अब बात चलते-चलते मुहावरों तक आ ही गई है तो बताते चलें कि हमारे देश में एक मुहावरा है - भिगो कर जूते मारना. वैसे मैं सही कह रहा हूँ, मैं भिगो कर जूते मारना पसन्द नहीं करता. इसकी वजह यह है कि मैं जूते सिर्फ़ दो तरह के पहनता हूँ- या तो चमडे के या फिर कपडे के. इन दोनों ही प्रकार के जूतों के साथ एक बडी भारी दिक्कत यह है कि इनसे मारने पर किसी को चोट तो कम लगती है और आवाज़ ज़्यादा होती है. ख़ास तौर से चमडे वाले जूते के साथ तो बहुत बडी दिक्कत यह है कि भीगने से वे ख़राब हो जाते हैं. अब अगर जूते भीग गए तो मैं चलूंगा कैसे? ऊपर से ज्ञानदत्त जी पानी में रात भर इन्हे भिगोने की बात करते हैं. मुझे लगता है कि पिछले दिनों इन्होने अपने जो एक फटहे जूते का फोटो पोस्ट किया था, वह इसी तरह फटा होगा.
जहाँ तक मेरा सवाल है, आप जानते ही हैं, आजकल हर चीज़ का दाम बहुत बढा हुआ है. सब्ज़ियां गृहिणियों के लिए जेवरों की तरह दुर्लभ हो गईं हैं और दाल के मामले में तो पहले से ही आम आदमी की दाल गलनी बन्द है. आम तौर पर आम आदमी को सिर्फ़ सूखी रोटी से काम चलाना पड रहा है. ऐसी स्थिति में मैं घर-परिवार के लिए रोटी का जुगाड करूँ या जूते ख़रीदूँ. भला एक नया ख़र्च मैं कैसे एफोर्ड कर सकूंगा?
मेरी इन तथ्यगत मजबूरियों के बावजूद भाई आलोक नन्दन ने आरोप लगाया है कि मैं भिगो कर जूते मारता हूँ. हालांकि मैं अपने परमप्रिय नौ नम्बर के जूते की कसम खाकर कह सकता हूँ कि मैने उन्हें कभी किसी भी तरह से जूते नहीं मारे हैं. पर अगर मुहावरे के रूप में इसकी बात की जाए तो मेरी मातृभाषा यानी कि भोजपुरी में थोडे अलग अन्दाज वाली एक ऐसी ही कहावत है. यह कहावत है - मरलस त बकिर पनहिया लाल रहल. आप जानते ही हैं कि कहावत मुहावरे की तरह अपना ठौर ढूंढने के लिए वाक्य की मोहताज नहीं होती. जूते की तरह मुहावरे का भी अपना स्वतंत्र अर्थ होता है. अगर तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो मुझे पूरा विश्वास है कि मुहावरे और कहावत के बीच क़रीब वही फ़र्क़ पाया जाएगा जो जूते और मोजे के बीच होता है.
कहावत में यह सामर्थ्य इसीलिए होती है क्योंकि हर कहावत के पीछे एक कहानी होती है. इस कहावत के पीछे कहानी यह है कि एक सज्जन ससुराल गए थे और वहाँ किसी कारणवश उन्हें व्यंजनों की जगह जूते परोस दिए गए. दुर्भाग्य से जूते ऐसी चीज़ हैं कि और तो हर मामले में उन्हें इज़्ज़त के लायक माना जाता है, पर इन्हें खाने के बाद कोई बताना नहीं चाहता. समझ लें कि रिश्वत या कमीशन की तरह. तो उन्होंने भी घर लौट कर किसी से इसका ज़िक्र करना मुनासिब नहीं समझा. लेकिन ख़बरची तो हर ज़माने में होते रहे हैं. सो यह एक्सक्लूसिव न्यूज़ भी किसी ने ब्रेक कर दी और देखते-देखते यह ख़बर पूरे गांव में फैल गई.
पहले तो लोंगों ने दबी ज़ुबान से पीठ पीछे ही चर्चाएं कीं. जैसे अख़बारों में गॉसिप के कॉलम छपते हैं. पर जब दबी ज़ुबान चर्चाओं पर कहीं से कोई मानहानि का मुकदमा नहीं हुआ तो किसी सिरफिरे ने हिम्मत करके सीधे उन्हीं से पूछ लिया कि मान्यवर सुना है आपने ससुराल में जूते खाए हैं. अब सवाल यह है कि वे भला कैसे यह मान लेते कि ससुराल जैसी पावन जगह पर उन्होंने जूते जैसी चीज़ खाई. और दिक्कत यह कि वह आजकल के नेताओं की तरह महान भी नहीं हो सके थे जो सीधे ज़िन्दा मक्खी निगल जाते. लिहाजा बात तो उन्होंने मान ली, पर थोडे संशोधन के साथ. यह संशोधन बिलकुल वैसा ही था जैसा ईमानदार सम्पादक कभी-कभी सच्ची ख़बरों में कर देते हैं. उन्होने कहा कि हाँ भाई, मारा तो उसने, पर जिस पनही से मारा वह पनही असल में लाल रंग की थी.
पनही भोजपुरी में जूते को कहते हैं. फिर भी यह बताना ज़रूरी लगता है कि पनही और जूते के एक-दूसरे का पर्याय होने के बावजूद दोनों के बीच कुछ बुनियादी फ़र्क़ हैं. वैसे ही जैसे सैंडिल और हाई हिल सैंडिल में. आपसे क्या छिपाना, जूते खाना बेइज़्ज़ती की बात समझे जाने के बावजूद (हालांकि वास्तव में ऐसा है नहीं), 'हम लोग' एक उम्र में हाई हिल सैंडिल खाना बडे फ़ख़्र की बात समझा करते थे और हमराज टाइप के दोस्तों से उसकी चर्चा 'मगर किसी से बताना मत' वाले जुमले के साथ कुछ इस अन्दाज में किया करते थे कि वह ईर्ष्यावश सबको बता दे और कम से कम अपनी पूरी ज़मात तो यह बात जान ही जाए कि अब अपन भी इस लायक समझे जाने लगे हैं. क्या पता उन सज्जन के साथ भी कुछ ऐसी ही बात रही हो.
ख़ैर, अभी बात पनही और जूते की चल रही थी. जान लें कि पनही असल में जूते की थोडी बिलो टाइप वैरायटी है. हिन्दी में उसे प्लास्टिक का जूता कहते हैं. भोजपुरी इलाके में यह बहुत लोकप्रिय इसलिए है, क्योंकि अधिकांश क्षेत्रफल मटियार ज़मीन और लाल व काली सडक से महरूम होने के नाते वहाँ रास्तों में जगह-जगह पानी जमा रहता है. ऐसी स्थिति में अकसर लोगों को जूता पैरों के बजाय हाथ में लेकर चलना पडता है. मुहावरात्मक अर्थ में जूते और पानी के बीच कितना बैर है वह तो आप जानते ही हैं.
चमडे का जूता हमारे यहाँ अभिधात्मक अर्थ में एक ही महीने में सड जाता है. पुनश्च, उस पनही के लाल रंग का सम्बन्ध आप लाल झंडे से जोडने की ग़लती क़तई न करें. पनही को लाल कहने का उनका कुल मतलब बस इतना ही था कि वह पनही रंगदार यानी कि रंगीन थी. हमारी-आपकी तबीयत की तरह. बाक़ी तो आप ख़ुद ही समझदार हैं.
(.... अभी और भी हैं जहाँ आगे-आगे)