Monday, 14 September 2009

'सच का सामना' का सच



कुछ दिनों से टेलीविजन पर एक धारावाहिक दिखाया जा रहा है, जिसका नाम है ‘सच का सामना’। जिस प्रकार भारतीय संविधान में राजनेताओं के योग्यता की कोई लक्षमण रेखा नहीं निर्धारित की गई है उसी प्रकार टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों के स्तर की कोई सीमा नहीं होती, वे किसी भी स्तर के हो सकते हैं, उसी स्तर का यह भी धारावाहिक है। किंतु जैसा कि बाजार में बिकाऊँ होने की शर्त विवादित होना है, न कि उच्च स्तरीय होना, उसी तरह यह भी धारावाहिक विवाद का केन्द्रविन्दु बनाया गया, जिसकी गूँज संसद तक पहुँची और जिसको सभी टी.वी. चैनलों ने तेज़ी से लपका।संसद में बहस छिड़ गई कि इस पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।क्यों कि सच का सामना करने से सबसे ज्यादा अगर कोई घबराता है तो राजनेता । जिस दिन सरकार बदलती है उसी दिन विपक्ष को एक साथ ढेरों सच का सामना करने की आशंका सताती है। सत्ता पक्ष के पिटारे से कई ऐसे जाँच के विषय निकलते हैं, जिससे न केवल सत्ता का संतुलन बनाने में सहायता मिलती है बल्कि वे समर्थन जुटाने के भी काम आते हैं । यह आशंका जताई गई कि यदि किसी दिन राजीव खंडेलवाल ने मंत्री या सत्ता पक्ष के राजनेता को सच का सामना करने के लिए तलब कर लिया तो हाथ पाँव फूल जाएंगे । प्रश्न कुछ इस तरह के हो सकते हैं, जैसे कि – स्विस बैंक में किसका पैसा जमा है, और किन लोगों का खाता है?वे किस उद्योग से सम्बन्ध रखते हैं या किसी समर्पित जनसेवी के हैं ? उनके नाम आपको पता हैं किंतु आप बताना नहीं चाह्ते हैं आदि आदि--- उसके बाद पोलीग्राफ टेस्ट के लिए झूठ पकड़ने वाली मशीन के पास लाया जाएगा और मशीन बताएगी कि नेता जी सच बोल रहे हैं या झूठ। किंतु जैसा कि कैबिनेट में एक वकील साहब हैं, जो ऐसे अवसरों पर सलाहकार की भूमिका निभाते हैं या यूँ कहें कि हर सरकार में ऐसे लोगों की आवश्यकता का अनुभव की जा रही है जो सम्विधान की अपने सुविधानुसार व्याख्या कर सकें, उनका दिमाग बहुत तेज़ी से काम करता है। उन्होंने कहा कि डरने की कोई बात नहीं है, स्थिति नियंत्रण में है। टी.वी. चैनलों के पास न्यायालय की शक्ति थोड़े ही है, जो गिरफ्तारी वारंट निकालेंगे और आरोप का सामना करने जाना पड़ेगा। वैसे भी राजनेता के गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावज़ूद उसे न्यायालय में आरोप का सामना करने के लिए प्रस्तुत करना कठिन कार्य होता है तो राजीव खंडेलवाल किस खेत की मूली हैं। वैसे तो हमारे निजी सूत्रो ने इस कार्यक्रम के बारे में कुछ शर्तें तय कर रखी हैं । जैसे कि इस कार्यक्रम में किसी सत्ता पक्ष के राज नेता को सच का सामना करने के लिए नहीं बुलाया जाएगा । यदि गलती से उसे टी वी चैनल पर बुला ही लिया गया है तो उसे एकांत में समझा दिया जायेगा कि सच का सामना न करना दोनों के हित में है। यदि इस पर भी वह नहीं समझता है और लोकतंत्र का सजग प्रहरी होने का दम्भ रखता है, तो उसे कार्यक्रम दिखाने के पहले एक स्पष्टीकरण या माफीनामा दिखाना होगा कि इस घटना का दूर-दूर तक सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्टीकरण देना होगा कि झूठ पकड़ने वाली मशीन नेताओं पर काम नही करती है, इस लिए यह निर्णायक नहीं है। जो नेता कहेगा वही सच माना जाएगा न कि मशीन। क्योंकि मशीन में गड़बड़ी की सम्भावना भी हो सकती है, यह और बात है कि डी.डी.ए. के फ्लैटों के आबंटन के समय कम्प्यूटरीकृत लॉटरी और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें निष्पक्षता पूर्वक सन्देह से परे कार्य करती हैं ।
अगली शर्त यह है कि इस कार्यक्रम में सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों को नहीं पूँछा जा सकता,क्योंकि जबसे हमें स्वतंत्रता मिली है तब से यह भी स्वतंत्रता मिली है कि किसी राजनेता से सार्वजनिक महत्व के प्रश्न का उत्तर देना या न देना उसके निर्भर है । क्योंकि इससे उसके चरित्र पर आक्षेप आ सकता है और मानहानि का भी मुकद्मा दायर कर सकता है क्यों कि वह न्याय का आर्थिक भार उठाने मे भी सक्षम है। किंतु अन्य लोगों से चरित्र पर आक्षेप लगाने वाले प्रश्न भी पूंछे जा सकते हैं। जैसे राजीव खंडेलवाल किसी राजनेता से यह प्रश्न नहीं पूँछ सकते कि आप ने अब तक कोई घपला किया है या नहीं ?सच बोल रहे हैं कि झूठ इसका निर्णय पोलीग्राफ टेस्ट करेगा । जैसे कि यह पूँछा जा सकता है कि “शादी से पहले आप ने किसी स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं या नहीं?” “शादी के बाद किसी स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्पर्क बनाया है या नहीं?” “यदि बनाया भी है तो उंगली पर गिना जा सकता है या नहीं?” यदि हाँ बोलेंगे तो पूरा परिवार सुन और देख रहा है, प्रतिष्ठा और पत्नी दोनों खोने की आशंका है और वह सच बोल रहा है या झूठ इसका निर्णय झूठ पकड़ने वाली मशीन करेगी, जिसे अंतिम माना जाएगा। जैसे “‘गे राइट्स’ के बारे में आप का क्या ख्याल है?” “क्या आप ने पुरुष होते हुए किसी पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं?” “इस आर्थिक मन्दी के दौर में जबकि हर व्यक्ति महंगाई से त्राहि त्राहि कर रहा है,सोंच कर बताइए यदि आपके विवाह के पूर्व धारा 377 समाप्त कर दी जाती, तो क्या आप स्त्री से विवाह करके बाल बच्चों के फिजूल के खर्चीली झंझट के चक्रव्यूह में फँसना पसन्द करते या किसी ‘गे’ से विवाह कर सभी खर्चों पर पूर्ण विराम लगा देते?” इस प्रश्न पर आपको दो लाइफलाइन दी जाएगी, जिससे आप अपने शुभ चिंतकों से विचार-विमर्श कर सकते हैं। किंतु घोर परम्परावादी माता पिता से फोन पर विचार मत माँगिएगा वर्ना आपकी शारीरिक सुरक्षा और पैतृक सम्पत्ति को खतरा भी उत्पन्न हो सकता है ।
राजीव खंडेलवाल को समझा दिया गया है कि प्रश्न किस स्तर के होने चाहिए। उनसे यह भी कह दिया गया है यदि समझ न आये तो उदाहरण के रूप में सलमान खान के धारावाहिक ‘दस का दम’ से कुछ प्रश्न लिए जा सकते हैं, जैसे कि-“कितने प्रतिशत भारतीयों को घर वाली से बाहर वाली ज्यादा आकर्षित करती है?” “कितने प्रतिशत भारतीय विवाहित होने के बावज़ूद घर के बाहर अपनी प्यास बुझाते हैं?” “कितने प्रतिशत भारतीय ऑफिस जाने से पहले अपनी पत्नी को पार्टिंग किस देते हैं?” “कितने प्रतिशत भारतीय अपने पत्नी की पसंद का धारावाहिक देखते हैं?” आदि आदि................

-विनय कुमार ओझा 'स्नेहिल'

4 comments:

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  2. सही कहा.....क्या कहा जाय...स्थिति कितनी निकृष्ट होगी कहा नहीं जा सकता.

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  3. भाई ओझा जी,
    हमारे नेतागण त्रिकालदर्शी है. अपना देश भगवान भरोसे चलता है . इसीलिये भगवान को भी बार-बार अवतार लेने का कष्ट उठाना पडता है.कहने को तो हम कहते हैं कि कानून का शासन है.पर कानून भी कैसे कैसे . सच का सामना इनका कुछ भी नहीं कर सकता क्योंकि पॉलीग्राफ और मोबाइल सबूत के दायरे से बाहर हैं.

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  4. नारायण-नारायण-नारायण!!! आप नेता के बारे में ऐसी बात कर रहे हैं. घोर कलिकाल! लगता है आपने गीता नहीं पढ़ी. भगवान श्रीकृष्ण ने उसमें कहा है कि नेता वह प्राणी है जो मान-अपमान, आशा-निराशा, सत्य-असत्य और यहां तक कि होने-न होने से भी परे है. ऐसे महान प्राणी के बारे में ऐसी बात नहीं की जाती. नेता को क्या गरज कि वह सच का सामना करे! अरे अगर हो दम तो आए सच, और करे नेता का सामना? साले की मार-मार कर खोपड़ी न फोड़ दी गई तो कहिएगा.

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