Monday, 21 December 2009

निठारीकरण हो गया

कर दिया जो वही आचरण हो गया ।

लिख दिया जो वही व्याकरण हो गया ।

गोश्त इन्सान का यूं महकने लगा

जिंदगी का निठारीकरण हो गया ।

क्योंकि घर में ही थीं उसपे नज़रें बुरी

द्रौपदी के वसन का हरण हो गया ।

उस सिया को बहुत प्यार था राम से

पितु प्रतिज्ञा ही टूटी , वरण हो गया ।

'राढ़ी ' वैसे तो कर्ता रहा वाक्य का

वाच्य बदला ही था, मैं करण हो गया ।

कल भगीरथ से गंगा बिलखने लगी

तेरे पुत्रों से मेरा क्षरण हो गया । ।

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है!
    बधाई!

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  2. गोश्त इन्सान का यूं महकने लगा
    जिंदगी का निठारीकरण हो गया ।
    बहुत खूबसूरती से कही बात

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  3. बहुत ही सुन्दर और प्रासंगिक.

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  4. उधर आपने लिखा, बहुत बहुत खूब
    इधर मेरे दिल का हरण हो गया !!

    ..बार-बार पढ़के संतुलन खो गया ?

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  5. vaah raarhee jee.vyawastha kee visangatiyon par kyaa sateek dhang se piroya hai.

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  6. अद्भुत है यह रचना. जितनी बार पढ़ी जाए, नई ही लगेगी. आज के आदमी की पीड़ा बिलकुल सही पहचान है.

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