Sunday, 10 May 2009

अक़्ल और पगड़ी

हाज़िरजवाबी का तो मुल्ला नसरुद्दीन से बिलकुल वैसा ही रिश्ता समझा जाता है जैसा मिठाई का शक्कर से. आप कुछ कहें और मुल्ला उसके बदले कुछ भी करें, मुल्ला के पास अपने हर एक्शन के लिए मजबूत तर्क होता था. एक दिन एक अनपढ़ आदमी उनके पास पहुंचा. उसके हाथ में एक चिट्ठी थी, जो उसे थोड़ी ही देर पहले मिली थी. उसने ग़ुजारिश की, ‘मुल्ला जी, मेहरबानी करके ये चिट्ठी मेरे लिए पढ़ दें.’
मुल्ला ने चिट्ठी पढऩे की कोशिश की, पर लिखावट कुछ ऐसी थी कि उसमें से एक शब्द भी मुल्ला पढ़ नहीं सके. लिहाज़ा पत्र वापस लौटाते हुए उन्होंने कहा, 'भाई माफ़ करना, पर मैं इसे पढ़ नहीं सकता.’
उस आदमी ने चिट्ठी मुल्ला से वापस ले ली और बहुत ग़ुस्से में घूरते हुए बोला, 'तुम्हें शर्म आनी चाहिए मुल्ला, ख़ास तौर से ये पगड़ी बांधने के लिए.’ दरअसल पगड़ी उन दिनों सुशिक्षित होने का सबूत मानी जाती थी.
'ऐसी बात है! तो ये लो, अब इसे तुम्हीं पहनो और पढ़ लो अपनी चिट्ठी.’ मुल्ला ने अपनी पगड़ी उस आदमी के सिर पर रखते हुए कहा, 'अगर पगड़ी बांधने से विद्वत्ता आ जाती हो, फिर तो अब तुम पढ़ ही सकते हो अपनी चिटठी.’

9 comments:

  1. बहुत सुंदर! मुल्ला का जवाब नहीं!

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  2. मुल्ला जी के किस्से मेरे भी फेव्रेटे हैं ...

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  3. पगड़ी तो आजकल कोई बाँधता नही।
    अक्ल तो राधाकृष्णन जी अपने साथ ही ले गये।

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  4. रोचक किस्सा है ................ .....मुल्ला नसरुदीन के किस्से जोरदार होते हैं

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  5. aap har bar kamaal karte hain BADHAI BADHAI

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  6. पुराने जमाने में पगड़ी थी, आजकल पीएचडी की डिगरी है। कई अनपढ़ पीएचडीमय दीखते हैं।

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  7. मुल्ला की पगडी हमें भी भेज दो भाई

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