Tuesday, 23 June 2009

kavita

तुम
तुम
तुलसी का एक बिरवा हो
जिसे
मेरी माँ ने दूर से लाकर
आँगन में लगाया था
और
चिकनी मिट्टी से लीपकर
सुन्दर सा थाला बनाया था ।
पहले
मैं तुम्हें यों ही
नोचकर फेंक देता था
तब मैंअबोध था,
बाद में
तुम्हारा प्रयोग
ओषधीय हो गया
तुम्हारी पत्तियों को चाय में डालने लगा
और कभी कभी काढ़ा भी बनाने लगा
छौंक लगाकर ।
तुम चुप रही तो मैं
सूर्य को अर्घ्य देने लगा
तुम्हारे थाले में
मां की देखा- देखी
और अब
धूप जलाकर पूजा भी कर लेता हूँ।
लगता है
तुम अभी भी तुलसी का एक बिरवा
हो सूखती हुई
मेरे आँगन में ।

8 comments:

  1. kya khoob kaha...
    bahut khoob kaha...
    itnee sukomal.....sugathit aur sundar kavita k liye
    aapka abhinandan !

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  2. तुम अभी भी तुलसी का एक बिरवा
    हो सूखती हुई
    मेरे आँगन में.........दिल को छू जाने वाली कविता बन पड़ी है

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  3. bahut hi pyaar se likhi kawita................jisame bhawanaye hi bhawanaye hai

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  4. Waah ! Waah ! Waah !

    Atisundar abhivyakti...

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  5. चलो मुझ नाचीज birwe को pahchaanaa तो
    alka mishra

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सुस्वागतम!!