Thursday, 30 April 2009

मुल्ला और इंसाफ़

इधर बहुत दिनों से मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी याद आ रही है. मित्रों से निजी बातचीत के क्रम में उनका जिक्र भी अकसर होता रहा है. पढ़ता भी ख़ूब रहा हूं, गाहे-बगाहे जब भी मुल्ला के बारे में जो कुछ भी मिल गया. पर उधर जूते ने ऐसा परेशान कर रखा था कि मुल्ला को इयत्ता पर याद करने का मौक़ा ही नहीं मिल सका. आज एक ख़ास वजह से उनकी याद आई. एक बात आपसे पहले ही कर लूं कि मुल्ला से जुड़े इस वाक़ये को किसी अन्यथा अर्थ में न लें. कहा यह जाता है कि यह एक चुटकुला है, लिहाजा बेहतर होगा कि आप भी इसे एक चुटकुले के ही तौर पर लें. अगर किसी से इसका कोई साम्य हो जाता है तो उसे बस संयोग ही मानें.


तो हुआ यह कि मुल्ला एक बार कहीं जा रहे थे, तब तक सज्जन दौड़ते-दौड़ते आए और उन्हें एक चाटा मार दिया. ज़ाहिर है, मुल्ला को बुरा लगना ही चाहिए था तो लगा भी. लेकिन इसके पहले कि मुल्ला उन्हें कुछ कहते, वह मुल्ला से माफ़ी मांगने लगे. उनका कहना था कि असल में उन्होंने मुल्ला को मुल्ला समझ कर तो चाटा मारा ही नहीं. हुआ यह कि मुल्ला को आते देख दूर से वह किसी और को समझ बैठे थे और इसी धोखे में उन्होंने चाटा मार दिया. पर मुल्ला तो मुल्ला ठहरे. उनकी नाराज़गी कम नहीं हुई. उन्होंने उन सज्जन की कॉलर पकड़ी और उन्हें घसीटते हुए पहुंच गए शहरक़ाज़ी की अदालत में. क़ाज़ी को पूरा वाक़या बताया. तो क़ाज़ी ने कहा, ‘भाई मुल्ला साहब, आप बदले में इन्हें एक चाटा मारें.’
लेकिन मुल्ला इस न्याय से भी संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने कहा, ‘क़ाज़ी साहब देखिए, इन महोदय ने 20 आदमियों के बीच मेरी इंसल्ट की है. सों ये मामला इतने से निपटने वाला नहीं है.’
‘तो, आख़िर आप क्या चाहते हैं?’ क़ाज़ी ने पूछा.
‘इनकी इस हरकत से मेरी इज़्ज़त का जो नुकसान हुआ है आख़िर उसका क्या होगा?’ मुल्ला ने सवाल उठाया.
शहरक़ाज़ी समझदार थे और मुल्ला को जानते भी थे. लिहाजा मामला जल्द से जल्द रफ़ा-दफ़ा करने के इरादे से उन्होंने मुल्जिम पर एक स्वर्णमुद्रा का दंड लगाया और कहा कि वह अभी अदालत के सामने ही मुल्ला को इस रकम का भुगतान करे. बेचारा वह तुरंत भुगतान करने की हैसियत में था नहीं. सो उसने थोड़ा मौक़ा चाहा. यह कहकर कि हुज़ूर अभी मैं स्वर्णमुद्रा लेकर आपकी ख़िदमत में हाज़िर होता हूं, वह अदालत से बाहर चला गया और देर तक नहीं लौटा. जब और इंतज़ार करना मुल्ला के लिए नामुमकिन हो गया तो वह अपनी जगह से उठे. शहरक़ाज़ी की गद्दी के पास पहुंचे और उनसे मुखातिब हुए, ‘अब क़ाज़ी साहब ऐसा है कि मुझे कहीं जाना है, ज़रूरी काम से. लिहाजा मैं इससे अधिक देर तक इंतज़ार तो कर नहीं सकता. अब ऐसा करिएगा कि जब वह आए तो रकम उससे आप वसूल लीजिएगा और तब तक ये रसीद मैं आपको काटकर दिए जा रहा हूं.’ और लगा दिया एक झन्नाटेदार तमाचा. फिर चलते बने.

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Wednesday, 29 April 2009

दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली

पुस्तक समीक्षा

दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली
संभवतः बहुत कम ही साहित्यप्रेमियों को इस बात की जानकारी होगी कि लब्धप्रतिष्ठ उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली , पिछली सदी के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित होने वाली अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका धर्मयुग में ‘ बुनियाद अली ’ के छद्म नाम से एक स्तंभ लिखा करते थे , जिसका शीर्षक था - बेदिल दिल्ली। धर्मयुग पत्रिका के सर्वाधिक पढे जाने वाले और चर्चित स्तंभों में सम्मिलित बेदिल दिल्ली के अन्तर्गत लिखे गए उन्हीं लेखों को संकलित कर पुस्तकाकार में किताबघर प्रकाशन ने हाल में ही प्रकाशित किया है । कहने की जरूरत नहीं कि पुस्तक में संकलित सभी 52 लेख ऐतिहासिक महत्व के हैं।
इनके माध्यम से लेखक ने तत्कालीन दिल्ली की सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दशाओं का चित्रण पूरी प्रामाणिकता के साथ किया है। दिल्ली स्थित सरकारी महकमों में फैला भ्रष्टाचार हो या सामाजिक स्तर पर पसरी संवेदनहीनता, साहित्यिक गलियारों में होने वाली आपसी टाँग खिचाई हो या फिर राजनीतिक मठाधीशों की छद्म सदाचारिता , हर जगह व्याप्त विसंगति को उकेर कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बुनियाद अली मुस्तैद नजर आते हैं।
लेखक ने पुस्तक में संकलित लेखों को विषयानुसार तीन वर्गों में विभाजित कर दिया है। ‘ये गलियाँ औ’ चैबरे’ वर्ग में संकलित लेखों में मुख्यतः तत्कालीन दिल्ली के शासन, प्रशासन, सत्ता और संसद से लेकर सड़क पर टाट बिछाकर बरसाती के नीचे रहने वाले आम आदमी के जीवन से जुड़ी सच्चाइयों की पड़ताल की गई है। मिसाल के तौर पर ‘कायदे-कानून’ लेख में वे चुटीले अंदाज में कहते हैं-‘‘सारे नियम और कायदे-कानून असल में लोगों की सुख-सुविधा के लिए बनाए जाते हैं। मगर सरकारी दतरों में जिस तरह इसका मलीदा बनाया जाता है, यह देखने, समझने और भुगतने की चीज है।’’ इसी तर्ज़ पर ‘प्रशासन कितना चुस्त’ लेख में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिए गए प्रतीकात्मक पत्र के जरिए उन्होंने (यानी बुनियाद अली ने) प्रशासनिक स्तर के कदम-कदम पर पसरी अनियमितताओं को पूरी बेबाकी से बयान किया है। इस वर्ग में संकलित अधिकांश लेख व्यंग्यात्मक शैली और हल्के-फुल्के लहज़े में ही लिखे गए हैं, लेकिन इनके साथ ही कुछ लेखों (जैसे-‘दिल्ली के जामुन’ और ‘सरकारी अस्पताल’) में तरल मानवीय संवेदनाओं को भी पूरी पारदर्शिता के साथ शब्दबद्ध किया गया है।
पुस्तक में समाविष्ट दूसरे वर्ग ‘साहित्य वाद-संवाद’ में संकलित कुल ग्यारह लेखों में साहित्यिक गोष्ठियों, लेखक संघों और अकादमियों से जुड़े नेपथ्य की वास्तविकताओं को रोचक शैली में लिखा गया है। विशेष रूप् से ‘टी-हाउस, काॅफी हाउस’ शीर्षक लेख में बुनियाद अली ने, उस दौर में वहाँ होने वाली (शीर्षस्थ साहित्यकारों की) अड्डेबाजियों और उनकी बेलौस अदाओं का आँखों देखा हाल बड़े ही दिलचस्प अंदाज में बयान किया है।
इसी क्रम में पुस्तक के तीसरे वर्ग ‘इतस्ततः’ में सम्मिलित किए गए लेखों में बुनियाद अली ने देश के सर्वोच्च पद पर आसीन अति विशिष्ट व्यक्ति के (राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रति) अनुचित व्यवहार से लेकर अदने स्तर के सरकारी मुलाजिमों के भीतर पूरी तरह जम चुकी क़ाहिली और संवेदनहीनता को रेखांकित किया है।
प्रत्येक लेख में कहीं संस्मरण, कहीं कहानी, कभी गंभीर निबंध तो कभी रिपोर्ताज जैसी भिन्न-भिन्न विधागत शैलियों का समावेश, बुनियाद अली ने इतनी खूबसूरती से किया है कि आज भी इन्हें पढ़ने पर ज़रा-सी भी बोझिलता का अहसास नहीं होता। कहा जा सकता है कि-‘धर्मयुग’ पत्रिका के बेदिल दिल्ली स्तंभ की लोकप्रियता का एकमात्र कारण बुनियाद अली का ‘अंदाज़-ए-बयाँ’ ही था, जिसके चलते वो गंभीर से गंभीर बात भी सीधी-सरल और गुदगुदाती भाषा में कह दिया करते थे।
यद्यपि पुस्तक में संकलित सभी लेख आज से लगभग 25-30 वर्ष पहले लिखे गए थे, लेकिन उनकी रोचक भाषा शैली, कसी बुनावट, व्यंग्यात्मक लहजा और उसमें समाए आम आदमी के जीवन की दुश्वारियों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया गया है कि जो आज भी पढ़ने पर मन में गहरा प्रभाव उत्पन्न कर देते हैं। इन लेखों से गुजरते हुए ये साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है कि इतने वर्ष बीतने के बाद भी इनकी प्रासंगिकता अब भी बरकरार है। दिल्ली की जिस संवेदनहीनता को लेकर बुनियाद अली, इन लेखों में चिंतित नजर आते हैं, उसके स्तर में कमी की जगह बढ़ोतरी ही होती जा रही है। यहाँ के गली-कूचों से लेकर राजपथ तक चप्पे-चप्पे पर, बेशुमार विसंगतियाँ आज भी मुँह बाए खड़ी नजर आ जाती हैं। कहना चाहिए कि बुनियाद अली की वह बे-दिल दिल्ली अब, माॅल्स और मल्टीप्लेक्सेस की चकाचैंध में अंधी और लाखों मोटरगाड़ियों के कोलाहल में बहरी भी हो गई है। शायद तभी उसे न तो हर तरफ छिटकी अव्यवस्थाएँ दिखती हैं और न ही सुनाई पड़ती हैं, आम आदमी की आवाज।
( नई दुनिया के 19 अप्रैल 09 अंक में प्रकाशित )

-विज्ञान भूषण

पुस्तक: बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
लेखक: द्रोणवीर कोहली
मूल्य: 400 रुपये मात्र
पृष्ठ: 296
प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली

Tuesday, 28 April 2009

चार रंग जिंदगी के

पुस्तक समीक्षा

चार रंग जिंदगी के

अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सर्जनात्मक लेखन से जुडने वाली रचनाकार डाॅ अरुणा सीतेश ने बहुत कम समय में ही तत्कालीन कथा-लेखिकाओं के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली थी। उनके कथा- साहित्य के केंद्र में प्रायः स्त्री जीवन की गहन भावनाओं का मार्मिक चित्रण उपस्थित रहता है। कुछ समय पूर्व प्रकाशित कथा संकलन ‘ चार लंबी कहानियां ’ में सम्मिलित उनके द्वारा लिखी गई कहानियां जहां एक ओर नारी मन के अंतद्र्वंद्व को उजागर करती हैं तो साथ ही मानवीय मनोविज्ञान का विश्लेषण भी करती हैं।
समीक्ष्य संग्रह में संकलित पहली कहानी ‘डूबता हुआ सूरज’ एक असफल प्रेम की मार्मिक गाथा को बयान करती है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी यद्यपि चिर- परिचित कथानक पर ही आधारित है , लेकिन इसका शिल्प और मनोभावों को पूरी सशक्तता से व्यक्त करने के लिए गढे गए वाक्य विन्यास , पाठकों को बांध कर रखने में पूर्णतः सक्षम हैं।
भावुक इंसान के जीवन की मुश्किलें तब और बढ जाती हैं , जब उस पर अपने ही परिजनों और जीवन को व्यावहारिकता से देखने वालों का दबाव पडने लगता है। बुद्धिजनित तर्कों और भावजनित संवेदनाओं के दो राहे पर खडे एक ऐसे ही युवक शिशिर की दुविधाग्रस्त अंतर्दशा का सूक्ष्म विवेचन इस संग्रह की कहानी ‘ चांद भी अकेला है ’ में किया गया है। इस कहानी का अंत शिशिर के उस असाधारण निर्णय के साथ होता है , जब वह अपने सपनों और अपनी महात्वाकांक्षाओं को दफनाकर मानसिक रूप से विकलांग अपनी बहन के इलाज कराने का निश्चय कर लेता है। इसी तरह ग्रामीण परिवेश पर आधारित संग्रह की एक अन्य कहानी‘कल्लू का कल्लू’ में सवर्ण और शक्तिसम्पन्न वर्ग के द्वारा कमजोर वर्ग के उत्पीडन और इसके विरुद्ध उपजे विद्रोह को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया गया है। यह कहानी शोषण के खिलाफ होने वाली क्रांति की जमीनी हकीकत और उसकी परिणति को सहजता के साथ हमारे समक्ष उजागर करती है। दरअसल , यह कहानी इस कडवे सच को भी स्थापित करती है कि हाशिए पर रहने वाले लोग भी केंद्र में पहुंचने पर किस तरह से हाशिए पर बचे शेष लोगों को भूल जाते हैं ?
कहा जा सकता है कि समीक्ष्य संग्रह की चारो कहानियां हमारे आस-पास के जीवन से जुडी तो हैं , ही साथ ही इनके माध्यम से बनते- बिगडते पारिवारिक और सामाजिक संदर्भेंा का भी प्रभावी चित्रण किया गया है। चार अलग - अलग विषयों पर लिखी गई ये कहानियां , वास्तव में पाठक को जिंदगी के चार रंगों से रू-ब-रू कराती हैं।

विज्ञान भूषण


पुस्तक - चार लंबी कहानियां
लेखिका- डाॅ अरुणा सीतेश
प्रकाशक- अमरसत्य प्रकाशन, नई दिल्ली
मुल्य - 150 रु मात्र

Sunday, 26 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-32

आप कई बार देख चुके हैं और अकसर देखते ही रहते हैं कि ख़ुद को अजेय समझने वाले कई महारथी इसी खड़ाऊं के चलते धूल चाटने के लिए विवश होते हैं. यह अलग बात है कि अकसर जब आप धूल चाटने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं तो यह काम आप जिस उद्देश्य से करते हैं, वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हर बार आप यह पाते हैं कि आप छले गए. इसकी बहुत बड़ी वजह तो यह है कि आप अकसर 'कोउ नृप होय हमें का हानी' वाला भाव ही रखते हैं. कभी अगर थोड़ा योगदान इस कार्य में करते भी हैं तो केवल इतना ही कि अपना खड़ाऊं चला आते हैं, बस. और वह काम भी आप पूरी सतर्कता और सम्यक ज़िम्मेदारी के साथ नहीं करते हैं. आप ख़ुद तमाशेबाज खिलाड़ियों के प्रचार तंत्र से प्रभावित होते हैं और इसी झोंक में हर बार अपने खड़ाऊं का पुण्यप्रताप बर्बाद कर आते हैं. और यह तो आप अपनी ज़िम्मेदारी समझते ही नहीं हैं कि आपके आसपास के लोगों के प्रति भी आपकी कोई ज़िम्मेदारी बनती है.
अगर आपका पड़ोसी ग़लती करता है और आप उसे ग़लती करते हुए देखते हैं तो ज़्यादा न सही पर थोड़े तो आप भी उस ग़लती के ज़िम्मेदार होते ही हैं न! बिलकुल वैसे ही जैसे अत्याचार को सहना भी एक तरह का अत्याचार है, ग़लती को देखना भी तो एक तरह की ग़लती है! अगर आप अपने पड़ोसी को ग़लती करने से बचने के लिए समझाते नहीं हैं, तो इस तरह से भी एक ग़लती ही करते हैं. वैसे अगर आप पॉश लोकेलिटी वाले हैं तो वहां कोई ग़लती अनजाने में नहीं करता. वहां ग़लती करने के पहले भी उसकी पूरी गणित लगा ली जाती है. ग़लतियां वे करते हैं जिन्हें आप कम-अक्ल मानते हैं. और वे ग़लतियां इसलिए नहीं करते कि उनका विवेक आपसे कम है, वे ग़लती सिर्फ़ इसलिए करते हैं क्योंकि वे इतने सूचनासमृद्ध नहीं हैं जितने कि आप. उनके पास इसका कोई उपाय नहीं है. आपके पास उपाय तो है और आप सूचना समृद्ध भी हैं. चाहें तो दुनिया के सच को देखने के लिए अपना एक अलग नज़रिया बना सकते हैं. पर आप वह करते नहीं हैं. क्योंकि आप एक तो अपनी सुविधाएं नहीं छोड़ सकते और दूसरे वह वर्ग जो आपको सुविधाएं उपलब्ध कराता है, उसके मानसिक रूप से भी ग़ुलाम हो गए हैं.
यह जो आपकी दिमाग़ी ग़ुलामी है, इससे छूटिए. उनके प्रचार तंत्र से आक्रांत मत होइए. यह समझिए कि उनका प्रचारतंत्र उनके फ़ायदे के लिए है, आपके फ़ायदे के लिए नहीं. वह हर हवा का रुख़ वैसे ही मोड़ने की पूरी कोशिश करते हैं, जैसे उनका फ़ायदा हो सके. अगर उनका न हो तो उनके जैसे किसी का हो जाए. सांपनाथ न सही, नागनाथ आ जाएं. नागनाथ के आने में आपको ऐसा भले लगता हो कि सांपनाथ का कोई नुकसान हुआ, पर वास्तव में सांपनाथ का कोई नुकसान होता नहीं है. यह जो झैं-झैं आपको दिखती है, वह कोई असली झैं-झैं नहीं है. असल में नागनाथ और सांपनाथ के बीच भी वही होता है जो बड़े परदे पर नायक और खलनायक के बीच होता है. ज़रा ग़ौर फ़रमाइए न, सांपनाथ का ऐसा कौन सा पारिवारिक आयोजन होता है, जिसमें नागनाथ शामिल नहीं होते हैं और नागनाथ का ऐसा कौन सा काम होता है जिसमें  सांपनाथ की शिरकत न हो?
फिर? भेद किस बात का है? असल में यह भेद नहीं, भेद का नाटक है. अगर वे ऐसा न करते तो अब तक कब के आप यह समझ गए होते कि बिना पूंजी के भी चुनाव जीता जा सकता है और ज़रूरी नहीं कि बड़ी-बड़ी पार्टियों के ही माननीयों को जिताया जाए, आप अपने बीच के ही लोगों को चुनाव लड़ा-जिता कर सारे सदनों पर अपने जैसे लोगों का कब्ज़ा बनवा चुके होते. भारत की व्यवस्था से पूंजी, परिवारवाद, क्षेत्रवाद और जाति-धर्म का खेल निबटा चुके होते. लेकिन आप अभी तक ऐसा नहीं कर सके. क्यों? क्योंकि आपके दिमाग़ में यह बात इस तरह बैठा दी गई है कि जनतंत्र में जीत धनतंत्र की ही होनी है, कि आप आज अचानक चाहें भी तो उसे अपने दिमाग़ से निकाल नहीं सकते हैं. अभी जो मैं यह कह रहा हूं, शायद आपको ऐसा लग रहा हो कि इसका दिमाग़ चल गया है.
लेकिन नहीं दोस्तों, आप अचानक कलम छोड़ कर जूता निकाल लेते हैं, तब आपकी मनःस्थिति क्या सामान्य होती है? नहीं. यह आपको इसीलिए करना पड़ता है क्योंकि कलम को आपने सिर्फ़ रोजी-रोटी से जोड़ लिया है. यह आपके भीतर एक तरह का अपराधबोध भी पैदा करता है, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी न निभा पाने की और अपराधबोध आपको एक दिन उबलने के लिए मजबूर कर देता है. यह सिर्फ़ शोषण-दमन की पीड़ा नहीं है जो जूते के रूप में उछलती है, यह स्वयं अपनी ही आत्मा के प्रति धिक्कार की भी पीड़ा है, जो दूसरों के साथ-साथ अपने पर भी उछलती है और यह अनियंत्रित उछाल कोई सही दिशा नहीं ले सकती. इसका तो उपयोग वही अपने हित में कर लेंगे जिनके ख़िलाफ़ आप इसे उछाल रहे हैं. क्योंकि उनके पास एक सुनियोजित तंत्र है, जो हारना जानता ही नहीं. वह हर हाल में जीतने के लिए प्रतिबद्ध है. साम-दाम-दंड-भेद सब कुछ करके. दो सौ वर्षों से चली आ रही भारत की आज़ादी की लड़ाई ऐसे ही केवल बीस वर्षों में हाइजैक कर ली गई. इसके पीछे कारण कुछ और नहीं, केवल ऊर्जा का अनियंत्रित प्रवाह था.
अकसर होता यह है कि आपने कुछ लिखा और अपनी ज़िम्मेदारी पूरी मान ली. अपने पाठक को शंकाएं उठाने और तर्क़ करने का तो आप कोई मौक़ा देते ही नहीं. उसे वह मौक़ा दीजिए. यह मौक़ा उसे भी दें जो आपका पाठक-दर्शक या श्रोता नहीं है. जो किसी का भी पाठक होने लायक तक नहीं है. थोड़ा निकलिए दीन-दुनिया में. मिलिए ऐसे लोगों से जिनसे मिलना आपको ज़रा निम्न कोटि का काम लगता है. अगर आप एक दिन में एक व्यक्ति से भी आमने-सामने का संपर्क करेंगे तो यह न सोचें कि वह संपर्क केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित रहेगा. याद रखें, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी.  यह रास्ता थोड़ा लंबा ज़रूर है, पर अंतहीन नहीं है. और ख़याल रखें, ज़िन्दगी का कोई शॉर्टकट नहीं होता. शॉर्टकट तो हमेशा मौत का ही होता है. अगर शॉर्टकट के फेर में पड़ेंगे तो फिर से वही जलालत झेलनी होगी. लड़ाई हाइजैक हो जाएगी. सिर्फ़ चेहरे बदल जाएंगे, व्यवस्था वही बनी रहेगी.
इसलिए कहीं भी अकेले-अकेले जूते चलाने की ग़लती न करें. अगर दुनिया के मजदूर-किसान यानी असली फोर्थग्रेडिए इकट्ठे नहीं हो सकते तो कोई बात नहीं, पर कम से कम भारत के तो सारे चिरकुट एक हो जाएं. चुनाव का समय भी वस्तुतः देश के सारे चिरकुटों की सोच की एकता प्रकट करने का एक मौक़ा होता है. यह क्यों भूलते हैं कि 19वीं सदी के आरंभ तक इस देश का आम आदमी चुनाव के बारे में जानता भी नहीं था. और तब जब उसे इसके बारे में पता भी चला तो माननीयों के चयन में उसकी भागीदारी नहीं थी. सिर्फ़ माननीय ही चुनते थे माननीयों को. लेकिन अब माननीयों को वह सिर्फ़ चुन ही नहीं रहा है, उनकी मजबूरी बन चुका है. यह काम कोई एक दिन में नहीं हुआ है. क़रीब सवा सौ साल लगे हैं इतिहास को बदलने में. यह कोई एनसीआरटी की किताब वाला इतिहास नहीं था, जिसे च्विंगम चबाते-चबाते जब चाहे बदल दिया जाए. यह असली इतिहास है. इसके बदलने में कई बार हज़ार-हज़ार साल भी लग जाते हैं.
जानकारी का अधिकार अभी तक आपके पास नहीं था, पर अब है. यह आपको मिल सके इसके लिए कितना संघर्ष करना पड़ा, यह आप जानते ही हैं. थोड़े दिन और संघर्ष के लिए तैयार रहिए, आपको इन जिन्नों को वापस उसी बोतल मे भेजने का अधिकार भी मिलने वाला है. अभी यह विकल्प भी आपके सामने आने वाला है कि जो लोग मैदान में दिख रहे हैं उनमें अगर आपको कोई पसन्द नहीं है तो आप यह भी ईवीएम में दर्ज करा आएंगे. टीएन शेषन ने अगर यह सोचा होता कि भारत की चुनाव प्रक्रिया को बदलना अकेले उनके बस की बात नहीं है तो क्या होता? क्या आज यह सोचा जा सकता था कि बिना बूथ कैप्चरिंग के भी चुनाव हो सकता है. लेकिन नहीं उन्होंने आलोचनाओं को बर्दाश्त करते हुए अपनी ख़ब्त को ज़िन्दा रखा और आज यह संभव हो गया. ऐसे ही एक दिन नागनाथ-सांपनाथ से मुक्ति भी संभव दिखेगी. वह भी शांतिपूर्वक. लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब आप उतावली में न आएं. इस दुनिया को धीरे-धीरे बदलने की कोशिश करें. इसके पहले कि बड़े बदलाव के लिए कोई प्रभावी कदम उठाएं चेतना के अधिकतम दिये जला लें. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो आपकी कुर्बानी भी वैसे ही हाइजैक हो जाएगी जैसे मंगल पान्डे, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला ख़ां, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, शचीन्द्रनाथ सान्याल और उधम सिंह की कुर्बानी हाइजैक हो गई. या फिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तरह आप ख़ुद ही हाइजैक कर लिए जाएंगे.

इसके विपरीत, चेतना का एक दिया अगर आप जलाएंगे तो वह अपने जैसे हज़ार दिये जला देगा. उन हज़ार दियों से हज़ार हज़ार दिये जल जाएंगे. फिर जो जूतम-पैजार शुरू होगी, वह चाहे किसी भी रूप में हो, उसे रोकना या हाइजैक कर पाना किसी माननीय के बस की बात नहीं होगी.  आख़िर एक न एक दिन तो नासमझी इस दुनिया से विदा होनी ही है, तो आज से ही हम इस महायज्ञ में हिस्सेदार क्यों न हो जाएं. बस अपने संपर्क में आने वाले हर शख़्स को यह समझाने की ज़रूरत है कि एक बोतल, एक कम्बल, एक सौ रुपये के लिए अगर आज तुमने अपने पास का खड़ाऊं बर्बाद कर दिया, झूठे असंभव किस्म के प्रलोभनों में अगर आज तुम फंस गए, तो उम्र भर तुम्हें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी. जाति-धर्म-क्षेत्र-भाषा के जाल में फंसने जैसा महापाप अगर आज तुमने किया तो इसका प्रायश्चित तुम्हारी कई पीढ़ियों को करना पड़ेगा. इसलिए सिर्फ़ इस पाप से बचो. निकालो अपना-अपना खड़ाऊं और दे मारो उन माननीयों के मुंह पर जो आज तक तुम्हें भांति-भांति की निरर्थक बातों से बहकाते रहे हैं. मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखा कर जलालत की भेंट देते रहे हैं.  तो भाई, अब ताक क्या रहे हैं निकालिए और दे मारिए अपना खड़ाऊं-जूता-चप्पल-चट्टी ... जो कुछ भी है.....पर ज़रा देख के .. ज़रा ध्यान से..  एक साथ .. एक तरफ़... ताकि असर हो. ऐसा कि ......

(दोस्तों अथातो जूता जिज्ञासा की तो यह इति है, पर मुझे पूरा विश्वास है कि जूता कथा अब शुरू होगी और उसे लिखेंगे आप.... अपने-अपने ....................

अथातो जूता जिज्ञासा-31

ओम क्रांति: क्रांति: क्रांति: ओम

Friday, 24 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-31

तो अब बात उस खड़ाऊं की जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी थी और जिसकी पहचान अब आप भूल गए हैं, या फिर पहचान कर भी उससे अनजान बने हुए हैं. यह भी हो सकता है कि आप उसे पहचान कर भी अनजान बने हों. इसकी एक वजह तो आपका आलस्य हो सकता है और दूसरी आपमें इच्छाशक्ति की भयावह कमी भी. अपनी इसी कमज़ोरी की वजह से आप तब वाह-वाह तो कर रहे हैं जब दूसरे लोग उल्टे-सीधे जूते परम माननीयों पर फेंक रहे हैं, लेकिन ख़ुद अपने हाथों में मौजूद खड़ाऊं का उपयोग करने से बच रहे हैं. मुझे मालूम है कि आप वह जूता भी नहीं चला सकेंगे. आख़िर आप बुद्धिजीवी हैं. बुद्धिजीवी कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े करता है. असल बुद्धिजीवी तो सारा तूफ़ान चाय की एक प्याली में उठाता है और चाय के साथ ही उसे थमने के लिए मजबूर भी कर देता है.

आजकल तो चाय की प्याली की भी ज़रूरत नहीं है. आज का बुद्धिजीवी तो एक ब्लॉग बनाता है और ब्लॉगे पे बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर देता है. ब्लॉग पर ही वह ख़ुश हो लेता है और ब्लॉग पर ही नाराज हो लेता है. कभी इस बात पर तो कभी उस बात पर. कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों नहीं देता है. कभी इस बात पर कि कोई ऐसी गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई वैसी गाली क्यों देता है. बड़े से बड़ा बखेड़ा खड़ा करने के लिए भी उसे कहीं दूर नहीं जाना पड़ता है. वह घर बैठे अपने पीसी या लैपटॉप पर ही सब कुछ कर लेता है. आम तौर पर कमेंट के बक्से में और बहुत हुआ तो एक पोस्ट मार के. कलिए ग़नीमत है, कम से कम इसकी बात दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे सौ-पचास लोगों तक जाती तो है, पहले तो बहुत बड़े-बड़े कवि और विद्वान विचारक लोग 15 बाई 18 के कमरे में ही सोफे पर बैठ के बहुत बड़ी-बड़ी गोष्ठियां कर लेते थे. घर में बैठी उनकी बीवी को पता नहीं चलता था, लेकिन पड़ोसी को पता नहीं चलता था, लेकिन 100 कॉपी छपने वाली पत्रिका में और लेखक संघ के कार्रवाई रजिस्टर में ऐतिहासिक क्रांति की ऐसी-तैसी हो चुकी होती थी. थोड़े दिनों में ऐसे ही लोग जनकवि घोषित कर दिए जाते थे. ये महान लोग घुरहू पर कविता लिखते थे और बेचारे घुरहू को कभी पता ही नहीं चल पाता था. अगर पता चल भी गया तो वह यह तो कभी समझ ही नहीं पाता था कि उसके बारे में यह जो लिखा गया है, उसका मतलब क्या है.

असल बुद्धिजीवी तो है ही वही जो ड्राइंग रूम में बैठे-बैठे फ्रांस की रक्त क्रांति से लेकर बोल्शेविक और 1857 तक सब कुछ कर देता है और बच्चे के एडमिशन के लिए बिना किसी रसीद के 50 हज़ार का डोनेशन भी दे आता है. वह 30 रुपये किलो आलू भी ख़रीद लेता है, 60 रुपये किलो दाल भी ख़रीद लेता है, ट्रेन में एक बर्थ के लिए टीटीई को दो-तीन सौ रुपये एक्स्ट्रा भी दे देता है और मन मसोस कर ब्लैक में गैस का सिलिंडर भी ले लेता है. यह अलग बात है कि यह सब करते हुए वह झींकता भी रहता है. हर बार वह गाली देता है - व्यवस्था को, व्यवस्था के कर्णधारों को, भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने वाली आम जनता को, यहां तक कि देश को भी. वह सबको भ्रष्ट और निकम्मा बताता है. और मामूली असुविधाओं से बचने के लिए भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक भी हुआ रहता है. वह शोषण के ख़िलाफ़ बात भी करता है और दमन को बर्दाश्त भी करता है.

असल बुद्धिजीवी वह है जो पहले परिवारवाद के ख़िलाफ़ एकजुट होने की बात करता है और इसके ख़ात्मे के लिए साम्प्रदायिक ताक़तों के साथ ले लेता है. पहले वह तोप सौदे में घोटाले की बात करता है और उसके सबूत जेब में रखता है. इस वादे के साथ कि अभी नहीं, पहले प्रधानमंत्री बनाओ, तब दिखाउंगा. गोया सुबूत न हुआ, दुलहिन का मुंह हो गया कि घुंघटा तभी उठेगा.... और प्रधानमंत्री बन जाने के बाद सचिवालय के कब्रिस्तान से मंडल का जिन्न निकाल देता है. वह जिन्न ठहरा भारतीय जिन्न. हनुमान जी से प्रेरणा ले लेता है. लेकिन हनुमान जी तो लंका जलाए थे, वह भारत ही जलाने लगता है.

इसके बाद बुद्धिजीवियों की दूसरी जमात कमंडल उठा लेती है और घूमने लगती है पूरा देस. चिल्ला-चिल्ला के .. राम लला हम आएंगे... आदि-आदि. अरे भाई जब आना होगा आना. लेकिन नहीं वे केवल चिल्लाते हैं और रामलला के पास तो नहीं लेकिन चीखते-चीखते एक दिन सत्ता में ज़रूर पहुंच जाते हैं. लेकिन ना, तब एक बार फिर मामला गड़्बड़ा जाता है. अब परिवारवाद के बजाय सांप्रदायिक ताक़तों का उभार रोकने की ज़रूरत महसूस होने लगती है. रोकी जाती है और समर्थन की पूरी धारा बदल जाती है. देश में प्रगतिशील विचारधारा की स्थापना की जाती है उसी परिवारवाद के एक बेज़ुबान पोषक तत्व को सत्ता का मठाधीश बनाकर. जो सिर्फ़ राजकुमार के लिए राजदंड बचाए रखने के अलावा और कुछ भी नहीं करता. कोई नए तरह का नहीं, यह बिलकुल बर्बर किस्म का सामंतवाद है मित्रों. इसे पहचानिए. नागनाथ और सांपनाथ का यह खेल बन्द करना अब अनिवार्य हो गया है. और यक़ीन मानिए, यह बन्द होगा, उसी खड़ाऊं से जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी है. बशर्ते आप उसकी पवित्रता को समझें, उसकी अनिवार्यता को महसूस करें और जानें उसकी ताक़त को. उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आएं जो आपको यह बता रहे हैं कि इससे कुछ नहीं होने वाला है. आपको ऐसा बताने के पीछे उनका बड़ा गहरा स्वार्थ है. उन्होंने सीधे-सादे अनपढ़ और गंवार लोगों को सुला रखा है दारू या मामूली लालच के नशे में. उनके परम पवित्र और अनमोल खड़ाऊं वे ख़रीद लेते हैं सौ-पचास रुपये में और आपको सुला देते हैं आलस्य और हताश के नशे में. आपकी खड़ाऊं वे बेकार कर देते हैं आपके आलसीपने की प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाकर. वे हर वर्ग की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं. लेकिन याद रखें उनके सारे कमीनेपन की सारी ताक़त सिर्फ़ तब तक है जब तक कि आप अपने खड़ाऊं की ताक़त पहचान नहीं जाते और इसकी पवित्रता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं होते. खड़ाऊं को तो अब आप पहचान ही चुके हैं!

चरैवेति-चरैवेति.....   

अथातो जूता जिज्ञासा-30

Thursday, 23 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-30

यक़ीन मानें आम जनता जो  जूता चला रही है, असल में वह जूता है ही नहीं. यह तो वह खड़ाऊं है जो भगवान राम ने दिया था भरत भाई को. भरत भाई ने यह खड़ाऊं अपने लिए नहीं लिया था, उन्होंने यह खड़ाऊं लिया था आम जनता के लिए. इसीलिए उनके समय में उस खड़ाऊं का इस्तेमाल उनके मंत्रियों, अफ़सरों और निजी सुरक्षाकर्मियों ने नहीं किया. यही वजह थी जो ख़ुद भरत राजधानी के बाहर कुटी बना कर रहते रहे और वहां से राजकाज चलाते रहे. जनता की व्याकुलता की वजह इस दौरान राम की अनुपस्थिति भले रही हो, पर शासन या व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी कतई नहीं थी. और सबसे बड़ी बात तो यह कि अधिकारों के उस खड़ाऊं में भरत के लिए कोई रस भी नहीं था. उनकी रुचि अगर थी तो उस ज़िम्मेदारी में जो राम की अनुपस्थिति के कारण उन पर आ पड़ी थी.

जबकि अब के शासकों की रुचि अपनी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी में कभी ग़लती से भी दिख जाए तो यह एक असामान्य बात मानी जाती है. क्योंकि सामान्यतया उनकी कुल रुचि केवल उस अधिकार में है जो उन्होंने जनता को बहला-फुसला कर या डरा-धमका कर अपने ही जैसे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से छीना है. नतीजा यह है कि आपके जनप्रिय नेताओं के बंगलों के बिजली-पानी-टेलीफोन जैसी सुविधाओं के बिल ही हर महीने लाखों में होते हैं. यह सब कहीं और से नहीं, आपकी ही जेब से आता है. हवाई सैर, अपनी ही नहीं बाल-बच्चों की अय्याशी का इंतज़ाम, पांचसितारा जीवनशैली के ख़र्चे ... आदि सब आपकी ही जेब से निकलते हैं.  इस पर ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह सब आप जान चुके हैं.

क्या आज के राजनेता उतनी ही आसानी से खड़ाऊं लौटा देने वाले हैं, जितनी आसानी से भरत ने लौटा दिया था? भरत ने जिस खड़ाऊं को ख़ुद अपने सिर पर रखा, वह आज के राजनेताओं के गुर्गों के पैरों में है और उसका इस्तेमाल आम जनता यानी आपको रौंदने के लिए किया जा रहा है.   बहुत दिनों बाद इस बात को जनता ने समझ लिया है और इसीलिए अब वह इस खड़ाऊं के इस्तेमाल के लिए बेचैन हो उठी है. उसने देख लिया है कि अपने लिए छोड़ी गई खड़ाऊं का सदुपयोग जब तक वह स्वयं नहीं करेगी तब तक उसका प्रयोग उसके ही सिर पर होता रहेगा. कभी महंगाई के रूप में, तो कभी छोटी-छोटी रोज़मर्रा इस्तेमाल की चीज़ों की अनुपलब्धता और कभी भ्रष्टाचार के रूप में. इसीलिए अब  उसे जहां कहीं भी मौक़ा मिल रहा है और जैसे ही वह ज़रा सा भी साहस जुटा पा रही है, तुरंत खड़ाऊं उठा रही है और दे दनादन शुरू हो जा रही है, अपने परम प्रिय नेताओं पर.

लेकिन जैसा कि आम तौर पर होता है बेचैनी में बड़ा जोश होता है. वह आज के इस नए जनता जनार्दन में भी साफ़ तौर पर दिखाई पड़ रहा है. अपने यहां कहावत है - बहुत जोश में लोग होश खो बैठते हैं. यह सही है कि किसी व्यक्ति पर जूता फेंकना उसके प्रति प्रबल विरोध जताने का एक प्रतीकात्मक तरीक़ा है, लेकिन अगर हमें प्रतीकात्मक विरोध ही जताना है, यानी अपनी नाराज़गी ही व्यक्त करनी है तो उसके और भी बहुत तरीक़े हैं. जूता फेंकना इसका इकलौता तरीक़ा नहीं है और न जूता इसका असली रूप ही है. अभी जगह-जगह जूते फेंकने की जो यह हड़बड़ी दिखाई दे रही है, इसकी असली वजह आपको अपने असली खड़ाऊं की सही पहचान न होना है. तो आप अपना हक़ हासिल कर सकें इसके लिए सबसे पहली ज़रूरत यह है कि आप अपने खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान करें. यह जानें कि वह खड़ाऊं कौन सा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए. सच-सच बताइए, क्या आप सचमुच जानना चाहते हैं कि वह खड़ाऊं कौन सा है, कैसा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए? तो बने रहिए इयत्ता के साथ और अपने उस परम पवित्र खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान के लिए इंतज़ार करिए इस अथातो जूता जिज्ञासा की अगली कड़ी का.

अथातो जूता जिज्ञासा-29

Wednesday, 22 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-29

इन समानधर्माओं में सबसे पहला नाम आता है इराकी पत्रकार मुंतजिर अल ज़ैदी का, जिन्होंने ख़ुद को दुनिया सबसे ताक़तवर समझने वाले महापुरुष जॉर्ज बुश पर जूतास्त्र का इस्तेमाल किया. इसकी आवश्यकता कितने दिनों से महसूस की जा रही थी और कितने लोगों के मन में यह हसरत थी, यह बात  आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि यह जूता चलते ही दुनिया भर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. भले ही कुछ लोगों ने दिखावे के तौर पर शिष्टाचारवश इसकी भर्त्सना की हो, पर अंतर्मन उनका भी प्रसन्न हुआ. बहुत लोगों ने तो साफ़ तौर पर ख़ुशी जताई. गोया करना तो वे ख़ुद यह चाहते थे, पर कर नहीं सके. या तो उन्हें मौक़ा नहीं मिला या फिर वे इतनी हिम्मत नहीं जुटा सके. सोचिए उस जूते की जिसकी क़ीमत चलते ही हज़ारों से करोड़ों में पहुंच गई.

असल में ज़ैदी ने यह बात समझ ली थी कि अब अख़बार तोप-तलवार के मुकाबले के लिए नहीं, सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए निकाले जाते हैं. उन्होंने देख लिया था कि अख़बार में बहुत दिनों तक लिख-लिख कर, टीवी पर बहुत दिनों तक चिल्ला-चिल्ला कर बहुतेरे पत्रकार तो थक गए. मर-खप गए और कुछ नहीं हुआ. वह समझ गए थे कि कलम में अब वह ताक़त नहीं रही कि इंकलाब ला सके. इंकलाब की बात करने वाली कलमें भी अब सिर्फ़ पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार बनाने में लग गई हैं. कलमें अब कलमें नहीं रहीं, वे मजदूरी का औजार हो गई हैं. इससे भी नीचे गिर कर कई कलमें तो दलाली का हथियार हो गई हैं. ऐसी कलम को बहुत दिनों तक घिस-घिस कर निब और काग़ज़ बर्बाद करने से क्या फ़ायदा. तो बेहतर है कि इसकी जगह जूता ही चलाया जाए.

यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि उनका जूता ज़ोरदार ढंग से चल गया. असल में इस जूते ने चलते ही उन तमाम मजबूरों-मजलूमों को आवाज़ दी जो सीनियर और जूनियर दोनों बुश लोगों के ज़माने में बेतरह कुचले गए. यही वजह थी जो इस जूते ने चलते ही अपनी वो क़ीमत बनाई जो हर तरह से ऐतिहासिक थी. इतिहास में कभी कोई जूता चलने के बाद उतनी क़ीमत में नहीं बिका होगा, जितनी क़ीमत में वह जूता बिका. भगवान रामचन्द्र के उस खड़ाऊं की भी कोई प्रतिमा कहीं नहीं बनाई गई, जिसने भरत जी की जगह 14 वर्षों तक अयोध्या का राजकाज संभाला.  मैंने हाल ही में कहीं पढ़ा था कि किसी जगह उस जूते की प्रतिमा स्थापित की गई है और बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर आने वाले दिनों में उसकी पूजा शुरू कर दी जाए.

वैसे भी ऐसे जूते की पूजा क्यों न की जाए, जो बहुत बेजुबानों को आवाज़ दे और बहुत लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने. मसलन देखिए न, उस जूते ने कितने और लोगों को तो प्रेरित किया जूते ही चलाने के लिए. लन्दन में चीन के प्रधानमंत्री पर जूता चला, भारत में गृहमंत्री पर जूता चला और इसके बाद यह जूता केवल पत्रकारों तक सीमित नहीं रहा. कलम छोड़कर जूते को हथियार बनाने वाले सिर्फ़ पत्रकार ही नहीं रहे. पत्रकारों के बाद पहले तो इसे उन्हीं पार्टी कार्यकर्ताओं ने अपना हथियार बनाया जो अब तक अपने-अपने नेताओं के आश्वासनों पर जीते आ रहे थे आम जनता की तरह, पर आख़िरकार महसूस कर लिया कि नेताजी के आश्वासन तो नेताजी से भी बड़े झूठ निकले. तो पहले उन्होंने जूता चलाया. फिर आम जनता, जो बेचारी बहुत दिनों से जूता चलाने का साहस बटोर रही थी, पर घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों और नाना प्रकार के दबावों के कारण वह ऐसा कर नहीं पा रही थी, उसने भी जूता उठा लिया.

जब तक पत्रकार जूता उठा रहे थे, या पार्टियों के कार्यकर्ता जूते चला रहे थे, तब तक बात और थी. लेकिन भाई अब यह जो जूता बेचारी आम जनता ने उठा लिया है, वह कोई साधारण जूता नहीं है. इस जूते के पीछे बड़े-बड़े गुन छिपे हुए हैं. इसके पीछे पूरा इतिहास है. आम जनता ने जूता उठाने के पहले जूतावादी संस्कृति का पूरा-पूरा अनुशीलन किया है. उसने जूते की बनावट, उसकी उपयोगिता और उसके धर्म को ठीक से समझा है. सही मायने में कहें तो सच तो यह है कि उसने जूता संस्कृति का सम्यक अनुशीलन किया है. तब जा कर वह इस निष्कर्ष तक पहुंची है कि भाई अब तो जूता जी को ही उठाना पड़ेगा. जनता का यह जूता वही जूता नहीं है, जो अब तक उसी पर चलता रहा है. यह जूता सत्ता के जूते से बहुत भिन्न है. और एक बात और, इस जूते के चलने का तो यह सिर्फ़ श्रीगणेश है. यह इसकी इति नहीं है. यह जूता एक न एक दिन तो चलेगा ही यह बात बहुत पहले से सुनिश्चित थी, लेकिन अब यह रुकेगा कब यह तय कर पाना अभी बहुत मुश्किल है.

आगे-आगे देखिए होता है क्या.....

अथातो जूता जिज्ञासा-28

Tuesday, 21 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-28

और अब बात आधुनिक भारत में जूता चिंतन की. निराला जी से थोड़े पहले उनके ही धातृ शहर इलाहाबाद में हुए एक अकबर इलाहाबादी साहब. अपने ज़माने के बहुत उम्दा शायरों में गिने जाते हैं वह और अगर क़रीने से देखा जाए तो बिलकुल आधुनिक सन्दर्भों में जूता चिंतन की शुरुआत ज़नाब अकबर इलाहाबादी साहब से ही होती है. यह अलग बात है कि उनके पूर्वजों को जूते चलाने का भी शौक़ रहा हो, पर जहां तक मैं जानता हूं, अकबर साहब के शौक़ सिर्फ़ जूते पहनने तक ही सीमित थे. उन्होंने कभी भी जूते चलाने में किसी तरह की हिस्सेदारी नहीं की. ख़ास कर जूते बनाने का शौक़ तो उनके पूर्वजों को भी नहीं था. इसके बावजूद पढ़े-लिखे लोगों के बीच जूते पर केन्द्रित उनका एक जुमला अत्यंत लोकप्रिय है. जब भी कोई ऐसी-वैसी बात होती है, भाई लोग उन्हें फट से कोट कर देते हैं. जूते पर केन्द्रित उनका शेर है :

बूट डासन ने बनाया मैंने एक मज़्मूं लिखा

मुल्क में मज़्मूं न फैला और जूता चल पड़ा.

ख़ुद मुझे भी यह शेर बेहद पसन्द है. पर इस शेर के साथ एक दिक्कत है. इस दिक्कत की वजह शायद यह है कि शिल्प के स्तर पर वह ज़रूर थोड़े-बहुत पश्चिमी मानसिकता से प्रभावित रहे होंगे. जहां साहित्य के उम्दा होने की बुनियादी शर्त उसके दुखांत होने को माना जाता है.  जहां यथार्थ के नाम पर हताशावादी स्वर ही प्रमुख है. यह आशा तक नहीं छोड़ी जाती कि शायद आगे के लोग ही कोई रास्ता निकाल सकें. शायद इसीलिए उन्हें शिक़ायत हुई जूते से. बिलकुल वैसे ही जैसे हार जाने के बाद एक नेताजी को शिक़ायत हुई जनता से. पहले तो विशुद्ध भारतीयता की बात करके सत्ता में आई उनकी पार्टी ने पांच साल तक सत्ता सुख ले लेने के बाद यह तय किया कि ये अंट-शंट टाइप के अनपढ़-देहाती कार्यकर्ताओं से पिंड छुड़ाया जाए और इनकी जगह स्मार्ट टाइप के इंग्लिश स्पीकिंग ब्रैंड मैनेजरों को लाया जाए. फिर उनकी ही सलाह पर उन्होंने एलेक्शन की कैम्पेनिंग की. यहां तक कि नारे भी उनके ही सुझावों के अनुसार बने. लेकिन चुनाव का रिज़ल्ट आने के बाद पता चला कि जनता तो फील गुड और इंडिया शाइनिंग का मतलब ही नहीं समझ सकी. तब बेचारे खिसिया कर कहे कि काम करने वाली सरकार इस देश की जनता को नहीं चाहिए.

शायद यही वजह है कि इस बार महंगाई चरम पर होने के बावजूद उनकी पार्टी ने चुनाव के दौरान एक बार भूल कर भी महंगाई का जिक्र नहीं किया. शायद उन्होंने तय कर लिया है कि आगे अगर सत्ता में आए भी तो महंगाई-वहंगाई जैसे फ़ालतू के मुद्दों पर कोई काम नहीं करेंगे. यह अलग बात है कि इसके पहले भी उन्होंने आम जनता के लिए क्या किया, यह गिना पाना ख़ुद उनके लिए ही मुश्किल है. हालांकि वह कौन है जिसने उनके राजकाज में गुड फील किया और किधर की इंडिया शाइन करते हुए दिखी, इसे आम भारतीय नहीं जानता.

वैसे भी आम भारतीय यह बात कैसे जान सकता है! बेचारा वह तो रहता है भारत में और इधर बात होती है इंडिया की. पूरी तरह भारत में ही रहने वाले और उसमें ही रचे-बसे आम आदमी को इंडिया कैसे दिखे? वैसे यह सच है कि भारत के ही किसी कोने में इंडिया भी है, पर यह जो इंडिया है उसमें मुश्किल से 20 परसेंट लोग ही रहते हैं. वही इसे जानते हैं और वही इसे समझते हैं. इस इंडिया में होने वाली जो चमक-दमक है, वह भारत वालों को बस दूर से  ही दिखाई देती है और भारत वाले इसे देखते भी बड़ी हसरत से हैं. उसके सुख भारत वालों के लिए किसी रहस्यलोक से कम नहीं हैं. ठीक इसी तरह इंडिया वालों के लिए भारत के दुख भी कोई रुचि लेने लायक चीज़ नहीं हैं. वे समझ ही नहीं पाते कि ये भूख और ग़रीबी कौन सी चीज़ हैं और बेकारी क्यों होती है. उनके लिए यह समझना लगभग असंभव है कि महंगाई से परेशान होने की ज़रूरत क्या है. भाई जो चीज़ एक साल पहले 10 रुपये की मिलती थी, वह सौ रुपये की हो गई, तो इसमें परेशान होने जैसी क्या बात है? निकालो जेब से 100 रुपये और ले लो. सबसे मुश्किल और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत वालों के भेजे में यह आसान सी बात घुसती ही नहीं है.

बहरहाल, कुछ ऐसी ही दिक्कत अकबर इलाहाबादी साहब के साथ भी हुई लगती है. अब सोचिए मज़्मूं कैसे चलेगा? उसके पास कोई हाथ-पैर तो होते नहीं और चलने के लिए पैर बहुत ज़रूरी हैं. तो जब मज़्मूं के पास पैर होते ही नहीं तो वह चलेगा कैसे? तो जाहिर सी बात है कि मज़्मूं चलने के लिए लिखे ही नहीं जाते. बल्कि इसे बाद के हिन्दी के आलोचकों-कवियों ने ज़्यादा अच्छी तरह समझा. वे उसे मज़्मूं मानते ही नहीं जो चल निकले. आज हिन्दी में मज़्मूं वही माना जाता है जिस पर लोकप्रियता का आरोप न लगाया जा सके. इस आरोप से किसी भी मज़्मूं को बचाने की शर्त यह है कि उसे ऐसे लिखा जाए कि वह किसी की समझ में ही न आ सके. इसके बावजूद यह ध्यान भी रखा जाता है कि कोई यह न कह सके कि भाई आपका तो मज़्मूं जो है, वो अपंग है. तो इसके लिए मज़्मूं को ये कवि-लेखक-आलोचक लोग आपस में ही एक से दूसरे की गोद में उठाते हुए इसके चल रहे होने का थोड़ा सा भ्रम बनाए रखते हैं. वैसे ही जैसे माताएं शिशुओं को अपनी गोद में उठाए हुए ख़ुद चलती रहती हैं और मंजिल पर पहुंच जाने के बाद शिशु ये दावा कर लेते हैं कि वे चले.

इसके ठीक विपरीत जूता या अकबर साहब के शब्दों में कहें तो बूट बनाया ही जाता है चलने के लिए. आप चाहें तो यूं भी कह सकते हैं कि बूट बनाया जाता है पैरों के लिए और पैर होते हैं चलने के लिए. अब जो चीज़ पैरों का रक्षा कवच बन कर चल सकती है, वह हाथों में हो तो भी चलेगी ही. क्योंकि चलन उसकी फितरत है. एक और मार्के की बात इसमें यह भी है कि यह रक्षा उसी की करती है जिसके पास होती है. मतलब यह कि जो इसे चलाता है. यह उसकी मर्जी पर निर्भर है कि वह इसे कैसे चलाए. चाहे तो पैरों से और चाहे तो हाथों से चला ले. बस इसी बात को कालांतर में अकबर साहब के कुछ समानधर्माओं ने समझ लिया और वे शुरू हो गए.

अथातो जूता जिज्ञासा-27

Monday, 20 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-27

अब मध्यकाल से निकल कर अगर आधुनिक काल में आएं और जूतोन्मुखी रचनाधर्मिता की बात करें तो चचा ग़ालिब का नाम सबसे पहले लेने का मन करता है. एक तो सूफ़ियाना स्वभाव (तमाम तरह के दुराग्रहों को टाटा बाय-बाय वह पहले ही कह चुके थे) और दूसरे दुनियादारी की भी बेहतर समझ (ख़रीदारी कर के नहीं सिर्फ़ गज़रते हुए देखा था उन्होंने दुनिया के बाज़ार को), सच पूछिए तो दुनिया की हक़ीक़त ऐसा ही आदमी क़ायदे से जान पाता है. जूते की इस सर्वव्यापकता और सर्व शक्तिसम्पन्नता को उन्होंने बड़े क़ायदे से समझा और साथ ही  उसे शहद में भिगोने की कला भी उन्हें आती है. ऐसा लगता है कि रैदास और तुलसी द्वारा क़ायम की गई परंपरा को उन्होंने ही ठीक से समझा और इन दोनों को वह साथ लेकर आगे बढ़े. कभी-कभी तो उनके यहां सूर भी दिखाई दे जाते हैं.

यह शायद सूर का, या कि सूफ़ी संतों का ही असर है जो वह भी ख़ुदा से दोस्ती के ही क्रम को आगे बढ़ाते हैं, यह कहते हुए - या तो मुझे मस्जिद में बैठकर पीने दे, या फिर वो जगह बता जहां पर ख़ुदा न हो. और ग़ालिब भी एक को मार कर दूसरे को छोड़ने वाले छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं हैं. वह भी अपने दूसरे पैर का जूता निकालते हैं, बिलकुल कबीर और रैदास की तरह. जब वह कहते हैं :

ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ्र

काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे.

तब उनका मतलब बिलकुल साफ़ है.

दूसरे तो दूसरे, यहां तक कि वे ख़ुद को भी नहीं छोड़ते हैं. उनकी ही एक ग़ज़ल का शेर है:

बने है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता

वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है.

उनके बाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी ख़ूब जूते उछाले. 'क्यों सखि साजन नहि अंगरेज?' जैसे सवाल उठा कर वह ग़ुलामी की भारतीय मानसिकता पर जूते ही तो उछालते रहे हैं. सद अफ़सोस हमें ज़रा सी भी शर्म आज तक नहीं अंग्रेज तो चले गए और कहने को लोकतंत्र भी आ गया, पर आज तक हम न तो लोकतंत्र अपना सके और अंग्रेजियत से ही मुक्त हो सके. निराला ने भी बहुत जूते चलाए और वह भी चुन-चुन कर उन लोगों पर जिन पर उस वक़्त जूते चलाने की हिम्मत करना बहुत बड़ी बात थी. 'अबे सुन बे गुलाब' और 'बापू यदि तुम मुर्गी खाते होते' उनकी इसी कोटि की रचनाएं हैं. वैसे सुनते तो यह हैं कि तुलसीदास पर भी जूते चलाते थे, पर यह काम वह कोई द्वेषवश नहीं, बल्कि श्रद्धावश करते थे. मैंने सुना कि वे सचमुच के जूते तुलसी की तस्वीर पर चलाते थे. एक-दो नहीं, सैकड़ों जूते बरसा देते थे. तब तक चलाते ही रहते थे वे जूते तुलसी पर, जब तक कि ख़ुद थक कर लस्त-पस्त नहीं हो जाते थे.

एक बार किसी आलोचक ने उन्हें यह करते देख लिया तो पूछा कि ऐसा आप क्यों करते हैं. उनका शफ्फाक जवाब था- भाई इसने कुछ छोड़ा ही नहीं हमारे लिखने के लिए. अब हम लिखें क्या?  हालांकि उन्होंने हिंदी साहित्य को ऐसा बहुत कुछ दिया जिसके लिए हिन्दी साहित्य ख़ुद को ऋणी मानता रहे, पर वे उम्र भर यही मानते रहे कि उनका अवदान तुलसी के सामने धेले का भी नहीं है. अब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि निराला जूतेबाज चाहे जितने भी बड़े रहे हों, पर कवि वे निश्चित रूप से बहुत छोटे रहे होंगे. क्योंकि आजकल कई तो ऐसे कवि ख़ुद को तुलसी क्या वाल्मीकि से भी बड़ा रचनाकार मानते हैं, जिन्होंने अभी कुल तीन-चार दिन पहले ही लिखना शुरू किया है. मुझे लगता है कि निराला जी को ज़रूर सीख लेनी चाहिए थी भारत के ऐसे होनहार कवियों से.

थका भी हूं अभी मै नहीं....

अथातो जूता जिज्ञासा-26

Sunday, 19 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-26

यह तो आप जानते ही हैं कि भरत भाई ने भगवान राम की पनही यानी कि खड़ाऊं यहीं मांग ली थी. यह कह कर आपके नाम पर ही राजकाज चलाएंगे. भगवान राम ने उन्हें अपनी खड़ाऊं उतार के दे दी और फिर पूछा तक नहीं कि भाई भरत क्या कर रहे हो तुम मेरे खड़ाऊं का? अगर वह आज के ज़माने के लोकतांत्रिक सम्राट होते तो ज़रा सोचिए कि क्या वे कभी ऐसा कर सकते थे? नहीं न! तब तो वे ऐसा करते कि अपने जब चलते वन के लिए तभी अपने किसी भरोसेमन्द अफ़सर या पार्टी कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री बना देते. छांट-छूंट के किसी ऐसे अफ़सर को जो ख़ुद को कभी इस लायक ही नहीं समझता कि वह देश चलाए. आख़िर तक यही कहता रहता कि भाई देखो! देश चलाने का मौक़ा मेरे हाथ लगा तो यह साहब की कृपा है.

वह निरंतर महाराज और युवराज के प्रति वफ़ादार अफ़सर की तरह सरकार और राजकाज चलाता रहता. अगर कभी विपक्ष या देशी-विदेशी मीडिया का दबाव पड़्ता तो वनवासी साहब के निर्देशानुसार कह देता कि भाई देखो! ऐसा कुछ नहीं है कि मैं कठपुतली हूं. बस तुम यह जान लो कि मैं सरकार अपने ढंग से चला रहा हूं और अपनी मर्ज़ी से भी. यह अलग बात है कि किसी भी मौक़े पर वह सम्राट और युवराज के प्रति अपनी वफ़ादारी जताने से चूकता भी नहीं. क्योंकि यह तो उसे मालूम ही होता कि खड़ाऊं उसके पैर में नहीं, सिर पर है और उसकी चाभी उसके पास नहीं बल्कि साहब के पास है. इसके बाद  जैसे ही उसे आदेश मिलता प्रधानमंत्री की कुर्सी ख़ाली करके चल देता एक किनारे. क्योंकि यह तो उसे पता ही है - साहब से सब होत है, बन्दे ते कछु नाहिं. साहब जब चाहेंगे उसे किसी संस्थान का चेयरमैन बना देंगे और उसके खाने-पीने और रुतबे का जुगाड़ बना रहेगा ऐसे ही.

पर भगवान राम चूक गए. उन्होने राजकाज एक योग्य व्यक्ति को सौंप दिया और वह भी पूरे 14 साल के लिए. नतीजा क्या हुआ? इसके बाद पूरे 14 साल तक  वह सिर्फ राजसत्ता ही नहीं, खड़ाऊं से भी वंचित रहे. नतीजा क्या हुआ कि बेचारे भूल ही गए खड़ाऊं का उपयोग तक करना. 14 साल के वनवास के बाद जब वह दुबारा अयोध्या लौटे और भरत भाई ने पूरी ईमानदारी से उन्हें उनका राजकाज लौटाया तो वह एकदम आम जनता जैसा ही व्यवहार करते नज़र आए. तो बेचारे मिलने के बाद भी झेल नहीं पाए राजदंड और आख़िरकार फिरसे उसे हनुमान जी सौंप कर चलते बने. बोल दिया कि भाई देखो, अब यह सब तुम्हीं संभालो. अपने राम तो चले.

पर हनुमान जी भला कबके खड़ाऊं पहनने और इस्तेमाल करने वाले. इस पेड़ से उस पेड़ तक, और भारत से श्रीलंका तक सीधे उछल-कूद जाने वाले को खड़ाऊं की क्या ज़रूरत? तो वे तो जितने दिन चला सके मुगदड़ से राजकाज चलाते रहे. खड़ाऊं का तो उन्होंने इस्तेमाल ही नहीं किया. उसी खड़ाऊं पर इस घोर कलिकाल में नज़र पड़ी लोकतंत्र के कुछ सम्राटों की तो उन्होंने तुरंत आन्दोलन खड़ा कर दिया. आगे की तो कहानी आप जानते ही हैं.

आज मैं सोचता हूं तो लगता है कि अगर भगवान ने अपनी खड़ाऊं न दी होती और उसके इस्तेमाल के वह आदी बने रहे होते तो क्या यह दिन हमें यानी कि भारत की आम जनता को देखने पड़ते? बिलकुल नहीं. अब भगवान राम तो हुए त्रेता में और इसके बाद आया द्वापर. द्वापर में हुआ महाभारत और वह किस कारण से हुआ वह भी जानते ही हैं. ग़ौर करिएगा कि महाभारत के दौरान भी जो सबसे बड़े योद्धा जी थे, श्रीमान अर्जुन जी, वह जूतवे नहीं उठा रहे थे. युद्ध के मैदान में जाके लग सबको पहचानने कि वह रहे हमारे चाचाजी, वह मौसा जी, वह मामा जी और वह दादा जी. अब बताइए हम कैसे और किसके ऊपर जूता चलाएं. तब सारथी भगवान कृष्ण को उनके ऊपर ज्ञान का जूता चलाना पड़ा. बताना पड़ा कि देखो ये तो सब पहले से ही मरे हुए हैं. तुम कौन होते हो मारने वाले. मारने और बनाने वाला तो कोई दूसरा है. वो तो सामने आता ही नहीं है, और सब मर जाते हैं. पार्टी हाईकमान की तरह. तुमको तो सिर्फ़ जूता हाथ में उठाना ही है. बाक़ी इनका टर्म तो पहले ही बीत चुका है. तब जाके उन्होने जूता उठाया और युद्ध जीता.

लेकिन सद अफ़सोस कि वह भी अच्छे जूतेबाज नहीं थे. उनका जूता भी बहुत दिन चल नही पाया. थोड़े ही दिनों भी वह भी भाग गए हिमालय. इसलिए कलियुग में फिर चाणक्य महराज को बनाना पड़ा एक जूतेबाज चन्द्रगुप्त. चन्द्रगुप्त ने टक्कर लिया कई लोगों से उसी जूते के दम पर चला दिया अपना सिक्का. जब तक उनका जूता चला तब तक देश में थोड़ा अमन-चैन रहा. बन्द हुआ तो फिर जयचन्द जैसे लोग आ गए और विदेश से बुला-बुला के आक्रांता ले आए. चलता रहा संघर्ष. आख़िरकार जब पब्लिक और राजपरिवारों सब पर अंग्रेजों का जूता चलने लगा तो मजबूरन फिर कुछ लोगों को जूता उठाना पड़ा. तब जाके देश स्वतंत्र हुआ. इस तरह अगर देखा जाए तो पूरा इतिहास किसका है भाई? विचारों का? ना. आविष्कारों का? ना. नीति का? ना. धर्म का? ना. आपके ही क्या, दुनिया के पूरे के पूरे इतिहास पर छाया हुआ है सिर्फ़ जूता. अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर कहा जाए कि इतिहास तो जूते से लिखा गया है. यक़ीन न हो देख लीजिए, आज भी जिसके हाथ में सत्ता का जूता होता है, वह जैसे चाहता है वैसे इतिहास को मोड़ लेता है. जब चाहता है किताबें और किताबों के सारे तथ्य बदल देता है. वह जब चाहता है राम के होने से इनकार कर देता है और जब चाहे हर्षद मेहता को महान बता सकता है. वह जब तक चाहे जॉर्ज पंचम के प्रशस्ति गान का गायन पूरे देश से पूरे सम्मान के साथ करवाता रहे और अंग्रेजी को हिन्दुस्तान के राजकाज की भाषा बनाए रखे.

अथातो जूता जिज्ञासा-25

Saturday, 18 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-25

तो साहब कविवर रहीम ने पनही ही कहा था. उन्होंने पानी नहीं कहा था. मेरा ख़याल है कि यह बात अब तक आप समझ गए होंगे. वैसे हिन्दी के हतबुद्धि और कठकरेजी आलोचकों की  तरह इतने साफ़-साफ़ तर्कों के बावजूद अगर आप न ही समझना चाहें तो भी मेरे पास आपको समझाने का एक उपाय है. और वह भी कविवर रहीम के ही शब्दों में. ग़ौर फ़रमाइए:

खीरा सिर ते काटिए, मलियत नमक मिलाय

रहिमन ओछे जनन को चहियत इहे सजाय.

ज़रा सोचिए, इतना कड़ा प्रावधान करने वाले महाकवि रहीम भला पानी की बात क्यों करेंगे? पानी रखने का नतीजा क्या होता है, इसका सबक उन्होंने इतिहास से ले लिया था. ध्यान रहे, वह सिर्फ़ फ़ौजी थे. फ़ौजी शासक नहीं थे. इसलिए पूरे निष्ठुर नहीं हो सकते थे. अगर शासक रहे होते तब तो कवि होकर भी निष्ठुर हो सकते थे. राजनीतिक कवि तो वही होता है जो जब पूरे देश के नौजवान आत्मदाह कर रहे हों, तब अपनी कुर्सी बचाने के जोड़-तोड़ में व्यस्त होता है. पर रहीम ऐसे नहीं थे. वे तो उनमें से थे जो अपना सारा कुछ लुटा कर कहते थे : देनहार कोउ और है, ताते नीचे नैन. अगर राजनीतिक होते हो बात जस्ट उलटी होती. जनता के पैसे से ऐश करते और जनता पर एहसान लादते कि देख बे! धन्य महसूस कर अपने-आपको कि हमने तेरे पैसे से ऐश किया. लेकिन नहीं साहब, वह राजनीतिक नहीं थे और इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें भी एक समय अपने घर से ही निकाल दिया गया.

मैंने देखा तो नहीं, पर सुना है कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें चित्रकूट में एक भड़्भूजे के यहां मजदूरी करनी पड़ी. उन्हीं दिनों उनके किसी परिचित ने भाड़ झोंकते हुए उन्हें पहचान लिया और उसने पूछा कि अरे यह क्या? क्या से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण मसला तो यह था कि कैसे? और उसका जवाब दिया कवि रहीम ने :

चित्रकूट में फिरि रहे, रहिमन राम रमेश

जा पर बिपदा परत है, सोइ आवे एहि देश.

बहुत सारे विद्वान कहते हैं कि रहीम ने यहां चालाकी की है. उन्होने अपनी विपत्ति को राम और रमेश यानी भोलेनाथ तक कि विपत्ति से जोड़ दिया है. बिलकुल वैसे ही जैसे कि आजकल के कवि अपनी विपत्ति को आम जनता की विपत्ति बताने की कोशिश करते हैं. लेकिन मुझे लगता नहीं कि रहीम ने यहां कोई कविसुलभ चालाकी की है. भोलेनाथ के बारे में तो मुझे बिलकुल नहीं पता कि वह चित्रकूट कैसे पहुंचे, लेकिन कविवर रहीम कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे. मेरे जैसे पल्लवग्राही पंडितों की तुलना में पुराणों की उनकी जानकारी निश्चित रूप से बेहतर रही होगी. लिहाजा उनको चाइलेंज करने का दमखम तो मुझमें नहीं है.

रही बात राम की तो वो तो आप भी जानते हैं कि किन परिस्थितियों में वह चित्रकूट पहुंचे थे. आप जानते ही हैं कि वह सिर्फ़ इसीलिए चित्रकूट पहुंचे थे कि उन्होने पनही के बजाय पानी रखा था. उन्होंने पानी रखा था सौतेली मां की जिद और पिता के आदेश का. अगर उस वक़्त उन्होंने पानी रखने के बजाय पनही निकाल लिया होता तो आप समझ सकते हैं कि इतिहास क्या होता? उन्हें वनवासी बनकर चित्रकूट जाने के बजाय अयोध्या का राज मिला होता. पर पता नहीं क्या सोच कर उन्होंने राज नहीं लिया, वनवासी बन गए. शायद वह पानी बचाने में लग गए और पनही भी ख़र्च नहीं करना चाहा उन्होंने. हालांकि पनही भी आख़िरकार उनकी बची नहीं. आपने देखा ही, बाद में किस तरह भरत भाई उनकी पनही भी मांग ले गए. कि दीजिए इसको. अपने तो चले आए, बड़े दिलदार बन के और साथ-साथ पनहियो लिए चले आए. अरे खाली गद्दी छोड़ देने से थोड़े न गद्दी संभाली जाती है. गद्दी संभालने के लिए पनही चाहिए होती है जी. ऊ आप हमको दे के जाइए.

और भले भए कि उन्होंने दे भी दी भरत भाई को अपनी पनही. इसके बाद भरत भाई तो चले गए राजकाज चलाने पनही लेकर और बेचारे रामचन्द्र जी, लक्ष्मण जी और सीता जी तीनों जने घूमते रहे जंगल-जंगल. नंगे पैर कुस-कांटा सब बर्दाश्त करते हुए. यूपी, बिहार, एमपी और छत्तीसगढ़ की जनता की तरह. इसी बीच जंगल में ही एक विश्वसुन्दरी आईं और लक्ष्मण भाई को मीका बना गईं. इसके बाद आप जानते ही हैं, मानवाधिकारवादियों का कार्यक्रम शुरू होना ही था और उसी कार्यक्रम के तहत रावण द ग्रेट सीता जी को किड्नैप कर ले गए. ओहोहो! माफ़ करिएगा. फिर विषयांतर हो गया. हम रामकथा सुनाने थोड़े न यहां आए थे. उसके लिए तो कई ठो परमपूजनीय बापू लोग हइए हैं.

बहरहाल, हमारा अभीष्ट तो सिर्फ़ जूता शास्त्र का ऐतिहासिक अनुशीलन है और इतिहास का अनुभव यह कहता है कि पनही छोड़ कर भगवान राम ने अच्छा नहीं किया. क्योंकि पनही छोड़ने के बाद उस ज़माने से लेकर इस ज़माने तक उन्हें कहीं चैन नहीं मिला. अब देखिए न, अगर उन्होंने पनही न छोड़ी होती तो क्या किसी को यह हिम्मत होती कि उनके नाम पर राजनीति करता? लेकिन नहीं आज उनके नाम पर राजनीति हो रही है. भाई लोग सत्ता हासिल कर रहे हैं, ऊहो राम के नाम पर रावण वाला कर्म करके. और जैसे ही सत्ता में आ जा रहे हैं, तो फिर कौन राम और कैसे राम. प्रधानमंत्री की कुर्सी मिलते ही भगवान राम आया राम गया राम भी नहीं रह जाते, वह बेचारे राम हो जाते हैं. अपने राम की तरह.

ज़रा सोचिए, अगर उन्होंने अपनी पनही भरत भाई को न दी होती और उसे गाहे-बगाहे चलाने के प्रेक्टिस बनाए रहे होते तो आज उनकी और उनके ग़ैर राजनीतिक भक्तों की यह दुर्दशा होती क्या? नहीं न! कविवर रहीम ने इस बात को महसूस किया था. और यक़ीन मानिए, अगर चित्रकूट की दशा देखिएगा तो आपको उनकी बात पर यक़ीन हो जाएगा कि 'जाको बिपदा धरत है, सोइ  बसत यहि देस'. गांव तो क्या, कस्बे तक की स्थिति यह है कि न पीने का पानी, न बिजली, न सड़क, न ढंग के स्कूल, न रोज़गार के साधन..... अजी हुज़ूर आम तौर पर लोग बस जिए जा रहे हैं ज़िन्दगी, मौत के इंतज़ार में. जाहिर है, यहां वही आएगा और वही रहेगा..........

अथातो जूता जिज्ञासा-24

Friday, 17 April 2009

गांधी इज ग्रेट ...अपने पीछे यह गधों की फौज छोड़कर जाएंगे : फिराक

भारत की असली पराजय अध्यात्म के धरातल पर नहीं बल्कि युद्ध के मैदान में हुई है...इतिहास चीख-चीख कर यही कह रहा है...सिकदंर की सेना के यहां पर हाथ पाव फूल गये थे...और उसे अपने सैनिक अभियान को बीच में छोड़कर लौटना पड़ा था...मगध की सेना के नाम से यवन सेना नायकों को अपने बीवी बाल बच्चों की याद आने लगी थी।....उसके बाद हमला पर हमला हुआ...युद्ध तकनीक में भारत मात खाया...
भारत में न जाने कैसे और कब युद्ध देवता इंद्र की पूजा बंद हो गई...कहा जाता है गौतम ऋषि का शाप था इंद्र को...उनकी पत्नी गौतमी पर बुरी नजर डाली थी इंद्र ने....कहानी जो भी हो लेकिन इंद्र की पूजा बंद हो गई..मुझे इंद्र का मंदिर आज तक कहीं नहीं मिला है....यकीनन कहीं न कहीं होगा ही....लेकिन सार्जनिक तौर पर इंद्र की पूजा नहीं होती है...भारत के पतन को इंद्र के पतन के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिये...इंद्र एक प्रैक्टिकल देवता था...जो युद्ध में खुद लड़ता था, चाहे वह युद्ध किसी के भी खिलाफ क्यों न हो, और उस युद्ध का उद्देश्य कुछ भी क्यों न हो....इंद्र युद्ध का देवता था....इंद्र की पूजा न करके भारत में युद्ध के देवता की अवहेलना की गई...और भारत निरंतर युद्ध के मैदान में मात खाता रहा....
यदि बुद्ध का संबंध राज परिवार से नहीं होता, तो बौद्ध धर्म इतनी तेजी से कभी नहीं फैलता...बुद्ध के चेहरे पर राज परिवार की चमक थी...और यही चमक लोगों के साथ-साथ उस समय के तमाम राज घरानों को अपनी ओर आकर्षित करती थी...यही कारण है कि बौद्ध धर्म को राजपरिवारों की प्रश्रय मिला...बुद्ध और महावीर के नेतृत्व में देश में अहिंसा की बीमारी तेजी फैली...इधर सीमओं के पार से आक्रमण पर आक्रमण होते रहे....बुद्ध की फिलौसफी और जीवन को सलाम है, भरी जवानी में विश्व कल्याण की भावना से ओतप्रोत होकर सबकुछ छोड़ा....मजे की बात है कि लोग बुद्ध के बताये हुये मार्ग पर भी ठीक से नहीं चल सके...मूर्ति पूजा के खिलाफ उन्होंने बहुत कुछ कहा और उनके चेले चपाटी उनके मरने के बाद उन्हीं की मूर्ति बनाके उनकी पूजा करने लगे....बुद्ध को पत्थरों में तराशा गया....इंद्र पीछे छूटता चला गया...चार्वाक से ज्यादा उलटी खोपड़ी किसकी होगी....
पिछले हजारों वर्षों में बहुत कुछ हुआ है...उनको कुरेदने से शायद कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है...बहुत सारे जख्म एक साथ बहने लगते हैं...
यदि हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने ब्रिटेन समेट दुनिया के सभी साम्राज्यवादी देशों को जमीनी स्तर पर ध्वस्त नहीं किया होता तो भारत की आजादी दूर कौड़ी होती...लगता है मैं बहक रहा हूं....बहकू भी क्यों नहीं....गांधी की गतिविधि पूरी तरह से पैसिव थी...गांधी की खासियत यह थी कि उन्होंने अपने पैसिव एनर्जी से यहां के लोगों को एक्टिवेट किया था....अभी कुछ दिन पहले दारू के नशे में फिराक साहेब के रिकार्ड हुये कुछ दुर्लभ शब्द सुनने को मिले थे...उन्हीं के शब्दों में...गांधी इज ग्रेट ..लेकिन अपने पीछे यह गधों की एक पूरी फौज छोड़कर जाएंगे...गधे गांधीयन पैदा होंगे और वे देश पर शासन करेंगे...खादी आज एक महंगा आइटम हो गया है,और यह सत्ता का प्रतीक है....एसा क्यों हुआ...पंचवर्षीय योजना नेहरू को रूस से उधार लेनी पड़ी थी...गांधी के ग्रामिण माडल को पूरी तरह क्यों नहीं अपनाया...जबरदस्त खिचड़ी पकाई गई है....पूरा संविधान खिचड़ी है...कसाब जैसे लोगों का भी यहां ट्रायल चलता है...हद हो गई है..
नई फसल के लिए पूरी खेत को जोता और कोड़ा जाता है....चीन की सांस्कृतिक क्रांति कई मायने में बेहतर है...कम से कम चीन की नई पीढ़ी इतिहास के काले भूत से तो मुक्त हो गई है....भले ही माओ को कितनी भी गालियां दी जाये, चीन जैसे अफमीची देश की तकदीर उसने बदल दी है....कभी सारा चीन अफीम के नशे में झूमता रहता था...नायक हमेशा किसी खास देश में होते हैं..उसके बाद ही उसे विश्व नायक का दर्जा मिलता है...वैसे गांधी का इफेक्ट अपने समय पर जबरदस्त था...लोगों को लाठी खाने के लिये तैयार करना भी एक मादा की बात है...गांधी का मूवमेंट इस लिये चला क्योंकि उनके मूवमेंट का सीधा असर अंग्रेजों पर नहीं पड़ता था...खैर अब इन बातों को याद करने का अब कोई तुक नहीं है....
किताबों से इतर आम जनता के बीच गांधी पर इतने चुककुले सुनने को मिले हैं कि उन्हें मेरे लिये गिन पाना भी मुश्किल है...इन चुटकुलों को जनरलविल के साथ जोड़कर देखने पर एक नई तस्वीर ही खुलती है...मामला वाद का नहीं है...असल बात है उस लक्ष्य को पाना, जिसके लिये किसी राष्ट्र विशेष का जन्म हुआ है....भारत का आध्यात्मिक लक्ष्य अस्पष्ट है...वैसुधव कुटुंबकम...लेकिन इस लक्ष्य की आधारशीला सैनिक तंत्र ही हो सकता है....भारत में सैनिक शिक्षा पहली क्लास से ही लागू कर देना चाहिये....हालांकि यह संभव नहीं है क्योंकि शिक्षा पर मुनाफाखोर माफियाओं का कब्जा है...और सरकारी शिक्षा की तो बाट पहले से ही लगी हुई है...शिक्षा में लाइफस्टाईल को तवज्जो दिया जा रहा है...भारत रोगग्रस्त है...और अभी तक इसकी बीमारी की पहचान भी नहीं पाई है...इलाज की बात तो दूर है...वैसे खून किसी भी बीमार देश के लिये बेहतर दवा का काम करता है...दिनकर याद रहा है...
क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो,
वो क्या जो विषहीन,
दंतहीन विनित सरल हो..
.अब उर्वशी भी याद रही है... लगता है है देश में जूता एक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है...देखते हैं आगे-आगे होता है क्या।

Thursday, 16 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-24

अथातो जूता जिज्ञासा-23

जूता चिंतन का यह क्रम संत रैदास पर आकर ठहर गया हो, ऐसा भी नहीं है. इतना ज़रूर है कि उनके बाद उनके ही जैसे जूते चलाने का रिवाज शुरू हो गया. आई मीन शहद में भिगो-भिगो कर जूते चलाने का. जूते सूर ने भी चलाए, लेकिन ज़रा धीरे-धीरे. शहद में भिगो-भिगो कर. हल्के-हल्के. जब वह कह रहे थे 'निर्गुन को को माई-बाप', तब असल में वह जूते ही चला रहे थे, लेकिन शहद में भिगो के, ज़रा हंस-हंस के. ताकि पता न चले. वही मरलस त बकिर पनहिया लाल रहे. वह साफ़ तौर पर यह जूते उन लोगों पर चला रहे थे जो उस ज़माने में एकेश्वरवाद और निर्गुन ब्रह्म को एक कट्टर पंथ के तौर पर स्थापित करने पर तुले हुए थे. अपने समय की सत्ता की शह उन्हें बड़े ज़ोरदार तरीक़े से मिली हुई थी. वह देख रहे थे कि इस तरह वे सामासिकता में यक़ीन करने वाली भारत की बहुलतावादी आस्था पर जूते चला रहे थे. जहां सभी अपने-अपने ढंग से अपने-अपने भगवान बनाने और उसमें विश्वास करने को स्वतंत्र हों, ऐसी खुली मानसिकता वाली संस्कृति का तालिबानीकरण वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे और इसीलिए उन्होंने कृष्ण के उस बालस्वरूप को अपने इष्ट के रूप में स्थापित किया जो सभी तरह के छल-छ्दम और कर्मकांड से दूर था. उन्होंने ऐसा भगवान चुना जिसे सिर्फ़ पूजा ही नहीं जा सकता था, उससे निर्द्वन्द्व दोस्ती की जा सकती थी और वह भी बड़ों की तरह गुणा-भाग वाली स्वार्थपरक दोस्ती नहीं, बच्चों की तरह निर्विकार भाव वाली दोस्ती.

उनसे ही थोड़ा आगे चलकर सेनापति कवि रहीम ने भी जूते पर बड़ा ज़ोरदार चिंतन किया. आप जानते ही हैं जूते का एक पर्याय पनही है. पिछले दिनों भाई अरविन्द मिश्र जी ने हुक्म भी किया था कि अब आप पनही पर प्रकाश डालें. तो साहब पनही पर प्रकाश डालने के लिए रहीम का उद्धरण लेना बहुत ज़रूरी है. हालांकि पनही चिंतन सम्बन्धी उनके दोहे को बाद में हिन्दी के आलोचकों और उनके कुछ प्रतिस्पर्धियों ने थोड़ा भ्रष्ट कर दिया, उसमें मिलावट करके. ग़ौर फ़रमाएं, कविवर रहीम कहते हैं:

रहिमन पनही राखिए, बिन पनही सब सून

पनही गए न ऊबरे, क्या प्राइमरी क्या दून.

बाद में लोगों ने इसमें पनही की जगह पानी कर दिया और जाने कहां से मोती-मानस-चून उठा लाए. अब सोचिए एक ऐसा कवि जो सेनापति रहा हो, वह पानी की बात क्यों करेगा. ख़ास तौर से तब जबकि रहीम के ज़माने में पानी को प्रदूषित करके यह बताने वाले भी नहीं थे कि देखिए जी यह पानी तो प्रदूषित है. पानी बेचने वाली कम्पनियां तो तब पैदा ही नहीं हुई थीं, फिर भला पानी प्रदूषित करने की ज़रूरत तब क्या थी. और जब पानी प्रदूषित करने की ज़रूरत नहीं थी, तब भला पानी राखने की बात करने की क्या ज़रूरत थी? रहीम के ज़माने में तो विज्ञापन कंपनियां भी नहीं थीं कि यह सोचा जाए कि वे उनके लिए काम करते रहे होंगे और इसी क्रम में उन कंपनियों को यह पता रहा हो कि भाई आगे बोतल में बन्द करके पानी बेचने वाली कुछ कंपनियां आएंगी और उन्हें पानी बेचने के लिए स्लोगन  की ज़रूरत पड़ेगी. चलो आज बना के या रहीम से ख़रीद के रख लेते हैं और भविष्य में जब ज़रूरत पड़ेगी तो काम आएगा.

इसके बजाय इस बात की संभावना ज़्यादा है कि उन्होंने पानी के बजाय पनही रखने की बात कही हो और क्या पता कि यह बात उन्होंने अपने जहांपनाह अकबर साहब से ही यह बात कही हो. आख़िर वह एक सिपहसालार थे. सिपहसालार का बुनियादी काम जूते चलाना ही होता है. आप जानते ही हैं कि अब तक इस देश पर जिन लोगों ने भी राज किया है, सबने जूते के ही दम पर राज किया है. और हिन्दुस्तान ही क्यों, पृथ्वी नामक इस ग्रह के किसी भी कोने पर अगर किसी ने कभी राज किया है तो जूते के ही दम पर. यह अकारण नहीं है कि अब लोकतंत्र में पब्लिक जूते उठा रही है. असल में बेचारी पब्लिक ने देख लिया है कि उसके नाम पर राज तो वे लोग कर रहे हैं जिन्हें जेलों में होना चाहिए, पर बदनाम वह हो रही है. तो बदनामी से बचने के लिए ज़रूरी हो गया है कि वह राजकाज सचमुच ख़ुद संभाले और राजकाज उसके हाथ में आए इसके लिए अनिवार्य है कि वह जूते उठाए. क्योंकि सिस्टम तो जितने भी बनाए जाएंगे, उनमें ऐसे छेद भी अनिवार्य रूप से बना दिए जाएंगे जिनसे सुपात्र सत्ता से बाहर हो जाएं और शूपात्र सत्ता के भीतर समा जाएं.

माफ़ करिएगा, भावुकता में ज़रा विषयांतर हो गया. और भाई मेरा इरादा किसी पर जूते चलाने या जूते चलाए जाने का समर्थन करना नहीं, बल्कि जूता शास्त्र का ऐतिहासिक अनुशीलन है. बावजूद इसके कि मैं इतिहास का इ भी नहीं जानता. लेकिन क्या करिएगा, इतिहास बेचारे के साथ तो बरोब्बर यही हुआ है. अब देखिए न! अभी हाल-फ़िलहाल का ताज़ा उदाहरण लीजिए, आधुनिक इतिहास का ही. इससे वे सारे लोग बाहर हो गए जिन्होने इसे बनाया- चन्द्रशेखर आज़ाद,  बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह, ऊधम सिंह, अशफ़ाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्र नाथ सान्याल, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, मंगल पांडे .... आदि-आदि. ये सब बेचारे आदि-आदि में चले गए. इंतज़ाम ऐसा भी बना दिया गया है आगे आने वाली पीढ़ियां अगर ढूंढ-ढूंढ कर जानना चाहें भी कि भारत की आज़ादी की लड़ाई किन लोगों ने लड़ी, तो वे उतनी कसरत करके भी सच्चाई न जान पाएं जितनी कसरत करके इन दीवानों ने अंगरेजों से आज़ादी हासिल कर ली.

और इतना ही क्यों सरकार जिसकी भी आती है, वह अपने ढंग से इतिहास बना देता है. गोया इतिहास न हुआ डीएम या एसएसपी की कुर्सी हो गई. जब जिस पार्टी की सरकार बने वह अपने पसन्द वाले आईएएस के कान पकड़े और कहे कि चल बे बैठ तू. और पिछली सरकार द्वारा वहां बैठाए गए घोंचू का कान पकड़ कर कहे कि बहुत दिन कर ली तूने डीएमगिरी, अब चल चिलांटू संस्थान का कार्यकारी निदेशक बन के बैठ. ज़्यादा ग़ुस्सा आ गया तो वेटिंग में भी डाल दिया. जिसके जैसे जी में आता है वह वैसहीं इतिहास लिखने लगता है. कब इतिहास में क्या लिखा जाएगा, यह सरकार तय करती है और सरकारे के कुछ पालतू इतिहासकार. नतीजा? साफ़ है. वे होनहार पुत्र जिन्होंने अपने पिताओं को जेल में सड़ने के लिए डाल दिया, आज उनके ही नाम पर इंडिया गेट के आसपास की कई सड़कें हैं. शायद यह बताने के लिए कि सत्ता का रास्ता ऐसा ही होता है. भारत माता के होनहार सपूतों, इनके चरित्र को अपनाओ और सत्ता में आओ. अपने देश, अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा और अपनी मेधा पर थूको और सत्ता हासिल करो. अपने गौरवशाली इतिहास पर जितनी हो सके ज़्यादती करो और सत्ता में आओ. जब आधुनिक इतिहास के साथ ही इतना कुछ हुआ है तो भला मध्यकालीन और प्राचीन इतिहास के साथ तो जितने भी सितम हुए हों, कम ही कहे जाएंगे. ख़ास तौर से भारत के प्राचीन इतिहास को तो नष्ट करने में इसके मध्यकालीन शासकों ने कोई कसर ही नहीं छोड़ी और जो बचा भी था उसे बाद में आए भारत को आधुनिकता का पाठ पढाने वाले शासकों ने भ्रष्ट कर दिया.

यह सब बेचारे इतिहसवे के साथ क्यों होता है? जाहिर है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसके पास जूता नहीं है. अगर बेचारे इतिहास के पास जूता होता और वह उस जूते का इस्तेमाल कर पाता तो क्या ऐसा होता? शायद कभी नहीं. यह जो ऐतिहासिक अनुशीलन की हिम्मत मैं जुटा पाया हूं, उसके मूल में भी बात दरअसल यही है. मैं जानता हूं, इतिहास मेरा कुछ बिगाड नहीं पाएगा, लिहाजा ऐतिहासिक अनुशीलन कर रहा हूं.

इतिहास की इस विवशता को कविवर रहीम ने बड़ी शिद्दत से महसूस किया. आख़िर उनके पिता बैरम ख़ान के साथ जो कुछ हुआ था, उसे वह कैसे भूल सकते थे. और अगर वह भूल भी जाते तो भी पानी से भला एक सेनापति का क्या काम? लेकिन पनही से उसका सम्बन्ध बड़े निकट का है. आप जानते ही हैं, अंगरेज बहादुर के ज़माने में सूरज अस्त नहीं होता था. क्यों? क्या इसकी वजह भी आपको मालूम है? नहीं न! अपने भाई आलोक नन्दन के मुताबिक इसकी एक ही वजह है और वह है जूता. अंग्रेजी फ़ौज के जूते इतने मजबूत होते थे कि उन्हें कहीं भी किसी भी तरह से आने-जाने में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होती थी. उनके प्रतिद्वन्द्वी राजाओं के सिपाहियों के पास जूते बड़े कमज़ोर किस्म के थे. लिहाजा वे उन्हें पहन कर बहुत दूर तक न तो दौड़ लगा सकते थे और न मार ही कर सकते थे. नतीजा यह हुआ कि बाक़ी लोग हारते गए और अंग्रेज बहादुर जीतता गया. अब आप ही बताइए, ये अलग बात है कि हम आज तक अंग्रेज बहादुर को बहादुर कहते आ रहे हैं, लेकिन वास्तव में बहादुर भला कौन है? अंग्रेज या कि जूता? वैसे विचारणीय यह प्रश्न भी है कि भाषा विज्ञान की दृष्टि से निहायत अवैज्ञानिक होने के बावजूद अगर आज तक अंग्रेजी हमारे सिर चढ़ी हुई है तो इसमें बहादुरी किसकी है, इस भाषा की या कि उन जूतों की जो इसकी तरफ़दारी में हमारी ही देसी सरकारों की ओर से हम पर चलाए जाते रहे हैं? हिन्दी अपनी सारी वैज्ञानिकता और पूरे देश में प्रचलित होने के बावजूद अगर आज तक सरकारी कामकाज की भाषा नहीं बन सकी और कारपोरेट जगत में तो घुसने ही नहीं पाई, तो इसकी वजह क्या है?  बतौर भाषा इसकी कोई कमज़ोरी या कि इसकी जूताविहीनता?

चरैवेति-चरैवेति.....

Tuesday, 14 April 2009

भारत मां क्यो है, पिता क्यों नहीं ?

उन दिनो दिमाग को किताबों में घूसेड़ कर उसे बुरी तरह से थका देने के बाद थोड़ा चैन लेने शराब में डूब जाता था..फटे तक पीता था, कोनवालोय के अंदाज में। दारू कब और कैसे मुंह से लगी थी मुझे खुद याद नहीं...शायद सरस्वती पुजा के दिन। मुहल्ले भर के आवारा लौंडे सरस्वती पुजा बड़ी धुमधाम से करते थे, एक महीना पहले से ही घूम-घूम कर चंदा काटा जाता था और उसी चंदे के पैसे से पूजा के साथ-साथ दारू चलता था। हां मां सरस्वती के प्रति गहरी आस्था में कोई कमी नहीं होती थी, लेकिन यह भी सच है कि दारू उन्हीं दिनों मुंह लगा था.
बाद के दिनों में शराब के नशे में डाक बंगला चौराहे की एक दुकान पर हिटलर का मीन कैंफ हाथ लगा और एक बार जब उसको पढ़ना शुरु किया तो शराब का नशा भी उसके सामने फीका लगने लगा...बस पढ़ता ही गया...पूरी किताब खत्म करने के बाद ही अगल-बगल की दुनिया दिखाई दी...और इसका हैंगओवर लंबे समय तक बना रहा...शायद यहां जो कुछ भी मैं लिख रहा हूं, वह मीन कैंफ के हैंगओवर का ही असर है। हिटलर की आत्मकथा को दुनिया का मैं सर्वश्रेष्ट आत्मकथा मानता हूं...उस आत्मकथा में एक स्पष्ट उद्देश्य दिखाई देता है, और इसी में किसी भी आत्मकथा की सार्थकता है। हिटलर की आत्मकथा एक आंदोलन की रूपरेखा को व्यवहारिक स्तर पर बहुत ही मजबूती से रखता है, उस आंदोलन के उद्देश्य को लेकर चाहे जो बहस हो, लेकिन उसका मैकेनिज्म जमीन पकड़े हुये है।
हिटलर की आत्मकथा को पढ़ने के बाद कई तरह के सवाल दिमाग में कौंधते रहे, जैसे भारत को मां क्यो कहा जाता है, पिता क्यों नहीं ? हिटलर पितृ भूमि की बात करता है, और हमलोग मातृभूमि की। बचपन में पढ़ाया गया था कि भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा...मेरी समझ में यह नहीं आता था कि फिर भारत माता कैसे हो गई। मैं भारत को पितृ भूमि के रूप में देखने लगा था...मीन कैंफ को पढ़ने के बाद अपने देश और जमीन की प्रति मेरा परसेप्शन चेंज हो गया था...
कभी-कभी खोपड़ी में कोई उलटी बात बैठ जाती है, जिसका कोई मायने मतलब नहीं होता, लेकिन वह लंबे समय तक आपके हावभाव और सोचने की दिशा को घुमाता रहता है...खोपड़ी यदि चारो दिशा में नहीं घूमे तो वह खोपड़ी ही क्या ? वाइमर गणतंत्र पर हिटलर की प्रतिक्रिया पढ़कर भारत का गणतंत्रीय ढांचा मेरी आंखों के सामने घूमने लगा.. वाइमर गणतंत्र दुनिया का सबसे मजबूत गणतंत्र, जिसका हिटलर ने कबाड़ा निकाल दिया...यानि हिटलर उस गणतंत्र से भी मजबूत था।
खैर मामला चाहे जो मीन कैंफ के पढ़ने के बाद हिटलर मेरे दिमाग में घुस गया था...और हिटलर को लेकर जीवन में बड़े-बड़े पंगे होते रहे...जर्मनी में मीन कैंफ पर आज भी प्रतिबंध है, जबकि हिटलर के समय इस किताब को बाइबिल की तरह बांटा जाता था..हर घर में मीन कैंफ रखना जरूरी था...बहरहाल समय के साथ हिटलर तो दिमाग से उतर गया, लेकिन वो पल जो मैंने हिटलर के साथ बीताये हैं मेरी जीवन के अदुभुत पल हैं....वोदका के नशे में चुर होकर आज भी उन पलों को जीने के लिये जी ललचाता है...जो बीत गई वो बात गई माना वह बेहद प्यारा था....भारत पितृभूमि को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता कब मिलेगा...?मिलेगा भी या नहीं...? भूख और गरीबी तो यहां की नीयती बन चुकी है...है कोई पोलिटिकल पार्टी जो यह दावा करे कि उसके सत्ता में आते ही भारत सुरक्षा परिषद के स्थायी सीट पर नजर आएगा....? यदि नहीं तो...किसे वोट दूं....??और क्यों दू...???वैसे एक मेरे वोट न डालने से कुछ भी उखड़ने वाला नहीं है....दुनिया अपनी गति से आगे बढ़ती रहेगी....और साथ में डेमोक्रेसी भी...डेमोक्रेसी एक धंधा है...और राष्ट्रवाद एक जलती हुई चीज है...
गड़गच्च के दारू पीने का मन कर रहा है...कोई है जो मेरे साथ बैठे...मैं चाहता हूं कि इन चीजों को अपने दिमाग से झटक कर के फेंक दूं...वोदका थोड़ी देर के लिए राहत देती है...लेकिन कुछ और चाहिये...जो मेरे दिमाग को पूरी तरह से अपने वश में कर ले...और मैं बुरी तरह से उसमें डुबता चला जाऊ...कोई गहरी अर्थ वाली चीज हो....वह कुछ भी हो सकता है...कुछ भी...हिटलर की गर्लफ्रेंड का नाम एमा ब्राउन था...हिटलर अपनी एमा थोड़ी देर के लिये मुझे देदे....तेरे साथ मरी थी...मरने के बाद क्या होता है...??बेहतर मौत कौन सी है...???एमा मेरे साथ वोदका का दो घूंट लगा और बता...हिटलर के साथ मर करके तुम्हे क्या मिला....??तुम अजीब महिला थी...??हिटलर के जीवन में तुम मीन कैंफ के बाद आई थी...हिटलर तू अपने समय का हिटलर होगा...अब तो तुझे कुत्ते भी गालियां देते हैं...अब तू थोड़ा साइड बैठ और मुझे एमा से बात करने दे...तो एमा तू क्या कह रही थी...वोदका इज योर प्वाइजन टू...ड्रींक...डार्लिंग, ड्रींक एंड लेट मी ड्रींक योर ब्राउनी आइज...वोदका से ज्यादा नशा है तेरी इन ब्राउनी आंखों में....आई थिंक यू वोंट माइंड इट...ओह माई गाड अकेले बैठे-बैठे छह पैग गटक चुका हूं...

Tuesday, 7 April 2009

भूंसा खोपड़ी में भरा होता है

आज क्या लिखा जाये कुछ समझ में नहीं आ रहा है, जरूरी नहीं है कि आप हर दिन कुछ लिखने की स्थिति में ही होते हैं, कई बार आपके दिमाग में कई तरह के ख्याल आते हैं और आपको लगता कि वो दुनिया के बेहतर ख्याल हैं,लेकिन आप उन्हे कलमबद्ध नहीं कर पाते हैं,और फिर वो ख्याल उड़ जाते हैं और चाहकर भी आप उन्हें दोबारा अपने दिमाग में नहीं ला पाते हैं...कई बार आप कुछ लिखना चाहते हैं, लेकिन आपके दिमाग में लिखने के लिए कुछ खास नहीं होता है। क्या लिखने के लिए किसी विषय का होना जरूरी है..???? हम बेतरतीब तरीके से नहीं लिख सकते हैं..??? कभी इधर की बात, कभी ऊधर की बात, कभी कहीं की बात...शायद लेखन कला के नजरिये से यह गलत हो...
बहुत मुश्किल से लोगों ने लेखन को विभिन्न विधाओं में ढाला है...लिखने के लिए सबजेक्ट मैटर की जरूरत तो होती है...लेकिन जब आप दिमाग के पूरे कैनवास को खोलकर लिखेंगे तो शायद आपको अहसास होगा कि सबकुछ वृतीय रूप में जुड़ा है..इसका मतलब यह हुआ कि आप कही से भी शुरु करके बढ़ सकते हैं, और परिणाम शायद वही आएगा...बेहतर है लेखक की कृति के बजाय लेखक को पढ़ना...यह कहाना ज्यादा उचित होगा कि आप लेखक को नहीं उसके दिमाग को पढ़े...किसी भी लेखक के विभिन्न समय की विभिन्न रचनाये क्रमश उसके दिमाग के विकास की यात्रा को बतलाती है..उसकी रचनाओं से आप उसके दिमागी सफर को समझते हैं..
.कार्ल जुंग मुंह पर स्कूल में उसके एक सहपाठी ने घूसा मारा था..और बेहोश हो गया था....इसके बाद स्कूल जाने के नाम पर ही वह बेहोश हो जाता था...बाद में दिमाग की परतों को खोलते वक्त उसका खुद का दिमाग उस घटना से संचालित होता रहा...उसके काम को आप किसी विषय से बांध कर देखेंगे तो उस विषय को समझेंगे, लेकिन उसे लैक कर जाएंगे
...लेखनी का सीधा संबंध सभ्यता से है, सभ्यता के विस्तार और फैलाव से है...विषय पर ठहरकर लिखने की प्रैक्टिस स्कूलों और कालेजों में करवाई जाती थी...पता नहीं शुरु से ही प्रवाह को पीटा क्यों जाता है...गणित, विज्ञान, साहित्य, राजनीति सभी की जड़े अरस्तू में घूसती हैं...अरस्तू को कहीं से उठाकर पढ़ने पर यही लगता है कि बस उसने यही से शुरु की है...मैकियावेली का प्रिंस मैकियावेली के दिमाग की कुछ परतों को खोलता है...मैकियावेली के प्रिंस को ठीक से पकड़ना है तो अपने इर्दिगिर्द के माहौल से उसे जोड़कर देखिये...उदाहरण के लिये लालू से जोड़ सकते हैं..
.समाज की शक्तियों को नचाते हुये कोई कैसे सत्ता पर सवार होता है, और अपनी सत्ता को बचाने के लिये क्या-क्या खेल खेलता है साफ-साफ दिखने लगेगा...विषय और फार्मेट धारा को कुंद करती है...और दुनिया में किसी भी व्यवस्था का काम ही धारा को कुंद करना और उसे अपनी व्यवस्था के अनुकूल बनाना....व्यवस्था में बंधी हुई चिंतन और लेखनी विषय से शुरु होती है...
.रूसो के सामाजिक समझौता को क्या कहा जाएगा....?किस विषय पर कही गई किताब है वह....?वह शुरु ही करता है, इनसान स्वतंत्र पैदा हुआ है और सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा है....इस एक वाक्य को पढ़कर क्या कहा जा सकता है...किस विषय को वह टच कर रहा है....उसकी किताब पढ़कर लोग बास्तिल पर धावा मार देते हैं...और फिर फ्रांस गिलोटिन की राह पकड़ लेता है....असल बात है लिखना नहीं, कहना....लेखनी तो एक माध्यम है....भूंसा खोपड़ी में भरा होता है...अब उसे भूंसे का इस्तेमाल आप खाद के रूप में करते हैं या चारे के रूप में यह पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है...विषय एक आवश्यक बुराई है, जिससे जितनी जल्दी निजात पाले बेहतर होगा....
शीर्षक क्या है....एक तकनीकी टग्गा...अब अथातों जुता जिज्ञासा को कुछ भी माना जाये...क्या फर्क पड़ता है...इसका सार्वजनिक इस्तेमाल राजनीती के कुलीन लोगों पर होने लगा है...यानि की यह व्यवहारिक रूप में दिखने लगा है...इसे कहते हैं समय को पकड़ करके अपनी बात कहना...और समय द्वारा उसका प्रत्युतर दिया जाना....मंत्री पर जूता चलाने वाले पत्रकार ने भले ही जूता कथा नहीं पढ़ी हो, लेकिन काम तो वही कर गया, जिसके बारे में इसमें कहा जा रहा है....वैसे लोकतंत्र में जनता को वोट के बजाये सीधे जूते चलाने का अधिकार दे दिया चाहिये...इससे सिर फूटता नहीं है, लेकिन अपना काम कर जाता है....या फिर नेतापद की उम्मीदवारी के लिए प्रत्याशियों के जूते खाने की काबिलियत को सम्मिलित कर लेना चाहिये...जैसे सांसदों के लिये 8 जूते, विधायकों के लिये 4 जूते...ग्रामीण और कौंसिल लेवर पर दो-दो जूते आदि...देश के एक पत्रकार ने जूते चलाने की अदा दिखा दी है.....मुद्दें बहुत हैं, जूतें चलाने लिये, और देश के हर कोने से हैं। उनकी गिनती कर पाना मुश्किल है, भारत को विदेशों से जूतों का आयात करना पड़ सकता है....
आदमी सोंच कर के एक ही दिशा में क्यों लिखे ?? एक होता है लिखने के लिये लिखना, और एक होता है कुछ कहने के लिये लिखना ...यदि आप कुछ कहने के लिये लिखना चाहते हैं तो आपको विषय के झंझट में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है। बस अपनी बात कहते जाइये...सामाजिक समझौता रूसो का बकवास है...विज्ञान, कला और मानवता पर!!...उसका बकवास लोगों की खोपड़ी पर चढ़ता गया..
पढ़ा है मेरी अंतोनोयत की कमर बहुत पतली थी...यह फैक्ट हुआ, जो किसी ने फेंका है...इस फैक्ट के सहारे 14 साल तक मैं उसकी कमर की परिकल्पना करता रहा....और आज तक भी सही नतीजे तक नहीं पहुंच पाया हूं कि उसकी कमर कैसी थी...गिलोटिन ने उसके खूबसूरत कमर को मांस के लोथड़ों में बदल दिया....उनलोगों ने उसकी पतली कमर का भी ख्याल नहीं किया....विषय पर लिखना अपने इमैजिनेशन को फार्मेट में लाने जैसा है...हां विषय का सही इस्तेमाल फैक्ट्स के संकलन में है।
जूता कथा फैक्ट से इतर बह रही है...फैक्ट को पहिये बनाकर ...अपनी बात को कहने के लिये फैक्ट्स अच्छा काम करता है..लेकिन असल चीज है कहना....रेलवे संभालते संभालते लालू के दिमाग में रोलर घूमने लगा है...इस इलेक्शन को लामबंद करने के लिये लालू वरुण पर खेलने की पूरी तैयारी कर चुके हैं...लालू की बात हवा में उछलेगी और उसी के तर्ज पर इलेक्शन का समीकरण बनता जायेगा...इलेक्शन में खबरों को रद्दोबदल करके निकालने का सौदा होता है...और खबरों के धंधा में लगे लोग इस समीककरण के असली पार्ट पूर्जे होते हैं...उनका धंधई गुर के कारण मैकेनिकल इस्तेमाल होता है...खबरों को प्रसारित करने के लगाम कहीं और होता है...इसे देख पाना या पकड़ पाना डान को जिंदा पकड़ने की तरह मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। लालू ताल ठोककर कह रहा है कि अडवाणी के हाथ में सत्ता को नहीं आने दिया जाएगा...लालू की इस आक्रमकता को समझने के लालू के दिमाग का आपरेशन किया जा ना चाहिये...एक घाघ नेता है...और जानता है कि कहां क्या बोला जाता है, और सार्जनिक सभाओं में कही गई बात का क्या असर होता है। लालू बकरी का बच्चा नहीं है, कि दौड़े और पकड़ लिये...लालू मैकियावेली के प्रिंस के बहुत करीब है....प्रिंस का सीधा सा मतलब है, जो सत्ता के खेल में है। लालू पिछले 20 साल से सत्ता का खेल खेल रहा है,..लालू महिमा लिखने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन यह हकीकत है।

Saturday, 4 April 2009

बेबाक लेखनी दावपेच का शिकार नहीं हो रही

प्रेम का पाठ पढ़ाया जाता है, जबकि हिंसा एक सहज प्रवृति है...आपके अंदर दौड़ रही होती है, खून में। लियो तोलोस्तोव कहता है, इनसान के नसों से खून निकाल कर पानी भर दो, फिर युद्ध नहीं होंगे। सभी जीव जंतुओं में हिंसा जनन और प्रजनन का आधार है। दुनियाभर के तमाम धर्मग्रंथों की रचना मानव के अंदर व्याप्त इसी मौलिक प्रवृति की रोकथाम करने के लिए की गई है। यही कारण है कि दुनिया के तमाम धर्म ग्रन्थ शांति के उपदेशों से भरे हैं, और उनमें शांति बनाये रखने की बात कही गई है। शांति एक परिकल्पना है जबकि हिंसा प्रवृति है।
इसके बावजूद शांति के गीतों के बीच हिंसा का राग अलापने वाले महानयक चमकते हुये दिखते हैं, चाहे वह सिकन्दर हो, नेपोलियन हो, चंगेज खान हो,सम्राट अशोक हो, या फिर फ्यूरर। ये लोग इतिहास की छाती पर मजबूती से पांव रखे हुये नजर आते हैं, और उस वक्त तमाम धर्मग्रन्थ प्रलाप की मुद्रा में दिखते हैं। मजे की बात है कि सामुहिक रूप से हिंसा का काफिला शांति शांति करते हुये आगे बढ़ता है।
उस पेंटर लौंडिया को मेरी आंखों में हिंसा दिखाई देता था, जबकि उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में मैं डूबता जाता था। उसके मुंह से निकलने वाली बदबू के कारण मैं हमेशा उससे दूरी बनाये रखता था। वह चाहती थी कि मैं अपना सिर उसके गोद में रख कर उससे बाते करूं, लेकिन मुझे डर लगता था कि बातों के दौरान वह अपना मुंह मरे मुंह में घुसेड़ देगी...और उसकी मुंह की बदबू को झेलने के लिये मैं तैयार नहीं था। उसके ब्लंटकट बाल में उंगलियां फिराने की मेरी खूब इच्छा होती थी, लेकिन वह अपने बालों को छूने भी नहीं देती थी, उसे हमेशा खराब होने का डर सताता रहता था। वह गिटार सीखने जाती थी और दावा करती थी कि वह एक अच्छी पेंटर भी है।
उन दिनों मैं फ्यूरर के मीन कैफ में डूबा हुआ था। मीन कैफ का कवर पेज दिखाते हुये मैंने उससे कहा, क्या तुम हिटलर की इस तस्वीर को बना सकती हो ? दो मिनट तक वह उस तस्वीर को निहारती रही और फिर बोली, कोशिश करती हूं। यह किताब मुझे दे दो।
मैंने कहा, किताब नहीं, ऊपर का कवर पेज ले जाओ। तुम्हे तस्वीर बनानी है, न कि किताब पढ़नी है।
कुछ लोग ब्लौग पर लिखने वालों को लेकर हायतौब क्यों मचा रहे हैं....ब्लाग एक माध्यम है, अभिव्यक्ति का और उन सभी तत्वों को अपने आप में सम्मिलित किये हुये है, जिनका विकास सभ्यता के साथ होता आया है और होता रहेगा। अब यह प्रयोग से आगे निकल चुका है। इसका विस्तार गांवों में बिजली के साथ तेजी से होगा और हो रहा है ।
विकास का पैमाना यह होना चाहिये कि देश का अंतिम आदमी तक ब्लौगियर हो जाये....इसके लिये जरूरी शर्त है शिक्षा और बिजली।
बहरहाल, वह लौंडिया करीब ढेर महीने तक मुझे दिखाई भी नहीं दी...पता नहीं किस बिल में घुस गई थी। उसके मुंह से निकलने वाले दुर्गन्ध को याद करते हुये, अपने आप को मैं उसकी तरफ से डिस्ट्रैक्ट करने की कोशिश कर रहा था। जब किसी चीज को आप दिमाग से झटकते है तो वह आपको उतना ही अधिक परेशान करती है और वह आप पर बुरी तरह से हावी होते जाती है।
ढेर महीना बाद जब वह आई तो उसके हाथ में बड़े से पेपर में लिपटा हुआ कोई सामान था। उसने मुझे सामान को खोलने के लिए कहा। पेपर हटाते ही, मैं मंत्रमुग्ध रह गया....कैनवास पर हिटलर को उसने अदभुत तरीके से उतारा था...बियांड इमैजिनेशन...अपने दोनों हाथ उसके ब्लंट कट बाल में डाले और उसके होठों को चूम लिया, और वह हक्की बक्की होकर मुझे देख रही थी। स्वास्तिक के निशान पर नजर पड़ते ही, मेरी भौंवे तन गई, वह बेहूदा तरीके से बना हुआ था।
मेरे मुंह से निकला, अबे उल्लू की दूम, इस चिन्ह को भी ठीक से बनाना था...
उसने कहा, एक नहीं दो बनाई हूं...ये मैं ले जाती हूं...वो वाली दे दूंगी...मेरे पापा के एक दोस्त इसे मांग रहे थे।
मैंने कहा, इसे रहने दे, तुम्हारा भरोसा नहीं, तुम किसी को भी दे सकती हो।
किसी कहानी का क्लामेक्स कहां होता है ? क्या बिना क्लामेक्स की कहानी लिखी जा सकती है ? एक कहानी में कौन-कौन से तत्व होने चाहिये....?? कहानी और रिपोर्टिंग के ग्रामर को पूंछ पटककर पीटना चाहिये...ब्लाग आपको वहां तक छोड़ती है...या छोड़ता है (चाहे जो लिंग रख ले)...जहां तक आप जाना चाहते हैं। नेट की दुनिया लोगों को दिल और दिमाग से जोड़ रही है, वो वो भी ट्रांसनेशनल स्तर पर। मैं इसके लिग को लेकर खुद कन्फ्यूज हूं कि ब्लौग अच्छी है या ब्लौग अच्छा है। कोई मेरा यह कन्फ्यूजन कोई दूर करे, मेरे साथ साथ ब्लौग की दुनिया भी समृद्ध होगी, जिसके जो मन में कहता रहे...ब्लौग रिवोल्यूशन जिंदाबाद !!!!!!!!!!!!!!
इसने खोखले शब्दों का कलात्मक प्रयोग करने वाले संपादकों की चड्डी गिली कर दी है, कुछ तो बात होगी !! लिखने वाले काफिले में शामिल लोगों को संपादकों के सामने जलील नहीं होने दे रहा है, बेबाक लेखनी दावपेच का शिकार नहीं हो रही है...यही तो अभिव्यक्ति की क्रांति का चरमोत्कर्ष है... ब्लाग रिवोल्यूशन को तो क्रांति भरी गीतों और संगीतो से सजाने की जरूरत है....दुल्हन चली, पहन चली तीन रंग की चोली...कुछ और गीत बने तो और बेहतर....धंधई से दूर लिखने और सोचने के कुछ नये नारे भी उछले...

Thursday, 2 April 2009

अलग- अलग उम्र की अलग-अलग लड़कियों की टोलियां

कुछ समय है लिख सकता हूं...दिमाग का घोड़ा दौड़ रहा..शोले के गब्बर सिंह के घोड़े की तरह...वेसे वसंती के घोड़े के नाम धन्नु था..घोड़ों ने इनसान को गति प्रदान की है...इनसान को हवा से बात करने की अदा है...मशीनी युग आज भी होर्स पावर जैसे शब्दे मेजरमेंट के इकाई बने हुये हैं।
नगालैंड की घाटियों से निकल कर शहर में पटका खाने के बाद सबकुछ जुदा -जुदा सा लग रहा था...कमरे में बंद होकर पंखा की हवा खाने से शरीर में शरीर में अकड़ने होती थी...और लोटने के लिये कहीं मिट्टी का टिला भी नहीं था...नगालैंड में लकड़ी के मकान में रहता था...वह मकान जमीन से पांच फीट ऊपर था...लकड़ी के मोटे-मोटे पाये पर खड़ा था...और अक्सर जंगली सुअर रात बिताते थे...उनकी गुर्राहट को सुनते हुये सोने की आदत थी...पहाड़ी जिंदगी बैखौफ होती है, जबकि मैदानी इलाके के गली मोहल्लों में चिपचिपाहटत होती है..हर स्तर पर।
शाम को दरबे से निकल कर छत पर जाने की इजाजत थी...एक ही मकान में पच्चीस तीस परिवार रहते थे...वह मकान उस मोहल्ले के जमींदार का था...एक बदरंग शरीर वाला मुंशी सभी लोगों से हर महीने किराय वसुलने आता था, एक उबड़ खाबड़ साइकिल से।शाम को विभिन्न तरह के दो पाये छत पर या तो मंडलियों में बैठते थे या फिर छत पर टहलते हुये इधर उधर की बातें किया कहते थे...कपड़े उठाते, गेंहूं बटोरते, आम के बुआम को फेरते हुये महिलायें भी एक दूसरे में मजे लेते हुये छत पर इधर उधर दौड़ती रहती थी...अलग- अलग उम्र की अलग-अलग लड़कियों की टोलियां अपने अपने तरीके से व्यस्त रहती थी...छोटी छोकरियां कित कित खेलती थी, जबकि बड़ी छोकरियां छुआ छुत....और उनसे भी बड़ी छोकरियां ग्रुप में बैठकर अंतराक्षी के नाम पर अपने सुरीले सुर का जादू बिखेरती रहती थी...सबकुछ एक नया टेस्ट जैसा था....एक रक्षात्मक दूरी बनाकर सबकुछ को समझने की कोशिश कर रहा था...यह नागालैंड की घाटियों में खेले गये युद्ध के संस्कार से ओतप्रोत था...कहीं भी रहो तो लोगों से सुराक्षत्मक दूरी बनाकर रहो...जंग का पहला पाठ यही है....नगालैंड की घाटियों में सैनिकों की टोलियों से अक्सर मुलाकात होती थी....सैनिकों की एक टुकड़ी तो मेरे गर के बगल में ही डेरा डाले हुये थी...एक मुछैल सैनिक मुझे अक्सर अपनी पीठ की सवारी करता था...और मेरे हाथ में हथियार थमा देता था....खेल खेल में उन हथियारों से मैं उस पर निशाना साधता था....और जोर जोर से हंसता था...कभी कभी अपने मन मुताबिक काम भी ले लेता था...जैसे अपने हाकिम की गाड़ी उसे पसंद नहीं थी...मेरी हाथ में पत्थर थमा कर बोला था...उस गाड़ी की सारी लाइटें तोड़ डालों....और मैंने पलक झपते ही तोड़ दिये थे....शहर में रंग बिरंगे लोगों की यह नई बस्ती में तत्काल दीवानगी तक पहुंचाने वाली कोई बात नहीं थी....सबकुछ पीचपीचा था.....मुझे तो घाटियों में खोने का चस्का था...जिंदा पत्थरों को आपस में टकरा कर उनसे छिटकरने वाली चिंगारी को देखने और उसके बारुदी गंधों को नथूने में खींचने की आदत थी...वाकई में वह एक नशा था....और चिलम से लेकर ठर्रा और देसी विदेशी दारू गटने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उस नशे की बराबरी करना तो दूर ....ये सारे नशे उससे मीलों दूर हैं...बहरहाल, शहर की पटरी पर अपनी जिंदगी को बैठाने की नई जरूरत थी, और उस विषय में फिलासफिकाना तरीके से सोंच पाना भी मेरे लिये असंभव था....इंसान के अंदर सबसे महत्वपूर्ण चीज है उसका इंस्टिंक्ट.....और हर हर स्थान पर यही उसके साथ रहता है....दुनिया में सभी शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य इसी इंस्टिंक्ट को निखारना होना चाहिये....अक्षरों की पहचान और समय के साथ शब्दों के साथ इसकी समग्रता को समझना या समझाना तो अभ्यास का खेल है...यह मैकेनिज्म है....जिंदगी को ठोक-पीटकर चलाने के लिए बहुत सारे मैकेनिज्म का इजाद किया गया है, लेकिन जिंदगी तो अपना डग अपने स्टाइल से भरती है...नई जगह बचपन के लिए अक्सर असहज होती है...नये लोगों के साथ आप नये समीकरण में आते हैं...और इस समीकरण में आपका स्थान आपके इंस्टिक्ट से बनता है...उस वक्त आप दुनिया के सारे ज्ञान से अनभिज्ञ होते हैं...किताबी ज्ञान की तो बात ही छोड़ दिये दीजिये....वोदका में गड़गच्च होने के बाद कोनवालोव गोर्की को किताबें पढ़ते हुये देखकर बकबकाता था...अबे कीताबी कीड़े....तुम्हे प्रेम पत्र लिखना नहीं आता....नया मुहल्ला अपने आप में कुख्यात था...राज्य के सचिवालय के पीछे होने के बावजूद रात आठ बजे के बाद इस मुहल्ले में कोई भी रिक्शा वाला आने के लिए तैयार नहीं होता था...उनकी दिनभर की कमाई भी जाती थी और छूड़े लगने की भी पूरी गुंजाईश होती थी...बच्चों से लेकर बुढ़ों तक के गलेफड़े लड़ने झगड़ने के लिये फड़फड़ाते थे...उस मकान के नीचे एक भुआ वाली बुढ़िया थी...चूंकि उस मकान के पास एक पेड़ था और पेड़ पर जाड़े के दिनों में भुओं का अड्डा बन जाता था, वह पेड़ भुआ वाली बुढ़िया के जमीन के सामने था, इसलिये लोग उसे भुआ वाली बुढ़िया कहते थे...आर्शिवाद और गालियां उसके जुबान पर होती थी....नब्बे प्रतिशत गालियां और 10 प्रतिशत आर्शिवाद...कोठी का अंदर का माहौल और गली के माहौल बेसूरे संगीत से जुड़े हुये थे...अरे नटूरा वाला....इ साला चरेनिया के बेटवा...वहां के छोटे छोटे लौंडे इसी अंदाज में एक दूसरे को संबोंधित करते थे....सड़क पर पड़ी हुई सिगरेट के टुट्टियों को पीते थे....और एक दूसरे पर भूंकते और गुर्राते थे...वे लोग कुत्तों की तरह झुंड में हमला करते थे, और वो भी नियोजित तरीके से...पहली टक्कर पोसना से हुई...दर्जी की औलाद था...और बच्चों के उस गिरोह का खतरनाक लड़का समझा जाता था...उसके बारे में सब यही कहते थे कि चमरचीठ था...जिसको पकड़ लेता था उसे छोड़ता नहीं था..लंबे समय तक घर्षण करते हुये थका कर अपने सामने को पटकता था....मैं किचकिची गली से शाम के समय गुजर रहा था, पीछे से उसने एक लाता मारा...नगालैंड की घाटी में जैसे भेड़िये बच्चों पर टूटते थे, और बच्चे भेड़ियों से भिड़ते वैसे ही मैं उस से भिड़ गया...अपने दांतों और नाखूनों का उस पर खतरनाक तरीके से इस्तेमाल किया...उसके चिथड़े मेरे नाखूनों में थे...25-30 बच्चों की एक पूरी टोली मुझपर टूट पड़ी थी...
---जारी है

अथातो जूता जिज्ञासा-23

(भाई लोगों ने बड़ी राहत महसूस की होगी कि चलो अब जूता नहीं पड़ेगा. लेकिन नहीं साहब, जूता अभी थका नहीं है. अभी उसकी यात्रा पूरी भी नहीं हुई है. सच तो यह है कि जूता चिंतन जब अपने शवाब की ओर बढ़ ही रहा था, तभी मुझे यानी जूता चिंतक को वक़्त के कुछ जूते बर्दाश्त करने पड़ गए. बस इसीलिए जूता चिंतन को लिपिबद्ध करने की प्रक्रिया ज़रा थम सी गई थी. पर अब मैं फिर मैदान में हाजिर हूं और तब तक हाजिर ही रहूंगा जब तक कि फिर कोई जूता नहीं पड़्ता या चिंतन की प्रक्रिया अपनी चरम परिणति तक नहीं पहुंच जाती.)

अथातो जूता जिज्ञासा-22

जूते बनाने वाला हमेशा सबसे ख़राब जूते ही पहनता है, यह कहावत जितनी पश्चिम में सही है उससे कहीं ज़्यादा सही यह हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में है. ग़ौर करे तो आप पाएंगे कि हमारे भारत महान में तो बहुत दिनों तक जूते बनाने वाले के लिए जूते पहनना ग़ुनाह जैसी बात रही है. यहां जूते पहनने की अनुमति सिर्फ़ उन्हें ही रही है जो जूते चलाना जानते थे. बिलकुल वैसे ही जैसे फ्रांस की वह रानी साहिबा - मैरी अंतोनिएत. पर अब जूते बनाने वाले भी यहां जूते पहनने लगे हैं और यक़ीन मानिए उन्हें भी यह नसीब तभी हुआ है जब उन्होने जूते बनाने के अलावा जूते चलाने भी सीख लिए हैं.

जूते बनाते-बनाते चलाने लग जाने की प्रक्रिया की शुरुआत सच पूछिए तो संत कवि रैदास से शुरू होती है. अव्वल तो क़रीब पांच सौ साल पहले दी हुई उनकी एक कहावत भारतीय लोकमानस आज भी नहीं भूला है - मन चंगा तो कठौती में गंगा. हालंकि रैदास ने जब यह बात कही थी तब उन्होंने कोई कहावत कहने के लिए यह बात नहीं कही थी. असल में तो उन्होंने जूता ही चलाया था, पर ज़रा भिगो कर. या यूं कहें कि शहद में डुबो कर. जैसा कि भाई आलोक, भाटिया जी और इर्दगिर्द मेरे लिए कह चुके हैं. यह जूता उन्होने चलाया था उन कर्मकांडियों और चमत्कारप्रेमियों के मुखारविन्द पर जो धर्म के नाम पर सिर्फ़ कर्मकांडों की लकीर पीटते जाने के अभ्यस्त हो चुके थे. लकीर पीटने के वे इस हद तक अभ्यस्त हो चुके थे कि जिन रीति-रिवाजों के अनुपालन में वे अपना और अपने प्रति विश्वास रखने वालों का अच्छा-ख़ासा समय बरबाद करते थे, उनका निहितार्थ जानने की कभी कोशिश भी नहीं करते थे. बल्कि सच तो यह है कि अगर कोई दूसरा जानने की कोशिश भी करता तो शायद उसे उनका कोपभाजन भी बनना पड़्ता. क्या पता वे कौन सा कैसा शाप दे देते. क्योंकि उनके मूल मे जाने और निहितार्थों की तलाश करने से उनका अपना धन्धा जो चौपट होता था.

न हल चले न चले कुदाली

बैठे भोजन दें मुरारी

वाली उक्ति तो बस तभी तक सम्भव हो सकती थी, जब तक कि कोई इन बातों के निहितार्थ की तलाश न करता. निहितार्थ तलाशने की कोशिश हुई नहीं कि गए काम से. पर रैदास ने इनके निहितार्थ तलाशने की कोशिश की. वैसे जूते उनके पहले भी लोगों ने कर्मकांड पर चलाए. गोरख से लेकर कबीर तक, उनके भी पहले चार्वाक और बुद्ध भी ... जूते ही तो चलाते रहे.  पर उन्हें जूते बनाने का अनुभव नहीं था. बस इसीलिए उनके जूते बहुत दिनों तक चल नहीं सके.  वे थोड़े दिनों के नारे बन कर रह गए. कबित्त तो बने पर कहावत नहीं बन सके. रैदास की बात लोक की बात बन गई तो इसकी वजह शायद यही थी कि उन्होने चलाना बाद में, बनाना पहले सीखा था.

इसीलिए जब उन्होंने चलाना शुरू किया तो ताबड़्तोड़ चलाया और बड़े-बड़े जूतेबाजों को भी फिर हिम्मत नहीं हुई कि रैदास के सामने पड़ते. क्योंकि वह वही कह रहे थे जो बार-बार योगी कहते आए थे. उत्तमा सहजावस्था, मध्यमा ध्यान धारणा, अधमा तीर्थयात्रा च मूर्तिपूजा धमाधमा.  और अपने यह कहने में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आजकल हो रही शर्मनिरपेक्षता का भी कोई ख़याल नहीं किया.  साफ़ कहा-

कृस्न करीम राम हरि राघव, जब लगि एक न पेखा.

बेद कितेब कुरान पुरानन, सहज एक नहिं देखा.

जोइ-जोइ पूजिय सोइ-सोइ कांची, सहज भाव सति होई.

कहि रैदास मैं ताहि को पूजूं, जाके ठांव नांव नहिं होई.

उनके समय में भारत मिशनरियों के सेवा भाव और पुण्य प्रयासों से आक्रांत नहीं था. टीवी चैनलों के ज़रिये अरबों का कारोबार करने वाले परमपूज्य बाबाओं और राम के माध्यम से संसद पर कब्ज़ा करने की एकटक ताक में लगे भक्तों का भी तब कोई अता-पता नहीं था और शर्मनिरपेक्ष लोग तो तब होते ही नहीं थे, वरना यक़ीन मानिए इन्हें भी उन्होंने छोड़ा नहीं होता. बाद में जब गोसाईं बाबा डंके की चोट पर ऐलान कर रहे थे -

धूत कहो अवधूत कहो रजपूत कहो जोलहा कहो कोऊ

काहू की बेटी से बेटा न ब्याहब काहू की जात बिगारब न सोऊ

मांग के  खइहौं मसीत में सोइहौं, लेबै को एक न देबै को दोऊ.

तब उनकी हिम्मत का अधिकांश उसी धारा से आ रहा था, जिसकी शुरुआत रैदास ने की थी.

(चरैवेति-चरैवेति)

Wednesday, 1 April 2009

उन गालियों की कनेक्टिविटी अदभुत थी

कभी कभी दिमाग की दही निकल जाती है, आप सोचते कुछ हैं, चाहते हैं कुछ है और होता कुछ है...इनसानी खोपड़ी भी अजीब है। एसी स्थिति में बेहतर है दिमाग को रिर्वस में ले जाकर थोड़ी देर के लिए उन पलों को जिंदा कर कर लिया जाये,जिन्होंने कभी आपको गुदगुदाया है। यह एक थेरेपी है, जिसका इस्तेमाल आप कर सकतेहैं, और यकीनन आपको लाभ लोगा...कम से कम मुझे तो होता है। मुखा सिंह के बारे में एक कवावत प्रसिद्ध था, अपना मैल भी फ्री में नहीं देने वाले हैं...साठ साल के हो गये थे, लंबाई छह फीट चार इंच, हाथ में एक डंडा, मैली कुटैली धोती हमेशा ठेहूने तक लटकती थी...और उसकी उजली गंजी पूरी तरह से बदरंग हो चुकी थी...उस मटमैले मुहल्ले के कुछ लोगों ने उसके कान में फूंक दिया था, कि मरने के पहले कुछ एसा काम कर जाओ कि लोग याद करेंगे, वैसे भी तुम अगला जाड़ा नहीं झेस सकोगे...मरने के नाम पर वह लोगों हजारों गालियां निकालता था, दुनियाभर के तमाम रिश्तों के साथ उन गालियों की कनेक्टिविटी अदभुत थी...प्रतियोगिती परीक्षाओं में रिश्तों से संबंधित प्रश्न ठोकने वाले बाबू लोग भी कनेक्टिविटी निकालने में अकबका जाते....उदाहरण के दौर पर दादी धिकलों, बहिन छिनरों, आदि उसके जुबान पर होते थे। अपने आप आप को अमर करने की बात उस बुढ़े की खोपड़ी में धंस गई थी, और अपनी जमीन पर उसने एक धर्मशाला बना दिया था और एक बड़े से पत्थर पर मोटे-मोटे अक्षरों में अपना नाम खुदवा कर उसे टंगवा दिया था...रेलवे लाइन से सटा हुआ यह धर्मशाला मुहल्ला के तमाम लौंडो का मनोरंजन का स्थान था...जाड़े के दिनों में सब यहीं बैठकर धूप तापते थे, शाम को क्रिकेट खेलते थे और रात को दीवार की ओट में बैठकर दारू पीते थे...ढिबरी की रौशनी में यदायदा जुआ भी चलता था।...इस धर्मशाला से सटा हुआ एक मकान था, उसमें कई मकान मालिक के अलावा कई किरदार रहते थे...उस मकान में लौंडियों की संख्या अधिक थी, और उस मुहल्ले के सारे लौंडे उस मकान को अपना ससुराल समझते थे...गैंग का सबसे खतरनाक जासूस था मंगल जासूस....उसका बाप एक कम्युनिस्ट नेता था...और भाषण देने का एक भी मौका नहीं छोड़ता था...मंगल की जासूसी अदभुती थी...उस मकान के हर लौंडिया का वह पूरी खबर रखता था...यहां तक कि कौन सी लौंडियां ने आज कौन सी चड्डी पहन रखी है...कौन कहां जा रही है....आज किसके घर में क्या आया है...साला वह अदभुत चोर था, किसी भी चीज पर हाथ साफ कर देता था...इधर मंगल मुहल्ले की लौंडियों की खबर रखता था और उधर उसका बाप मुहल्ले की औरतों का...औरतों के बीच में यह बात प्रचलित थी कि मंगला का बाप साला गुंडा है....दो दो बीवी रखे हुये था...और उन दोनों से कितने बच्चे थे गिन पाना मुश्किल था....मंगला पहले नंबर पर था...किसी भी राइटअप का क्लामेक्स कहां होता है...राइटअप की शुरुआत कहां से करनी चाहिये...उसका मीडिल क्या हो....यानि की लिखने की तकनीक क्या हो...ब्लाग बाबा को थैंक्स देना चाहिये कि राइटिंग पर अब संपादकों का कब्जा नहीं रहा...लिखने के शुरुआती दिनों में एबे सिये के स्टाइल में एक चिरकूट अखबार को एक आलेख लिखकर दिया था....संपादक टाइप के चीज ने कहा था भाई इस अखबार में एसे नहीं लिखा जाता है...फार्मेट अलाउ नहीं करता है...एक काम करो तुम फ्रांस में जाकर लिखो....अब मंगला की कहानी कहीं से भी शुरु की जा सकती है...एक व्यापक चरित्र है....क्या वह फार्मेट में आ सकता है....इस आलेख में बहुत कुछ घूसेड़ना चाहता हूं....लेकिन एक साथ बहुत सारी चीजें मेरा इंतजार कर रही हैं।