Wednesday, 25 November 2009

बदल रहा है सामाजिक यथार्थ : कुँवर नारायण

'नई धारा' के आयोजन में कुंवर, बालेन्दु
एवं राधेश्याम सम्मानित

भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यंत जटिल, विविध, बहुस्तरीय और रूढ़िबद्ध है. वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेजी से नहीं कि यहाँ की सामाजिक चेतना को बदल दे. इससे पहले और तेजी से बाजारवाद और उपभोक्ता संसकृति जैसी शक्तियाँ सामाजिक चेतना को बदल रही हैं. यह कहना है ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक कुँवर नारायण का. वे पिछले दिनों पटना में साहित्यिक पत्रिका ‘नई धारा’ द्वारा आयोजित उसके संस्थापक संपादक उदयराज सिंह की समृति को समर्पित पाँचवाँ स्मारक व्याख्यान कर रहे थे. व्याख्यान का विषय था ‘साहित्य और आज का समाज.’
नारायण ने कहा कि बाजारवाद का तंत्र अत्यंत विकसित, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी तरीकों से भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति हमारी स्वाभाविक आसकित को पुष्ट करता रहता है. उन्होंने साहित्य को वर्तमान समाज के सरोकारों से जोड़ते हुए कहा कि साहित्य सामाजिक चेतना को सीधे संबोधित करती शाब्दिक कला है. ऐसे में यदि आज सामाजिक चेतना से साहित्यिक चेतना का सीधा संवाद संभव नहीं हो पा रहा तो क्या यह सिर्फ साहित्य के लिए चुनौती है या एक षिक्षित समाज के लिए भी कि वह जाने-अनजाने नव समाज की एक अत्यंत समृद्ध सांस्कृतिक चेष्टा् से वंचित न होता चला जाए. उन्होंने कहा कि हिन्दी की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘नई धरा’ ने अपनी सामाजिक एवं साहित्यिक प्रतिबद्धता को जन सांस्कृतिक चेतना के पक्ष में सदैव सक्रिय एवं गतिशील बनाए रखा है तो इसलिए कि वह सामाजिक चुनौतियों से मुठभेड़ की शक्ति रखता है. उन्होंने ‘नई धारा’ के 60 वर्शों के निरंतर प्रकाशन पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए उसे हिन्दी साहित्य की मुख्य धारा का प्रवक्ता बताया. समारोह की अध्यक्षता आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने की, जबकि संचालन ‘नई धारा’ के संपादक एवं कवि-आलोचक डाॅ. शिवनारायण ने किया.
इस अवसर पर उदयराज सिंह की धर्मपत्नी एवं ‘नई धारा’ की संचालिका श्रीमती षीला सिन्हा ने श्री कुँवर नारायण को उदयराज सिंह स्मृति सम्मान से विभूषित किया, जिसके तहत उन्हें एक लाख रुपए की राषि सहित शॉल, सम्मान पत्र, प्रतीक चिह्न एवं श्रीफल अर्पित किया. इसके बाद ‘नई धारा’ के प्रधान संपादक प्रथमराज सिंह ने डाॅ. बालेन्दुषेखर तिवारी (राँचीे) एवं राधेश्याम तिवारी (दिल्ली) को ‘नई धारा रचना सम्मान’ से विभूषित किया, जिसके तहत उन्हें 25-25 हजार रुपये की राषिसहित प्रतीक चिह्न, सम्मान पत्र, शाल एवं श्रीफल अर्पित किया गया.
आरंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए ‘नई धारा’ के प्रधान संपादक प्रथमराज सिंह ने कहा कि मुझे इस बात का गर्व है कि मैं अपने पूर्ववर्ती पूर्वजों की चार पीढ़ियों को हिंदी सेवा के व्रत को ‘नई धारा’ के माध्यम से विकासमान कर रहा हूँ. ‘नई धारा’ हिंदी का प्रकाष स्तंभ बने, यही मेरी कोशिश होगी. प्रसिद्ध व्यंग्यलेखक डाॅ. बालेन्दुशेखर तिवारी एवं चर्चित कवि राधेष्याम तिवारी ने भी ‘नई धारा के सम्मान को अपने रचनात्मक जीवन का शीर्ष गौरव बताते हुए आभार प्रकट किया. ‘नई धारा’ के संपादक डाॅ. शिवनारायण ने कहा कि अपने समय की चेतना से रचनात्मक संवाद का दस्तावेज ‘नई धारा’ विगत 60 वर्षों से अविराम प्रकाषित हो रही है और भविष्य में भी अपने समय की चुनौतियों से रू-ब-रू होती हुई श्रेष्ठ साहित्य के प्रकाषन में अपनी भूमिका निभाती रहेगी. अध्यक्षीय भाशण करते हुए आलोचक डाॅ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि आज का समाज जितना जटिल और द्विधाग्रस्त है, उसके गर्भ से उतना ही उत्कृश्ट साहित्य का सृजन हो रहा है. उस चेतना का प्रवाह ‘ नई धारा’ में दिखाई पड़ता है.
आयोजन के आरंभ में ‘नई धारा’ के नवंबर अंक का लोकार्पण कुँवर नारायण करते हुए इस अंक के रचनाकारों को बधाई दी. समारोह का आरंभ डाॅ. रीना सहाय की वाणी वंदना से हुआ, जबकि अंत डाॅ. कलानाथ मिश्र के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ. समारोह में बिहार के विभिन्न भागों से आए सैकड़ों साहित्यकार मौजूद थे।
6 नवंबर की सुबह दस बजे पटना से स्काडा विजनेस सभागार में ‘नई धारा’ के ‘रचनाकार से मिलिये’ श्रृंखला में प्रसिद्ध कवि कुँवर नारायण ने आयोजित किया गया। आयोजन की अध्यक्षता वयोवृद्ध कवि गोवर्द्धन प्रसाद ‘सदय’ ने की, जबकि संचालन ‘नई धारा’ के संपादक डाॅ. षिवनारायण ने किया.
आरंभ में चर्चित कवि राधेष्याम तिवारी के सद्यः प्रकाषित काव्य-संग्रह ‘इतिहास में चिड़िया का लोकार्पण करते हुए कवि कुँवर नारायण ने कहा कि राधेश्याम की भाषा में सादगी है, इसलिए कविता का भाव मन में उतर जाता है. इसके बाद राधेष्याम तिवारी सहित निविड़ शिवपुत्र (दिल्ली) ने भी सर्वाधिक कविताओं का पाठ कर श्रोताओं को मुग्ध कर दिया.
इस अवसर पर काव्यपाठ करते हुए कुँवर नारायण ने लगभग दर्जन भर कविताएँ सुनाई, जिनमें चन्द्रगुप्त मौर्य, नालंदा और बख्तियार, अमीर खुसरो, सरहपा, नाजिम हिकमत के साथ, पालकी आदि प्रमुख थीं. श्रोताओं ने लगभग घंटे भर तक कुँवर नारायण को बड़े चाव से सुना. काव्यपाठ से पूर्व कँुवर जी ने कहा- ‘कविता में मेरी स्थिति बदलती रहती है. कभी मैं इतिहास से जीवन को, तो कभी जीवन से इतिहास को देखता हूँ. इसलिए मेरी कविताओं के अर्थ-ग्रहण में सावधानी बरतनी होगी.
आयोजन के आरंभ में ‘सामयिक परिवेश’ की अध्यक्ष ममता मेहरोत्रा ने स्वागत किया, जबकि उपन्यासकार अषोक कुमार सिन्हा ने कुँवर जी के काव्य-व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला. अंत में चर्चित कवि परेश सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन किया. आयोजन में सैकड़ों रचनाकार उपस्थित थे, जो आयोजन की समाप्ति पर प्रीतिभोज में शामिल हुए.

6 comments:

  1. कुँवरनारायण के पटना में हुए कार्यक्रमों की रपट पढ़कर बहुत तसल्ली हुई । यहाँ प्रस्तुत करने के लिए शुक्रिया ।

    ReplyDelete
  2. बहुत बढ़िया साहब!
    रपट और संस्मरण का संगम सुन्दर रहा!

    ReplyDelete
  3. दिलचस्प संस्मरणात्मक विवरण

    ReplyDelete
  4. गुरुदेव, इस अंतर्यामी रपट के लिए आभार. जहां तक मेरी जानकारी है आप इस आयोजन में शामिल नहीं हुए थे- आप जैसे उदार मित्र ने शायद इस मामले में साहित्य और मित्र धर्म का निर्वाह किया है. जय हो...

    ReplyDelete
  5. @ पंकज पराशर : बन्धुवर, ख़बर लिखने के लिए कहीं होना ज़रूरी थोड़े है. महाभारत काल में ही संजय हो चुके हैं. वैसे यह जानकारी मुझे भाई गोपाल राय के मेल से मिली थी. यह सूचना देना मैं भूल गया था. ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद.

    ReplyDelete
  6. इस बदलते सामाजिक यथार्थ से अवगत कराने के लिए आभार।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

    ReplyDelete

सुस्वागतम!!