Wednesday, 8 July 2009

एक श्रद्धांजलि उन्हें भी

कल उनका अन्तिम संस्कार हो गया। माफी चाहूंगा ,वहां इसे संस्कार नहीं बोलते। संस्कार वहां होते ही नहीं। यूँ समझिए कि क्रिया-कर्म हो गए। दफना दिए गए।लगभग दो सप्ताह तक यूँ ही पड़े रहे। मृत शरीर को देखकर कोई पुत्र, कोई पत्नी तो कोई वास्तविक उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा था।गनीमत थी कि क्रिया कर्म हो गया। ऐसा विवाद अपने देश में होता और कोर्टकेस हो जाता तो मिट्टी भी नहीं मिलती बेचारी काया को!
खैर, क्रिया कर्म बड़ा शानदार हुआ।उनका जीवन भी तो बड़ा शानदार था।कई लोग उन्हें जिन्दा देखकर मरे, कई मरने के बाद मर गए।मुझे समझ नहीं आया।मानसिक मृत्यु के बाद ऐसे 12 लोगों को शारीरिक आत्महत्या की क्या आवश्यकता थी?परन्तु वे उनके फैन थे और फैन को कुछ भी करने का अधिकार होता है ।बहरहाल , उनके क्रियाकर्म पर विशाल जलसा हुआ- रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए।गाने गाए गए, डांस हुआ। शमशान भी गूंज उठा।उस मस्ती में कहां की वसीयत और कहां की आत्महत्या! सारे विवाद संगीत में डूब गए।
जिस ताबूत में वे दफनाए गए,सुना कि बेशकीमती था। कीमती चीजों से उन्हें गहरा लगाव था।उसी के लिए जिए वे!जो भी किया ,बहुत बड़ा किया। सुना कि उनका घर बहुत बड़ा था-नेवरलैण्ड।ऐसी लैण्ड आगे कभी नहीं- नेवर! झील से लेकर चिड़ियाघर तक अन्दर ही। क्या पता कब किस जानवर की जरूरत पड़ जाए!मन कब बच्चा-बच्चा खेलने लग जाए या किस जानवर से प्रेमप्रसंग का शौक चढ़ बैठे!क्या चमत्कारी काया थी ? नाचीज के समझ में कुछ आया ही नहीं।चेहरा-मोहरा देखकर लिंगभेद होता ही नहीं था। पता नहीं लोग होमोसेक्सुअल होने का आरोप कैसे लगा देते थे? लोगों का क्या, अनाप सनाप बकते ही रहते हैं।
अब समस्या तो इस नाचीज के दिमाग की है। कुछ समझ ही नहीं आता ।अब अपने समझ में यही नहीं आया कि क्या उस महंगे ताबूत में पंचभूत काया का जैविक क्षरण सामान्य विधि से अलग होगा? होगा तो समय कम लगेगा या ज्यादा?
उनके वस्त्रालंकार की तो बात करना ही बेमानी है।पता नहीं क्या-क्या पहने, क्या-क्या खाए! आवष्यकतानुसार चेहरा-मोहरा भी बदला।प्लास्टिक सर्जरी भी कराई, कभी मम्मी बने तो कभी पापा! ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। पैसे को उन्होंने पैसा समझा ही नहीं। इतने फकीर थे कि करोड़ों डालर के कर्ज में डूब गए। यह सब देखकर विदर्भ के किसानों की सोच पर मुझे बड़ी चिढ़ आई। छोटे से कर्जे पर नासमझ आत्महत्या कर लेते हैं। उन्हें भी पोजिटिव होने का गुण उनसे सीखना चाहिए। पर वे ऊँची बातें सोचते ही नहीं!
वे बड़े फनकार थे।संगीत को उन्होंने बड़ी इज्जत दिलाई। शास्त्रीय संगीत से पॉप संगीत में शिफ्ट करने में उनकी उच्चतम भूमिका है। वस्तुतः युवा पीढ़ी को संगीत से जोड़ने का पूरा श्रेय उन्हें ही दिया जाना चाहिए। आप से ही प्रभावित होकर अपने आर्यावर्त में अंगरेजी गाने का वर्चस्व बढ़ा और हमारा समाज ऊँचा हुआ। वैसे नाचीज ने भी अंगरेजी में एम .ए। किया था और अपने जमाने में अँखफोड़ पढ़ाकू था। इतना अँखफोड़ कि यूनिवर्सिटी में भी गर्लफ्रेण्ड बनाने का टाइम नहीं मिला परन्तु अंगरेजी गाने आज तक पूरी तरह समझ में नहीं आए।
उनके नृत्यकौशल की तो बात ही निराली थी।जब वे स्टार्ट हो जाएं तो जेनेरेटर भी मात खा जाए,करेंट लग जाए या फिर मिर्गी का रोगी भी शरमा जाए। क्या पद संचालन था!भाव भंगिमा की तो जनाब बात ही मत करिए। शरीर का हर जोड़ अलग -अलग दिखने लग जाए और पता लग जाए कि किस अंग का वाइब्रेशन अधिकतम कितना हो सकता है। उनके कंपन के अंकन के लिए कोई यन्त्र बना ही नहीं। सारे सीज्मोग्राफ और ई.सी.जी. फेल!
अब वे नहीं रहे। पता नहीं क्या होगा उस फन का, उस विरासत का? पर , एक भरोसा है उनके पीछे चलने वाली पीढ़ी पर। जिसके इतने फैन,इतने फोलोवर है कि आत्महत्या तक कर लें, उनके कुछ योग्य चेले तो होंगे ही! संभालेंगे उनकी विरासत। हमें क्या ? हमारी तरफ से भी एक विनम्र श्रद्धांजलि!

13 comments:

Puttu Ke Papa said...

Radhi ji app sachmuch Radi hai. Wha!!!!!! mrat vyakti ke atma ki shanti ke liye app ke udgar wakai main gazab hai. App ki "Sanskarik" Shradhanjali ke liye App ka Naman.

Anonymous said...

आपके कथ्य में कुछ जरुरत से ज्यादा कुंठित मासिकता, व्यक्तिगत सीमा में बँधकर उजागर हो रही है और कर ही क्या सकते हैं.

डॉ. मनोज मिश्र said...

हमारी तरफ से भी.....

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

सच्ची श्रद्धांजलि तो आप ने ही व्यक्त की है महराज! धन्यवाद आपको.

हरिशंकर राढ़ी said...

व्यंगकार कभी कुंठित नहीं होता।अनावश्यक प्रपंचों, विसंगतियों विडम्बनाओं, आधारहीन उडानों और नैतिक मूल्यों के मर्दन पर जब वह चोट करता है तो इनके समर्थकों को चुभता है। ट्राली की तरह पीछे पीछे चलना सबको अच्छा नहीं लगता। लटकों-झटकों से दुनिया का भला नहीं होने वाला। अगर इनकी आलोचना करने वाला कुंठित है तो आगे राम ही जाने........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुस्वागतम!!
हमारी तरफ से भी एक विनम्र श्रद्धांजलि!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

इस श्रद्धान्जलि के हकदार उस मृतात्मा से अधिक वे हैं जो शारीरिक रूप से जिन्दा होकर भी अपनी मानसिक इहलीला समाप्त कर चुके हैं। एमजे ने ऐसी कई आत्माओं को भटकने के लिए इस धरा-धाम पर छोड़ दिया। ऊपर की एक टिप्पणी ऐसी ही किसी आत्मा ने कर दी है। भगवान ऐसी आत्मा को शान्ति प्रदान करें।

Dhiraj Shah said...

भाव भीनी श्रद्धान्जलि

अनिल कान्त : said...

हमारी तरफ से भी एक विनम्र श्रद्धांजलि!

Shiv Kumar Mishra said...

भगवान उनकी आत्मा को शांति दें.

Anonymous said...

ऊपर एक टिप्पणी में इस आधार पर आपत्ति की गई है कि मृत आत्मा के सम्बन्ध में ऐसी श्रद्धांजलि असंस्कारिक है।क्या कहें, क्या केवल शारीरिक रूप से मर जाने से किसी के (कु) कर्म सुकर्म में बदल जाते हैं ? मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है।केवल मर जाने से मनुष्य आदर का पात्र हो जाता तो समाज अब तक नाथूराम गोडसे, जनरल डायर और हिटलर को माफ कर चुका होता;सालों साल हजारों रुपये खर्च करके रावण दहन नहीं करता और शायद 26/11 के “महापुरुषों” को भी सहानुभूति देता(आखिर वे भी तो मर चुके हैं)।परंतु शायद लाख पतन के बावज़ूद अभी भी लोग जीवनमूल्यों और मानवोत्थान को ही महत्व देते हैं। चलिए, लोगों से कह दें कि प्रपंचों और विडम्बनाओं की आलोचना करना छोड दें!

राकेश 'सोऽहं' said...

बड़ी साहसिक श्रद्धांजली है महोदय, इस श्रद्धांजली में हमारा मौन .
राकेश 'सोऽहं'

alka sarwat said...

यही चिंता मेरी भी थी कि बेचारा शरीर अपनी वास्तविक नियति को कैसे प्राप्त होगा

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सुस्वागतम!!