Sunday, 1 November 2009

गजल

यूं कितने बेजान ये पत्थर
लेकिन अब इंसान ये पत्थर !

मोम सा गलने की कोशिश में
रहते हैं हलकान ये पत्थर।

टकरा कर शीशा न तोड़े
क्या इतने नादान ये पत्थर !

अपनी चोटों से क्यों इतना
रहते हैं अनजान ये पत्थर ?

इसके उसके जीवन के हैं
स्थायी मेहमान ये पत्थर।

(संदीप नाथ की यह गजल “दर्पण अब भी अंधा है” संग्रह से।)

8 comments:

  1. lajawaab है पूरी ग़ज़ल ......... बहुर ही अछे शेर हैं ........

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  2. यूं कितने बेजान ये पत्थर
    लेकिन अब इंसान ये पत्थर !
    सब कुछ तो कह दिया इस अकेले शेर ने
    सभी शेर बहुत सुन्दर

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  3. उम्दा ग़ज़ल.....
    बेहतरीन ग़ज़ल !
    ___बधाई !

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  4. एक बेहतरीन ग़ज़ल .
    सही है
    आज का इंसान, इंसान कहाँ रहा .
    पत्थर मानिंद हो गया है .
    पत्थर तो फिर भी
    कभी
    नींव का
    और कभी मील का पत्थर
    होते हैं.
    इंसानियत अब रही कंहाँ ?

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  5. बहुत उम्दा ग़ज़ल है जी
    पढ़वाने के लिए शुक्रिया

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  6. यूं कितने बेजान ये पत्थर
    लेकिन अब इंसान ये पत्थर !
    आप की गजल के एक एक शव्द से सहमत हुं, बहुत सुंदर.
    धन्यवाद

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  7. "In the name of God"
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    (Thank you)

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