Friday, 28 August 2009

संघे शरणं गच्छामि....

लोकतांत्रिक भारत में पैदा हुए राजकुमार तमाम आर्यसत्यों को समझते-समझते ख़ुद मंत्री बन गए. असल में अब ईसापूर्व वाली शताब्दी तो रही नहीं, यह ईसा बाद की 21वीं शताब्दी है और ज़िन्दगी के रंग-ढंग भी ऐसे नहीं रह गए हैं कि कोई बिना पैसे-धेले के जी ले. वैसे तो उन्हें जब भी अपना पिछ्ला जन्म याद आता तो अकसर उन्हें यह सोच कर कष्ट होता था कि वे भी क्या दिन थे. मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी, अकसर तो बिन मांगे ही बड़े आराम से भिक्षा मिल जाती थी. जो लोग जान जाते कि यह तो राजपुत्र है, वे तो यह भी इंतज़ार नहीं करते थे कि उनके दरवाज़े तक पहुंचूं मैं. जहां जाता, अगर मेरे वहां पहुंचने या होने की सूचना मिल जाती तो राज परिवारों से जुड़े लोग बहुत लोग तो ख़ुद ही चलकर आ जाते थे भिक्षा देने नहीं, चढ़ावे चढ़ाने. कई राज परिवार तो तैयार बैठे रहते थे संन्यास दीक्षा लेने के लिए पहले से ही. एक ज़माना यह है, अब मांगो भी भीख नहीं मिलती. अब भीख सिर्फ़ तब मिलती है जब आप किसी बड़े बाप के आंख के तारे को उससे दूर कर दें. छिपा दें कहीं और फिर फ़ोन से सूचना दें कि भाई इतने रुपये का चढ़ावा इस स्थान पर इतने बजे रख जाएं. और ध्यान रखें, किसी प्रकार की समझदारी करने की कोशिश न करें यानी पुलिस-वुलिस को सूचना न दें, वरना आसपास मौजूद हमारे भदंत आपको वहीं से महापरिनिर्वाण को उपलब्ध करा देंगे. या फिर आप कोई लाइसेंस-वाइसेंस दिलाने की हैसियत में हों और उसे रोक दें. या फिर तब जब आप इनकम टैक्स विभाग से काला-सफ़ेद करने का पक्का परवाना रखते हों और दो लाख लेकर 10 लाख की रसीद दे सकें. अब जीवन की पृहा से मुक्ति के लिए संत नहीं बना जा सकता है, बल्कि तमाम संपदाएं अर्जित करने के लिए संत बना जाता है. संत बन कर वे सारी सुविधाएं हासिल की जाती हैं जो दिन-रात खटने वाले गृहस्थों को भी हासिल नहीं होती हैं.
लिहाज़ा इस जीवन में महापरिनिर्वाण पुराने वाले तरीक़े से तो नहीं मिलने वाला है, ये तो तय है. परिनिर्वाण प्राप्त करने के लिए तप का तरीक़ा दूसरा ही अपनाना होगा. तो सबसे पहले उन्होंने सरस्वती की ध्यान साधना की, देश के सबसे बड़े अगिया बैताल की छत्रछाया में. एक से बढ़कर एक चमत्कार किए उन्होंने ध्यान साधना के तहत. इसी दौरान कुछ नए देवताओं से उनका संपर्क हुआ और उन्होंने जान लिया कि जनता अब तक जिन देवताओं को पूजती आ रही है वे सब के सब बिलकुल ग़लत-सलत देवता हैं. जनता इन्हें झुट्ठे पूजती है, असली देवता तो दूसरे हैं. उन्होंने यह बात समझी और किसी ध्यान साधक की तरह बात समझ में आते ही नए मिले देवताओं की पूजा शुरू कर दी.
अब ज़ाहिर है जब आप किसी देवता को पूजिएगा तो चाहे नया हो या पुराना, वह फल तो देगा ही. बल्कि नए देवता थोड़ा ज़्यादा ही फल देते हैं. सो उन्होंने दिया भी. उन्होंने सबसे पहले तो इन्हें समझाया कि भाई देख सरस्वती की साधना से आज तक किसी को भी निर्वाण नहीं मिला है. निर्वाण मिलता है विष्णु भगवान की कृपा से और विष्णु जी मानते हैं लक्ष्मी जी को. उनकी ही सिफ़ारिश चलती है विष्णु भगवान के सामने. तो अब तू उन्हीं की साधना और साधना उस अगिया बैताल के यहां नहीं हो सकती. यह साधना तुझे करनी होगी हमारी छत्रछाया में, तो चल ये ले मंत्री पद और संभाल अपनिवेश का कारोबार.
राजकुमार ने तुरंत यह साधना शुरू की और अबकी बार इतने मन से की कि कुछ भी बक़ाया नहीं छोड़ा. अपनिवेश का काम उन्होंने इतने मन से किया कि उनके देवराज का सिंहासन डोलने लगा. ऐन वक़्त पर उनके हाथ से जान छुड़ाकर भाग गया देश, वरना उन्होंने उसे भी नहीं छोड़ा होता. ख़ैर उनके सपने अधूरे नहीं रहेंगे, इसका भरोसा उनके बाद उनके मार्ग के साधकों ने दिला दिया. इसीलिए बाद में कुछ विकल्पहीनता की त्रासदी और कुछ ईवीएम की कृपा ने जनता से उन्हें ऐज़ इट इज़ कंटीन्यू भी करवा दिया. बहरहाल, मंत्रालयी दौर में ही राजकुमार राष्ट्र अपश्रेष्ठि के ऐसे प्रिय हुए कि हवाई अड्डे पर उनके गुरुभाई इंतज़ार ही करते रहते और राजकुमार स्वयं विमान के पिछले दरवाज़े निकल अपश्रेष्ठि के कलाकक्ष में पहुंच जाते.
पर इसके बाद से बेचारे राजकुमार का मन उखड़ गया. उनकी समझ में एक तो यह बात आ गई कि राष्ट्र ऐसे चलने वाला नहीं है. राष्ट्र में अब दुख ही दुख है और दुख से उबार सकने की ताक़त रखने वाले इकलौते विहार में अब कोई दम नहीं रह गया है. यहां तक कि इसके जो देवता हैं, उन्हें उनके ही कुछ भक्तों ने अंतर्ध्यान यानी कि नज़रबन्द कर दिया है. तब? अब क्या किया जाए? यह प्रश्न उठा तो उन्होंने एक बार फिर ध्यान लगाया और पाया कि इस विहार के पीछे एक संघ है. वैसे तो विहार में प्रवेश का रास्ता ही संघ से होकर आता था, लेकिन राजकुमार को राजकुमार होने के नाते उसकी ज़रूरत शायद नहीं पड़ी थी. पर अभी उन्हें अचानक उसकी अहमियत पता चल गई और इसीलिए उन्होंने एकदम से घोषणा कर दी.
हालांकि घोषणा जो उन्होंने की, वह अंग्रेजी में की और अब क्या बताएं! यह कहते हुए मुझे बड़ी शर्म आती है कि वह मेरी समझ में बिलकुल वैसे ही ज़रा भी नहीं आई, जैसे 6 साल पहले उनके विहार का इंडिया साइनिंग और फील गुड़ वाला नारा पूरे देस की अनपढ़ जनता के समझ में नहीं आया था. ख़ैर, हमने सोचा कि अपन मित्र सलाहू किस दिन काम आएगा. सों हमने उससे पूछ लिया. उसने जो बताया और उसका जो लब्बोलुआब मेरी समझ में आया वो ये कि अब ये जो अपना विहार है इसकी स्थिति बिहार जैसी हो गई है और राजा साहब की हालत लालू और रामबिलास पासवान जैसी हो गई है. विहार के जो और भदंत हैं ऊ त बेचारे सब ऐसे हो गए हैं जैसे पंचतंत्र का वो सियार जो एक बछड़े के बाप के पीछे-पीछे लगा था.
ज़ाहिर है, अब ऐसे में ये सवाल तो उठना ही था कि फिर क्या किया जाए. कैसे मिलेगा निर्वाण. सवाल उठते ही उन्होंने तुरंत ध्यान लगाया. ध्यान में नारद मुनि आए. देवर्षि को राजकुमार ने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने तुरंत उन्हें सूतजी से मिलवाया. भला हो सूतजी का कि उन्होंने इस घोर कलिकाल में कथाओं पर उमड़ते-घुमड़ते शंकाओं के बादलों को देखते हुए कथा सुनने का कोई उपाय नहीं बताया. उन्होंने लौकिक उपाय बताते हुए राजकुमार को संघ के शरण में जाने का उपाय सुझाया. वही बहुमूल्य उपाय कुछ दिनों पूर्व उन्होंने मृत्युलोक के वासियों को बताया है. नया उपाय जानकर लोकवासियों में धूम मचनी ही थी, सो वो मची हुई है. सभी जाप कर रहे हैं : संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि...... आप भी कर के देख लीजिए. क्या पता दुख के जिन्न से पीछे छूट जाए.

17 comments:

  1. बढिया लेख, पर कृपया प्रूफ़ रीडिंग भी कर लिया करें. कई जगह अशुद्धियों के कारण प्रभाव में कमी आती सी लगी.

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  2. संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि......

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  3. ati uttam sahab mujhe apna title banate waqt pata nahi thi ki aap pahle se ek achchhi baat kah rahe hain, jahan tak ashuddiyo ki baat hain to kalam ka farz baat kahna hain jisse kuch sudhar hota ho baat badhiya hain to galtiyan bemani hain

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  4. "संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि...... आप भी कर के देख लीजिए. क्या पता दुख के जिन्न से पीछे छूट जाए."
    सुस्वागतम!!
    जाप करना प्रारम्भ कर दिया है।

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  5. संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि......
    जाप शुरू कर दिया है।

    देसी एडीटर
    खेती-बाड़ी

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  6. संघे शरणम् गच्छामी ... हा..हा.. बहुत खूब इष्ट देव जी.

    पिछली शाम शहर से बाहर था, टूर पर. इस व्यस्तता में आपको याद किया.

    फिर बी.एस.एन.एल. के इंस्पेक्शन क्वार्टर में ट्रेन के इंतज़ार में 'इयत्ता' देखा और आपका व्यंग्य 'सस्ते में' पढ़ा तथा प्रतिक्रिया दे दी.

    आज उसे दुबारा पढ़ने बैठा तो फिर एक नया व्यंग्य....और भी मजेदार.

    इस व्यंग्य में अनेक जगह हास्य का पुट बेहद मजेदार है .

    "कोई बिना पैसे-धेले के जी ले.....पिछ्ला जन्म याद कर कष्ट होता था कि वे भी क्या दिन थे.....पुलिस-वुलिस को सूचना न दें, वरना हमारे भदंत आपको वहीं से महापरिनिर्वाण को उपलब्ध करा देंगे.....लक्ष्मी जी की ही सिफ़ारिश चलती है विष्णु भगवान के सामने....उन्हें उनके ही कुछ भक्तों ने अंतर्ध्यान यानी कि नज़रबन्द कर दिया है....वह अंग्रेजी मेरी समझ में ज़रा भी नहीं आई....सूतजी ने कथा सुनने का कोई उपाय नहीं बताया...संघ के शरण में जाने का उपाय सुझाया"

    बहुत बहुत बधाई दिल से.

    एक उपाय है कि -

    पदोन्नति
    नहीं हुआ तो
    यूं मत
    रोया कीजिये,
    यही नारियल
    ले जाकर
    उनके दर पर
    फोड़ा कीजिये .
    ० राकेश 'सोहम'

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  7. बातों ही बातों में आपने इन्हें आईना दिखा दिया है, लेकिन इन्हें तो अब न शर्म आती है और न समझ ।

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  8. हे देव, संघे शरणम् गच्छामि नामक मन्त्र पाकर हम अत्यंत प्रसन्न हुए. शरण का वरण हर युग में होता आया है. अत: हे (इष्ट) देव, कलियुग में इस शरण-मन्त्र के जाप की महिमा का विस्तार से वर्णन करने के लिए हम आपके आभारी हैं.

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  9. इसे कहते है बातो बातो मै धोना, मजा आ गया जी

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  10. भन्ते! एक नया धम्मपद ठेलने की क्षमता है आप में!

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  11. भाई! अतीत की खिड़कियों से वर्तमान पर क्या खूब नज़र बिखेरी है आपने।
    कितनी सहज अभिव्यंजना में कई महत्वपूर्ण इशारे कर गये हैं आप..चुपचाप।

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  12. अच्छा लगा पढ़कर.. हैपी ब्लॉगिंग

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  13. हे भदंत ,आपके कितने जाप पूरे हुए जल्दी बताइये ताकि हम उसके आगे से शुरू करें

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  14. संघे शरणं गच्छामि.... संघे शरणं गच्छामि.... संघे शरणं गच्छामि....
    prayas acha hai..
    lage raho munna bhai

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सुस्वागतम!!