Wednesday, 22 July 2009

वो कौन ?

हरीश के घर से जब निकला तो अँधेरा होने को था । उसने समझाया कि मेरी मोटर साइकिल के व्हील ख़राब है अतः सुबह निकलूँ । फ़िर मार्गो की जानकारी भी मुझे ठीक से नहीं है, भटक जाऊंगा । लेकिन मैं नहीं माना, ‘ लाइफ का रियल मज़ा तो थोड़ा सा भटक जाने में ही है । जो होगा देखा जाएगा ।’ मैनें व्हील चेक करने की दृष्टि से लापरवाहीपूर्वक एक लात गाड़ी में जमा दी ।

चेविन्गुम का एक टुकडा मुंह में डाला और मोटर - साइकिल का कान उमेंठ दिया । निकलते- निकलते हरीश शायद भाभी के बारे मैं ज़ोर -ज़ोर से चींख कर कुछ बताना चाहता था लेकिन मोटर – साइकिल की आवाज़ में कुछ समझ न सका । मैं आगे निकल गया था और गाड़ी फर्राटे भर रही थी ।

सरपट भागते हुए काफी देर हो गई थी । घड़ी में झाँका, रात्री के बारह बज रहे थे । काली नागिन सी रोड घाटी प्रारम्भ होनें की सूचना दे रही थी । रोड के किनारे खडे मील के सफ़ेद पत्थर पर 'घाटी प्रारम्भ 55 कि.मी.' स्पष्ट देखाई देता था ।

रात स्याह हो चली थी । लगता था राक्षसि बादलों ने चाँद को ज़बरन छिपा रखा हो । दूर कहीं रहस्यमयी संतूर बज रहा था । मैं चोंका ! क्या मोटर - साइकिल का एफ़ एम ऑन हो गया ? मैनें गाड़ी का एरिअल चेक किया । घड़ी को आंखों के करीब ले गया, ‘रात के 2 बजे तो प्रसारण बंद हो जाता है ?

पथरीली पहाड़ी की ठंडी हवाएं शूल सी चुभती थीं । घुमावदार संकरे रस्ते से गुज़रते हुए, पहाडी और रहस्यमयी हो चली थी । आकाश को छूते पहाडी के शिखर, भीमकाय और भयानक चेहरों से लगते थे । अंधे मोड़ पर मोटर -साइकिल की हेड - लाइट गहरी खाई में डूब जाती थी ।

तभी मुझे दाहिने कंधे पर नर्म हथेली का दबाब महसूस हुआ ! पिछली सीट पर किसी स्त्री के बैठे होने का अहसास हुआ । रजनीगंधा के ताजे फूलों की महक हवा में तैर गई ? मेरे रोंगटे खड़े हो गए !!

मैंने अनचाहे चालाकी से मोटर -साइकिल बहक जाने का उपक्रम किया और वह मेरा नाम पुकारती हुई गहरी खाई में समां गई । ‘उफ़ बच गया ’ मैनें रहत की साँस ली । मैनें डर के मारे मोटर -साइकिल की स्पीड और बड़ा दी । तभी याद आया ….मैं तो रीमा के साथ निकला था ? तो क्या मैनें अपनी पत्नी को ही !!...नहीं ….!!! मैनें ये क्या किया ? रीमा का सलोना चेहरा उन्हीं भीमकाय पथरीले चेहरों के बीच झाँक रहा था … मैं वापस आ रहा हूँ 'रीमा' ।

हेड लाइट की तेज़ रोशनी में मेरे घर का बड़ा सा गेट दिखाई दे रहा था । मैं अपने घर के सामने पहुँच चुका था और उसी घाटी की और लौटना चाहता था । तभी रीमा नें गेट खोलते हुए अन्दर आनें को कहा !!
दाहिनें कंधे पर नर्म हथेली का दबाब अब भी था !!!
गेट के सामने वाटिका के बीच पीपल के झबरीले पेड़ के नीचे मुहल्ले का आवारा कुत्ता लगातार रो रहा था ।
[] राकेश 'सोऽहं'

14 comments:

  1. अमां यार! आप तो ग़जबे कर देंगे. किसको डरा रहे हैं.

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  2. " गेट के सामने वाटिका के बीच पीपल के झबरीले पेड़ के नीचे मुहल्ले का आवारा कुत्ता लगातार रो रहा था । "

    मुहल्ले के बेचारे आवारा कुत्ते को बाइक पर बैठा लेते तो दुआ देता।
    सुस्वागतम!!

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  3. कुत्ता आवारा हो या पालतू, उसका रोना शुभ नहीं होता.............
    नर्म हथेली के दबाव का अहसास मन के भटकते रहस्य को ही शायद प्रतिबिंबित कर रहा है और
    आवारा कुत्ते का रूदन रहस्य की म्रत्यु को ही शायद प्रतिबिंबित कर रहा है...........

    रहस्य कथा से पर्दा कब उठेगा..............

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  4. बहुत बढ़िया लगा! इस लाजवाब और बेहतरीन पोस्ट के लिए ढेर सारी बधाइयाँ !

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  5. क्या माहौल बना दिया आपने.

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  6. बोत confusion हो रेली बाप ,अब ...पैले वाली रीमा भूत? या ... बाद वाली ,
    भाई इस कहानी को तो आपने भारत -पाकिस्तान का जोइंट स्टेटमेंट बना दियेला है ...ना करो तो भूत हाँ करो तो भूत ...आया आआऊ ब्भ्ह भू ...औऔऔऔ ...कुत्त कुत्त कुत्त ...ठंढ ...गीला ...

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  7. अफ ऍम चालू हो गया फिर आपने सोचा २ बजे तो बंद हो जाता है | कहीं आप सिक्किम में तो नहीं थे !! अरे भाई अगर सिक्किम में थे हमारा अफ.ऍम रहा होगा क्योंकि ये ७दिन २४सो घंटा चलता है !! और सुबह जा कार संभालना चाहिए था घटी में किसको पटक आये | कहानी आगे कब सुना रहे हैं !!

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  8. आपने रहस्य रोमांच की एक सुन्दर कथा प्रस्तुत की है. वैसे इस कहानी को कुछ इस तरह आगे बढ़ा रहा हूँ. अन्यथा न लें . -

    मैं बिस्तर पर लेटा जरूर था, लेकिन नींद गायब थी. मस्तिष्क में विचित्र विचार आ जा रहे थे. इन्हीं विचारों में डूबे कब नींद आ गयी याद नहीं. सुबह उठा तो सिर भारी था.चाय की चुस्कियों के साथ पेपर पढ़ते हुए रात की घटना पर मुझे हँसी आ गयी.मैंने निश्चय किया आज के बाद कभी भूल कर भी भांग पीने में हरीश का सहयोग
    नहीं करूंगा.

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  9. 'इयत्ता' पर क्लिक करने वाले उन तमाम पाठकों का आभार जिन्होंने अपनी अमूल्य प्रतिक्रियाएं दीं .
    आदरणीय इष्ट देव जी का विशेष धन्यवाद, उनकी प्रेरणा और सहयोग से इस महत्वपूर्ण ब्लॉग पर अपनी 'रहस्य कथा' पोस्ट कर सका
    और जागरूक तथा कुछ नया करने वालों से रूबरू हो सका .

    मैं अपने बुजुर्ग और वरिष्ट कथाकार श्री कुंदन सिंह परिहार [जो मेरे निवास की पीछे वाली कालोनी में रहते हैं] और रहस्य कथाकार श्री कैलाश नारद जी [ जो मेरे निवास की आगे वाली कालोनी में रहते हैं] का विशेष आभारी हूँ जिन्होंने कथानक को प्रभावी कहा. उनका चरण वंदन.

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सुस्वागतम!!