Sunday, 11 October 2009

पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -2

मैंने अपनी यह यात्रा हज़रत निज़ामुद्दीन से चलने वाली हज़रत निज़ामुद्दीन – त्रिवेन्द्रम राजधानी एक्सप्रेस (ट्रेन नं.2432) से शुरू की थी. इस गाडी को त्रिवेन्द्रम पहुंचने में पूरे सैंतालीस घंटे लगते हैं और यह कोंकण रेलवे के रोमांचक और मनमोहक प्राकृतिक दृष्यों से होकर गुजरती है. केरल प्राकृतिक रूप से बहुत ही समृद्ध है और केरल में प्रवेश करते ही मन आनन्दित हो गया. यात्रा लंबी अवश्य थी किंतु अच्छी थी –अनदेखी जगहें देखने की उत्कंठा थी अतः महसूस नहीं हुआ. मेरे साथ मेरे एक मित्र का परिवार था. पति- पत्नी और दो बच्चे उनके भी. बच्चे समवयस्क ,उन्होंने अपना ग्रुप बना लिया.
त्रिवेन्द्रम अर्थात तिरुअनंतपुरम केरल की राजधानी है. यहां कुछ स्थान बहुत ही रमणीय और दर्शनीय है. मैंने जो जानकारी इकट्ठा की थी, उसके अनुसार त्रिवेन्द्रम में दो जगहें हमें प्राथमिकता के तौर पर देखनी थीं.प्रथम वरीयता पर था स्वामी पद्मनाथ मंदिर और दूसरे पर कोवलम बीच. अधिकांश मन्दिरों के साथ दिक्कत उनकी समयबद्धता से है . दक्षिण भारत के मंदिर एक निश्चित समय पर और निश्चित समयावधि के लिए खुलते हैं. गोया सरकारी दफ्तर हों और भगवान के भी पब्लिक मीटिंग आवर्स हों . भगवान पद्मनाथ का यह विख्यात मंदिर भी मध्याह्न 12 बजे बंद हो जाता है. इसके बाद सायं चार बजे प्रवेश प्रारम्भ होता है और दर्शन पांच बजे से हो सकता है . हम त्रिवेन्द्रम सवा नौ बजे पहुंच गए थे और रेलवे के विशेष प्रतीक्षालय (यहां एक एसी प्रतीक्षालय है जिसमें प्रति यात्री प्रति घंटा दस रुपये शुल्क लिया जाता है) में नहा-धोकर ,तरोताज़ा होकर 11 बजे तक तैयार हो गए थे. वहां घूमने –देखने लायक इतना कुछ नही है ,इस लिए हमारी योजना उसी रात मदुरै निकल जाने की थी. सामान हमने क्लॉक रूम में जमा करा दिया था. मंदिर के विषय में मालूम था ,इस लिये पहले हम कोवलम बीच घूमने चले गए.
कोवलम बीच रेलवे स्टेशन से लगभग 13 किमी की दूरी पर है . हमने स्टेशन से ही प्रीपेड आटो ले लिया था. मजे की बात है कि वहां प्रीपेड के नाम पर केवल पर्ची कटती है,भुगतान गंतव्य पर पहुंचने के बाद ड्राइवर कोइ ही करना होता है. भुगतान की रकम पर्ची पर लिखी होती है और पर्ची का शुल्क एक रूपया मात्र होता है.
कोवलम बीच वास्तव में एक सुन्दर अनुभव है. अरब सागर की उत्ताल तरंगें नारियल के झुरमुट से सुशोभित तट की ओर भागती चली आती हैं , बस सबकुच भूल कर उसकी विशालताऔर अनंतता को देखते रहने को जी चाहता है.
बहरहाल , लगभग चार बजे हम स्वामी पद्मनाथ मंदिर पहुंच गए. मंदिर निःसन्देह बहुत विशाल और भव्य है. इसका गोपुरम दूर से ही मन को मोह लेता है. हम द्वार की तरफ बढे ही थे कि हमें सामान क्लॉक रूम में जमा कराने का इशारा मिला (भाषाई समस्या वहां प्रायः झेलनी पडती है ) और हम समीप स्थित क्लॉक रूम तक पहुंच गए. जैसा कि मैने पहले ही बताया कि मंदिर के लिए ड्रेसकोड निर्धारित है ,उसका पालन करना ही था. हालांकि हम स्थिति ठीक से समझ नही पाये थे. क्लॉक रूम के बाहर सामान जमा की दर भी लिखी हुई है.चलिए , अब आप सारे कपडे उतार दीजिए,बस एक मात्र अंतः वस्त्र को छोडकर. मोबाइल वगैरह तो जमा होता ही है .अब आपको वे एकलुंगी नुमा धोती दे देंगे, उसे लपेट लीजिए, अगर लपेटने में कठिनाई है तो वे मदद भी कर देंगे ! हाँ, इस धोती का किराया है रु.15/- . धोती बाद में लौटा दीजिएगा, पर किराया अभी जमा करा दीजिए. महिला के लिए शुद्ध भारतीय वेश-भूषा अर्थात साडी ही अनुमन्य है.महिला ने साडी नहीं कुछ और पहना है तो 15/ मे लुंगी नुमा धोती उपलब्ध है.उसे बस ऊपर से लपेट लीजिए, अन्दर का सब कुछ चल जाएगा !यह व्यवस्था बच्चों पर भी लागू है . इस धार्मिक सुविधा केन्द्र पर सात धोती (बच्चों के लिए लगभग हाफ लुंगी/धोती ) लेने और पैंट-कमीज़ मोबाइल देने के रुपये 208/ लगे. हाँ, हमारे पर्स नहीं जमा हुए, उन्हें हम ले जा रहे थे अन्दर. हर श्रद्धालु के हाथ में अब केवल पर्स था ,जैसे वह पर्स न हो, पूजा का फूल हो ! यह भी एक दृश्य था ,जिसे शायद महसूस कर रहा था.
अन्दर प्रवेश करते ही एक ‘सेवक ‘ दौडा. बडी लगन से उसने छोटे –छोटे चार दिये तेल के (क्योंकि चार सदस्य क परिवार था) पकडाए. यहां का कोई नियम मानकर हमने दिये ले लिए, बगल के एक बडे जलते दिये में उसे उडेला और उसके भी बीस रुपए हो गये . यह बात बाद में समझ पाया कि यह सब केवल दूर से आने वाले दर्शनार्थियों के लिए है, स्थानीय तो सब जानते है .ऐसी एक दो घट्नाएं और हुई6 जिनका जिक्र अच्छा नहीं होगा. मंदिर के अन्दर हम पंक्तिबद्ध थे. लोग हाथों में पर्स पकडे चले आ रहे थे. पता नहीं किसका कितना ध्यान स्वामी पद्मनाथ पर था , कितना पर्स की संभाल पर!
आगे जारी........

11 comments:

  1. अच्छा तो आप पवित्र अश्वमेध यात्रा पर हैं ! यात्रा की शुभकामनाएं ! मदुरै मंदिर और कन्याकुमारी का दर्शन भी करियेगा !

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  2. पोस्ट बहुत अच्छी है लेकिन यदि चित्र भी साथ होते तो बहुत बढिया रहता।आप की पोस्ट से नयी जानकारी मिली।आभार।

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  3. आपका यात्रा संस्मरण बहुत बढ़िया रहा।
    अच्छी जानकारी मिली।

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  4. बहुत सुंदर लगी आप की यात्रा, मै दोबार पढने जा रहा हुं, शायद कभी जाना पड जाये तो आप का अनुभव हमारे काम आये.
    धन्यवाद

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  5. आदरणीय अरविंदजी, यात्रा तो मै करके वापस आ गया, मदुरै, कोडाइकैनाल, रामेस्वरम और कन्याकुमारी तक की. अब तो उसे याद कर रहा हूँ और यादें आप सबसे बांट रहा हूँ. मैं बाली जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ.चित्र मेरे पास हैं किंतु कुछ तकनीकी कारणों से इस वृत्तांत के साथ डाल नहीं पाया. आगे कोशिश करूँगा.और राज भाटिया जी , मैं धीरे – धीरे पूरा विवरण ब्लॉग पर डाल रहा हूं. आपके काम आये तो अच्छ है. इस बावत आप मुझसे सीधी जानकारी ले सकते हैं आवश्यकता पडे तो इमेल करिएगा.मैं फोन नं दे दूंगा. हैप्पी टु हेल्प. Email- hsrarhi@gmail.com

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  6. आपने जो वर्णन किये वो पढ़कर कुछ को फायदा होगा
    लेकिन बहुत अजीब लगता है ये कि किस तरह पोंगापंथ फैला हुआ है

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  7. बहुत बढ़िया लगा यह सब जानकर. बेहतर होगा कि आपने जिन बातों का ज़िक्र करना ठीक नहीं समझा, उनका ज़िक्र भी ज़रूर करें. भला क्यों छोड़ा जाए धर्म के नाम पर चल रही किसी भी तरह की ठगी को! सच पूछिए तो यही आपके लेखन की विशिष्टता दिखाई दे रही है. जगह का इतिहास, भूगोल और दूरी-सुविधा तो सभी बताते हैं, पर लूट का अनुभव सिर्फ़ आप ही बता रहे हैं. ज़रूर लिखें.

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  8. वाह क्या बात है बेहतरीन प्रस्तुति सुरुचिपूर्ण

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  9. बहुत हीं रोचक रहा यह यात्रा बृतांत । इतनी दूर से आप यहाँ केरल घूमने आये और हम यहाँ केरल में रहकर भी कहीं न घूम सके, यहाँ से जाने के बाद क्या खाख घूम पायेंगे, बस इसी बात का दुःख है ।:)

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  10. बहुत सुंदर लिखा, सही ठगने का ढंग बना रखा है,बहुतरोचक ढंग से आप ने इस विषय पर लिखा है, आप का यह लेख सम्भाल कर रखूंगा ताकि कभी हमारे काम आये.
    आप का धन्यवाद
    अगली पोस्ट का इंतजार
    आप को आप के परिवार को दिपावली की बहुत बहुत शुभकामनायें

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  11. साहिब!
    मेरी हिंदी कुछ
    अच्छी नहीं है ! किर्पया गलती के लिए माफ़ कीजियेगा | आपकी केरल भ्रमण के बारे में यही कहूँगा की जीवित इंसान को भूख लगती है प्यास लगती है और उसकी कई जरूरतें भी हैं इस लिए जो भी इंसान यह अहसास कर जाते हैं उनका प्रयास होता है की किसी न किसी तरह से जिसके पास कुछ है बह अपने दुसरे भाई बहनों को इज्ज़त मान से दे ताकि बह दुसरे भी अपनी जरूरतों को पूरा कर सकें! सारा विधान ही ज्ञान्बनो ने ऐसा बनाया हुआ है. अमेरिकन businessman रोच्क्फेलर जब स्वामी विवेकानंद जी से मिले तो उन्हों पूछा, " में भगवन देखना चाहता हूँ मुझे भगवान् दिखायो?" स्वामीजी ने कहा जीवत इंसानों की सेवा ही भगवन की सेवा है" रोच्क्फेलर ने डॉ. बोर्लौग को रिसर्च करने के लिए कहा और डॉ. बोर्लौग ने अफ्रीका में मिटटी की रिसर्च की और गेहूं की ऐसी वरिएटी तैयार की जिससे वहां रहने वाले लोग अपनी ज़मीं पर पैदा कर सकें ! इस्सी तरह धार्मिक स्थल पर जो किया जाता है या होता है वेह केवल इंसानों की सहायता है. हम आने जाने में इतने पैसे खर्चते हैं परन्तु जब वही पैसे किसी दुसरे को देने पड़े तो हमारे मन में कुच्छ कुच्छ होने लगता है. इसके लिए आप मेरी अंग्रेजी का artcle "charity pays" पढ़ सकते हैं. गूगल सर्च पर Prof P.K.Keshap लिखिए और Author : Prof P.K.Keshap Go Articles पर जा कर आप पढ़ सकते हैं. आपकी रचना बहुत रोचक है. अब तो मेरा भी मन केरल को देखने के लिए करने लगा है. अपने इष्ट देव से वेनति करूँगा की जल्दी से जल्दी प्रयोजन बना दे. धन्यवाद सहित Prof P.K.Keshap http://positivepersonality.blogspot.com

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