Friday, 17 July 2009

तुम कविता हो

प्रिये !
तुमने तो शुरु से ही
एक कविता का जीवन
जिया है,
बस
समय, भाव एवं परिस्थितियों ने
तुम्हारा किरदार
बदल दिया है।
पहले
जब मैं अबोध था,
तुम चंचल किंतु वात्सल्य रस से भरी
बालगीत लगती थी।
धीरे- धीरे
गेयता का पुट आया तो
तुम
कवित्त, घनाक्षरी
और
सवैया लगने लगी ।
क्रमशः
तुम श्रृंगार रस में पग गई,
अन्य सभी रस गौड.हो गये
और
बाह्य साहित्य के प्रभाव में
प्यार भरी गज़ल हो गई।
एक दिन अज़ीब सी कल्पना हुई
और तुम मुझे
समस्यापूर्ति लगने लगी।
मुझे लगा
मैं कुछ भूल रहा हूं
कस्तूरी मृग की भांति
व्यर्थ ही इधर उधर
कुछ ढूंढ रहा हूं
तुम तो तुलसी की चौपाई हो,
मेरी अंतरात्मा में
गहराई तक
समाई हो।
पाश्चात्य सभ्यता का युग आया
मुझे लगा
तुम छन्दमुक्त हो गई हो,
उन्मुक्त हो गई हो ,
वर्जनाएं समाप्त हो गई हैं
तुम्हारा शास्त्रीय स्वरूप
बदल गया है
पंक्तियों का आकार
परिवर्तित हो गया है
कहीं क्षीण तो कहीं स्थूल हो गई हो,
तुममें अब वीणा का अनुनाद नहीं है
नादयंत्र की थाप है
पर इस मुक्ति के कारण
तुम प्रवहमान हो गई हो,
ताज़गी लिये चलती हो
तुम्हारा यह उन्मुक्त रूप
मैनें
प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया है
हां,शर्त यह जरूर है
कि तुम अनुभूति एवं भाव से
भरी रहना
क्योंकि मेरे लिए तुम
अभी भी एक कविता हो।

15 comments:

  1. गजब ढा रहे हैं आप तो ....बेहतरीन...बेहतरीन...बेहतरीन

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  2. जबरदस्त!! बहुत सुन्दर!!

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  3. वाह..वाह..
    कविता के माध्यम से जीवन की सुन्दर कथा ।

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  4. अव्यक्त को व्यक्त कर दिया राढी जी!

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  5. मुझे तो इसमें बड़ी भयंकर धोखाधड़ी नज़र आ रही है.

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  6. हां,शर्त यह जरूर है
    कि तुम अनुभूति एवं भाव से
    भरी रहना
    क्योंकि मेरे लिए तुम
    अभी भी एक कविता हो।
    ...khubsurat bhavabhivyakti..Badhai ho Radhi ji !!

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  7. तुम्हारा यह उन्मुक्त रूप
    मैनें
    प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया है
    हां,शर्त यह जरूर है
    कि तुम अनुभूति एवं भाव से
    भरी रहना
    क्योंकि मेरे लिए तुम
    अभी भी एक कविता हो।

    अति सुन्दर गहन भवों से युक्त सारांश .
    बधाई.

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  8. यह भाषा , साहित्य, जीवन जीने की पद्धति या कुछ और भी हो सकती है. सुन्दर रचना.

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  9. मैं इष्टदेव जी से सहमत हूँ ,वो आपके लिए तो कविता है परन्तु आप उनके लिए क्या हैं.?
    सोच के मुझे भी बताइये और इष्ट देव जी को भी

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  10. अलका जी,
    कविता को समझने वाला और और उसे पसंद करने वाला कोई कवि ही होता है, इस सत्य को कविता भी समझती है और वह भी कवि को बहुत प्यार करती है. दोनों ही एक दूसरे को उम्र भर चाहते हैं और एक दूसरे को अमर कर देते हैं वे ! एक दूसरे के पूरक हैं कवि और कविता . कविता कवि की पहचान है तो कवि कविता का प्रेमी. अगर मेरे लिए वह कविता है तो मेरे बिना उसकी संकल्पना ही नहीं !जितनी ही कोमल है वह उतना ही उदार हूं मैं,इसीलिए तो वह मेरे पास है. बहुत डूब कर समझना होगा आपको !

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  11. गुस्ताखी माफ़ हो तो मै यह कहना चाहूँगा कि यह बहस बेकार है.....कविता के साथ "समझ या समझना" जोड़ा नहीं जा सकता....ये बात ही दिल की है यहाँ समझ क क्या काम!

    बहुत सुन्दर रचना है......मन भाई..

    सप्रेम,
    महेन्द्र मिश्र

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