Tuesday, 14 July 2009

प्रयोग से गुजरने की जिद तुम्हे भी है, मुझे भी...

शब्द अपने संकेत और ध्वनि खो देते हैं,
रश्मियों का उभरना भी बंद हो जाता है...
विरोधाभाषी शंकायें एक दूसरे की हत्या
करते हुये समाप्त होते जाती हैं...
आंखों के सामने बहुत कुछ दौड़ता है
लेकिन दिखाई नहीं देता......
बाहर का शोर अंदर नहीं आता
..................सब कुछ सपाट।
पता ही नहीं चलता...शून्य में मैं हूं
या मुझमें शून्य है....
मीलों आगे निकलने के बाद अहसास
होता है मंजिल के पीछे छूटने का....
और फिर मंजिल भी अपने अर्थ खो देता है...
मंजिल सफर का शर्त नहीं हो सकता...
इस रहस्य को मैं गहराई से समझता हूं,
अनजाने रास्तों पर भटकने
की बात ही कुछ और है...
कोलंबस के सफर की तरह...उनमुक्त और बेफिक्र...,
शून्य के परे तुम उभरती हो,
एक दबी सी मुस्कान के साथ...
खाली कैनवास पर रंग खुद चटकने लगते हैं...
तुम एक रहस्मयी धुन में गुनगुनाती हो...
और खींच ले जाती हो मुझे ओस में लिपटे एक तैरते द्वीप पर...
रात सफर में हो तो सुबह आ ही जाती है....
प्रयोग से गुजरने की जिद तुम्हे भी है, मुझे भी...

8 comments:

  1. एक दबी सी मुस्कान के साथ...
    खाली कैनवास पर रंग खुद चटकने लगते हैं...
    तुम एक रहस्मयी धुन में गुनगुनाती हो...
    और खींच ले जाती हो मुझे ओस में लिपटे एक तैरते द्वीप पर...
    रात सफर में हो तो सुबह आ ही जाती है....
    प्रयोग से गुजरने की जिद तुम्हे भी है, मुझे भी...
    waah bahut badhiya

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  2. सुन्दर /खुब सुरत /गजब

    आभार/ शुभकामनाओ सहित
    हे प्रभु यह तेरापन्थ
    मुम्बई टाईगत

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  3. "पता ही नहीं चलता...शून्य में मैं हूं
    या मुझमें शून्य है...."
    सुन्दर रचना,
    सुस्वागतम!!

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  4. बेहतरीन ...बेहतरीन...बेहतरीन

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  5. पता ही नहीं चलता...शून्य में मैं हूं
    या मुझमें शून्य है....
    मीलों आगे निकलने के बाद अहसास........
    बेहतरीन.

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  6. एक परम शून्य में ,
    निमिष शून्य सी अपनी सृष्टि ,
    ऐसे में अपना अस्तित्व हुआ
    शून्यों का योग चरम शून्य ||
    उद्दघोष यह गायेगा कौन ?

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सुस्वागतम!!