Sunday, 6 September 2009

मेरा चैन -वैन सब

( थोड़ा सा भूतकाल में चलें ,चार - पाँच साल पहले जब इस मुखडे की धूम थी .तब यह व्यंग्य लिखा गया था और प्रकाशित हुआ था .)
मैं पिछले कई महीने से असमंजस की स्थिति में हूँ। मैं ही क्या , पूरा देश ही ऐसी स्थिति में है। अन्तर सिर्फ इतना है कि देश को ऐसी स्थिति में रहने का लम्बा अनुभव है , जबकि मेरे लिए यह नया अवसर है।इसीलिए कुछ बेचैनी हो रही है मुझे।वस्तुतः इस बेचैनी के पीछे मेरे अज्ञान का ही हाथ है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस समय अपना देश, अपना समाज खुश है या दुखी ?

भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जिधर देखिए, एक ही स्वर गूंज रहा है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा.......। इस स्वर के गूंजते ही चेहरे पर रौनक आ जाती है- गोया बहुत बड़ी खुषखबरी मिल गई हो! क्षण भर को भागम-भाग,रेलम-पेल ठहर जाती है।सारी ताकत बटोरकर बन्दा अपने आप को नियन्त्रित करता है,अर्थात फिर भीड़ में घुसता है तो उसकी भी रागिनी फूट पड़ती है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा।

चैन उजड़ने जश्न पूरे जुनून पर है। यह सिद्ध करना है कि मेरा चैन सबसे ज्यादा उजड़ा है। आप इस बात को सिद्ध भी कर सकते हैं ,बशर्ते आप गर्दभ राग के विशेषज्ञ हों। सभी का चैन उजड़ा है, शिकायत सबको है किन्तु प्रश्न यह है कि किसका चैन उजड़ना प्रकाश में आ सकता है ?

पिछले मौसम में टूटू की शादी थी- कुमार साहब की सौभाग्यकांक्षिणी कन्या सेक्सी के साथ। उसी अवसर पर यह मार्मिक प्रश्न मेरे मानस पटल पर उभरा था। टूटू के दोस्त- दोस्तनियां समूह में पधारे थे। ऊँचे समाज के लोग हैं। उचाई का अन्दाजा मुझे इस बात से लगा कि अधिकांश दोस्तनियां कच्छा-बनियान में थीं और “अरे यार!” को छोड़कर शेष वार्तालाप अंगरेजी में कर रही थीं। वहीं इनका चैन भी उजड़ने लगा।

धरातल पर चार बड़े-बड़े तख्त पड़े थे। रस्सी से जकड़ दिया गया था उन्हें।नीचे लाल-पीली बत्तियां जल रही थीं। शर्माजी ने बताया कि इस प्रकार की व्यवस्था को डी जे कहते हैं। वर-कन्या के बिना विवाह सम्पन्न हो सकता है,परन्तु डी जे के बिना कतई नहीं।तख्तों के पीछे आधा दर्जन ध्वनि विस्तारक यंत्र अपनी पूरी शक्ति से कर्मयोग का पालन कर रहे थे- गोया सभी अतिथि बहरे हों। क्या पता आज के झटके से उनके कान खुल जाएं !

अपने यहां की शादियों में अब दो खण्ड भारी भीड़ लेते हैं। यह विभाजन मुख्यतः आयुवर्ग के अनुसार हो रहा है।खींचते- खांचते आप पच्चीस तक के हैं तो आप इसी डी जे के पास होंगे- हाँ, शर्त यह है कि आस-पास कच्छा बनियानधारी कन्याएं भी हों। चुस्त जींस और लघु उत्तरीय भी थोड़ा बहुत स्वीकार्य है। यदि आप पच्चीस से ऊपर हैं तो भोजन पंडाल की तरफ प्राप्य हैं । कुछ वियाग्राभोगी वानप्रस्थी भी आपको प्रथम समूह में दृष्टिगोचर होंगे। अब डी जे स्थल पर तिल फेंकने की जगह नहीं है। सबका चैन उजड़ना शुरू हो गया है। अदम्यशक्ति और उत्साह के पुंज ब्रह्मचारीगण तख्त पर ऐंड़े-बैंड़े लात चला रहे हैं । गधा पास में खड़ा हो तो दुलत्ती मारने के नए-नए तरीके वह भी सीख ले।

कुछ ज्ञानी कलाकारों ने मूल गीत को कई बार ”देख“ रखा है। ऊपरी नशा कम है। ऐसे कलाकार मूल गीत में बाप-बेटे के पद संचालन का अनुसरण कर रहे हैं। कहीं एकाध पद संचालन भी मूल कलाकारों से अलग हुआ तो कला खतरे में पड़ सकती है या अमिताभ- अभिषेक की श्रेणी से नीचे की श्रेणी में परिगणित हो सकते हैं। कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक है।कइयों को लगता है कि मूलगीत में सुधार की काफी गुंजाइश है। ऐसे कलाकारों को प्रयोगधर्मी कहा जाता है।वे फिल्म निर्देशक को उसकी गलतियों का एहसास कराना चाहते हैं।मसलन, जब चैन-वैन का उच्चारण हो तो अपनी छाती पर घूंसा मारना है, ”उजड़ा” पर दोनों टांगों के बीच एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाना है और फिर अचानक उठकर अभिनेत्री की चोली की रस्सियां खोलनी हैं।

रहने भी दो भाई साहब! एक तो नैतिक पतन के इस युग में बेचारी ने परम्परावादी रस्सीयुक्त चोली पहन रखा है। आधुनिकता की पोषक होती तो जींस-टॉप नहीं पहनती ? चलो, चोली ही पहनी तो हुक या बटन नहीं लगवा लेती ?

दस-बारह साल वालों ने मंच खाली कर दिया है। शायद उन्हें अनुमान हो गया है कि कुछ देर और टिके तो फ्रैक्चर हो सकता है। बालक का मन ब्रह्मा होता है। बच्चे मन के सच्चे! भैया पहले से नाच रहे थे।बड़ा होकर मैं भी ऐसा ही उच्च कोटि का नर्तक बनूंगा। अब दीदी की इच्छा रोके नहीं रुक रही है।दो -तीन कृशकाय हैं। उन्हें कुछ भय लग रहा है। मोटी वाली दीदी बोल्ड हैं। वे मंचस्थ हो गई हैं। उनके लिए स्थान रिक्त हो गया है। अब और नृत्यांगनाएं मंचस्थ हो रही हैं। तब तक आइसक्रीम खा आते हैं।

कुछ वानप्रस्थी भाई भी प्रयास में हैं। इस भीड़ में प्रवेश पा सकने में सफल हो गए तो स्पर्श सुख का सौभाग्य मिल ही जाएगा। किसी नौजवान ने जोर का धक्का मारने की कृपा कर दी तो ”किसी“ के ऊपर गिरने का सुख भी लूट सकते हैं। जिन्दादिली इसे ही कहते हैं। कुछ लोग गम्भीर किस्म के हैं। परिधि के बाहर से ही कला का सम्मान कर रहे हैं। बड़ी कृपा की ईश्वर ने जो दो आँखें दे दीं। गालिब का शेर इनकी समझ में कुछ ज्यादा ही आ गया है-

गो हाथ में जुम्बिश नहीं ,आँखों में तो दम है

रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे ।

चैन-वैन जोर-शोर से उजड़ने लग गया है। अब मेरा आत्मविश्वास साझा सरकार की तरह हिल रहा है। यहां तो चैन उजड़ते ही लोग खुश हो रहे हैं। डी जे है न , कोई भी गीत पूरा नहीं हो सकता । बीच से कटता है। लोग चिल्लाते हैं, फरमाइश करते हैं। थोड़ा सा चैन फिर उजड़ता है। सरकारी परियोजना की तरह कार्यक्रम रुक-रुक कर चलता रहता है, खुशी बढ़ती रहती है।

कभी- कभी न जाने क्यों डी जे अचानक ही चुप हो जाता है। लगता है कि हम कुछ सुन भी सकते हैं; हमारे दो कान भी हैं। परन्तु यह सुविधा ज्यादा देर तक टिक नहीं सकती। रणभेरी सी बजने लग गई है। पद संचालन पुनः शुरू हो गया है । स्थिति और विषम हो गई है। शहर वाले बरबाद हो रहे हैं।

(अभी यहीं तक , अंत अगले किसी दिन )

12 comments:

  1. भाई यह है आज की होनहार नालयक ओलाद, जिने देख कर देखने वाले को खुब शरम आती है... इन्हे नही... क्योकि यह होनहार जो है

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  2. डीजे कथा सुना कर आपने पुण्य लाभ अर्जित किया।

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  3. भाई अनूप शुक्ल फुरसतिया जी से सौ फीसदी सहमति.

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  4. इति श्री डी जे कथा ,नहीं नहीं अंत अभी बाकी है -वेट करते हैं !

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  5. वाह वाह जी बहुत् बडिया रहा डी जी जब इश्क कमीना और कम्बख्त हो गया है तो ये तो बेचारा डी जे और डाँस है अगली कडी का इन्तज़ार रहेगा

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  6. shehar waale kya country waale hi barbaad ho rahe hain... aur kamaal ki baat hai logon ki isi me bad maze bhi aa rahe hain !
    jaise koi competition ho ki sabse jyada koun apne ko barbaad kar sakta hai... par in logon ke mummy papa ke haal to aapne bataye hi nahin ?
    (shayad agli baar...)
    :)

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  7. हरिशंकर जी बुन्देली में कहूँगा - बडो अच्छो व्यंग्य लिखो हे मजा आ गओ . बेसे सच्ची बताएं हमाओ बी चेन वेन सो उड़ गओ . खुसी रहो .

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  8. राकेश जी,
    पता नहीं मुझे क्षेत्रीय भाषाओं ( बोलियों ) के उद्गार बहुत अच्छे लगते हैं.आपकी टिप्पणी इसी कारण मुझे प्रभावित कर गई.

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