Monday, 27 July 2009

आत्मीयता की त्रासदी :बेघर हुए अलाव

परिवर्तन,क्षरण ,ह्रास या स्खलन प्रकृति के नियम हैं और प्रकृति में ऐसा होना सहज और स्वाभाविक होता है किन्तु यही प्रक्रिया जब समाज में होने शुरू हो जाती है तो वह समूची मानव जाति के लिए घातक हो जाती है मानवीय मूल्यों से विचलन, अपनी ही संस्कृति के उपहास और आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम शायद बहुत आगे निकल गए हैं परिवर्तन की लहर आई है और सर्वत्र विकास ही दिख रहा है विकास गांवों का भी हुआ है किन्तु विकास के रासायनिक उर्वरक ने मिट्टी की अपनी गंध छीन ली है उस हवा में अब वह अपनत्व नहीं है जो हर रीतेपन को सहज ही भर लेता था भारत के गांव थे ही संस्कृति एवं परम्परा के पोषक! भोजपुरी भाषी क्षेत्र के गांव तो सदैव ही ऐसे थे जहां निर्धनता के कीचड़ मे आदर्श एवं आत्मीयता के कमल खिलते रहे अब ये गांव आत्मीयता का विचलन देख रहे हैं, समृद्ध परम्पराएं टूट रही हैं और अपनी संस्कृति से जुड़े लोगों के मन में टीस पैदा हो रही है। संभवतः ऐसी ही टीस की उपज है ओम धीरज का नवगीत संग्रह-“बेघर हुए अलाव”

संवेदनशीलता ही कवि पूंजी होती है गांव के अपनत्व ,मिट्टी के मोह,और परम्पराओं के प्रति ओम धीरज काफी संवेदनशील हैं। पूरे संग्रह में वे इसी की तलाश करते दिखते हैं ये बात अलग है कि उस गांव की हवा में आत्मीयता की वह गंध नहीं है जिसके वे आदती रह चुके हैं उनकी व्याकुलता पहले ही नवगीत “आओ चलें बाहर कहीं” में स्पष्ट झलकती है। बड़ा चुभता सा प्रश्न उठाया है-

बच्चियों पर /की गई मर्दानगी को देख / वक्त भी अब

ताली बजाता किन्नरों सा

इस नुकीले दंश को/कब तलक और क्यों सहें,

इस प्रश्न पर यहां सर कोई धुनता नहीं

aur कवियों ने भी गांव के बिगड़े हालात को अपनी कविता का विषय बनाया है परन्तु उनमें और ओम धीरज में एक बड़ा अन्तर है जहां दूसरे कवियों ने इन विद्रूपताओं से हास्य पैदा किया है वहीं ओम धीरज ने एक सोच ,एक संवेदना पैदा की है ये हास्य नहीं ,हमारे चिन्तन एवं मनन के विषय हैं

पाउच के /बल पर बनते परधान हैं

काम की जगह / बनी / जाति ही महान है

लोकतंत्र बिक रहा आज/ बिन भाव के

गांव की जीवन शैली ही आपसी प्रेम और सौहार्द की प्रतीक रही हैखान-पान ,अलाव और दरवाजों की बैठक गांव की एकता -आत्मीयता के ताने -बाने थेये ताने बाने अब टूट रहे हैं अलाव गांव की विशिष्टता के रूप में जाने जाते थेयहां आपसी समझौते,भविष्य के सपने , हास परिहास और संवेदनाएं स्थायी रूप से स्थान पाते रहे हैं आज उनके लिए कोई स्थान नहीं अब ये बेघर हो रहे हैइसी तथ्य को रेखांकित करता है नवगीत -गांव बेगांव एक बानगी देखिए-

सिकुड़े आंगन/बांच रहे अब

मौन धूप की भाषा......

चौपालों से नाता/टूटे बेघर आज / अलाव हो गए।
कुछ परम्पराएं बड़ी पुरानी हैंइक्कीसवीं सदी की सोच से निरर्थक भी सकती हैं पर उनमें एकता का पुट था उन लुप्त परम्पराओं और उनके पालन में आने वाली समस्याओं को कवि ने हृदय से समझा है-

अर्थी के बांस नहीं/चढ़ पाते कांधे

पीपल के पेड़ नहीं / घंट कहां बांधे ?

गीतों -नवगीतों में प्रायः प्रेम का प्रवाह होता है, शृंगार का कोई पक्ष होता है या फिर अनगढ़ सी कोई कल्पना “ बेघर हुए अलाव ” में नंगे सत्य को बड़े सहज किन्तु कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया हैबड़ी से बड़ी विडम्बना को ओम धीरज ने एकदम छोटी किन्तु सार्थक प्रस्तुति दी है-

दरिया की/ लहरों का

बदला मिजाज है

कागज की/ नावों पर

बहता समाज है

----------------

मन में / है मूरत

अनगढ़ तराशे

पानी में /ढूंढें है / सुख के बताशे

ऐसे /मरीजों का मर्ज लाइलाज है

कवि का गांव भोजपुरी भाषी क्षेत्र में है भोजपुरी के शब्द अपने साथ हार्दिक अभिव्यक्ति लेकर प्रस्फुटित होते हैं। लगता है कि ये शब्द नहीं, अपितु एक व्यापक भाव के संक्षिप्त रूप हों इन शब्दों का प्रयोग कवि ने इतनी सहजता से किया है कि वे गीतों को रस प्रदान करते हुए दिखते हैं इनके प्रयोग देखिए-“फटहे से पन्ने पर”,“फींच”,“अन्हराया”,“कांटकूस,घिरिर-घिरिर”,“सुकवा तारा,कथरी”,“बिहान” आदि

निःसंदेह गांव का मिजाज बदला है किन्तु अभी भी कवि के हृदय में गांव के लिए बहुत स्नेह है। अभी भी कवि का गांव शहर से अच्छा है और वह अभी भी वह पुरानी गंध तलाश लेता है- आंगन /ओसारे में/ रहठा की /आग है

पक रहा/ भदेली में / भदईं का/ भात है

सनई के टुन्से से/ बन रहे सलोने की

नथुने में भर आई / सरसोई गंध है

कचरस , आलू-निमोना,बतरस ,पकरस और खोइया की आंच तले बनने वाले भात में कुछ वैसी ही गंध है जो शायद John कीट्स के सेन्सुअसनेस में होगी

“मुंह में मीठी /गारी लेकर/ गाल /फुलाए

भौजाई से / देवर की मनुहारी लेकर” का दृष्य भी किसी प्रेमलोक का ही है सुन्दरताएं अभी भी शेष हैं-

मकई के पौधे को/ सोह रहीं नारियां

कजरी की/ धुन में/ रोप रहीं क्यारियां

मत पूछो /भाव इन / मांसल/ भराव के....

और इसीलिए सौंदर्य अभी जीवित है ओम धीरज का यह संग्रह बहुत से दायरों को तोड़कर बाहर निकलता है ऐसे अनेक नवगीत हैं जो वैश्विक अनुभूति के गीत हैंतमाम विचलनों को खुलकर चुनौती दी गई है

टूट रहे/रिश्तों नातों पर

जाति धर्म के जज्बातों पर

तुम विग्रह विच्छेद लिखो,

पर हम तो

सन्धि समास लिखेंगे

मेरे लिए यह संभवतः पहला संग्रह था जिसके शब्दों से गुजरते हुए मुझे लगा कि अभिधा में भी इतनी शक्ति होती है संग्रह के अधिकाँश गीत लक्षणा और व्यंजना में बोलते है किन्तु इस संग्रह में अभिधा की बात ही कुछ और है सारतः ओम धीरज का यह संग्रह अपने आप में दर्द, सौन्दर्य, जिजीविषा और पुनरुत्थान का एक सुन्दर सम्मिश्रण हैयह एक शुभ संकेत है और आत्मीयता को निमन्त्रण देता हुआ हिन्दी साहित्य की एक आवश्यकता है

पुस्तक - बेघर हुए अलाव ( नवगीत संग्रह )

कवि - ओम धीरज पृष्ठ -१२८, मूल्य - 150/-

प्रकाशक-अस्मिता प्रकाशन,185-ए, नया बैरहना, इलाहाबाद -०३

समीक्षक - हरी शंकर राढ़ी

12 comments:

  1. "टूट रहे/रिश्तों नातों पर

    जाति धर्म के जज्बातों पर

    तुम विग्रह विच्छेद लिखो,

    पर हम तो

    सन्धि समास लिखेंगे"

    कवि - ओम धीरज की पुस्तक - बेघर हुए अलाव ( नवगीत संग्रह ) की श्री हरी शंकर राढ़ी जी ने सुन्दर समीक्षा की है।
    आभार!

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छी समीक्षा की है

    ReplyDelete
  3. हर देश ,राज्य या गाँव की संस्कृति अपने आप में अमूल्य धरोहर हैं और इन्हें विलुप्त होने से बचाना संभव न हो तो कम से कम संजो कर रखना बहूत जरूरी है ताकि भावी पीढी इनके बारे में अनभिज्ञ न रहे.

    यह भी सही है गावों में कृत्रिमता का प्रवेश होने लगा है ,हरे जंगलों को काट कर सीमेंट के पेड़ उगाए जा रहे हैं ,मीठे-मीठे फूलों की खुशबू की बजाये अब वहां भी डीज़ल की सुगंधी फैलती जा रही है.एक एक कर पार्यावरण संरक्षण के हर नियम पूंजीपतियों को बेचे जा रहे हैं .खेतों में रसायन झोंक-झोंककर बंजरीकरण क्रान्ति का सुभारम्भ हो चूका है.

    ReplyDelete
  4. Hi,

    Thank You Very Much for sharing this helpful informative article here.

    -- Junagadh | Girnar | Somnath | Gir National Park

    Nice Work Done!!!

    Paavan

    ReplyDelete
  5. इस पोस्ट में कुछ तकनीकी खामियां आ गई हैं जैसे विराम चिह्न लुप्त हो गए हैं. दर असल ,पहले कुर्त देव 10 में कम्पोज कर के फोंट बदला गया और इस क्रम में कुछ तकनीकी गलतियां चली गईं जिसका मुझे खेद है.
    हरिशंकर राढी

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छी समीक्षा की है आपने. वास्तव में आलोचक वह आलोचक ही है जो किसी पुस्तक रूपी मकान के कोने-कोने से सही माइनों में परिचय करवाता है.

    ReplyDelete
  7. बेहतरीन प्रस्तुति के लिये आभार साधुवाद

    ReplyDelete
  8. तो अब किताबों की समीक्षा ब्लॉग पर भी
    हरिशंकर जी ,ये तो अतिक्रमण हो गया

    ReplyDelete
  9. मेरी समझ में नहीं आता कि ब्लोग के बारे में ऐसे पूर्वाग्रह क्यों हैं ? ब्लोग आज उभरता हुआ एक बडा मंच बन रहा है. इसकी व्यापकता सार्वभौमिक हो रही है और इस पर वह सब कुछ है जो एक साहित्यिक पत्रिका में होता है . इस पर प्रसार और प्रतिकिया तत्काल ही उपलब्ध है . फिर इस पर एक अच्छी चीज़ क्यों न पोस्ट की जाएं ?साहित्य प्रेमियों को एक अच्छे संग्रह की जानकारी देना किस मर्यादा का अतिक्रमण है ? क्या समीक्षा साहित्य से बाहर की चीज़ है ? अलका जी , आपके हिसाब से ब्लोग पर क्या- क्या पोस्ट करने की अनुमति होनी चाहिए ?

    ReplyDelete
  10. आपके इस समीक्षा ने ही विभोर कर दिया तो पुस्तक पढना कितना आनंद दाई लगेगा....सोच रही हूँ....

    इस महत आलेख हेतु आपका कोटिशः आभार...

    कृपया भविष्य में भी इसी प्रकार उत्कृष्ट पुस्तकों से परिचित करवाते रहें....हम आपके आभारी रहेंगे...

    ReplyDelete

सुस्वागतम!!