Friday, 26 June 2009

देवियों और सज्जनों

पता है मुझे
कौन है देवी
और कौन है सज्‍जन
सच तो ये है
न कोई देवी है
न कोई सज्‍जन
सच तो ये भी है
कि मैं भी सज्‍जन नहीं
न देवी, न देवता
यह तो लबादा है
जिसे ओढ़कर
हम सब सज्‍जन होने का
करते हैं नाटक
दरअसल,हकीकत तो नाटक ही है
ये दुनिया एक रंगमंच है
कुछ समझे बाबू मोशाय
अरे जम के करो नौटंकी
अपनी भूमिका सलीके से निभाओ
साफ-साफ और सलीके से बोलो
ऐसा बोलो कि मजा आ जाय
लोग कहें वाह-वाह
नाटक कम्‍पनी दे पुरस्‍कार
कुछ समझे देवियों और सज्‍जनों।।।।

संजय राय
21 जून,2009

10 comments:

  1. वाह!!
    बहुत बढिया!!
    सटीक।

    ReplyDelete
  2. umda !
    atyant umda rachna

    bhai.......badhaai !

    ReplyDelete
  3. मजा आ गया आप की रचना पढ कर, बहुत सुंदर.
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  4. रोचक रचना के लिए बधाई।
    सुस्वागतम!!

    ReplyDelete
  5. bahut dino baad dikhe. bilkul khanti such aur practicle rachna.
    hari shanker rarhi

    ReplyDelete
  6. सही कहा भाई ! दुनिया तो रंगमंच ही है.

    ReplyDelete

सुस्वागतम!!