Thursday, 6 August 2009

मेघ : तीन चित्र

साथियों हालाँकि वर्षा नहीं हो रही है । मेघ बरसे न बरसें हर स्थिति में तरसाते हैं । अभी कल ही मेघ आए और ऑफिस से लोटते समय कुछ चित्र खींच गए कि -

उमड़ - घुमड़ कर आते मेघ
ओ मद में मादमाते मेघ ।
तुम बिन सब कुछ सूना है
आस मिलन की लिए हुए
रात चौगुनी-दिन-दूना-है
कसक भरी इस बिरहा में
क्यों मन को भरमाते मेघ ?
उमड़ - घुमड़ कर .....
छूटा घर छूटा चोबारा
छूटे संगी साथी जिन पर
निज- हारा, मन- हारा
पीया मिलन की बेला में
क्यों आंसू बरसाते मेघ ?
उमड़-घुमड़ कर .......
आभावों की लिस्ट बड़ी है
योवन की देहरी पर देखो
अरमानो की लाज खड़ी है
घास-फूस की झोपड़ पर
क्यों मदिरा बरसाते मघ?
उमड़-घुमड़ कर ....
[] राकेश 'सोऽहं'

5 comments:

  1. तीसरा चित्र सबसे अच्छा है
    बधाई
    अलविदा सावन ,भादों मुबारक

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  2. सुस्वागतम!!
    चित्र तो तीनों बढ़िया हैं,
    मगर वर्षा अभी भी रूठी हुई है।

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  3. योवन की देहरी पर देखो
    अरमानो की लाज खड़ी ह
    घास-फूस की झोपड़ पर
    क्यों मदिरा बरसाते मेघ
    .....Umda prastuti...badhai.

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सुस्वागतम!!