम इतनी महंगी कर दी गई कि पहले से ही दाने-पाने की महंगाई से बेहाल जनता के लिए उसका बोझ उठाना संभव नहीं रह गया. सुनिश्चित कर दिया गया कि जनता राजनीतिक नौटंकी को सच समझती रहे. पर अब भी जनता युवराज को सीधे राजा मान लेने को तैयार नहीं थी. जाने कहां से उसके दिमाग़ में ये कीड़ कुलबुलाने लगा था कि उसका राजा उसके बीच से होना चाहिए. ऐसा जो उसके दुख-दर्द को समझे. महारानी की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ऐसा राजा वे कहां से लाएं? आख़िरकार राजनीतिक पंडितों की आपात बैठक बुलाई गई. पंडितों ने बड़ी देर तक विचार किया. बहस-मुबाहिसा भी हुआ, पर अंतत: कोई नतीजा नहीं निकला. थक-हार कर किसी ने सलाह दी कि ऐसे मामलों से निबटना तो अब केवल एक ही व्यक्ति के बूते की बात है और वह हैं राजपुरोहित. ख़ैर, शाही सवारी तुरंत तैयार करवाई गई और उसे रवाना भी कर दिया गया राजपुरोहित के राजकीय बंगले की ओर. महारानी ने स्वयं अपने सचल दूरभाष से राजपुरोहित का नंबर मिलाया:
‘हेलो’
‘जी, महारानी जी’ ‘प्रनाम पुरोहिट जी!’ ‘जी महारानी जी, आदेश करें.’
‘जी आडेश क्या पुरोहित जी मैं टो बश रिक्वेश्ट कर सकटी हूं जी आपशे.’ ‘हें-हें-हें.... ऐसा क्या है राजमाता. आप आदेश कर सकती हैं.’ ‘जी वो क्या है कि राजरठ आपके ड्वार पर पहुंचता ही होगा. यहां पहुंचिए टब बाटें होंगी.’
इतना कह कर महारानी ने फ़ोन काट दिया और बेचारे राजपुरोहित कंपकंपाती ठंड में राजमाता और उनकी कुलपरंपरा के प्रति नितांत देशज शब्दों में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए जल्दी-जल्दी जनमहल पहुंचने के लिए तैयार होने लगे. जी हां, राजमहल का यह नया नामकरण राजपुरोहित ने ही किया था. एक टोटके के तौर पर. शनिदेव के कोप से राजपरिवार को बचाने के लिए. उनका यह प्रयोग चल निकला था, लिहाजा राजपरिवार में उनकी पूछ बढ़ गई थी और उनकी हर राय क़ीमती मानी जाने लगी थी. ***************************** थोड़ी देर बाद राजपुरोहित महारानी के दरबार में थे. समस्या उन्हें बताई जा चुकी थी और यह भी कि कई सलाहें आ चुकी थीं. सभी महत्वपूर्ण विचारों पर लंबी चर्चा भी हो चुकी थी. पर इस लायक एक विचार भी नहीं पाया गया था जिस पर अमल किया जा सके और जनता को इस बात के लिए मजबूर किया जा सके कि वह युवराज को महाराज मान ले. वैसे जनता के सीने पर बुल्डोजर चलवाया जा सकता है, लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि जब जनता ही नहीं रहेगी तो फिर युवराज राज कैसे करेंगे और किस पर करेंगे? फिर तो एक ही विकल्प बचता है कि राज करने के लिए जनता भी सात समुंदर पार से मंगाई जाए. पर उधर से जनता कैसे आएगी? वहां तो जनता की पहले से ही कमी है और दूसरे जो जनता है वह भी बेहद पेंचीदी टाइप की हो गई है. ऐसी कि उसे बात-बात पर राजकाज में मीनमेख निकालने की आदत सी हो गई है.
‘अब जनटा टो हमारे मायके से मंगाई नहीं जा सकती राजपुरोहिट जी और युवराज को अगर वहां भेजें टो शायद इन्हें किशी हेयर कटिंग शैलून में भी काम न मिले.’ राजमाता ने अपनी चिंता व्यक्त की, ‘राजा टो हम इनको यहीं का बना सकटे हैं. और वह भी मुश्किल लग रहा है अभी. टो प्लीज़ कोई रास्टा सुझाइए राजपुरोहिट जी.’
राजपुरोहित थोड़ी देर तो चिंतामग्न मुद्रा में बैठे रहे. फिर उन्होंने पंचांग निकाला. थोड़ी देर तक विचार करते रहे. इसके बाद उन्होंने युवराज की कुंडली मंगाने का अनुरोध महारानी से किया. जैसा कि ऐसे अवसर पर होना ही चाहिए, राजमाता ने इसके लिए किसी राजकर्मी को आदेश नहीं दिया. स्वयं और तुरंत निकाल कर ले आईं और बड़ी श्रद्धापूर्वक राजपुरोहित को सौंप दी. राजपुरोहित ने अपने मोटे चश्मे से कुछ देर तक बड़ी सूक्ष्मता से कुंडली का भी निरीक्षण किया. क़रीब-क़रीब वैसे ही जैसे कोई चार्टर्ड एकाउंटेंट निहारता है किसी बहीखाते को. और अचानक उसमें राहुदेव की स्थिति पर नज़र पड़ते ही उन्होंने ऐसे हुंकार भरी जैसे किसी पेंशनर की फाइल में मामूली सी गड़बड़ पाकर सरकारी बाबू भरते हैं. ‘फ़िलवक़्त यहां स्थिति राहुदेव की गड़बड़ है महारानी.’ ज़ोर से नाक सुड़कते हुए राजपुरोहित ने कहा.
‘टो इशके लिए क्या किए जाने की ज़रूरत है राजपुरोहिट’ राजमाता जानती हैं हैं कि भाग्य को भाग्य के भरोसे छोड़ देने वाले पुरोहित नहीं हैं राजपुरोहित. राजपरिवार का कुत्ता भी कह दे तो बैल का दूध भी निकाल कर दे सकते हैं वह. इसी कैन डू एप्रोच के नाते तो उन्हें यूनिवर्सिटी से उठाकर दरबार में लाया गया.
बहरहाल राजपुरोहित ने थोड़ी देर और लगाई. मोटी-मोटी पोथियों के पन्ने-दर-पन्ने देखते रहे और अंतत: एक निष्कर्ष पर पहुंचे. ‘उपाय थोड़ा कठिन है राजमाता, लेकिन करना तो होगा.’ ‘आप बटाइए. कठिन और आसान की चिंता मट करिए.’
‘है क्या कि युवराज की कुंडली में अबल हैं राहु और लोकतंत्र की कुंडली में प्रबल हैं राहु. तो अब युवराज की कुंडली में अबल राहु को सबल तो करना ही पड़ेगा.’ ’वह कैसे होगा?’ ’देखिए राजमाता, राहु वैसे तो तमोगुणी माने जाते हैं, लेकिन उनकी प्रसन्नता के लिए सरस्वती की पूजा ज़रूरी बताई गई है और सरस्वती की प्रसन्नता के लिए शास्त्रों में विधान है संस्कारों का. पुराने ज़माने में हमारे यहां केवल 16 संस्कार होते थे. उनमें से भी अब तो कुछ संस्कार होते ही नहीं हैं संस्कारों की तरह. कुछ आवेश में निबटा दिए जाते हैं. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो अब आउटडेटेड हो गए हैं. और कुछ ऐसी भी बातें हैं जिन्हें अब संस्कारों में जोड़ लिया जाना चाहिए, पर अभी जोड़ी नहीं गई हैं.’ ‘हमारे लिए क्या आडेश है?’ राजमाता उनका लंबा-चौड़ा भाषण झेलने के लिए तैयार नहीं थीं.
‘जी!’ राजपुरोहित तुरंत मुद्दे पर आ गए, ‘बस युवराज का एक संस्कार कराना होगा.’ ‘कौन सा संस्कार?’ ‘राजनीतीकरण संस्कार.’
‘वह कैसे होगा?’ किसी भी मां तरह राजमाता ने भी अपनी चिंतामिश्रित जिज्ञासा ज़ाहिर की.
‘जैसे सभी संस्कार होते हैं, वैसे ही यह भी होगा. हर संस्कार के कुछ रीति-रिवाज हैं, कुछ रस्में हैं. इसकी भी हैं. और टोटके भी करने होंगे.’ उन्होंने कहा और फिर राजमाता की ज़रा आश्वस्तिजनक मुद्रा में देखते हुए उन्होंने कहा, ‘इसके रीति-रिवाज थोड़े कड़े हैं. पर उसका भी इंतज़ाम हो जाएगा. आप चिंता न करें.’
‘क्या रीटि-रिवाज हैं इशके?’ ‘वो क्या है कि संस्कार वैसे होते हैं सरस्वती की ही प्रसन्नता के लिए, लेकिन ये मामला लोकतंत्र और उसमें भी राजनीति का है न, तो उसमें ऐसा काम करना पड़ेगा जिससे राहु भी प्रसन्न हों. इसके लिए राजकुमार को जनता जनार्दन यानी दरिद्र नारायण के बीच जाना पड़ेगा.’ ‘ये डरिड्रनारैन क्या चीज़ होटा है?’ ‘राजमाता हमारे देश में जो दरिद्र लोग यानी पूअर पीपल हैं न, उन्हें भी हम भगवान का रूप मानते हैं. इसीलिए हम उन्हें दरिद्रनारायण कहते हैं. और लोकतंत्र में तो राजपाट का सुख ही उनकी सेवा से ही मिलता है. लिहाज़ा उनकी सेवा में युवराज को एक बार प्रस्तुत होना होगा. युवराज को यह जताना होगा कि वह भी उनके ही जैसे हैं और उनके दुख-दर्द को समझते हैं.’ ‘ओह! लेकिन कहीं शचमुच बनना टो नहीं होगा युवराज़ को उनके जैशा.’ ‘नहीं-नहीं. बनने की क्या ज़रूरत है. हमारी संस्कृति की तो सबसे बड़ी विशिष्टता ही यही है कि हम कथनी और करनी को कभी एक करके नहीं देखते. भला सोचिए आपके आदिपूर्वज बार-बार आग्रह करते रहे सच बोलने का, पर अगर ग़लती से भी उन्होंने कभी सच बोला होता तो क्या होता?’ राजपुरोहित ने उदाहरण देकर समझाया, ‘ये तो सिर्फ़ नाटक है. दस-बीस दिन चलेगा. फिर सब सामान्य. राजा तो राजा ही रहेगा.’ ‘टो इश्में युवराज को क्या-क्या करना होगा?’
‘युवराज को कुछ ग़रीबों के बीच जाना होगा. उनसे मिलना-जुलना होगा. कुछ उनके जैसा खाना होगा. उनके जैसे कुछ मेहनत के काम करने होंगे. बस यही और क्या?’ ‘उनके जैसे काम .. मतलब?’ शायद राजमाता समझ नहीं सकीं.
‘अरे जैसे कुदाल चलाना या बोझ ढोना .. बस यही तो, और क्या!’ ‘क्या बाट आप करते हैं राजपुरोहिट? युवराज यह सब कैसे कर सकेंगे?’
‘हो जाएगा राजमाता सब हो जाएगा. उनको कोई बहुत देर तक थोड़े यह सब करना होगा.’ यह दरबार के विशेष सलाहकार थे, जो कई बार राजपुरोहित की मुश्किलें भी हल किया करते थे, ‘सिर्फ़ एक बार कुदाल चलानी होगी और इतने में सारे अख़बार और टीवी वाले फोटो खींच लेंगे. फिर एक बार मिट्टी उठानी होगी और फिर सभी मीडिया वाले फोटो खींच लेंगे और छाप देंगे. दिखा देंगे. बन जाएगा अपना काम.’ ‘ओह!’ राजमाता अब विशेष सलाहकार से ही मुखातिब थीं, ‘टो डेख लिजिएगा. शब हम आप के ही भरोशे शोड़ रए हें.’
‘आप निश्चिंत रहें राजमाता!’ कहने के साथ ही विशेष सलाहकार ने पुरोहित की बनाई सामग्रीसूची वज़ीरे-आज़म को थमा दी थी. इसमें पूजा-पाठ की तमाम चीज़ों के अलावा चांदी की कुदाल एक अदद, सोने की गद्दीदार खांची एक अदद, ख़ास तरह का कैनवस शू एक जोड़ी .. आदि चीज़ें भी शामिल थीं.
उधर राजमाता अपने मायके फ़ोन भी मिला चुकी थीं. असल में साबुनों का वह ख़ास ब्रैंड वहीं मिलता है जिससे शरीर के मैल और कीटाणुओं के साथ-साथ मन के विषाणु भी धुल जाते हैं.

Sunday, 10 May 2009

अक़्ल और पगड़ी

हाज़िरजवाबी का तो मुल्ला नसरुद्दीन से बिलकुल वैसा ही रिश्ता समझा जाता है जैसा मिठाई का शक्कर से. आप कुछ कहें और मुल्ला उसके बदले कुछ भी करें, मुल्ला के पास अपने हर एक्शन के लिए मजबूत तर्क होता था. एक दिन एक अनपढ़ आदमी उनके पास पहुंचा. उसके हाथ में एक चिट्ठी थी, जो उसे थोड़ी ही देर पहले मिली थी. उसने ग़ुजारिश की, ‘मुल्ला जी, मेहरबानी करके ये चिट्ठी मेरे लिए पढ़ दें.’
मुल्ला ने चिट्ठी पढऩे की कोशिश की, पर लिखावट कुछ ऐसी थी कि उसमें से एक शब्द भी मुल्ला पढ़ नहीं सके. लिहाज़ा पत्र वापस लौटाते हुए उन्होंने कहा, 'भाई माफ़ करना, पर मैं इसे पढ़ नहीं सकता.’
उस आदमी ने चिट्ठी मुल्ला से वापस ले ली और बहुत ग़ुस्से में घूरते हुए बोला, 'तुम्हें शर्म आनी चाहिए मुल्ला, ख़ास तौर से ये पगड़ी बांधने के लिए.’ दरअसल पगड़ी उन दिनों सुशिक्षित होने का सबूत मानी जाती थी.
'ऐसी बात है! तो ये लो, अब इसे तुम्हीं पहनो और पढ़ लो अपनी चिट्ठी.’ मुल्ला ने अपनी पगड़ी उस आदमी के सिर पर रखते हुए कहा, 'अगर पगड़ी बांधने से विद्वत्ता आ जाती हो, फिर तो अब तुम पढ़ ही सकते हो अपनी चिटठी.’

Thursday, 7 May 2009

ओडिपस की वाट लगा दी है फ्रायड ने

अपने सिद्धांतों को रखने के लिए फ्रायड ने एक मिथिकल चरित्र ओडिपस की वाट लगा दी है। साइको एनालिसिस के तहत उसने एक नया शब्द दिया है-ओडिपस कंप्लेक्स। ओडिपस कंप्लेक्स का सार यह है कि एक बच्चा विपरित लिंगी होने के कारण अपनी मां के प्रति सेक्सुअली एट्रेक्ट होता है। फ्रायड की इस खोज में कितना दम है इसको लेकर भले ही बहस किया जाये, लेकिन बच्चे की इस मनोवृति के लिए ओडिपस कांप्लेक्स शब्द का इस्तेमाल ओडिपस की व्यथा कथा को गलत तरीके से दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है। जिस बच्चे ने अपनी मां को देखा तक नहीं उसके मन में किसी भी तरह की भावना कैसे जागृत होगी ?
ओडिपस के जन्म के समय ही यह भविष्यवाणी की गई कि बड़ा होकर यह बच्चा अपनी पिता की हत्या करेगा और मां से शादी करेगा। इस घटना को रोकने के लिए उसके पिता ने उसे तत्काल मार डालने का इंतजाम किया, लेकिन जिस व्यक्ति को मारने का काम सौंपा गया उसने उसे जिंदा छोड़ दिया और ओडिपस दूसरे के घर में पला-बड़ा,किसी और को अपना माता-पिता समझते हुये। अब बड़ा होने तक जिस बच्चे ने अपने मां की शक्ल तक नहीं देखी उसके मन में मां के प्रति आकर्षण,वह भी सेक्सुअली, कैसे आ सकता है? फ्रायड ने ओडिपस की मार्मिक कथा के साथ बलात्कार किया है, और मजे की बात है मनोविज्ञान की दुनिया में झक मारने वाले ज्ञानी लोग भी लकीर के फकीर तरह बार-बार ओडिपस कांप्लेक्स शब्द का इस्तेमाल करते आ रहे हैं।
ओडिपस के हाथ से अपने पिता की हत्या होती है, लेकिन अनजाने में। उसे पता नहीं होता है कि जिस व्यक्ति के साथ उसका झगड़ा हो रहा है वह उसका पिता है। बड़ा होने पर जब उसे पता चलता है कि उसके संबंध में भविष्यवाणी की गई है कि एक दिन वह अपने पिता की हत्या करके अपनी मां से शादी करेगा तो वह उस घर को छोड़ कर भाग निकलता है, जहां पर उसकी परवरिश हो रही थी। वह उन्हें ही अपना माता-पिता समझता है। लेकिन भविष्यवाणी सच साबित होती है और रास्ते में असली पिता से उसका झगड़ा हो जाता है और उसे मार डालता है। अपने असली पिता के हत्या करने तक उसने अपनी असली मां शक्ल नहीं देखा था,फिर काहे का ओडिपस कंप्लेक्स?
ओडिपस कांप्लेक्स को किसी बच्चे के साथ जोड़ना एक टेक्निकल फाल्ट है। फ्रायड की खोज के मुताबिक हो सकता है एक बच्चा विकास के प्रारंभिक क्रम में अपनी मां के प्रति सेक्सुअली आकर्षित हो,और पिता के प्रति ईष्या का भाव रखता हो,लेकिन इसे ओडिपस कांप्लेक्स नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब फ्राडय ने इस शब्द का इस्तेमाल कर ही दिया है तो इस शब्द का इस्तेमाल सही संदर्भ में किया जाना चाहिये और साथ ही इसे एक नया अर्थ भी प्रदान किया जाना चाहिये। ओडिपस पिता की हत्या करने के बाद अपनी मां से शादी करता है और उससे उसे बच्चे भी होते हैं। एक समय अंतराल के बाद उसे पता चलता है कि जिस घर से वह भागा था वह घर उसके असली माता-पिता का नहीं था। इसके बाद वह अपने अपने असली माता-पिता की तलाश करता है। और जब सच्चाई उसके सामने खुलती है है तब वह दुखों के गहरे सागर में डूब जाता है। सच्चाई जानने के बाद वह अपनी मां के पास जाता है।
सच्चाई जानने और मां के पास पहुंचने के समयअंतराल में ओडिपस की मानसिकता क्या रही होगी, इसी को केंद्र बिंदु में रखकर ओडिपस कांप्लेक्स शब्द को नया अर्थ प्रदान करते हुये एक मिथिकल चरित्र को फ्राडय की कुंठित खोज और सोच से मुक्त कराया जा सकता है। ओडिपस के पहुंचने के पहले ही उसकी मां को पता चल जाता है कि उसकी शादी उसके बेटे से हुई है। गहन मानसिक पीड़ा में वह खुद को खत्म कर लेती है, ओडिपस को उसका लाश मिलता है। सच्चाई खुलने के बाद दोनों के बीच कोई संवाद नहीं होता है। अपनी मां के लाश के सामने ही ओडिपस अपनी आंखे फोड़ लेता है और शेष जीवन एक अंधे के रूप में प्राश्यचित करते हुये व्यतीत करता है। इस समयअवधि के दौरान ओडिपस की मानसिकता क्या थी, यह ओडिपिस कांप्लेक्स का विषय वस्तु होना चाहिये,न कि एक मां के प्रति एक बच्चे का सेक्सुअली एट्रेक्शन।

यात्रा बनाम परिक्रमा

पों......... की ध्वनि के साथ जैसे ही ट्रेन ने एंट्री मारी प्लैटफॉर्म पर मौजूद अनारक्षित श्रेणी से लेकर वातानुकूलित शयनयान प्रथम श्रेणी तक के सभी यात्री अपने-अपने सरो-सामान समेटते हुए एक साथ लपके. ऐसे जैसे राहत सामग्री से भरे ट्रक की ओर किसी आपदापीड़ित इलाके के ग्रामीण दौड़ते हैं. जो लोग बार-बार एलीट क्लास की आभिजात्यता पर ऐसे-तैसे कमेंट करते रहते हैं, उन्हें अगर यह मंज़र दिखा दिया जाता तो निश्चित रूप से उनकी बोलती हमेशा के लिए वैसे ही बन्द हो जाती जैसे कभी-कभी टीवी चैनलों वाले रियलिटी शो के काबिल जजों की डांट से बाल प्रतिभागियों की हो जाती है. सोच और स्पिरिट की ऐसी सामूहिक समानता और धक्का-मुक्की सहने की ऐसी भयावह क्षमता चुनाव के दिनों में मलिन बस्तियों के दौरे करने वाले राजनेताओं में भी नहीं देखी जाती.

इसी धक्का-मुक्की में जैसे-तैसे मैंने भी एएस-3 नामक कोच को लक्षित कर लिया और दोनों कन्धों पर दो एयरबैग तथा बाएं हाथ में भारी-भरकम सूटकेस उठाए अपनी ताक़त भर तेज़ रफ्तार से दौड़ा. वैसे मेरी बेहतरार्ध भी कुछ कम नहीं हैं. सौंदर्य प्रसाधनों से ठुंसे अपने निजी बैग के अलावा एक स्ट्रॉली भी वह खींचती हुई बहुत तेज़ कदमों से चल पड़ी थीं. उनके आगे-पीछे बालवृंद भी पानी का महाजग और टिफ़िनादि लिए दौड़े आ रहे थे. बहरहाल जैसे-तैसे मैं उस कोच तक पहुंचने में कामयाब हो ही गया. अब संघर्ष डिब्बे में घुस कर अपनी शायिकाएं तलाशने और उन पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए करना था. थोड़ी देर और धक्का-मुक्की चली और आख़िरकार डिब्बे के अंदर की जंग भी अपन ने जीत ही ली.

पर यह क्या? अपनी पांच में से दो शायिकाओं पर पहले से ही संवैधानिक दर्ज़ा प्राप्त अवैध क़ब्ज़ा देख अपने प्राण तो सूख गए. ख़ैर, सामान वहां छोड़ अब मैं अपनी आत्मा और आत्मजों की खोज में वैसे ही आतुरभाव से निकल पड़ा जैसे सीताजी की खोज में वानरसेना निकली थी. ईश्वर की असीम अनुकंपा से कोच के गेट पर पहुंचते ही मेरे 'रेड' तो उछलते-कूदते क़रीब पहुंचते दिख गए और उनसे क़रीब बीस मीटर दूर उनकी मातृशक्ति भी तेज़ दौड़ने के कारण उन्हें डांट लगाती, चीखती-चिल्लाती दिखीं. प्लैटफॉर्म रूपी मैदान में अब वैसी धक्का-मुक्की दिखाई नहीं दे रही थी. अलबत्ता मुझे झांकते देखते ही श्रीमती जी बिफर पड़ीं, 'अरे आ क्यों नहीं जाते जी, देखते क्या हैं? इसे खींचते हुए मुझसे चला नहीं जा रहा है.'उन्होंने स्ट्रॉली की ओर इशारा किया, 'आहं आहां....'

ख़ैर, मैंने बच्चों को सहेज कर उन्हें अपना डिब्बा दिखाते हुए श्रीमती जी की ओर दौड़ लगाई. उन्हें इस कदर हांफते देख मन तो हुआ कि उन्हें भी लाद लूं, पर शादी के 12 साल बाद इतनी ताक़त किस बेचारे में बचती है. लिहाजा केवल स्ट्रॉली उठाई और कंधे पर लादे अपने डिब्बे की ओर बढ़ा. भीतर पहुंचते ही अपनी बर्थ पर क़ब्जा देख श्रीमती जी ने मुझे ऐसे घूरा गोया मैंने उन कुंभकर्णों को ख़ुद बुलाकर लिटाया हो. बच्चे यूं तो साइडबर्थ पर बैठ गए थे, पर वे भी इस उम्मीद में थे कि पापा इन कुंभकर्णों से वैसे ही भिड़ जाएंगे और इन्हें भगा देंगे. वैसे मैं कुछ कम बहादुर हूं भी नहीं. अगर वे मनुष्य योनि के प्राणी होते तो उन्हें लताड़ कर भगाते मुझे देर नहीं लगती. यहां तो ख़ाकी वर्दीधारी प्राणी थे. वह भी कोई ऐसे-तैसे नहीं, कन्धे पर तीन-तीन सितारेधारी. उनके सिर गर्दन से जुड़े हुए होते भी जिस निस्पृह भाव से बर्थ पर लुढ़के पड़े थे, वह देख कर उनकी वस्तुस्थिति का अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता था.

आख़िरकार मैंने ख़ुद कुछ कहने के बजाय टीटी को बुलाना उचित समझा. बुलाने के क़रीब आधे घंटे बाद अवतरित हुए टीटी महोदय ने हमारे इलाके में पहुंचने के बाद पहले तो हमारे और अन्य यात्रियों के टिकट चेक किए. अपने चार्ट से मिलाया. आइडेंटिटी प्रूफ देखे. इसके बाद हमारी मूलभूत समस्या का बिना कोई समाधान किए चलने लगे. मजबूरन मुझे उन्हें टोकना पड़ा, 'सर आपने हमारी प्रॉब्लम तो सॉल्व की नहीं.' उन्होंने पलटकर मुझे ऐसे घूरा जैसे मैं बिना टिकट लिए एसी कंपार्टमेंट में घुस आया होऊं. फिर भी जवाब शांतिपूर्वक दिया, 'अब आप तो देख ही रहे हैं कि ये लोग किस हाल में हैं!'

'अरे तो पुलिस बुलाइए न! भई मेरा कन्फर्म रिज़र्वेशन है और साथ में पूरा परिवार है. आख़िर बच्चे इतनी दूर कैसे जाएंगे इस तरह?' मैंने उन्हें समझाना चाहा.

'तो वो आप ख़ुद ही बुला लीजिए न! पुलिस वालों का पुलिस क्या कर लेगी?' उनका यह जवाब यह बताने के लिए काफ़ी था कि क़ानून की समझ उन्हें मुझसे बेहतर है, 'थोड़ी देर धीरज रखिए. हो सकता है इन लोगों को होश आए और ये लोग ख़ुद ही उठकर चले जाएं.'

मैं बेचारा क्या करता? पूरे परिवार समेत अपने हिस्से की एकमात्र साइडबर्थ पर सिकुड़ गया. 'ये भी कोई तरीक़ा है? एक तो छ: घंटे लेट ट्रेन आएगी और ऊपर से कन्फर्म बर्थ पर क़ब्ज़ा किसी और का.' श्रीमती जी मेरे बैठते ही ऐसे बिफरीं, गोया ट्रेन के लेट आने और इस क़ब्ज़े के लिए भी ज़िम्मेदार मैं ही हूं.

'और तो और, ये रेल वाले इकट्ठे नहीं बता सकते कि ट्रेन छ: घंटे लेट है.' ये सामने की अपर बर्थ के मालिक थे, 'रात को 11 बजे जब मैंने रेलवे इन्क्वायरी को फ़ोन किया तो मालूम हुआ कि ट्रेन ऑन टाइम है. स्टेशन पहुंचने के बाद मालूम हुआ कि आधे घंटे लेट है. लेट के वे एक घंटे बीतने के बाद मालूम हुआ कि जी अब दो घंटे लेट है. फिर तीन घंटे बाद मालूम हुआ कि पांच घंटे लेट है और आख़िरकार यह कि छ: घंटे लेट है.' वे पूरा वृत्तांत ऐसे बता रहे थे, वे अकेले ही समय से यहां आए थे. बाक़ी लोग सीधे आकर बैठ गए हैं. रेल की इस लेट-लतीफी को लेकर उनका ग़ुस्सा आठवें आसमान पर था.

बहरहाल, ट्रेन ने एक ज़ोर का झटका धीरे से दिया और हौले से रेंग चली तो लोगों की जान में जान आई. इस बीच मैं श्रीमती जी तथा आसपास के अन्य सज्जनों एवं देवियों के व्यवस्था विरोधी प्रवचन सुनता बैठा रहा. लगभग चार घंटे बाद ट्रेन जब ग्वालियर पहुंचने वाली थी तो वही टीटी महोदय तेज़ी से भागते हुए आए और उन दोनों महानुभावों को झकझोर कर जगाते हुए बोले, 'अरे चौधरी साहब, डेढा जी जल्दी उठिए. आगे साले विजिलेंस वाले हैं. ये बर्थ छोड़ दीजिए. चलिए कहीं और आपका इंतज़ाम कर देते हैं.' वे दोनों वर्दीधारी सज्जन हड़बड़ा कर उठ बैठे और टीटी साहब हमारी ओर मुख़ातिब होते हुए बोले, 'हां भाई! बैठ लीजिए आप अपनी बर्थ पर.' इसके पहले कि इस एहसान के लिए मैं उन्हें शुक्रिया भी बोल पाता वर्दीधारियों समेत टीटी साहब अंतर्ध्यान हो चुके थे और मैं भगवान कार्तिकेय को मन ही मन धन्यवाद कहते हुए अपनी बर्थ पर काबिज हो गया.

बर्थ पर जमते ही श्रीमती शुरू हो गईं, ‘हज़ार बार मैंने समझाया कि चलो हमारे मायके हो आएं, पर तुम्हें तो हर साल नई जगह घूमने की पड़ी रहती है. मेरे घर के लोगों से मिलने में तो तुम्हें जाने क्यों कष्ट होने लगता है! बस एक बहाना मिल गया है कि नई जगह जाएंगे, नई जानकारी होगी. अब लो भुगतो नई जानकारी. ऐसे नई जानकारी कर-कर के बहुत लोग दौड़ते रहे कार्तिकेय भगवान की तरह उम्र भर और जिन्होंने माता-पिता की परिक्रमा की वे प्रथम पूज्य हो गए. कम से ये बवाल तो न झेलना होता. अभी आगे जाने क्या-क्या झेलना है.’

भला इस बात का विरोध अब मैं कैसे कर सकता था. मुझे प्रोफेसर करन याद आए. क्लासकोर्सीय हिन्दी साहित्य में गाइडों के रूप में तमाम महत्वपूर्ण योगदान कर चुके होने के बाद जब उनका पहला कविता संग्रह छप कर आया तो उसके विमोचन समारोह में उन्होंने कहा था, 'मैं आज तक दिल्ली नहीं गया. इसके बावजूद यह मेरी चौदहवीं किताब आज छप कर आपके सामने है.’ यह मैं जानता था कि दिल्ली तो क्या वह गोरखपुर से लखनऊ आना भी बिलकुल पसंद नहीं करते थे. न केवल घूमना-फिरना, बल्कि क्लासकोर्स के अलावा कुछ और पढ़ने को भी वे समय की फिजूलखर्ची मानते थे. यूं कई-कई किताबें लिखकर अपने को बड़ा साहित्यकार कहने वाले प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में बहुत थे, पर उनमें से किसी की भी किताब शहर की दुकानों पर न तो उपलब्ध थी और न किसी ने पढ़ी थी. जबकि प्रो. करन की लिखी गाइड शहर की ऐसी कोई दुकान नहीं थी, जहां न मिलती रही हो. सच तो यह है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य भी निराला के आगे नहीं पढ़ा था, पर पिछले 20 सालों में कम से कम 50 छात्र-छात्राओं को पीएचडी दिला चुके थे. अब तो उस संग्रह की कुछ कविताएं कुछ यूनिवर्सिटियों के कोर्स में भी हैं.

और यह सब दिल्ली गए बिना होना उनके लिए गौरव की बात तो है ही, हमारे लिए सीख लेने लायक भी है. आख़िर क्या ज़रूरत है दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए इतनी धक्का-मुक्की सहने की. प्रोफेसर साहब आज मुझे वास्तव में बड़े समझदार लग रहे थे. उन्होंने सिर्फ़ एक काम किया था अपने ज़माने के हेड साहब की जमकर सेवा की थी. इसके एवज में उन्होंने एमए टॉप कराया गया था और पीएचडी की डिग्री थमा दी गई थी. पीएचडी के साथ-साथ हेड साहब ने अपने बेटी के लिए उन्हें आरक्षित कर लिया था और दहेज में उन्हें लेक्चररशिप दे दी गई थी. अब मुझे लग रहा था कि यह उपलब्धियां इसीलिए उनकी हो सकीं क्योंकि उन्होंने कई जगहों की यात्रा के बजाय परिक्रमा में आस्था बनाए रखी. पैर पसारने के साथ जैसे-जैसे नींद का झोंके ने दस्तक देनी शुरू की मुझे चन्द्रशेखर की पदयात्रा, आडवाणी की रथयात्रा और उमा भारती की राम-रोटी यात्रा भी याद आने लगी थी. मैं देख रहा था कि चन्द्रशेखर तो ख़ैर, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौक़ा पा भी गए, पर बाक़ी लोग तो बेचारे वेटिंग में ही रह गए. जबकि समझदार लोग परिक्रमा के दम पर एमपी हुए बग़ैर पीएम का पूरा टेन्योर निबटा गए. मुझे ख़ुद अपनी बेवकूफ़ी पर तरस आने लगा. मन तो यह हुआ कि लौट चलें अबसे और चल कर श्रीमती जी के माता-पिता की ही परिक्रमा कर आएं. कम से कम कुछ दिन घर में शांति तो बनी रहेगी. पर फिर सोचा अब जब बर्थ पर क़ब्ज़ा मिल ही गया है, तो क्यों जाऊं बीच में छोड़ कर? अब पलनी पहुंचकर कार्तिकेय महराज की परिक्रमा करके ही लौटेंगे.

Wednesday, 6 May 2009

डर के बिना कुछ न करेंगे जी...!

 

इलाहाबाद में आजकल पब्लिक स्कूलों में बढ़ी हुई फीस के ख़िलाफ अभिभावक सड़कों पर उतर आए हैं। वकील, पत्रकार, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी आदि सभी इस भारी फीस वृद्धि से उत्तेजित हैं। रोषपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। इसे लेकर कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी तो जिलाधिकारी को स्कूल प्रबन्धकों के साथ समझौता वार्ता करनी पड़ी है। नतीजा चाहे जो रहे लेकिन इस प्रकरण ने मन में कुछ मौलिक सवाल फिर से उठा दिए हैं।जिलाधिकारी को ज्ञापन

भारतीय संविधान में ८६वें संशोधन(२००२) द्वारा प्राथमिक शिक्षा को अब मौलिक अधिकारों में सम्मिलित कर लिया गया है। मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अध्याय-३ में जोड़े गये अनुच्छेद २१-क में उल्लिखित है कि-

“राज्य ऐसी रीति से जैसा कि विधि बनाकर निर्धारित करे, छः वर्ष की आयु से चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करेगा।”

नागरिकों के लिए निर्धारित मौलिक कर्तव्यों की सूची, अनु.५१-क, में भी यह कर्तव्य जोड़ा गया है कि-

५१-क(ट): छः वर्ष की आयु से १४ वर्ष की आयु के बच्चों के माता पिता और प्रतिपाल्य के संरक्षक, जैसा मामला हो, उन्हें शिक्षा के अवसर प्रदान करें।”

शिक्षा को वास्तविक मौलिक अधिकार बनाने की राह में पहला कदम आजादी के पचपन साल बाद उठाकर हम संविधान में एक धारा बना सके हैं। इसका अनुपालन अभी कोसों दूर है। अभी हमारे समाज में शिक्षा व्यवस्था दो फाँट में बँटी हुई है। बल्कि दो ध्रुवों पर केन्द्रित हो गयी लगती है। पहला सरका्री और दूसरा प्राइवेट। इन दोनों क्षेत्रों में चल रही शिक्षण संस्थाओं पर गौर करें तो इनके बीच जो अन्तर दिखायी देता है उसकी व्याख्या बहुत कठिन जान पड़ती है।

 

सरकारी संस्थाओं में फीस कम ली जाती है। आयोग या चयन बोर्ड से या अन्य प्रकार की प्रतियोगी परीक्षा से चयनित योग्य अभ्यर्थियों को शिक्षण और प्रशासनिक नियन्त्रण  के कार्य के लिए योजित किया जाता है। सरकारी दर से मोटी तन्ख्वाह दी जाती है। सेवा सम्बन्धी अनेक सुविधाएं, छुट्टियाँ और परीक्षा आदि के कार्यों के लिए अतिरिक्त पारिश्रमिक। यह सब इसलिए कि सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी के इस काम में कोई कमी न रह जाय। शिक्षादान को बहुत बड़ा पुण्य भी माना जाता है। सरकारी वेतन पाते हुए यदि यह पुण्य कमाने का अवसर मिले तो क्या कहने? ऐसे ढाँचे में पलने वाली शिक्षा व्यवस्था तो बेहतरीन परिणाम वाली होनी चाहिए। लेकिन हम सभी जानते हैं कि वस्तविक स्थिति इसके विपरीत है। सच्चाई यह है कि जिस अध्यापक की जितनी मोटी तनख्वाह है उसके शिक्षण के घण्टे उतने ही कम हैं। गुणवत्ता की दुहाई देने वालों को पहले ही बता दूँ कि बड़े से बड़ा प्रोफेसर भी यदि कक्षा में जाएगा ही नहीं तो उसकी गुणवता क्या खाक जाएगी बच्चों के भेजे में।

 

प्राइवेट स्कूलों का नजारा बिल्कुल उल्टा है। फीस अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा। प्रबन्ध तन्त्र द्वारा अपने व्यावसायिक हितों (कम लागत अधिक प्राप्ति) की मांग के अनुसार शिक्षकों की नियुक्तियाँ की जाती हैं। गुणवत्ता की कसौटी काफी बाद में आती है। परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को सधाने के बाद सरकारी नौकरी पाने  में असफल रहे मजबूर टाइप के लोगों को औने-पौने दाम पर रख लिया जाता है। दस से बारह तक भी काम के घण्टे हो सकते हैं। सुविधा के नाम पर कोई छुट्टी नहीं, एल.डब्ल्यू.पी. की मजबूरी साथ में, शिक्षण के अतिरिक्त विद्यालय के दूसरे काम मुफ़्त में, नाच-गाना। लगभग बन्धुआ मजदूर जैसा काम।

 

इन दोनो मॉडल्स में जो अन्तर है उसके बावजूद एक अभिभावक की पसन्द का पैटर्न प्रतिलोमात्मक है। कम से कम प्राथमिक स्तर की शिक्षा का तो यही हाल है। जो सक्षम हैं वे अपने बच्चों का प्रवेश प्राइवेट कॉन्वेन्ट स्कूलों में ही कराते हैं। थोड़े कम सक्षम लोग भी गली-गली खुले हुए ‘इंगलिश मीडियम मॉन्टेसरी/ नर्सरी’ में जाना चाहेंगे। सरकारी स्कूल में जाने वाले तो वे भूखे-नंगे हैं जिन्हें दोपहर का मुफ़्त भोजन चाहिए। सरकारी वजीफा चाहिए जिससे मजदूर बाप अपनी बीड़ी सुलगा सके। मुफ़्त की किताबें चाहिए जिससे उसकी माँ चूल्हे में आग पकड़ा सके, स्कूल ड्रेस चाहिए जिससे वह अपना तन ढँक सके। नियन्त्रक अधिकारियों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक का ध्यान भी इन्हीं विषयों तक अटक कर रह जाता है। पठन-पाठन का मौलिक कार्य मीलों पीछे छूट जाता है। बहुत विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि सब जानते हैं कि सरकारी पाठशालाओं की हालत कैसी है।

 

मेरा प्रश्न यह है कि इसी समाज में पला-बढ़ा वही व्यक्ति सरकारी महकमें में जाकर बेहतर परिस्थियाँ पाने के बावजूद अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन क्यों हो जाता है। नौकरी की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त होते ही हरामखोरी उसके सिर पर क्यों चढ़ जाती है? बच्चों को नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने की जिम्मेदारी जिसके सिर पर है वह स्वयं क्यों अनैतिक हो जाता है? जिसे बच्चों में सदाचार और अनुशासन का बीज बोना है, वे स्वयं अनुशासनहीन और कदाचारी कैसे हो जाते हैं? जो व्यक्ति प्राइवेट संस्थानों में सिर झुकाए कड़ी मेहनत करने के बाद तुच्छ वेतन स्वीकार करते हुए उससे बड़ी धनराशि की रसीद तक साइन कर देते हैं वही सरकारी लाइसेन्स मिलते ही आये दिन हड़ताल और प्रदर्शन करके अधिक वेतन और सुविधाओं की मांग करते रहते हैं। ऐसा क्यों है?

 

यहाँ मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा हूँ। लेकिन सामान्य तौर पर जो दिखता है उससे मेरा निष्कर्ष यह है कि हमारा समाज ऐसे लोगों से ही भरा पड़ा है जिनके भीतर स्वार्थ, मक्कारी और मुफ़्तखोरी की प्रवृत्ति प्रधान है। अकर्मण्यता, आलस्य और अन्धेरगर्दी की फितरत स्वाभाविक है। कदाचित्‌ मनुष्य प्रकृति से ही ऐसा है। यह हालत केवल शिक्षा विभाग की नहीं है बल्कि सर्वत्र व्याप्त है। यह भी कि कायदे का काम करने के पीछे केवल एक ही शक्ति काम करती है, वह है “भय”।

 

केवल भय ही एक ऐसा मन्त्र है जिससे मनुष्य नामक जानवर को सही रास्ते पर चलाया जा सकता है। शारीरिक प्रताड़ना का भय हो, या सामाजिक प्रतिष्ठा का भय, नौकरी जाने का भय हो या नौकरी न मिल पाने का भय, रोटी छिन जाने का भय हो या भूखों मर जाने का भय; यदि कुछ अच्छा काम होता दिख रहा है तो सिर्फ़ इसी एक भय-तत्व के कारण। जहाँ इस तत्व की उपस्थिति नहीं है वहाँ अराजकता का बोलबाला ही रहने वाला है। आज ड्ण्डे की शक्ति ही कारगर रह गयी लगती है।

 

जय हो “भय” की...!!!

(सिद्धार्थ)

Ghazel

ग़ज़ल
(ये ग़ज़ल मैंने shashtriya परम्परा से हटकर एक नए मीटर पर लिखी थी जिसके sheron की पहली लाइन में मात्राएं कम रखी गई हैं। अटपटा लग सकता है परन्तु गेयता में व्यवधान नहीं है।)

साँप के घर में नेवले की षिकायत लेकर ।
मिलने जाते हैं कई लोग अदावत लेकर ।
खूब व्यापार सितम का करते,
हाथ में थोड़ा नमूना-ए -षराफत लेकर ।
खुदा का shukriya अदा करना
मरने पाओ जो जिन्दगी को सलामत लेकर।
कोई लेता तो अब थमा देते
हम परेषान हैं गांधी की अमानत लेकर ।
अब सजा और क्या गरीबों को?
ये सजा कम है क्या जीना और मुसीबत लेकर !
पूरी दुनिया खरीद बेच रहे
निकले थे जेब में थोड़ी सी सियासत लेकर ।
राढ़ी तुमने फरेब देखा है
जब तेरे लोग घूमते थे मुहब्बत लेकर ।
लोग देखेंगे दुखी ठग लेंगे
अब निकलना नहीं बिगड़ी हुई हालत लेकर ।

Tuesday, 5 May 2009

सामाजिक रिश्ता

मुल्ला नसरुद्दीन के पास समय की बड़ी कमी थी. बेचारे अपनी बीवी को समय दे ही नहीं पाते थे. तो उन्होंने सोचा कि क्यों न उसे तलाक़ ही दे दिया जाए. लिहाजा वे शहरक़ाज़ी के दफ्तर गए और वहां तलाक़ की अर्जी डाल दी. क़ाज़ी ने नसरुद्दीन को बुलाया. मुल्ला हाज़िर हुए.
क़ाज़ी ने सवाल किया,
तो तुम्हारी बीवी का नाम क्या है मुल्ला?
अरे! ये तो मालूम ही नहीं है, मुल्ला ने जवाब दिया.
अच्छा, क़ाज़ी ने आश्चर्य जताया, तुम लोग कितने दिनों से साथ रह रहे हो? क़ाज़ी ने फिर पूछा.
मेरा ख़याल है 20 साल से कुछ ज़्यादा हो गए, मुल्ला ने कुछ सोचते हुए बताया.
ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम 20 साल से साथ रहो और नाम भी न जानो? क़ाज़ी बौखलाया.
हो सकता है हुज़ूर! बिलकुल हो सकता है. मुल्ला ने सफ़ाई पेश की, असल में हमारा उसका कोई सामाजिक रिश्ता ही नहीं है.


Saturday, 2 May 2009

कविता - tumhaari deh

तुम्हारी देह
प्रिये
तुम अपनी देह में बंधी रहो
क्योंकि
तुम्हारी देह मेरा अन्तिम सत्य है
तुम्हारी
देह एक जीवन है,
जीवनयात्रा है
कर्म है
धर्म है
आस्था और आकर्षण है
देह की परिधि के बाहर
कुछ
नहीं बस shoonya है
इस देह ने ही तुम्हें
मेरी प्रियतमा बनाया है
जब तुम्हारी याद आई है
tumhara तन ही याद आया है ।
तुम्हारी देह
कुन्दन है,
कामाग्नि एवं विरहाग्नि में
तपकर इसका रूप निखरा है।
तुम्हारा तन सप्त सरोवर है
निर्मलहै
निर्झर है
हिमषीतल है ।
तुम्हारा तन
श्नल है
मैं जल जाता हूँ
जब तुम मेरे पास होती हो
सर्दियों में जब
मेर सीने पर सिर रखकर सोती हो,
तुम्हारी देह दर्पण है
अंग-अंग में तुम्हारा प्रतिबिम्ब है
प्रतिबिम्ब मेरा भी है
किन्तु वह तुम्हारी देह पर अर्पण है
और कदाचित नारीमय भी है।
तुम्हारी देह
खाद्य है
पेय है
पथ्य है
भोग्य है
सेव्य है
ओषधि है
संजीवनी है
तुम्हारी देह
शृंगार है
रति है
रतिपति है
पुष्पबाण है
बसन्त है
सुगन्ध है
पुष्प है,मकरंद है
पूजा है तुम्हारी देह
साधना है
यज्ञ है
हवन है
हवि है
होत्री भी है
यजमान है तुम्हारी देह।
सार्वभौमिक साहित्य है
तुम्हारी देह,
मूलपाठ है
षाब्दिक कृतियाँ तो इसकी टीकाएँ हैं।
तुम्हारी देह
अmrit और मदिरा की
लबालब भरी हुई
गागर है
जहाँ भी जाती हो
दो- चार बूँद छलक ही जाती है
और रह जाता है
एक अदृष्य निषान
तुम्हारी देह का ।
तुम्हारी देह
एक नाव है
जिसपर बैठकर हम पार जाते हैं
कामना के,
वासना के
और चेतना के।
लज्जा है तुम्हारी देह
श्रद्धा, ईष्र्या और इड़ा है।
तुम्हारे कुंतल
तुम्हारी आँखें
सीधी उतरती हैं दिल में
बेधती हैं,साधती हैं
और चीखती हैं।
उरोज
उन्नत षिखर हैं
मनु को प्रलय से बचाने के
आलम्ब,आश्रय और विश्रामस्थल हैं
जीवन हैं,
अमृत हैं और हालाहल हैं
कटि कटार है
आधार है या गोमुख से निकली
गंगा की धार है!
बहुत कुछ है आसपास
षीतलता
कोमलता
निर्मलता
प्रवाह
निर्वाह,
दाह और कदाचित आत्मदाह!
आभूषण तुम्हारे सेवक हैं
वस्त्र तुम पर ष्षोभा पाते हैं
मैं तो क्या
देवता भी तुम्हारी देह पाने के लिए
धरती पर चुपके से आते हैं
वस्तुतः सब कुछ मिथ्या है
तुम्हारी देह
सत्य है
इस सत्य पर निष्चित ही
सच्चरित्र की मृत्यु है
मैं नहीं मानता आत्मा को अजर -अमर
वह तो दुर्बल है
चंचल है
कर्महीन, धर्महीन और पलायनवादी है
आत्मा भी भटकती - भटकती
तुम्हारी देह में षरण पाती है
और
मैंने तो यही पढ़ा है
अनुभव ने भी यही गढ़ा है
षरणदाता सदैव ही षरणार्थी से बड़ा है
mera मन
अब निष्चल है
तुम्हारी देह मेरा अन्तिम स्थल है।
--हरीशंकर राढ़ी

खजूर से इतर

यह कहानी मैंने बहुत पहले लिखी थी. शायद सन 2000 में और मन में चल तो यह उसके भी बहुत पहले से रही थी. लेकिन लिखने के बाद भी केवल आलस्यवश मैंने इसे भेजा कहीं नहीं. बहुत दिनों बाद मैंने इसे एक जगह भेजा भी तो लंबे अरसे तक कोई जवाब नहीं आया और न मैंने कोई पूछताछ ही की. फिर पिछले साल इसे भाई फ़ज़ल इमाम मल्लिक ने मांगा तो मैंने उन्हें दे दी. तब यह सनद में छप कर आई. मुझे लगता है अब इसे दुबारा पढ़ा जाना चाहिए. शायद इसे पढ़े जाने के लिए यह एक मुफ़ीद वक़्त है. तो लीजिए आप भी देखिए और अपनी राय भी दीजिए. 

                                                                                                       इष्ट देव सांकृत्यायन
                                               
बहुत गहरा कुआं था. कुआं जितना गहरा था, उतना ही संकरा. कुएं में ढेर सारे मेढक थे. बहुत बड़ा तालाब था. तालाब जितना बड़ा था, उतना ही छिछला. तालाब में ढेर सारी मछलियां थीं. यूं उनमें कोई रिश्ता न था. तालाब न तो कुएं का पड़ोसी था और न कुआं तालाब का. संबंध फिर भी दोनों में थे और गहरे थे. ऐसे ही मछलियां न तो मेढकों की पड़ोसी थीं और न मेढक मछलियों के. संबंध फिर भी दोनों में थे और बहुत उथले थे. हुआ यह कि अपने-आपमें सिमटे-सिकुड़े मेढकों ने एक दिन आकाश देख लिया. मछलियां यूं तो आकाश देख नहीं सकीं पर मेढकों ने उन्हें दिखाई आकाश की परछाईं. परछाईं भी यूं ही नहीं दिखाई. दरअसल आकाश देखते ही उनमें उस पर फ़तह का सपना जाग उठा था. वह आकाश जिस पर बगुलों का पूरा क़ब्जा था और आकाश पर क़ाबिज होने के नाते बगुले उन्हें बिराते हुए से लगे. उन्हें लगा गोया गरमी के दिनों में यह अपना कुआं जो काफ़ी कुछ सूख जाता है, इन बगुलों के नाते सूखता है और बिलकुल ऐसे ही बरसात के दिनों में जो बाढ़ का शिकार सा हो जाता है, वह भी इन बगुलों के नाते होता है. बिलकुल वैसे ही जैसे मछलियों का तालाब उनके ही नाते सूखे और बाढ़ का शिकार हुआ करता है.
उधर तालाब में डूबती-उतराती मछलियों ने भी एक दिन देख लिया पाताल. पाताल पर उनने सांपों का क़ब्जा देखा. सांपों को देखते ही वे गहन सम्मान के भाव से सिहर उठीं. मेढक भी ऐसे ही कभी-कभी सम्मान के भाव से सिहर उठते थे, बगुलों के प्रति. कभी-कभी ऐसे ही वे मछलियों के प्रति अपने अगाध स्नेह का कहर भी बरपाते थे.
अब जब उनके मन में आकाश पर क़ब्जे का भाव जग ही गया तो बगुलों से जंग अपरिहार्य हो गई. इस जंग में वे जानते थे कि उनमें से तमाम खेत रहते और अपने में से एक का भी खेत होना उन्हें मंजूर न था. इस संकट से निज़ात के तरीक़े सोचने के लिए मेढकों की एक सभा हुई और आख़िरकार तय पाया गया कि इस जंग में सिर कटाने के लिए मछलियां तैयार की जाएं. यूं भी कुछ बड़ी मछलियां इस जंग में पहले से जुटी थीं. पर उनमें से ज़्यादातर अपने सिर कटा चुकी थीं और जो नहीं कटा सकीं वे थक-हार गई थीं.
'पर इस तरह तो हमारी भूमिका पर सवाल उठाया जाएगा. आख़िर हम क्या करेंगे जब सिर मछलियां ही कटाएंगी?' उनमें से एक युवा पर समझदार मेंढक ने सवाल उठाया.
'करेंगे, करेंगे', एक बूढ़े मेढक ने अपने पिछले दोनों पैरों पर खड़े होने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा और धप्प से बैठ गया.
'क्या करेंगे?' युवा मेढक ने फिर सवाल उछाला.
'नेतृत्व' बूढ़े मेढक ने बताया.
'वाह भाई! मरेंगी मछलियां और नेतृत्व करेंगे हम?' युवा मेढक ने कहा, 'भला कौन स्वीकार करेगा ऐसे नेतृत्व को?' उसने सवाल उछाला.
'करेंगे, सभी करेंगे', बूढ़े मेढक ने एक बार फिर बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा, 'ये मछलियां होती ही इसीलिए हैं बालक. भूल गए आकाश के उसे कोने की बात जहां मछलियों के उत्सव तक की अगुवाई बगुले करते हैं और वह भी अपने पूरे साजो-सामान के साथ. ऐसे ही हम भी करेंगे. लड़ेंगी मछलियां और मरेंगी भी वही, पर फ़तह हमारी होगी. उन्हें मिलेगा स्वर्ग का राज्य और हमें धरती का', कहते हुए उसने ठहाका लगाया.
दरअसल वे दोनों बगुलों के पैरों से चिपटकर आसमान की सैर एक बार कर आए थे. और उनमें से बूढ़ा तो यह प्रयोग भी कर चुका था.
अब युवा मेढक के पास समझौते के मुताबिक चुप रह जाने के अलावा कोई चारा न था. अंतत: तय पाया गया कि सभी मिलकर बूढ़े मेढक को भगवान के अवतार और उसकी हर बात को आत्मा की आवाज़ के रूप में प्रचारित करेंगे. वह जितने झूठ बोले उसे सत्य के साथ प्रयोग कहा जाए.
हुआ भी यही. सत्य की बारहां कचूमर निकालते हुए मछलियों की जान की क़ीमत पर उनने जंग फ़तह की और राज्य हासिल किया. हालांकि उन्हें आसमान पर आधिपत्य नहीं मिल सका पर तालाब पर वे पूरी तरह क़ाबिज थे. उसमें सीधी दख़ल देने अब कोई बगुला आने वाला नहीं था.
उधर उनके लिए एक नई मुसीबत पैदा हो गई. बगुलों से आसमान साफ़ कराने में सारा ख़ून-पसीना चूंकि मछलियों का ही बहा था, लिहाज़ा उन्हें सत्ता में भागीदारी तो नहीं पर इसका भ्रम देना अब उनकी मजबूरी बन गई थी. भ्रम भी उनने रच ही डाला. हुआ यह कि बूढ़े मेढक की मदद से एक पेड़ उगाया गया, खजूर का. इस पेड़ की जड़ें तो उस कुएं में दबी थीं, जहां मेढक रहते थे पर शाखाएं तान दी गईं मछलियों के तालाब पर. फिर एक भ्रम यह भी पैदा किया गया कि दरअसल यह जो कुआं है वही पूरा तालाब है और जो तालाब है वह भी असल में तो कुआं है. गोया यह कि यह जो कुआं है वही तालाब है और जो तालाब है वही कुआं है.
पर बात इससे भी नहीं बनी. वजह यह कि कुछ मछलियां जो समझदार थीं और जिनने बगुलों से मेढकों की नूरा कुश्ती की असलियत को भांपते हुए उनके नेतृत्व में लडऩे से इनकार कर दिया था, उनने बगुलों को भगाने के बाद बगुलों के ही इशारों पर चलते रह जाने वाले मेढकों की नहीं बल्कि मछलियों की सत्ता की बात की थी. वे ग़रीब मछलियों के लिए मुकम्मिल धरती और मुकम्मिल आसमान बनाना चाहती थीं, जहां थोड़ा-थोड़ा ही सही, पर सभी मछलियों को बराबर का हक मिलता. अब यह तो वे यूं दे नहीं रहे थे. आखिरकार तय हुआ कि इसका भी हकीकत के बजाय सिर्फ़ भ्रम दे दिया जाए. ताकि मछलियां यूं ही दबी-कुचली और बहकी रहें.
हुआ यह कि खजूर का जो वह पेड़ बनाया गया था उस पर आधिपत्य में मछलियों की भागीदारी तय की गई. इसके लिए मछलियों में एक और भ्रम पैदा किया गया. यह कि दरअसल मेढक और मछलियां कुछ अलग-अलग नहीं, बल्कि सारी की सारी जो मछलियां हैं वे मेढक हैं और सारे के सारे जो मेढक हैं वे मछलियां हैं. गर्ज़ यह कि मछलियां ही मेढक और मेढक ही मछलियां हैं.
पर इसमें भी भय यह था कि किसी दिन मछलियां सचमुच उस पेड़ की दावेदार हो सकती थीं और अगर इसमें कहीं ईमानदारी बरत दी जाती तो उनका उस पेड़ पर आधिपत्य भी हो जाता. भय दरअसल ऐसे में यह था कि अगर मछलियों का आधिपत्य उस पेड़ पर हो जाता तो एक दिन वे उस पेड़ का मूल ढूंढने लगतीं और जब उन्हें वह मिल जाता तो या तो वे उसे खोद डालतीं या फिर उसे उस कुएं से निकाल कर पूरे तालाब पर फैला देतीं. और तब मेढकों के लिए कहीं कोई जगह नहीं बचती.
लिहाजा तय किया गया कि ऐसा भी कभी ईमानदारी से होने नहीं दिया जाएगा. मछलियों को दिया जाएगा सत्ता में भागीदारी का सिर्फ़ भ्रम और इसी बहाने ऐसे जैसे मेढक-मछली भाई-भाई करते-करते मेढकों को मछली और मछलियों को मेढक साबित कर दिया बिलकुल ऐसे ही केकड़े, घोंघे, कौवे और यहां तक कि शेर, चीते और लकड़बग्घे तक को मछलियों के बराबर का दर्जा देते हुए सबको एक साथ नाप दिया जाएगा. इसमें बस इतना ही तो ध्यान रखना है कि मगरमच्छ, केकड़े, घोंघे, घडिय़ाल, सूंस, हिप्पोकैंपस, ऊदबिलाव, वाइपर या फिर केंचुए ही क्यों न आएं, पर बस मछलियां इस खजूर के शीर्ष तक न पहुंचने पाएं. और हां!  उन्हें यह भी कभी न लगने पाए कि वे इसके शीर्ष तक कभी पहुंच ही नहीं सकतीं.
सत्य, प्रेम और अहिंसा की भाषा में उस तालाब का अपना एक क़ायदा बना. यह क़ायदा दरअसल तो बगुलों की देखरेख में और उनके मुताबिक बना, पर इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि इससे कहीं से भी ऐसी कोई बू न आए. क्योंकि बदले जमाने में अब उन्हें आसमान में बैठे-बैठे कुएं पर पूरा आधिपत्य रखना था और इसी तरह तालाब की सारी संपदा हासिल करते रहनी थी. बस यही वजह थी कि मेढकों की सफलता की शुभकामना करते हुए उनके सिंहासनारूढ़ होने और अरसे तक बने रहने का पूरा इंतज़ाम करते हुए बगुलों ने मेढकों से विदा ली.
खजूर के पेड़ की इस चढ़ाई के मुकाबले पर नज़र रखने के लिए भी एक महकमा बनाया गया. उसके भी अपने क़ायदे-क़ानून बने और ये क़ायदे-क़ानून भी बिलकुल वैसे ही बने, जैसे ताल, कुएं और आकाश के उस समुच्चय का क़ायदा. ऐसा कि जिसमें जो करने को लिखा था, बस वही छोड़कर और सब हो इसकी पूरी गारंटी थी.
तब से लेकर अब तक मछलियां तीन खेमों में बंट चुकी हैं. एक वे जो पूरे भ्रम में जी रही हैं, दूसरी वे जो थोड़ी भ्रम में हैं और थोड़ी निभ्रम भी और तीसरी वे जिनका भ्रम टूट चुका है. और हां! जिनका भ्रम जितना गहरा है वे उतने ही मजे में हैं. क्योंकि वे लगातार खजूर पर चढऩे की कोशिश में हैं. उनका ख़याल है कि इस खजूर पर चढ़ते ही आसमान पर उनका राज हो जाएगा. यह जानते हुए भी कि उनकी कोशिश कभी सफल नहीं होनी, वे लगातार कोशिश में लगी हैं और इस कोशिश में उनका पूरा शरीर, मन और यहां तक कि आत्मा भी छिली जा रही है. दूसरी वे हैं जो रह रही हैं तालाब में 'कोउ नृप होय हमें का हानी' के से भाव से.
तीसरी वे जो जान गई हैं कि उन्हें किस तरह बेवकूफ़ बनाकर उनसे उनकी जमीन, ताल और यहां तक कि आसमान सब कुछ छीन लिया गया. किस तरह बगुले और केकड़े और कई और जंतु 'अहिंसा परमो धर्म:' और 'सत्यमेव जयते' रटते-रटते उनके ताल पर क़ाबिज हो गए और अब उसे खाए जा रहे हैं. किस तरह उन्हें आसमान दिखाकर न तो ताल में रहने दिया गया, न ज़मीन पर और न आसमान तक पहुंचने ही दिया गया. हुआ यह कि उन्हें उस खजूर पर न मालूम कहां लटका दिया गया जहां कुछ भी नहीं है ... न तो फल, न जल और न छाया ही.
बस वे मछलियां हैं, जिनमें अब शेष है सिर्फ बेचैनी और उन्हें है सिर्फ़ तलाश. बेचैनी, उस आधे-अधूरे जगत से निकल एक नई दुनिया बनाने और अपना हक़ हासिल करने की. तलाश है एक ऐसे रास्ते की, जो उनको वहां से निकालने में मददगार बन सके. जहां से उन्हें थोड़ी सी सचमुच की रोशनी मिल सके. जी हां, जनाब! उन्हें तो है ही तलाश, आप भी देखिए और अगर कोई रास्ता दिखे तो हमें भी ज़रूर बताएं. कौन जाने आप भी उनमें से ही एक हों.