Monday, 23 March 2009

तुम्हारी आंखें क्रिमिनल की तरह लगती है

आज तक मैंने भूत देखे नहीं है, लेकिन उनके किस्से खूब सुने हैं...इनसान के रुप में आरपी यादव भूत था...पूजा पाठ से उसका दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं था, लेकिन खिलाने के नाम पर वह मरघट में भी आ सकता था...उसके बिछापन पर चारों तरफ मार्क्स की मोटी-मोटी किताबें बिखरी रहती थी...और उन किताब के पन्नों पर ही वह पेंसिल से छोटे-छोटे अक्षर में अपने कामेंट्स लिखा करता था...हर चार वाक्य के बाद वह लोहिया का नाम जरूर लेता था...उसके गले में रुद्राक्ष की एक माला हमेशा रहती थी...पंद्रह मिनट पढ़ता था और पैंतालिस मिनट मार्क्स, लोहिया, जेपी आदि की टीआरपी बढ़ाता था...उसकी अधिकांश बातें खोपड़ी के ऊपर बाउंस करते हुये निकलती थी...उसकी जातीय टिप्पणी से कभी -कभी तो मार पीट तक की नौबत आ जाती थी...वह अपने आप को प्रोफेसर कहता था...वह एक एसे कालेज का प्रोफेसर था, जिसे सरकार की ओर से मान्यता नहीं मिली थी...वेतन के नाम पर उसे अठ्ठनी भी नहीं मिलता था, लड़को को अंग्रेजी पढ़ाकर वह अपने परिवार को चला रहा था...कभी-कभी वह अजीबो गरीब हरकत करता था...बड़े गर्व से वह बताता था कि उसके अपने ही जात बिरादरी वाले लोग उसका दुश्मन बन गये हैं, क्योंकि वह उनके उलुज जुलूल कार्यक्रमों में पहुंच कर उनकी आलोचना किया करता है...अपने बाप के मरने के बाद उसना अपना बाल नहीं मुड़ाया था...अपनी बेटी की शादी उसने मात्र पैंसेठ रुपये में कोर्ट में कर दी थी...उसकी बेटी अंग्रेजी में एम कर चुकी थी...कभी -कभी सनकने के बाद वह मार्क्स और लोहिया की भी बीन बजाने लगता था...उसके अंदर बेचैनी और भटकन थी...और यही चीज उसे बौद्ध धर्म की ओर ले गई...एक दिन अचानक उसने बुद्ध का गेरुआ लिबास पहनकर अपने आप को बौद्ध धर्म का अनुयायी घोषित कर दिया....और फिर चीन की ओर निकल गया....जाते जाते उसने मेरी अंग्रेजी अच्छी कर दी थी....मेरे दिमाग में अंग्रेजी की पटरी उसने बिछा दिया था, उस पर ट्रेन दौड़ाना मेरा काम था...

नगालैंड की ऊंची-नीची घाटियां मेरे दिमाग में हमेशा सरसराती है, बचपन में नगाओं के बीच में रहकर गुरिल्ला युद्ध को पूरी रवानगी से जीने लगा था....घाटियां में सरकते हुये उतरना और चड़ना वहां के बचपन के खेल में शामिल था...बरसात के दिनों में खेल का मजा उन्माद के स्तर से भी आगे निकल जाता था...हाथ-पैर और चेहरे से निकलने वाले खून लगातार खेलते रहने के लिये उकसाता था...दुनिया की सारी किताबों में डूबने का मजा एक तरफ और उस खेल का मजा एक तरफ...टोली में दोड़ते हुये लड़के मिट्टी के गोलों से एक दूसरे पर हमला करते हुये अपने आप को बचाते थे..मिट्टी के गोले कब पत्थर में तब्दील हो जाते थे, पता ही नही चलता था..

.बाद के दिनों में एक रुमानी मौके पर एक मेरे चेहरे को हाथ में लेने के बाद हिरणी जैसी आंखों वाली लड़की ने कहा था...तुम्हारे चेहरे पर चोरों की तरह कटने और छिलने के दाग हैं...खचड़ी साली...!!! पुलिस वाले के बेटे बेटियों को सभी चोर ही लगते हैं..गलती उसकी नहीं था...उसका बाप पुलिस में था, उसके घर पर ताले की जगह पर हथकड़ी लगे होते थे...एक दिन तो उसने हद ही कर दी थी...मेरी आंखों को गौर से देखते हुये कहा था, तुम्हारी आंखें क्रिमिनल की तरह लगती है। वह बेहतर चित्रकार थी....एक दिन अचानक गायब हुई और दो साल बाद दिल्ली आने के बाद उसने मुझे अचानक खोज निकला और बोली कि उसकी शादी हो गई है...उसका पति दिल्ली में ही रहता है...एक पुरुष के जीवन में एक से अधिक औरतों आती हैं, और उसी तरह एक स्त्री के जीवन में एक से अधिक पुरुष आता है, और दुनिया में सबसे कठिन है स्त्री और पुरुष के बीच की केमेस्ट्री को समझना...केमेस्ट्री करीब आने पर पुरुष और स्त्री की कई ग्रंथियां सक्रिय हो जाती हैं....और इस दौरान दिमाग के छोटे-छोटे तंतु कैसे वर्क करते हैं, पकड़ पाना मुश्किल होता है...बाद में यदि आपके अंदर काबिलियत है तो ठंडे दिमाग से इन तुंतुओं को टटोल सकते हैं या फिर टटोलने की कोशिश कर सकते हैं...मेरे एक दोस्ते का फेवरेट डायलाग हुआ करता था, मैंने 19 प्यार किये...9 को मैंने धोखा दिया, और 9 ने मुझे धोखा दिया...एक की कहानी मत पूछो...वह न जाने कैसे मेरी बीवी बन गई...उसके बाद से सबकुछ दि इंड हो गया...

चेखोव का एक नाटक था, नाम नहीं पता...उसमें एक पत्नी अपने पति से बेवफाई करती है...अंत में उसका पति सब कुछ जानने के बाद उसे माफ कर देता है...माफी देने के दौरान चेखोव ने उस पति के मुंह बहुत सारे डायलाग घूसेड़ दिये थे...उस नाटक का रिहर्सल भी शुरु हो गया था...रिहर्सल देखने चेखोव भी आया..पति के मुंह से निकलने वाले डायलाग खुद उसे अच्छे नहीं लगे...एक पैराग्राफ के डायलाग को वह एक वाक्य में बदल दिया...मैं तुम्हे माफ करता हूं ...क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो..

.लोग वेबफाई क्यों करते हैं...? शेक्सपीयर का एक डायलोग है...औरत तेरा दूसरा नाम बेवफाई है...शेक्सपीयर ने कुल 40 नाटक लिखे हैं, जिनमे से 4 गायब हो गये हैं, 36 हैं....उसका सबसे बेहतरीन नाटक है जूलियस सीजर...जूलियस सीजर लाजवाब है...पहले के लोग खूब पढ़ा करते थे...अब के लोग तो क्लासिक किताबों के फिल्मी एटेप्टेशन को देखकर ही काम चला लते हैं...प्रदूषण के कारण पीढ़ी दर पीढी पढ़ने की भूख में कमी आ रही है, हालांकि किताबों की बिक्री में उछाल आया है...किताब खरीदना फैशन में शामिल हो गया है।

लेडी चैटरली कितनी पढ़ी लिखी महिला थी...!!!उसकी ट्रेजेडी क्लासिक है...हाथ पकड़ कर वह अपने साथ बैठा लेती है, और अपनी उदासी में डूबो लेती है...लेडी मैकेबेथ की व्याख्या में दुनिया भर के आलोचकों ने बड़ी भारी भूल की है...एक पत्नी हमेशा अपने असित्व को अपने पति के उत्थान उत्थान के जोड़ कर देखती है...लेडी मैकेबेथ पत्नी का एक आर्दश रूप है...चपंडूस आलोचकों ने उसे चौथी चुड़ैल कर दे दिया है...

प्रसिद्धी के बावजूद बालजाक बड़ी गरीबी में रहकर लिख रहा था, रूस की एक प्रशंसिका का खत पाकर वह औनो-पौने दाम पर अपनी पांडुलियां बेचकर भाड़े का इंतजार किया और रूस पहुंच गया...वहां जाकर पता चला कि उसकी प्रशंसिका छह बच्चों की मां है...वह खुद भी बालजाक को अपने सामने पाकर पशोपेश में पड़ गई...फिर बालजाक की बातों को सुनकर उसे अपने पास यह कहते हुये रख लिया कि जैसे मेरे छह बच्चे रहे हैं वैसे तुम भी रहो...ये औरत चीज क्या है....नेपोलियन बोनापार्ट कहता था..तुम मुझे अच्छी मां तो मैं तुम्हे एक अच्छा राष्ट्र दूंगा...जोसेफिना को उसने क्लासिक लव लेटर लिखे हैं...आइंस्टिन के भी लव लेटर क्लासिक हैं, जो उसने डौली को लिखे हैं...आइंस्टिन नाजायज बच्चे का पिता बना था, हालांकि प्रकृति के नजर में पुरुष और स्त्री के बीच का संबंध नाजायज नहीं होता...जायज और नाजायज समाज का नजरिया है, जो वर्षों से बने हुये व्यवस्था से संचालित होता है...

मार्क्स की वाइफ का नाम जेना था, शायद पूरा नाम जेनिफर...मार्क्स ने उसको बहुत सारी कवितायों लिखी है...पता नहीं इसके दिमाग में मजदूरवाद कहां से घूस गया...हेगल के चक्कर में पड़ गया था...जेना मार्क्स को किस कहां लेती होगी...??उसका पूरा चेहरा तो घासों ढका हुआ था...यार कहीं ले, मेरी बला से...

हिरनी जैसी आंखों वाली लड़की को एक बार चुंबन ली थी, अरे वही..पुलिस वाले की बेटी...उसके मुंह से निकलने वाली बदबू से दिमाग भिन्ना गया था, बहुत दिनों तक मनोवैज्ञानिक प्रोबल्म का शिकार रहा...मन के किसी छेद में यह बात बैठ गई थी कि खूबसूरत लड़कियां ठीक से मूंह नहीं धोती....मुंबई में कई हीरोइनों के मुंह से भी बदबू आती है, एसा मेरा डायरेक्टर बता रहा था..

Saturday, 21 March 2009

अन्ना,आई लव यू...बला की तड़प थी तेरे अंदर

दिल्ली के लक्ष्मीनगर की तंग गलियों के क्या कहने...एक बार अंदर घुस गये तो खत्म होने का नाम ही लेता है...बस घुसते जाइये इस गलीसे उस गली में..भूलभूलैये की तरह है...कभी इन मैं इन तंग गलियों का अभ्यस्त था...घर से निकलते वक्त मेरे हाथ में कोई न कोई किताब होती थी, और पन्नों पर सहजता से आंखे गड़ाये हुये मैं इन गलियों निकल जाता था...एक भी कदम गलत नहीं पड़ते थे...सड़क पर चलते-चहते पढ़ने का नशा ही कुछ और है....यह आदत कब और कैसे लगी पता नहीं, लेकिन दिल्ली में इस आदत से बुरी तरह से ग्रस्त था...अभी भी यह आदत छुटी नहीं है...मुंबई की बेस्ट बसों में भी चलते-चलते पढ़ता रहता हूं।

पढ़ने का असली चस्का गोर्की से लगा था, मेरा बचपन, माई एप्रेंटिशीप...और माई यूनिवर्सिटी...इन तीनों किताबों को पढ़ने के दौरान ही गोर्की मेरा लंगोटिया हो गया था...उसे खूब पढ़ता था...खोज खोज कर पढ़ता था...उसके शब्द सीधे मेरा गर्दन पकड़ लेते थे, और फिर मैं हिलडुल भी नहीं पाता था...मेरी भूख तक उसने छिन ली थी...निगोड़ा कहीं का...एसे कहीं लिखा जाता है। मेरी खोपड़ी में वह बुरी तरह से घूसता गया, अपने शब्दों के माध्यम से। मां का एक कैरेक्टर है रीबिन....एक स्थान पर वह कहता है, मेरी हाथ खोल दो, मैं भागूंगा नहीं...सच्चाई से भाग कर मैं कहां जा सकता हूं...रीबिन हमेशा किसानों को लेकर बेचैन रहता है...एक जगह पर कहता है, चाहे खून की नदियां बहा दो, उसमें सच्चाई नहीं छुप सकती...गोर्की अपने कलम से दिमाग में ठंडा उन्माद उत्पन्न करता है, जिसका असर दिमाग पर चीरकाल तक बना रहता है, इसे कहते हैं लेखन....शायद मुझे पढ़ने का नशा गोर्की ने डाला था, जिसकी कीमत मुझे आज तक चुकानी पड़ रही है...

मां को मैंने पहली बार नौवी क्लास में पढ़ा था...एक कामगार यूनियन के नेता की लाइब्रेरी में यह किताब पड़ी हुई थी। उस नेता को न जाने क्या सूझी उसने किताब मेरे हाथ में थमा दी और बोला, इसे पढ़ो...लंबे समये तक उस किताब को मैंने छुआ तक नहीं...पड़ी रही...एक अनमनी सी दोपहरी में, जब करने को कुछ नहीं था, उस किताब पर नजर गई और एक बार पढ़ना शुरु किया तो बस पढ़ता ही चला गया...उसी दिन गोर्की का किटाणु अनजाने में दिमाग में घुस गया था, हालांकि पता नहीं चला था।

अकेले रहने के कई फायदे है, आप जब चाहे सुअर की थूथन उठाकर जिधर मन में आये चल दे...मकान मालिक से पंगा हो, कोई बात नहीं...कल से मकान खाली कर दूंगा...दिल्ली में खूब मकान बदलता रहा, कही न कहीं लगातार मकान बदलते रहने के पीछे गोर्की का किटाणु काम कर रहा था...विभिन्न परिस्थितियों में जिंदगी को देखने की इच्छा दिमाग के किसी कोने में कुलबुला रही थी...जब आप किसी को पढ़ते है तो उसके दिमाग का बीज आपके दिमाग में आ जांता है, और फिर वह अपने तरीके से ज्यामिति के नियमो से इतर जाकर आकार लेता है...उसका असर कहां-कहां हो रहा होता है आपको भी पता नहीं होता है, इसलिये बेहतर है अपने दिमाग का अपने तरीके से आपरेशन करते हुये उन चीजों को समझने की कोशिश की जाये जिनका सबंध आपसे है...

लक्ष्मीनगर का एक मकान मालिक अव्वल दर्जे का कंजूस था, और उसकी उसकी बेटी के पास कुत्ता था, जिसे वह खूब प्यार करती थी...और उस कुत्ते को प्यार करते हुये देखकर, उस मकान में रहने वाले सारे लौंडे उस कुत्ते का दुश्मन बने हुये थे...जाड़े के दिनों में वह अक्सर अपने छोटे से कुत्ते को गुनगुनी धूप में सैंपू से नहाने के बाद छत पर बांध देती थी, और काम करने के लिये नीचे चली जाती थी। इसके बाद लौंडे उस कुत्ते के नाक में छाडू के तिनके घुसेड़ते थे, और वह जोर-जोर से भौंकता था...उसकी भूक सुनकर वह लड़की भागी हुई छत पर आती थी...और इस तरह से लौंडे धूम में अपना बदन सेंकेते हुये अपनी आंख भी सेकते थे....लड़की का बाप 47 के बंटवारे के समय पाकिस्तान आया था, बुरी हालत में.., उसके लिये एक -एक पैसा किमती था...घनघोर असुरक्षा को झेलते हुये उसके दिमाग के किसी कोने में यह बात घुस गई थी कि सिर्फ पैसा ही उसे बचा सकता है...गोर्की इन चीजों को समझने के लिये उकसाता था...बेहतरीन किताबें वो होती है, जो आपको अंतरदृष्टि देती हैं...या यूं कहा जाये कि आपके अंतरदृष्टि को खोलती है...बाकी सब तो जोड़तोड़ है...समझने और समझाने की प्रक्रिया है...असल चीज है अंतरदृष्टि...लगता है कुछ फिलासिफिकल हो रहा हूं ...भाई हर आदमी फिलासफर है...

खैर दिल्ली और मुंबई की गलियो में भयानक असमानता है...मुंबई की गलियां कुछ ज्यादा ही तंग है...गोर्की का किटाणु आज भी गलियों की ओर खीच ले जाता है...कोई-कोई गली तो इतनी पतली है कि एक बार में एक आदमी ही उस गली से निकल सकताहै...गली में आपके सामने कोई लड़की आ गई तो उसके शरीर से रगड़ा खाने के लिये तैयार हो जाइये...मुंबई की ट्रैफिक का एक ही फार्मूला है...बस आगे निकलते रहो...इब्सन की एक कविताएं गोर्की को बहुत पसंद थी...किसी ब्लागर भाई के पास इब्सन की कोई कविता हो तो अपने ब्लाग पर चिपका कर उसका लिंक मुझे जरूर दे...यदि नोह की जहाज वाली कविता हो तो क्या बात है...महादेवी वर्मा की कवितायें मुझे पकाऊ लगती थी...मैं नीर भरी दुख की बदली-उमड़ी कल थी मिट आज चली....सुभद्रा कुमारी चौहान में ओज था...खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी...दिनकर दिमाग को पगलाता है.., वह कौन रोता है वहां इतिहास के अध्याय पर, जिसमें लिखा है नौजवानों की लहू का मोल है...दिमाग की खुजली कुछ शांत हो गई है...

पढने की तरह लिखना भी एक नशा है...इस नशे का कहीं कोई इलाज हो तो मुझे जरूर बताये...इसी तरह सोचना भी एक नशा है...अंद्रेई बोलोकोन्सकी प्येर से कहता है, इन किसानों की ओर देखो , जिस तरह ये बिना काम के नहीं रह सकते, वैसे ही तुम और मैं बिना सोंचे हुये नहीं रह सकते...तोलोस्तोव के शब्द भी दिमाग को पकड़ते हैं, लेकिन वे दिल में नहीं उतरते...तोलोस्तोव की लेखनी एक विशेष दिमागी स्तर की मांग करते हैं...अपने साथ काम करने वाली एक चुलबुली सी लड़की को मैंने तोलोस्तोव को पढ़ने के लिये उसे सजेस्ट किया था...एक सप्ताह बाद मुझे पर आकर बसर पड़ी...क्यों आप बकबास लेखकों को पढ़ने की सलाह देते हैं...मैंनं कहा, यार वह क्लासिक है...अपने बालों को झटकते हुये बोली, होगा अपने घर का...उसकी बाल के खुश्बू मेरे नथूनों से टकरा रहे थे, मैं पंगा के मूड में नहीं था...अब तोलोस्तोव के कारण आदमी अपना भविष्य क्यों खराब करे..

.अन्ना कैरेनिना, आई लव यू...बला की तपड़ थी तेरे अंदर...रूस में मरने वाले लोगों का स्वर्ग नरक, भारत में मरने वाले लोगों के स्वर्ग नरक से इतर है...पता नहीं....अन्ना कैरेनिना आपको डूबा ले जाएगी...मैं तो आज तक उससे निकल नहीं पाया हूं...स्कूल के दिनों में सभी लफाड़े मोहल्ले की लड़कियों को आपस में अपने तरीके से बांट लेते थे, हालांकि लड़कियो को इस बात की खबर तक नहीं होती थी...पूरे आत्म विश्वास से कहते थे...वो मेरी माल है.....भाई लोग, अन्ना कैरेनिना मेरी माल है....वैसे आप भी इसमें डूब सकते हो।

Friday, 20 March 2009

ईश्वर ने दुनिया बनाने से पहले एक सिगरेट सुलगाई होगी

ईश्वर ने दुनिया बनाने से पहले एक सिगरेट सुलगाई होगी..ये बात शायद रसुल ने ही लिखी थी...मैं भूलता बहुत ज्यादा हूं...किसी दिन सांस लेना न भूल जाऊ...वैसे स्वाभाविक क्रियाओं को भूलने से कोई संबंध नहीं है...डर की बात नहीं है, सांस लेना नहीं भूलूंगा...सिगरेट के बारे में एक डायलोग है...अब किसने लिखा है याद नहीं है...कुछ बुझौवल टाइप का है...वह कौन सी चीज है जो खींचने पर छोटी होती है...सिगरेट पर कुछ बेहतरीन फिल्मी गाने भी बने हैं...सबसे प्यारा गाना है...हर फिक्र को धुयें में उड़ता चला गया...एक समय था जब मैं रेलगाड़ी की तरह धुयें उड़ाता था...स्कूल जाने से पहले ही मुहल्ले के आवारा दोस्तों के साथ सिगरेट का कश लगाने लगा था...वो बस्ती ही एसी थी...स्कूल में कई दोस्तों को सिगरेट पीने की आदत डाल दी थी...बुरी लत बचपन में ही लगती है....अच्छा होता लाइफ में
एक टेक मिलता...कई चीजें ठीक कर लेता...
आप पहली-पहली बार किसी लड़की को लव लेटर लिखे...और हिम्मत करके उसे थमा दे...शाम को उसका बाप आपके घर पर आ धमके और आपकी कान खींचते हुये आपके लेटर में से ग्रैमेटिकल गलतियां दिखाये...तो आप क्या करेंगे। और दूसरे दिन से आपके सभी जानने वाले उन ग्रैमेटिकल गलतियों को लेकर आपकी खिल्ली उड़ाते रहे...इस तरह के मंजर में रिटेक कैसे लिया जा सकता है...जिस समय दुनिया यंग्रीमैन अमिताभ बच्चन की दीवानी थी उस वक्त मैं इसी तरह के दौर से गुजर रहा था...दीवार स्टाइल में अपने कुर्ते के नीचे के दो बटन को तोड़कर उसमें गांठ बांधकर स्कूल में उसी तरह से पहुंचा था...मैथेमैटिक्स का मास्टर बहुत मरखंड था...पता नहीं क्यों मैथेमेटिक्स के सारे मास्टर मरखंड क्यों होते हैं....दे धबकिया शुरु कर दिया...सात दिन तक स्कूल के बाहर बैठकर उसे पीटने की योजना बनाता रहा...कभी कमर में साइकिल का चैन लेकर आता, तो कभी मोहल्ले के किसी आवारा दोस्त के पास से चाकू....लेकिन उसके सामने आते ही हिम्मत जवाब दे देती थी...पता नहीं ये सब मैं क्यो लिख रहा हूं...बस यूं ही इच्छा हो रही है....हां तो मामला ये बनता है कि आपकी जो इच्छा करे लिखे...मैं तो आजकल यही कर रहा हूं...देखता हूं कब तक कर पाऊंगा..
.उस समय एबीसीडी की शुरुआत छठे क्लास से होती थी...हि इज मोहन, सी इज राधा...इस तरह के छोटे-छोटे सेंटेंस रहते थे...लटकते लुटकते राम भरोसे दसंवी तक पहुंच गया...किताब क्या होता है पता ही नहीं था...इंटर में आने के बाद लड़कियों के एक अंग्रेजी स्कूल में कुछ कार्यक्रम में लफंदरीय करने के लिये पहुंच गया, पूरे गैंग के साथ...एक लड़की ने अंग्रेजी में एसी डांट लगाई कि पूरे गैंग का हाथपांव ठंडा हो गया...सबकोई दूम दबाकर के इधर उधर भाग निकले...लेकिन मुहल्ले के दोस्तों की बहनों को पता चल गया था कि कैसे अपन लोगों की मिट्टी पलीद हुई है...गैंग के सभी लड़कों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया था...गंभीर विचार विमर्श के बाद सभी लोगों ने अंग्रेजी सीखने का फैसला किया...एक प्रोफेसर को पकड़ा गया...नाम था आरपी यादव...प्रत्येक लड़कों से महीने में वह एक सौ पच्चीस रुपया लेते थे...और सप्ताह में तीन दिन पढ़ाते थे...उनका पढ़ाने का अंदाज में भी निराला था...एक ही बार में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की डिस्कवरी आफ इंडिया पकड़ा दी....गैंग के लड़कों ने कहा कि सर आप पगला गये हैं का...इहां एबीसीडी भुझाइये नहीं रहा है...और आप एक बार हिमालय पर चढ़ा दिये....गुस्सा उनके आंख, कान, नांक और भौ से फूटते रहता था...थोड़ा सनकी थे...बोले, सालों जो मैं पढ़ाता हूं वह पढ़ो, नहीं तो भागों यहां से...
खैर डिस्कवरी आफ इंडिया में से वह एक पैराग्राफ उठाते थे और बारी बारी करके सभी लौंडो से रीडिंग डलवाते थे, और फिर कहते थे कि इसको घर पर जाकर कम से कम तीस बार पढ़ना...अंग्रेजी सीखाने के मामले में ट्रांसलेशन मैथेड के तो वह पक्के दुश्मन थे और इस मैथेड पर चले वाले अंग्रेजी के सभी उस्तादों को चीख चीख कर के गालियां देते थे...दस दिन में अंग्रेजी पढ़ना सीख गया..पहले टो टो करके पढ़ता था, फिर धड़ल्ले से। लेकिन उसके अर्थ से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था...आरपी यादव ने कह रखा था कि अभी अर्थ समझने की जरूरत भी नहीं है, बस बिना सोचे समझे पढ़ते जाओ...दस दिन बाद उन्होंने सभी लड़कों को दो किताबें खरीदने को कहा, एलेन की इंग्लिश लिविंग स्ट्रक्चर और थामस और मार्टिन की प्रैक्टिकल इंग्लिश एक्सरसाइज बुक...सीधे इन्होंने क्लाउज एक्सरसाइज में ढकेल दिया...नाउन क्लाउज, एडजेक्टिव क्लाउज...और न जाने कौन कौन सा क्लाउज...वह छोटा छोटा मैथेमैटिकल फार्मूला देते थे और कहते थे कि इन क्लाउजों के साथ कुश्ती करो...पांच सेंटेस सामने तोड़वाते थे और दो सौ सेंटेस घर से तोड़कर लाने के लिए कहते थे...घर से तोड़कर नहीं लाने पर गैंग के लौंडों की मां-बहन एक कर देते थे...पढ़ाने के दौरान वह एक बेड पर लेते रहते थे, और गालियां उनके मुंह से टपकती रहती थी...गैंग के सभी लौंडों ने मैदान छोड़ दिया, एक मैं ही बचा रहा...छह महिना के बाद तो मैं जान स्टुअर्ट मिल की आन लिबर्टी को अपने तरीके से पी रहा था, उसी की भाषा में।
एडम स्मिथ ने एक बहुत ही अच्छी बात कही है, किसी भी चीज को सीखने में सात दिन से ज्यादा समय नहीं लगनी चाहिये...हां नई चीज की खोज में आपके साठ साल भी लग सकते हैं...
आरपी यादव का थोबड़ा बनैले सुअर की तरह था, और आंखे छोटी-छोटी अंदर की ओर धंसी हुई, जिनमें अक्सर किंची लगा होता था...। एक कान हाथी की तरह बड़े थे, और दूसरा चमगादड़ की तरह छोटा...जब उसका हाथ उसके छोटे कान पर जाता था तो वह बौखला जाता था...बोलता था, मेरे इस कान को एक ब्राह्मण ने मरोड़ दिया था, बच्चा में मैं उसकी खाट पर बैठ गया था...अब कोई ब्राह्मण मेरी कान को मरोड़ कर दिखा दे, एसा घूंसा मारुंगा कि पाताल लोक में चला जाएगा...पता नहीं इन बातो का सेंस है या नहीं...

Tuesday, 17 March 2009

किस डाक्टर ने कहा है सोच सोच कर लिखो

किस डाक्टर ने कहा है सोच सोच कर लिखो...जिस तरह से लाइफ का कोई ग्रामर नहीं है, उसी तरह से लिखने का कोई ग्रामर नहीं है...पिछले 12 साल से कुत्ते की तरह दूसरों के इशारे पर कलम चलाता रहा, दूसरों के लिखे को एडिट करता रहा...हजारों बार एसे विचार दिमाग में कौंधे, जिन्हें पर उसी वक्त खूब सोचने की जरूरत महसूस करता रहा, और फिर समय की रेलम पेल में उड़ गये...ना बाबा अब सोच सोच कर मैं लिखना वाला नहीं है..बस दिमाग में जो चलता जाएगा वो लिखता जाऊंगा..
.मेरा दागिस्तान...इसी किताब में एक कहानी थी...एडिट करने वाले संपादक की...उसके पास जो कुछ भी जाता था, वह उसे एडिट कर देता था, उसे इसकी खुजली थी। यहां तक की कवियों की कवितायों में भी अपनी कलम घूसेड़ देता था...एक बार एक सनकी कवि से उसका पाला पड़ गया, उसकी कविता को उस संपादक ने एडिट कर दिया था। सनकी कवि ने कुर्सी समेत उसे उठा कर बाहर फेंक दिया...
मेरा दागिस्तान में बहुत सारे गीत हैं...और रूस का लोक जीवन है। यह किताब सोवियत संघ के समय के किसी रूसी लेखक ने लिखी थी...पढ़ते समय अच्छा लगा था...मुझे याद है एक बार मेरे हाथ में आने के बाद मैं इससे तब तक चिपका रहा था जब तक इसे पूरी तरह से पी नहीं गया...लगातार तीन दिन तक में यह किताब मेरे हाथ में रही थी.
कालेज के दिनों में कम कीतम होने की वजह से रूसी किताबें सहजता से पहुंच में थी...इसलिये उन्हें खूब पढ़ता था...गोर्की ने भी एक संपादक की कहानी लिखी थी, जो धांसू संपादकीय लिखने के लिए अपनी एड़ी चोटी की जोड़ लगा देता था, और हमेशा इस तरह से घूमता था मानों उसके सिर पर ही सारी दुनिया का भार टिका हुआ है। टाइपिंग पर काम करने वाले एक मजदूर ने एक बार खुंदक में आकर उसका संपाकीय में से कुछ शब्द ही बदल दिये थे,..फिर तो संपादक ने भौचाल खड़ा कर दिया था....भला हो तकनीक क्रांति का, भला हो ब्लाग की दुनिया का जिसने संपादकों से मुक्ति दिला दी...बस अब लिखो और चेप दो...मामला खत्म। जिनको पढ़ना है, पढ़े, नहीं पढ़ना है, चादर तानकर सोये...या फिल्म देखे...या फिर जो मन में आये करे...अपना तो दिमाग का कूड़ा तो निकल गया...
अब मिस मालती याद रही है, गोदान वाली मिस मालती, जिस पर फिलासफर टाइप के डाक्टर साहेब फिदा हो गये थे...शुरु शुरु में डाक्टर साहेब ने ज्यादा भाव नहीं दिया था, उन्हें लगा था कि विलायती टाइप का कोई देशी माल है...माल इसलिये कि कालेज दिनों में सारे यार दोस्त लड़कियों को माल ही कहते थे, हालांकि इस शब्द को लेकर में हमेशा कन्फ्यूज रहा हूं, क्योंकि उसी दौरान मेरे मुहल्ले के खटाल में गाय, भैंस रखने वाले ग्वाले अपने मवेशियों को माल ही कहा करते थे...उनके साथ लिट्टी और चोखा खाने में खूब मजा आता था...खैर, डाक्टर साहेब को धीरे-धीरे अहसास हो गया कि मिस मालती ऊंची चीज है, एक आर्दशवादी टाइप के दिखने वाले संपादक को अपने रूप जाल में फंसा कर दारू पीलाकर धूत कर देती है। वह बहुत ही अकड़ू संपादक था, एड बटोरने के लिए जमींदारों को अपने तरीके से हैंडिल करता था....प्यार का फंडा बताते हुये डाक्टर साहेब मिस मालती से कहते हैं, प्यार एक शेर की तरह है जो अपने शिकार पर किसी की नजर बर्दाश्त नहीं करता है...हाय, मालती ने क्या जवाब दिया था...ना बाबा ना मुझे प्यार नहीं करना, मैं तो समझती थी प्यार गाय है...
इधर चैट बाक्स पर चैट कर रहा हूं और लिख भी रहा हूं...लिखने का है कोई ग्रामर...? लोग मास्टर पीस कैसे लिख मारते हैं...तोलोस्तोव को युद्ध और शांति लिखने में छह साल लगे थे, 18 ड्राफ्टिंग की थी...यह किताब तो बहुत शानदार है, लेकिन तोलोस्तोव ने इसमें डंडी मारी की है, नेपोलियन की महानता को मूर्खता साबित करने पर तूला हुआ है...और रूसी जनता की जीजिविषा को मजबूती से चित्रित किया है...यदि रूस को सही तरीके से देखना है तो गोर्की और तोलोस्तोव को एक साथ पढिये....तोलस्तोव बड़े घरों की बालकनी और बाल डांस से लेकर डिप्लौमैटिक और सैनिक रूस को बहुत ही बेहतर तरीके से उकेरता है, तो गोर्की गंदी बस्तियों के दमदार चरित्रों को दिखाता है....वैसे फ्रांसीसी लिटरेचर भी मस्त है, वहां पर बालजाक मिलेगा...उसका किसान पढ़ा था, क्या लिखता है ! आपके सामने भारत के किसान नहीं घूमने लगे तो आपका जूता और मेरा सिर...भाई लोग पढ़ने के बाद अच्छा न लगे तो जरा धीरे मारना, और यदि मजा आये तो आप लोग उन किताबों के बारे में बताना जिनका असर आज तक आप पर किसी न किसी रूप में है...आज इतना ही, दिमाग कुछ हल्का हो गया है, अब एक मेल भी लिखना है...मेल मजेदार चीज है....मेल की अनोखी दुनिया पर एक नोवेल लिख चुका हूं...कोई पब्लिसर हो तो जरूर बताये, जो अच्छी खासी रकम दे...भाई लिख लिखकर अमीर होना है...जीबी शा ने अपनी लेखनी से दो साल में मात्र 50 रुपये कमाये थे...अभी तक उनक भी रिकार्ड नहीं तोड़ पाया हूं...कोई गल नहीं...सबसे बड़ी बात है अपने तरीके से लिखना, और वो कर रहा हूं...जय गणेश,जय गणेश, जय गणेश देवा....

Saturday, 14 March 2009

लिखने के लिये कोई सबजेक्ट चाहिये...भांड़ में जाये सबजेक्ट

क से कबूतर, ख से खरगोश, ग से गधा, घ से घड़ी...ए से एपल, बी से ब्याय, सी से कैट...बहुत दिनों से कुछ न लिख पाने की छटपटाहट है...लिखने के लिये कोई सबजेक्ट चाहिये...भांड़ में जाये सबजेक्ट...आज बिना सबजेक्ट का ही लिखूंगा...ये भी कोई बात हुई लिखने के लिए सबजेक्ट तय करो...ब्लौग ने सबजेक्ट और संपादक को कूड़े के ढेर में फेंक दिया है...जो मन करे लिखो...कोई रोकने वाला नहीं है।
अभी मैं एक माल के एसी कमरे में बैठा हूं, और एक मराठी महिला सामने की गैलरी में झाड़ू लगा रही है और किसी मराठी मानुष के साथ गिटर पिटर भी कर रही है। मुंबई में मराठी महिलाओं की मेहनत को देखकर मैं दंग रह जाता हूं...जीतोड़ मेहनत करने के बावजूद उनके चेहरे में शिकन तक नहीं होती...मुंबई के अधिकांश दफ्तरों में आफिस के रूप में मराठी मानुष ही मिलते हैं। दसवी से ज्यादा कोई शायद ही पढ़ा हो...लेकिन ये मेहनती और इमानदार होते हैं...इसके बावजूद ये नीचले पायदन पर हैं...किताबों में इनका मन नहीं लगता है...अब न लगे अपनी बला से...
आज का नवभारत टाइम्स मेरे डेस्क पर पड़ा हुआ है, हेडिंग है भारत ने दिया पाकिस्तान को जवाब...दबाव में झुके जरदारी...खत्म हुई रार, बीजेपी शिव सेना युति बरकरार...यहां के अखबारों पर चुनावी रंग चढ़ रहा है..
.अभी कुछ देर पहले एक फिल्म की एक स्क्रीप्ट पर काम कर रहा था...35 सीन लिख चुका हूं...दिमाग थोड़ा थका हुआ है...उटपटांग तरह से लिखकर अपने आप को तरोताजा करने की कोशिश कर रहा हूं...आजकल मनोज वाजपेयी ने दारू पीनी छोड़ दी है...अभी कुछ देर पहले ब्लागवानी का चक्कर काट रहा था...बस हेड लाइन पर नजर दौड़ाते हुये आगे भागता गया...नई दुनिया पर आलोक तोमर के आलेख को पढ़ने पर मजबूर हो गया...इसे दो अन्य ब्लाग पर भी चिपकाया गया है...शराब और पत्रकारिता में क्या संबंध है?...कुछ भी हो मेरी बला से....वैसे पत्रकारिता में था तो मैं भी खूब पीता था...मेरा पसंदीदा च्वाइस था वोदका...आज भी मौका मिलने पर गटक ही लेता हूं...वोदका गटकने के बाद डायलोगबाजी करने में मजा आता है...मेरा डायरेक्टर भी वोदकाबाज है...अक्सर मुझे अपने साथ बैठा ही लेता है...और फिर बोलशेविक क्रांति से लेकर हिटलर तक की मां बहन एक करने लगता है...उसे सुनने में मजा आता है....दुनिया में बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें सुनने में मजा आता है.
..कैप्टन आर एन सिंह की याद आ रही है...धूत होकर पीते थे...और अपनी बनारसी लूंगी पर उन्हे बहुत नाज था...ठीक वैसे ही जैसे मेरे दादा को अपने पीतल के लोटे पर...बहुत पहले गोर्की की एक कहानी पढ़ी थी...जिसमें उसने यह सवाल उठाया था कि आदमी लिखता क्यों हैं..?.या फिर उसे क्यों लिखना चाहिये...?आज तक इसका कोई सटीक जवाब नहीं मिला....किसी के पास कोई जवाब हो तो जरूर दे....जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही हर लड़की कविता क्यों लिखती है..?..कालेज के दिनों में पढ़ने की आदत सी बन गई थी...लिखने की शैली देखकर बता सकता था कि इसे किस लेखक ने लिखा है...लेडी चैटरली और अन्ना करेनिना मेरे प्रिय करेक्टर थे....युद्ध और शांति की नताशा का भी मैं दीवाना था...जवान होते ही प्यार अंद्रेई बोलोकोन्सकी से करती है, भागने की तैयारी किसी और के साथ करती है और शादी प्येर से करती है....प्येर भी अजीब इनसान था भाई...युद्ध को देखने का शौक था...वाह क्या बात हुई...बुढ़ा होने के बाद तोलस्तोव की कलाम जवान हो गई थी...वैसे वह शुरु से ही अच्छा लिखता था...
.एक किताब पढ़ी थी पिता और पुत्र...राइटर का नाम भूल रहा हूं....लोग भूलते क्यों है...शायद दिमाग के डेस्कटाप में सारी बातें नहीं रह सकती...वैसे मनोविज्ञान में भूलने पर बहुत कुछ लिखा गया है...खैर पिता और पुत्र का निहिलिस्ट नायक लाजवाब था...डाक्टरी की पढ़ाई पढ़ रहा था....उसकी मौत कितनी खतरनाक है...अच्छी चीज पढ़े बहुत दिन हो गये...वक्त ही नहीं मिलती...अब लगता है कुछ फ्रेश हो गया हूं...आदमी अपने दिमाग का अधिक से अधिक कितना इस्तेमाल कर सकता है...पता नहीं...एक बार अखाबर की दुनिया में काम करते हुये मैंने अपने अधिकारी से पछा था...कौवा काले ही क्यों होते हैं...?अपने सिर को डेस्क पर पटकते हुये उसने कहा था...मुझे क्या पता...दिमाग के थक जाने के बाद अक्सर में यूं ही सोचा करता हूं...बे सिर पैर की बात...क्या वाकई गधों के पास दिमाग नहीं होता...? गैलिलियों को क्या जरूरत थी ग्रह और नक्षत्रों की गति के बारे में पता लगाने की....? खाता पिता मस्त रहता...पोप की दुकान चलती रहती...मार्टिन लूथर ने भी पोप की सत्ता को ललकारा था...दोनों ठरकी थे....और नही तो क्या...? न दूसरों को चैन से बैठने दिये और न खुद चैन से बैठे...मारकाट फैला दिया...वैसे गलती उनकी नहीं थी...लोग सहनशील नहीं होते...अरे कोई आलोचना कर रहा है तो करने दो...दे धबकनिया की क्या जरूरत है...? मुंबई में कठमुल्ले लाउडस्पीकर पर गलाफाड़ फाड़ के अल्लाह को पुकारते हैं...देर रात तक काम करने के बाद आपकी आंख लगी नहीं कि ...बस हो गया...भाई ये भी कोई बात है...ठीक से न सोने की वजह से यहां के अधिकतर लोगों की आंखें दिन भर लाल रहती है...
अब गाना गाने का मन कर रहा है...रातकली एक ख्वाब में आई...सुबह गले का हार हुई...सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे...जाड़ा में बलमा प्यारा लगे...पुरानी गानों की बात कुछ और थी...मिलती है जिंदगी में मोहब्बत कभी-कभी ...छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा...अब टाईम हो गया है...जा रहा हूं बाहर की ताजी वहा खाने...जाते जाते....गणेश जी चूहा पर कैसे बैठते होंगे ?

Monday, 9 March 2009

माही वे तैनू याद करां, ने मेरी जिंदगी पलट दी

पंजाब सिर्फ खान पान में ही अव्वल नहीं है, गीतों और संगीतों की भी यहां समृद्ध परंपरा रही है। सूफी गायकी से लेकर, इश्क और शराब में डूबी उम्दा गीतों की यहां पर जबरदस्त रचना हुई है, और समय समय पर इन गीतों को बेहतर आवाजा देने वाले शानदार गायक भी ऊभरें हैं। गायकी की इस परंपरा में एक नाम जुड़ा है एम के( मनोज कुमार)। मनोज हर शैली की गीतों को अपनी आवाज देकर पंजाब की गायकी परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं। मुक्तसर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे एम के को बचपन से ही गायकी का शौक था। इनकी स्कूली शिक्षा अमृतसर के नवजोत मार्डन हाई स्कूल में हुई। आगे की शिक्षा के लिए यह दिल्ली आ गये। स्कूल और कालेज में होने वाले कार्यक्रमों अक्सर ये अपनी आवाज का जादू चलाते थे। लेकिन उस वक्त इन्हें पता नहीं था कि इनकी मंजिल मुंबई है। आइये जाने इनकी कहानी इन्हीं की जुबानी .....
मैं अक्सर अपने पिता जी के काम में मदद करता रहता था। इस सिलसिले में मुझे अक्सर ट्रेनों में सफर करना पड़ता था, कभी आगरा, कभी ग्वालियर कभी भोपाल, कभी जयपुर तो कभी अजमेर। दूर दूर तक मुझे यात्रा करनी पड़ती थी. सफर में अजनबियों से ज्यादा घुलना मिलना नहीं चाहिये, यह बात अक्सर मेरे पिता जी मुझे समझाते थे, लेकिन सफर में अकेले बैठे बैठे बोरियत महसूस होने लगती थी, मैं सीट पर बैठे-बैठे हल्की आवाज में गुनगनाता रहता था। कभी -कभी तो मुझे एसा महसूस होता था कि मेरी आवाज तो बिल्कुल एसी मिलती जुलती है, जैसे कभी मैंने अक्सर रेडियो और टीवी पर गायकों को गाते हुये सुना करता था। कभी कभी तो मुझे भी अचंभा सा महसूस होता था कि मैं गायक तो हूं नहीं लेकिन आवाज एसे लग रही है, जैसे मैं नहीं कोई सिंगर ही गा रहा हो। अकेलेपन का सिर्फ एक ही साथी होता था, गाना। पता नहीं धीरे-धीरे कब मैं इसमें अभ्यस्त हो गया।
गायक बनने की तो शायद मैंने ख्वाबों में भी नहीं सोची थी। मेरी मां अक्सर मुझे कहती थी कि बेटा जब तू पैदा होने वाला था, तो मैंने बहुत व्रत रखे, पूजा की, ईश्वर की आराधना की कि मेरी जो औलाद है वो बड़ा होकर खूब नाम कमाये। मां कहती थी मुझे यह तो नहीं पता था कि वह क्या बने लेकिन बस एक ही तमन्ना थी कि मेरा होने वाला बच्चा दुनिया में अपना नाम रोशन करे। शायद उन्हीं की प्रार्थनाओं का नतीजा है कि ईश्वर ने कोई न कोई साधन बनाकर मुझे आज एसी जगह पर खड़ा कर दिया।
एक दिन मैं अपन दोस्तों के साथ दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर जा रहा था, तो रास्ते में एक महिला मित्र बोली कि वह एक गजल सुनाना चाहती है। और हम सबने उसकी गजल सुनी। गजल सुनाने के बाद वह खुद की ही तारीफ करने लग गई कि देखो मेरी कितनी अच्छी आवाज है। मुझे थोड़ा सा उनके इस अभिमान भरे शब्दों को सुनकर एसा लगा कि एसी तो कोई बात नहीं जो इतना इतराया जाये। तो मैंने कहा कि मैं भी एक गाना सुनाता हूं। जब मैंने गाना शुरु किया तो पूरी कार में सन्नाटा सा छा गया। मेरे मित्रों ने मुझे कहा कि कमाल है, पागल तेरे अंदर तो सिंगर छुपा हुआ है। मैंने मजाक में टालते हुये कहा कि नहीं मुझे तो पूरा गाना भी नहीं आता। मैं सिंगर कैसे हो सकता हूं। उनमें से एक दोस्त गिरीश ने कहा, कि सिंगर एसे ही होते हैं। मैं तो सिंगरों के साथ रहा हूं और मुझे पता है कि तेरे में क्या क्वालिटी है। उसने मुझे बहुत प्रेस किया कि तू मेरे साथ एक बार मुंबई चल और मैं तुझे बाबू सिंह मान जी(पंजाब के जाने माने लेखक)से मिलवाता हूं। वो मेरे रिश्तेदार हैं और उन्होंने तेरे सिर पर हाथ रख दिया, तो समझ ले तेरी जिंदगी बन गई। पहले तो मैं टाल मटोल करता रहा, पर उसके बार बार समझाने पर मैं मुंबई आने को राजी हो गया। मान साहेब से मिला। उन्होंने मुझे सुना और कहा,बेटा मैं तो लेखक हूं, वैसे तेरी आवाज में तो बहुत कशीश लग रही है,बांधने वाली आवाज है। लेकिन फिर मैं तुझे म्युजिक डायरेक्टर से मिलवाता हूं।
उन्होंने एक दो म्युजिक डायरेक्टरों से मिलवाया और मेरा वायस टेस्ट करवाया। उनका उत्तर सकारात्मक मिला। और मान साहेब ने मेरे लिए गाने लिखने के मेरे आग्रह को स्वीकार किया और अपनी लेखनी से मुझे आठ गीतों के रूप में आर्शिवाद दिया। उनका एक, गीत माही वे तैनू याद करां, हर चरखी दे गेड़े ने रातों रात मेरी जिंदगी पलट दी। और आज मैं आप लोगों के सामने हूं। कुदरत भी बड़ी महान है। जब वो जिससे वो जो चाहती है, करवा ही लेती है। परमात्मा के रंग बड़े निराले हैं, अगर वो मेहरबान हो जाये, तो आपको कुछ आता हो या ना आता हो, वो मंजिल पर पहुंचा ही देता है। आप मेरे गीतों को माही वे एलबम में सुन सकते हैं। मेरे साइट http://www.mksinger.com/ पर जाकर फ्री में डाउनलोड भी कर सकतेहैं।

Friday, 6 March 2009

अँधेरा मिटेगा एक न एक दिन

विज्ञान भूषण

कहते हैं कि अँधेरा कितना भी गहरा और भयावह क्यों न हो उसे भी एक न एक दिन मिटना ही होता है। रोशनी की एक किरण चारो ओर बिखरे असीमित तमस को चीरकर जीवन ऊर्जा का संचार कर देती है। प्रकृति का यह नियम हम सबके जीवन पर भी अक्षरश: लागू होता है। इसे हमारे समाज की विडंबना ही कहना चाहिए कि वैज्ञानिक और आर्थिक स्तर पर विकास के उच्चतम सोपानों पर पहँुचने के बाद भी हमारी सोच, आज भी पुरुषवादी मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है। सार्वजनिक स्थलों और मीडिया में हम भले ही नारी स”ाक्तिकरण  के बड़े-बड़े दावे क्यों न कर लें लेकिन इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि घर के भीतर और बाहर  स्त्री नाम के जीव को अपना अस्तित्व और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए हर क्षण जूझना पड़ता है। शारीरिक और उससे बहुत ज्यादा मानसिक स्तर पर होने वाले इस संघर्ष की पीड़ा को कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है।
कथाक्रम जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़ी रचनाकार रजनी गुप्त का तीसरा उपन्यास ‘एक न एक दिन’ हाल में ही किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका ने नारी मन में घटित होने वाली उस टूटन-फूटन को बहुत शिद्दत से महसूस किया है, जो अक्सर हमारे आसपास होती रहती है लेकिन पौरुष के दंभ में उसका रंच मात्र भी एहसास नही होता है। उपन्यास की दो प्रमुख स्त्री पात्र कृति और अनन्या हैं , जो अलग अलग परिस्थितियों के चलते अपने दांपत्य जीवन से विमुख हो जाती हैं। जहाँ एक तरफ कृति को उसके पति चौहान साहब ने तानाशाही प्रवृत्ति के चलते छोड़ दिया वहीं दूसरी तरफ अपने काम में मशगूल रहने वाले और पिता बनने में अक्षम राजीव, अनन्या से अपना रिश्ता तोड़ लेते हैं। अपने पति से अलग होने के बाद भी दोनों स्त्री पात्र अपनी अलग पहचान बनाने में सफल भी हो जाती हैं। लेकिन बार-बार स्वयं में एक अपूर्णता का एहसास दिलाने वाले उनके जज्बात और पुरुष को प्राप्त करने की उनकी तड़प आ”चर्यचकित करती है। कृति की यह परावलंबी सोच , ‘कितनों के मुँह से चौहान साहब की लंपटता के किस्से सुनती रही फिर भी मन में एक ही खयाल मंडराता रहा-  काश! कि वह एक बार सिर्फ और सिर्फ एक बार फिर से उस पर पूर्ववत भरोसा कर पाते। देखिए चौहान साहब मैने सबका साथ खारिज कर दिया, यही तो चाहते थे न आप?’
पढ़कर पाठकों के मन में प्रश्नो की ढेरों काँटेदार झाडियाँ उगने लगती हैं। जिस पुरुष ने स्त्री के वजूद को हमेशा अपने पैरों तले कुचलना चाहा उसी के प्रति यह मोह यह आसक्ति आखिर क्यों है ? जो तुम्हारे अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं कर रहा है उसके आगे गिड़गिड़ाना  कहाँ तक उचित है ? मगर समीक्ष्य पुस्तक में इन प्रश्नों के कोई सार्थक जवाब नजर नहीं आए हैं। संभवत: रचनाकार की ऐसी ही मन:स्थिति को समझते हुए चेखव ने कहीं लिखा है कि -‘ लेखक का मुख्य कार्य  सवाल को सही ढंग से समाज के सम्मुख रखना होता है , उसका समाधान तलाशना नहीं।’
आरंभ से लेकर अंत तक पूरी रचना में एक उम्मीद पाठक को जरूर बाँधे रखती है कि एक न एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। और यही वो चैतन्य तत्व है जो पाठक को पूरा उपन्यास पढने के लिए प्रेरित करता है । इस उपन्यास के माघ्यम से लेखिका ने स्त्रीविमर्श से जुड़े सदियों पुराने घावों को पहले पूरी सावधानी के साथ उधाड़ा फिर वर्तमान परिवेश के अनुसार विचारों और तर्कों का मरहम लगाकर उस घाव पर फिर से टांका लगा दिया, इस उम्मीद के साथ कि पुरुषप्रधान इस समाज को स्त्री के वजूद का एहसास भी जरूर होगा -  एक न एक दिन।                     

पुस्तक     एक न एक दिन (उपन्यास)
लेखिका    रजनी गुप्त
प्रकाशक   किताबघर प्रकाशन , नई दिल्ली
मूल्य       425 रु मात्र

गीत

कैसा बसंत
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ।
कागसंघ छीन लिया कोयल की कूक
मंजरियाँ सेंक रहीं अनजानी धूप
चक्रवाक चंदा को देख , रहा पूछ
बोल प्रिये प्रीति मेरी कहाँ गई चूक ?
खुशियों को छोड़ गए अलबेले कंत,
जीवन की बगिया में कैसा बसंत !
फूलों को फूंक त्वचा गरमाते लोग
शूलों को नित्य नमन कर जाते लोग
भ्रमर बने सन्यासी सिखलाते योग
कौन नहीं झेल रहा ख़ुद का वियोग ?
चोली और दामन में हो गया संघर्ष
जीवन की बगिया में कैसा बसंत !
सपनों के सेंधमार हैं मालामाल
डोम बने हरिश्चंद करते सवाल
दिग्दिगंत फ़ैल रहा एक महाजाल
दुर्योधन नृत्य करे शकुनी दे ताल
तक्षक जन्मेजय में दोस्ती बुलंद !
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ?

Thursday, 5 March 2009

लादेनवादियों के लिये नो लास गेम

जंग में अपनी जमीन पर किये हमले की रणनीति का पूरा लाभ उठाया है इस बार लादेनवादियों ने। 12 नकाबपोश थे और इस बार एक भी हाथ नहीं लगे। लादेनवादियों के लिये यह नो लास गेम था। उनके सामने पाकिस्तान प्रशासन पंगु है और वो जानते हैं कि अपनी जमीन पर कैसे हमला किया जाता है। यह आधुनिक गुरिल्ला स्टाइल का नकाबबंद हमला है, जो सवालों का अंबार खड़ा करता है और इन सवालों के जवाब लादेन और मुल्ला ओमर जुड़े हुये हैं, जिन्होंने इस्लाम की एक धारा को तालिबान के रूप में अफगानिस्तान में सफलतापूर्वक स्थापित किया था और आज भी इस्लाम से जुड़ा एक तबका इस धारा से संचालित हो रहा है। अपने ब्लाग कला जगत पर डाक्टर उत्तमा ने अफगानिस्तान में तालिबानी उफान में एक गंभीर आलेख लिखा है,किस तरह से तालिबानी अफगानिस्तान में कला और कलाकारों को ध्वस्त कर रहे हैं। श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला और अफगानिस्तान के इलाकों में कला को जमीन से उखाड़ने की रणनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, दोनों सभ्यता पर चोट है, एक सभ्यता के वर्तमान रूप पर दो दूसरा इसके विगत पर। लादेनवाद की धारा अफगानिस्तान से निकल कर पाकिस्तान पहुंच चुकी है और वहां की सरकार, चाहे जिसकी भी हो, इस धारा के आगे विवश है। यदि लोग दूसरे देश की क्रिकेट टीम को निशाना बना सकेत हैं तो वहां की सरकार में बैठा कोई भी व्यक्ति इनकी पहुंच से बाहर नहीं है। इस हमला के बाद पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर ने कहा है, ये साधारण हमलावर नहीं,बल्कि प्रशिक्षित अपराधी थे। एसा करते हुये वे थोड़ी सी चूक कर गये। वे प्रशिक्षित तो थे पर अपराधी नहीं। वे एक टारगेट को हिट कर रहे थे, और इस टारगेट का आयाम अंतरराष्ट्रीय मंच से जुड़ा हुआ था। इस टारगेट में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई क्रिकेटर थे, जिनके जलवों से पूरा क्रिकेट जगत झूमता रहा है। इनके टारगेट पर विश्व समुदाय का क्रिमी लेयर था, दुनिया के ए क्लास के सिटीजन। यदि सब का सफाया हो जाता तो विश्व समुदाय सकते में पड़ सकता था, श्रीलंका और पाकिस्तान की तो सांसे ही थम जाती, कूटनीतिक मोर्चे पर चाहे वे जो कसरत करते। पाकिस्तान में तालिबानी कभी भी अपनी सरकार की घोषणा कर सकते हैं,इस बात से इनकार करना अपने आप को मुगालते में रखने जैसा है। अमेरिका से बुश के जाने के बाद भारतीय उप महाद्वीप में तालिबान खुलकर के नंगा नाच करने लगा है। पाकिस्तान पर यदि घोषित रूप से वो काबिज हो जाते हैं तो आणविक बटन भी उनके हाथ में चला जाएगा,और इसका इस्तेमाल वो भारत पर जरूर करेंगे। इसके पहले कि तालिबानी यहां तक पहुंचे, भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा को चाक चौबंद करते हुये एक आक्रमक विदेश नीति के तहत पाकिस्तान में हस्तक्षेप करने के लिए तैयार होना होगा, क्योंकि पाकिस्तान में तालिबान का उत्थान सीधे भारत की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान सरकार तालिबान पर काबू पाने में अक्षम है, या फिर यह मान लिया जाये कि पाकिस्तान की सत्ता से तालिबान कुछ कदम की दूरी पर हैं। मुंबई से लेकर लाहौर में होने वाले हमलों में जिस तरह से छोटे बड़े इस्लामिक संगठनों के नाम उछाले जा रहे हैं वह एक तरह से भारतीय जनता को दिगभ्रमित करने वाले हैं। इन सभी संगठनों को समग्र रूप में देखने की जरूरत है। ये सभी संगठने तालिबान के ही ब्रांच हैं, जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विभिन्न तरीके से एक उद्देश्य विशेष के लिये सक्रिय हैं और इनका एक मात्र उद्देश्य हैं लंबा समय तक संघर्ष करते हुये पूरी दुनिया में इस्लाम का पताका फहराना। इस्लाम की इस धारा की आलोचना करने में मात्र से यह धारा कुंद नहीं होगी, क्योंकि यह धारा व्यवहारिकतौर पर विश्व के किसी भी हिस्से पर अपना खौफनाक रूप दिखाने में सक्षम है। इस पर काबू पाने के लिए पहली शर्त है इस हकीकत को स्वीकार करना। तभी इसके खिलाफ लोगो को कमर कसने के लिए तैयार किया जा सकता है। लादेनवादियों ने राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर पूरी दुनिया को रणभूणि में तब्दील कर दिया है। हमें अपनी जमीन और अपने लोगों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करने की जरूरत है।

ब्लैक डाग थ्योरी और स्लम डाग मिलेनियर में समानता

क्या स्लम डाग मिलयेनेयर का इतिहास में स्थापित ब्लैक डाग थ्योरी से कोई संबंध है ? किसी फिल्म को आस्कर में नामांकित होने और अवार्ड पाने की थ्योरी क्या है? कंटेंट और मेकिंग के लेवल पर स्लम डाग मिलयेनेयर अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत में अपना झंडा गाड़ चुकी है, और इसके साथ ही भारतीय फिल्मों में वर्षों से अपना योगदान दे रहे क्रिएटिव फिल्ड के दो हस्तियों को भी अंतरराष्ट्रीय फिल्म पटल पर अहम स्थान मिला है। फिल्म की परिभाषा में यदि इसे कसा जाये तो तथाकथित बालीवुड (हालीवुड का पिच्छलग्गू नाम) से जुड़े लोगों को इससे फिल्म मेकिंग के स्तर पर बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, जो वर्षों से हालीवुड के कंटेंट और स्टाईल को यहां पर रगड़ते आ रहे हैं। वैसे यह फिल्म इतिहास को दोहराते हुये नजर आ रही है, ब्लैक डाग थ्योरी और स्लम डाग मिलेनियर में कहीं न कहीं समानता दिखती है। क्या स्लम डाग मिलयेनेयर एक प्रोपगेंडा फिल्म है, फोर्टी नाइन्थ पैरलल (1941), वेन्ट दि डे वेल (1942), दि वे अहेड (1944), इन विच वि सर्व (1942) की तरह ?
लंदन में बिग ब्रदर में शिल्पा सेठ्ठी को जेडी गुडी ने स्लम गर्ल कहा था। जिसे नस्लीय टिप्पणी का नाम देकर खूब हंगामा किया गया था और जिससे शिल्पा ने भी खूब प्रसिद्धि बटोरी थी। इंग्लैंड की एक यूनिवर्सिटी ने उसे डाक्टरेट तक की उपाधि दे डाली थी। दिल्ली में हालीवूड के एक स्टार ने स्टेज पर शिल्पा को चूमकर इस बात का अहसास कराया था कि शिल्पा स्लम गर्ल के रूप में एक अछूत नहीं है। एक स्लम ब्याय इस फिल्म में एक टट्टी के गटर में गोता मारता है और मिलेनियम स्टार अमिताभ का ओटोग्राफ हासिल करके हवा में हाथ उछालता है। क्या कोई मिलेनियम स्टार एक टट्टी लगे हाथ से ओटोग्राफ बुक लेकर ओटोग्राफ देगा ? यदि इसे फिल्मी लिबर्टी कहा जाये तो बालीवुड की मसाला फिल्म बनाने वाले लोग भी इस लिबर्टी के बारे में कुछ भी कहेंगे तो उनकी बात बेमानी होगी, लेकिन बेस्ट स्क्रीन फिल्म के तौर इसे आस्कर दिया जाना आस्कर की अवार्ड मैकेनिज्म पर सवालिया निशान लगाता है।
इफेक्ट के स्तर पर यह फिल्म लोगों को बुरी तरह से झकझोर रही है। यदि बाडी लैंग्वेज की भाषा में कहा जाये तो लोग इस फिल्म के नाम से ही नाक भौं सिकोड़ रहे हैं, खासकर गटर शाट्स को देखकर। इस फिल्म की कहानी कसी हुई है, और साथ में स्क्रीप्ट भी। इस फिल्म में प्रतीक का इस्तेमाल करते हुये स्लम पर हिन्दूवादी आक्रमण को दिखाया गया है और इस फिल्म के चाइल्ड प्रोटेगोनिस्ट के संवाद के माध्यम से राम और अल्लाह के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया गया है। 1947 में भारत का विभाजन इसी आधार पर हुआ था, जिसके लिए ब्रिटिश हुकुमत द्वारा जमीन बहुत पहले से तैयार की जा रही थी। उस समय ब्रिटिश हुकुमत से जुड़े तमाम लोग भारत के प्रति ब्लैक डाग की मानसिकता से ग्रसित थे और यही मानसिकता एक बार फिर स्लम डाग मिलयेनेयर के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय फिल्म पटल पर दिखाई दे रही है।
व्हाइट मैन बर्डेन थ्योरी के आधार पर दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाने का दम भरने वालों को उस समय झटका लगा था जब शिल्पा सेट्ठी ने बिग ब्रदर में नस्लीय टिप्पणी के खिलाफ झंडा खड़ा किया था और उसी दिन स्लम डाग मिलयेनेयर की पटकथा की भूमिका तैयार हो गई थी। पहले से लिखी गई एक किताब को आधार बनाया गया, जो भले ही व्हाइट मैन बर्डेन थ्योरी की वकालत नहीं करती थी, लेकिन जिसमें ब्लैक मैन थ्योरी को मजबूती से रखने के लिए सारी सामग्री मौजूद थे। यह फिल्म पूरी तरह से प्रोपगेंडा फिल्म है, जिसका उद्देश्य अधिक से अधिक कमाई करने के साथ-साथ ब्लैक डाग की अवधारणा को कलात्मक तरीके से चित्रित करना है। यह फिल्म दुनियाभर में एक बहुत बड़े तबके के लोगों के इगो को संतुष्ट करती है, और इस फिल्म की सफलता का आधार भी यही है। भारतीय दर्शकों को आकर्षित करने के लिए भी मसाला फिल्म की परिभाषा पर इस फिल्म को मजबूती से कसा गया है। इस फिल्म में वो सारे फार्मूले हैं, जो आमतौर पर मुंबईया फिल्मों में होता है। इन फार्मूलों के साथ रियलिज्म के स्तर पर एक सशक्त कहानी को भी समेटा गया है, और प्रत्येक चरित्र को एक खास टोन प्रदान किया गया है। इस फिल्म में बिखरा हुया बचपन से लेकर, बाल अपराध तक की कथा को मजबूती से पिरोया गया है। साथ ही टीवी शो के रूप में एक चमकते हुये जुआ घर को भी दिखाया गया है।
फिल्म लावारिश में गटर की दुनिया का किरदार निभाने वाले और कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रम में प्रत्येक सवाल पर लोगों को लाखों रुपये देने वाले मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन स्लम डाग मिलयेनेयर पर अपनी नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुके हैं। अपनी प्रतिक्रिया में इन्होंने इस फिल्म के कथ्य पर सवाल उठाया है, जिसका कोई मायने मतलब नहीं है, क्योंकि कथ्य के लिहाज से अपनी कई फिल्मों में अमिताभ बच्चन ने क्या भूमिका निभाई है उन्हें खुद पता नहीं होगा। अनिल कपूर इस फिल्म में एक क्वीज शो के एंकर की भूमिका निभा कर काफी खुश हैं। एक कलाकार के तौर पर उन्हें एसा लग रहा है कि वर्षों से इसी भूमिका के लिए वह अपने आप को मांज रहे थे। उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि आसमान को गले लगाने जैसी है। गुलजार और रहमान को भी इस फिल्म ने एक नई ऊंचाई पर लाकर खड़ा दिया है। यह इन दोनों के लिये सपनों से भी एक कदम आगे जाने जैसी बात है, हालांकि इस फिल्म पर हायतौबा मचाने वाले गुलजार और रहमान के प्रशंसकों का कहना है कि गुलजार और रहमान ने इसके पहले कई बेहतरीन गीतों की रचना की है और धुन बनाया है। भले ही इस फिल्म में उन्हें आस्कर मिल गया हो, लेकिन इससे कई बेहतर गीत और संगीत उनके खाते में दर्ज हैं।
मुंबईया फिल्मों की कास्टिंग के दौरान जाने पहचाने फिल्मी चेहरों को खास तव्वजो दिया जाता है, स्लम डाग मिलयेनेयर में भी इस फार्मूले का मजबूती से अनुसरण किया गया है, साथ ही स्लम में रहने वाले बच्चों को भी इसमें सम्मिलित किया गया है, जो इस फिल्म के मेकिंग स्टाइल को इटली के नियो-रियलिज्म फिल्म मूवमेंट के करीब ले जाता है, जहां पर शूटिंग के दौरान राह चलते लोगों से अभिनय करवाया जाता था। इस लिहाज से इस फिल्म को एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म भी कहा जा सकता है। लेकिन इसके साथ ही यह फिल्म एक प्रोपगेंडा फिल्म है, जिसमें बड़े तरीके से एक स्लम गर्ल के सेक्सुअल एक्पलायटेशन को चित्रित किया गया है, जो कहीं न कहीं बिग ब्रदर के दौरान शिल्पा सेट्ठी के बवाल से जुड़ा हुआ है और जिसकी जड़े बहुत दूर इतिहास के ब्लैक डाग थ्योरी तक जाती हैं। टट्टी में डूबकी लगाता हुआ भारत का बचपन भारत की हकीकत नहीं है, लेकिन जिस तरीके से इसे फिल्माया गया है, उसे देखकर विश्व फिल्म में रूची रखने वालों के बीच भारत के बचपन की यही तस्वीर स्थापित होगी, जो निसंदेह भारत के स्वाभिमान पर एक बार फिर सोंच समझ कर किया गया हमला है।
इस फिल्म को बनाने के पहले की इसे आस्कर के लिए खड़ा करने हेतु मजबूत लांमबंदी शुरु हो गई थी, और इस उद्देश्य को पाने के लिए हर उस हथकंडे का इस्तेमाल किया, जो आस्कर पाने के लिए किया जाता है। अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ खड़ा होने वाले मोहन दास करमचंद गांधी कहा करते थे, अच्छे उद्देश्य के लिए माध्यम भी अच्छे होने चाहिये। माध्यम के लिहाज से इस फिल्म पर कोई उंगली नहीं उठा सकता, लेकिन इसके उद्देश्य को लेकर एक अनंत बहस की दरकार है। यह फिल्म भारत को दुनियाभर में नकारात्मक रूप से स्थापित करने का एक प्रोपगेंडा है, जिसमें उन सारे तत्वों को सम्मिलित किया है, जो एक फिल्म की व्यवसायिक सफलता के लिए जरूरी माने जाते हैं।

Wednesday, 4 March 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-22

पिछले दिनों भाई ज्ञानदत्त जी बहुत परेशान हुए कि भरतलाल ने जाने उनकी चटपटी कहां रख दी है. पता नहीं आप कभी ऐसी परेशानी से हलकान हुए या नहीं, पर इस बात से इतना तो तय हुआ कि अभी भी ऐसे लोग हैं जिन्हें चटपटी पहनने का शौक़ है. चूंकि हिन्दुस्तान में चटपटी पहनने के शौक़ीन लोग हैं, लिहाजा यहाँ चटपटी मिलती भी है, अब यह अलग बात है कि ज़रा मुश्किल से मिलती है. वैसे मेरा ख़याल है कि आपको यह जानकर ताज्जुब नहीं होगा कि भारत के अलावा कुछ ऐसे देश भी हैं जहाँ जहाँ चटपटी बड़ी मुश्किल से मिलती है, अलबत्ता यह जानकर ताज्जुब ज़रूर होगा कि अभी भी पश्चिम में कुछ ऐसे देश हैं जहाँ चटपटी मिलती है और कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बड़े शौक़ से उसका इस्तेमाल भी करते हैं. जी हाँ, मैं उसी चटपटी की बात कर रहा हूँ जो खड़ाऊँ जी की छोटी बहन है. आधुनिक भाषा में परिभाषित करना हो तो यूँ समझें कि लकड़ी के सोल पर रबड़ की पट्टी वाली चप्पल.

अंग्रेज लोग इसे यही कहते भी हैं और इसे पहनना बड़ी प्रतिष्ठा की बात मानते हैं. उनकी एक कहावत है : ही इज़ सच अ लायर यू कैन फील इट विद योर वुडेन शूज़. यहँ वुडेन शूज़ का मतलब कुछ और नहीं वही चटपटी है. असल में यह कहावत अंग्रेजी में आई है डच भाषा से. डच में इसे क्लोम्पेन कहते हैं और कहावत का ज़ोर वस्तुत: इसकी दुर्लभता से है.  असल में पूरे पश्चिम में अब सिर्फ़ हॉलैंड ही ऐसा देश है जहाँ कुछ ख़ास इलाकों में क्लोम्पेन यानी कि चटपटी मिलती है. अब वहाँ यह चीज़ कबसे मिलती है, यह तो कोई इतिहासवेत्ता ही बता सकता है, लेकिन इतना तो तय है कि सिर्फ़ भारत ही ऐसा देश नहीं है, जहाँ चटपटी मिलती है. दूसरे देशों, और ख़ास तौर से वे देश जहाँ से मिली फ़ालतू की मान्यता को भी हम नोबल प्राइज़ या ऑस्कर एवार्ड की तरह अपने सीने से चिपका कर रखते हैं, में भी इसका प्रचलन है.

डच की ही एक और बड़ी दिलचस्प कहावत है, जिसका अंग्रेजी अनुवाद है :  ही हैज़ फॉरगॉटेन हिज़ वॉर्न शूज़. मतलब यह कि वह इतना कृतघ्न है कि अपने फटे हुए जूते भूल गया. पता नहीं उनके यहाँ ऐसे लोग होते हैं या नहीं, पर हमारे हिन्दुस्तान में तो ऐसे लोग बहुत हैं जो अपने फटे हुए जूते भूल जाते हैं. अब यह न सोचने लगिएगा कि उनके लिए अपना मूल जूते के नीचे है, वस्तुत: तो हम सब के लिए ही अपना मूल स्थान 'स्वर्गादपि चिर गरीयसी' होने के बावजूद है तो जूते के नीचे ही, पर वे इसे खुले मन से स्वीकारते हैं और यहाँ वॉर्न शूज़ यानी फटे हुए जूतों का आशय वस्तुत: मूल स्थान से ही है. इस अर्थ में देखें तो हम भारतीयों की तो ख़ूबी यही है कि हम अगर पने फटे हुए जूते भूल नहीं पाते तो उन्हें छिपा देने की पूरी कोशिश  करते हैं. हमं टाई लगानी नहीं आती, यह हमारे लिए शर्म की बात है. लेकिन नहीं, इससे भी ज़्यादा हैरतअंगेज़ तथ्य यह है कि धोती या मिर्जई या चौबन्दी पहनना न आने पर हमें फ़ख़्र होता है. यक़ीनन, चुल्लू भर पानी की क्या बिसात कि वह हमें डुबाए. सच तो यह है कि समुन्दर के सामने हम पड़ें तो वह वेचारा हमसे नज़रें मिलाने के पहले ही धंस जाए.

फटे हुए जूतों की बात पर याद आया, जूते घिसना या फटना सिर्फ़ हमारे देश के लोगों की ही मजबूरी नहीं है. कुछ दूसरे देश भी हैं, जहाँ इसे न केवल अनुभव बल्कि कड़ी मेहनत और मशक्कत का प्रमाण माना जाता है. इटैलियन की कहावत है : बिट्वीन सेइंग ऐंड डूइंग, मेनी  अ पेयर ऑफ शूज़ इज़ वॉर्न आउट. और साहब अंग्रेजी की ही एक और कहावत है : द कॉब्लर आल्वेज़ वियर्स द वर्स्ट शूज़. जूते बनाने वाला हमेशा सबसे ख़राब जूते ही पहनता है. समझ रहे हैं न!

(चरैवेति-चरैवेति...)