Friday, 12 June 2009

और तुम मुस्कराती हो कंटीली टहनियों में....

आधी रात को चुपके से तुम
मेरे कान के पास गुनगुनाती हो,
मौत के बाद जीवन के रहस्यों
की ओर ले जाती हो ।

हौले से अपनी आंखों को बंद करके
मैं मौत के सरहद को पार करता हूं,
गुरुत्वाकर्षण के नियमों को धत्ता बताते हुये
मैं ऊपर उठता हूं, और ऊपर- और ऊपर

शरीर के भार से मुक्त होने पर आर्बिट
के नियम बेमानी हो जाते हैं,
दूर से देखता हूं पृथ्वी को घूर्णन
और परिक्रमण करते हुये,
और रोमांचित होता हूं कुदरत के
कानून से मुक्त होकर ।


मौत के बाद की जीवन की तलाश
ग्रहों और नक्षत्रों के सतह तक ले जाती है,
और उन्हें एक अटल नियम के साथ बंधा पाता हूं
जिसके अनदेखे डोर सूरज से लिपटे हुये है।

रहस्यों के ब्रह्मांड में तुम भी गुम हो जाती हो
और तुम्हारा न होना मुझे बेचैन करता है,
फिर जीवन की तलाश में जलते हुये
सूरज में मैं डूबकी लगाता हूं,


चमकती हुई किरणे मुस्करा के फेंक देती है
मुझे फिर से पृथ्वी के सतह पर।
और ओस की चादर में लिपटी हुई धरातल पर
मैं तुम्हे दूर तक तलाशता हूं,
और तुम मुस्कराती हो कंटीली टहनियों में....

12 comments:

  1. achha likhte hain. kalpana ka tana bana lajawab bunte hain.

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  2. सजीव और सार्थक चित्रण।
    उत्तम रचना।

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  3. रुहे भी अपनी मीत की तलाश जब तक करती है.और यह तलाश तब तक चलती है जब दुसरा साथी ना मिल जाये .....यही कुछ बयान करती हुई आप्की कविता है.....दिल को छू गई...अतिसुन्दर्

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  4. बहुत ही सुन्दर क्या शब्दों का चयन और अनुपम उपयोग किया है आपने..पढ़ कर मन आनंदित हो गया...

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  5. waah waah
    atyant manbhaavan kavita .
    haardik badhaai !

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  6. भावमय सुन्दर रचना शुभकामनायें

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  7. भाव पुर्ण ओर अति सुंदर रचना
    धन्यवाद

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  8. A graceful mingling of science, spiritualism and corporal love.
    hari shanker rarhi

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  9. हुम्म्म! राढ़ी जी से पूरी सहमति है.

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