Thursday, 7 May 2009

यात्रा बनाम परिक्रमा

पों......... की ध्वनि के साथ जैसे ही ट्रेन ने एंट्री मारी प्लैटफॉर्म पर मौजूद अनारक्षित श्रेणी से लेकर वातानुकूलित शयनयान प्रथम श्रेणी तक के सभी यात्री अपने-अपने सरो-सामान समेटते हुए एक साथ लपके. ऐसे जैसे राहत सामग्री से भरे ट्रक की ओर किसी आपदापीड़ित इलाके के ग्रामीण दौड़ते हैं. जो लोग बार-बार एलीट क्लास की आभिजात्यता पर ऐसे-तैसे कमेंट करते रहते हैं, उन्हें अगर यह मंज़र दिखा दिया जाता तो निश्चित रूप से उनकी बोलती हमेशा के लिए वैसे ही बन्द हो जाती जैसे कभी-कभी टीवी चैनलों वाले रियलिटी शो के काबिल जजों की डांट से बाल प्रतिभागियों की हो जाती है. सोच और स्पिरिट की ऐसी सामूहिक समानता और धक्का-मुक्की सहने की ऐसी भयावह क्षमता चुनाव के दिनों में मलिन बस्तियों के दौरे करने वाले राजनेताओं में भी नहीं देखी जाती.

इसी धक्का-मुक्की में जैसे-तैसे मैंने भी एएस-3 नामक कोच को लक्षित कर लिया और दोनों कन्धों पर दो एयरबैग तथा बाएं हाथ में भारी-भरकम सूटकेस उठाए अपनी ताक़त भर तेज़ रफ्तार से दौड़ा. वैसे मेरी बेहतरार्ध भी कुछ कम नहीं हैं. सौंदर्य प्रसाधनों से ठुंसे अपने निजी बैग के अलावा एक स्ट्रॉली भी वह खींचती हुई बहुत तेज़ कदमों से चल पड़ी थीं. उनके आगे-पीछे बालवृंद भी पानी का महाजग और टिफ़िनादि लिए दौड़े आ रहे थे. बहरहाल जैसे-तैसे मैं उस कोच तक पहुंचने में कामयाब हो ही गया. अब संघर्ष डिब्बे में घुस कर अपनी शायिकाएं तलाशने और उन पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए करना था. थोड़ी देर और धक्का-मुक्की चली और आख़िरकार डिब्बे के अंदर की जंग भी अपन ने जीत ही ली.

पर यह क्या? अपनी पांच में से दो शायिकाओं पर पहले से ही संवैधानिक दर्ज़ा प्राप्त अवैध क़ब्ज़ा देख अपने प्राण तो सूख गए. ख़ैर, सामान वहां छोड़ अब मैं अपनी आत्मा और आत्मजों की खोज में वैसे ही आतुरभाव से निकल पड़ा जैसे सीताजी की खोज में वानरसेना निकली थी. ईश्वर की असीम अनुकंपा से कोच के गेट पर पहुंचते ही मेरे 'रेड' तो उछलते-कूदते क़रीब पहुंचते दिख गए और उनसे क़रीब बीस मीटर दूर उनकी मातृशक्ति भी तेज़ दौड़ने के कारण उन्हें डांट लगाती, चीखती-चिल्लाती दिखीं. प्लैटफॉर्म रूपी मैदान में अब वैसी धक्का-मुक्की दिखाई नहीं दे रही थी. अलबत्ता मुझे झांकते देखते ही श्रीमती जी बिफर पड़ीं, 'अरे आ क्यों नहीं जाते जी, देखते क्या हैं? इसे खींचते हुए मुझसे चला नहीं जा रहा है.'उन्होंने स्ट्रॉली की ओर इशारा किया, 'आहं आहां....'

ख़ैर, मैंने बच्चों को सहेज कर उन्हें अपना डिब्बा दिखाते हुए श्रीमती जी की ओर दौड़ लगाई. उन्हें इस कदर हांफते देख मन तो हुआ कि उन्हें भी लाद लूं, पर शादी के 12 साल बाद इतनी ताक़त किस बेचारे में बचती है. लिहाजा केवल स्ट्रॉली उठाई और कंधे पर लादे अपने डिब्बे की ओर बढ़ा. भीतर पहुंचते ही अपनी बर्थ पर क़ब्जा देख श्रीमती जी ने मुझे ऐसे घूरा गोया मैंने उन कुंभकर्णों को ख़ुद बुलाकर लिटाया हो. बच्चे यूं तो साइडबर्थ पर बैठ गए थे, पर वे भी इस उम्मीद में थे कि पापा इन कुंभकर्णों से वैसे ही भिड़ जाएंगे और इन्हें भगा देंगे. वैसे मैं कुछ कम बहादुर हूं भी नहीं. अगर वे मनुष्य योनि के प्राणी होते तो उन्हें लताड़ कर भगाते मुझे देर नहीं लगती. यहां तो ख़ाकी वर्दीधारी प्राणी थे. वह भी कोई ऐसे-तैसे नहीं, कन्धे पर तीन-तीन सितारेधारी. उनके सिर गर्दन से जुड़े हुए होते भी जिस निस्पृह भाव से बर्थ पर लुढ़के पड़े थे, वह देख कर उनकी वस्तुस्थिति का अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता था.

आख़िरकार मैंने ख़ुद कुछ कहने के बजाय टीटी को बुलाना उचित समझा. बुलाने के क़रीब आधे घंटे बाद अवतरित हुए टीटी महोदय ने हमारे इलाके में पहुंचने के बाद पहले तो हमारे और अन्य यात्रियों के टिकट चेक किए. अपने चार्ट से मिलाया. आइडेंटिटी प्रूफ देखे. इसके बाद हमारी मूलभूत समस्या का बिना कोई समाधान किए चलने लगे. मजबूरन मुझे उन्हें टोकना पड़ा, 'सर आपने हमारी प्रॉब्लम तो सॉल्व की नहीं.' उन्होंने पलटकर मुझे ऐसे घूरा जैसे मैं बिना टिकट लिए एसी कंपार्टमेंट में घुस आया होऊं. फिर भी जवाब शांतिपूर्वक दिया, 'अब आप तो देख ही रहे हैं कि ये लोग किस हाल में हैं!'

'अरे तो पुलिस बुलाइए न! भई मेरा कन्फर्म रिज़र्वेशन है और साथ में पूरा परिवार है. आख़िर बच्चे इतनी दूर कैसे जाएंगे इस तरह?' मैंने उन्हें समझाना चाहा.

'तो वो आप ख़ुद ही बुला लीजिए न! पुलिस वालों का पुलिस क्या कर लेगी?' उनका यह जवाब यह बताने के लिए काफ़ी था कि क़ानून की समझ उन्हें मुझसे बेहतर है, 'थोड़ी देर धीरज रखिए. हो सकता है इन लोगों को होश आए और ये लोग ख़ुद ही उठकर चले जाएं.'

मैं बेचारा क्या करता? पूरे परिवार समेत अपने हिस्से की एकमात्र साइडबर्थ पर सिकुड़ गया. 'ये भी कोई तरीक़ा है? एक तो छ: घंटे लेट ट्रेन आएगी और ऊपर से कन्फर्म बर्थ पर क़ब्ज़ा किसी और का.' श्रीमती जी मेरे बैठते ही ऐसे बिफरीं, गोया ट्रेन के लेट आने और इस क़ब्ज़े के लिए भी ज़िम्मेदार मैं ही हूं.

'और तो और, ये रेल वाले इकट्ठे नहीं बता सकते कि ट्रेन छ: घंटे लेट है.' ये सामने की अपर बर्थ के मालिक थे, 'रात को 11 बजे जब मैंने रेलवे इन्क्वायरी को फ़ोन किया तो मालूम हुआ कि ट्रेन ऑन टाइम है. स्टेशन पहुंचने के बाद मालूम हुआ कि आधे घंटे लेट है. लेट के वे एक घंटे बीतने के बाद मालूम हुआ कि जी अब दो घंटे लेट है. फिर तीन घंटे बाद मालूम हुआ कि पांच घंटे लेट है और आख़िरकार यह कि छ: घंटे लेट है.' वे पूरा वृत्तांत ऐसे बता रहे थे, वे अकेले ही समय से यहां आए थे. बाक़ी लोग सीधे आकर बैठ गए हैं. रेल की इस लेट-लतीफी को लेकर उनका ग़ुस्सा आठवें आसमान पर था.

बहरहाल, ट्रेन ने एक ज़ोर का झटका धीरे से दिया और हौले से रेंग चली तो लोगों की जान में जान आई. इस बीच मैं श्रीमती जी तथा आसपास के अन्य सज्जनों एवं देवियों के व्यवस्था विरोधी प्रवचन सुनता बैठा रहा. लगभग चार घंटे बाद ट्रेन जब ग्वालियर पहुंचने वाली थी तो वही टीटी महोदय तेज़ी से भागते हुए आए और उन दोनों महानुभावों को झकझोर कर जगाते हुए बोले, 'अरे चौधरी साहब, डेढा जी जल्दी उठिए. आगे साले विजिलेंस वाले हैं. ये बर्थ छोड़ दीजिए. चलिए कहीं और आपका इंतज़ाम कर देते हैं.' वे दोनों वर्दीधारी सज्जन हड़बड़ा कर उठ बैठे और टीटी साहब हमारी ओर मुख़ातिब होते हुए बोले, 'हां भाई! बैठ लीजिए आप अपनी बर्थ पर.' इसके पहले कि इस एहसान के लिए मैं उन्हें शुक्रिया भी बोल पाता वर्दीधारियों समेत टीटी साहब अंतर्ध्यान हो चुके थे और मैं भगवान कार्तिकेय को मन ही मन धन्यवाद कहते हुए अपनी बर्थ पर काबिज हो गया.

बर्थ पर जमते ही श्रीमती शुरू हो गईं, ‘हज़ार बार मैंने समझाया कि चलो हमारे मायके हो आएं, पर तुम्हें तो हर साल नई जगह घूमने की पड़ी रहती है. मेरे घर के लोगों से मिलने में तो तुम्हें जाने क्यों कष्ट होने लगता है! बस एक बहाना मिल गया है कि नई जगह जाएंगे, नई जानकारी होगी. अब लो भुगतो नई जानकारी. ऐसे नई जानकारी कर-कर के बहुत लोग दौड़ते रहे कार्तिकेय भगवान की तरह उम्र भर और जिन्होंने माता-पिता की परिक्रमा की वे प्रथम पूज्य हो गए. कम से ये बवाल तो न झेलना होता. अभी आगे जाने क्या-क्या झेलना है.’

भला इस बात का विरोध अब मैं कैसे कर सकता था. मुझे प्रोफेसर करन याद आए. क्लासकोर्सीय हिन्दी साहित्य में गाइडों के रूप में तमाम महत्वपूर्ण योगदान कर चुके होने के बाद जब उनका पहला कविता संग्रह छप कर आया तो उसके विमोचन समारोह में उन्होंने कहा था, 'मैं आज तक दिल्ली नहीं गया. इसके बावजूद यह मेरी चौदहवीं किताब आज छप कर आपके सामने है.’ यह मैं जानता था कि दिल्ली तो क्या वह गोरखपुर से लखनऊ आना भी बिलकुल पसंद नहीं करते थे. न केवल घूमना-फिरना, बल्कि क्लासकोर्स के अलावा कुछ और पढ़ने को भी वे समय की फिजूलखर्ची मानते थे. यूं कई-कई किताबें लिखकर अपने को बड़ा साहित्यकार कहने वाले प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में बहुत थे, पर उनमें से किसी की भी किताब शहर की दुकानों पर न तो उपलब्ध थी और न किसी ने पढ़ी थी. जबकि प्रो. करन की लिखी गाइड शहर की ऐसी कोई दुकान नहीं थी, जहां न मिलती रही हो. सच तो यह है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य भी निराला के आगे नहीं पढ़ा था, पर पिछले 20 सालों में कम से कम 50 छात्र-छात्राओं को पीएचडी दिला चुके थे. अब तो उस संग्रह की कुछ कविताएं कुछ यूनिवर्सिटियों के कोर्स में भी हैं.

और यह सब दिल्ली गए बिना होना उनके लिए गौरव की बात तो है ही, हमारे लिए सीख लेने लायक भी है. आख़िर क्या ज़रूरत है दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए इतनी धक्का-मुक्की सहने की. प्रोफेसर साहब आज मुझे वास्तव में बड़े समझदार लग रहे थे. उन्होंने सिर्फ़ एक काम किया था अपने ज़माने के हेड साहब की जमकर सेवा की थी. इसके एवज में उन्होंने एमए टॉप कराया गया था और पीएचडी की डिग्री थमा दी गई थी. पीएचडी के साथ-साथ हेड साहब ने अपने बेटी के लिए उन्हें आरक्षित कर लिया था और दहेज में उन्हें लेक्चररशिप दे दी गई थी. अब मुझे लग रहा था कि यह उपलब्धियां इसीलिए उनकी हो सकीं क्योंकि उन्होंने कई जगहों की यात्रा के बजाय परिक्रमा में आस्था बनाए रखी. पैर पसारने के साथ जैसे-जैसे नींद का झोंके ने दस्तक देनी शुरू की मुझे चन्द्रशेखर की पदयात्रा, आडवाणी की रथयात्रा और उमा भारती की राम-रोटी यात्रा भी याद आने लगी थी. मैं देख रहा था कि चन्द्रशेखर तो ख़ैर, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौक़ा पा भी गए, पर बाक़ी लोग तो बेचारे वेटिंग में ही रह गए. जबकि समझदार लोग परिक्रमा के दम पर एमपी हुए बग़ैर पीएम का पूरा टेन्योर निबटा गए. मुझे ख़ुद अपनी बेवकूफ़ी पर तरस आने लगा. मन तो यह हुआ कि लौट चलें अबसे और चल कर श्रीमती जी के माता-पिता की ही परिक्रमा कर आएं. कम से कम कुछ दिन घर में शांति तो बनी रहेगी. पर फिर सोचा अब जब बर्थ पर क़ब्ज़ा मिल ही गया है, तो क्यों जाऊं बीच में छोड़ कर? अब पलनी पहुंचकर कार्तिकेय महराज की परिक्रमा करके ही लौटेंगे.

15 comments:

  1. मन से लिखी गयी ,बेहतरीन पोस्ट .

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  2. ho sakta hai aapne bhartiya rail ki ye durdasha
    pahali bar bhogi ho, lekin bade achhe se bhogi hai ab toh aap hamare dord ko samajho ki hum kavi log kitni mushqilon se joojhate hue logon tak pahunchte hain unhen hasane k liye.........
    DHARDAR ANDAZ-E-BAYAN K LIYE BADHAI

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  3. रेल यात्रा कुछ खास इलाकों में तो ऐसी ही हो गई है। आप भी तो इस की शिकायत नहीं करते हैं। जहाँ करनी चाहिए।

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  4. सचमुच ज्यादातर रेल यात्रायें ऐसी ही हो चुकी हैं ! ज्ञान जी शायद कुछ ज्यादा प्रकाश डाल सकें !
    लेक्चररशिप या लेक्चरशिप ?

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  5. रेल यात्रा तो ऐसी ही होती हैं।

    बेहतरीन।

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  6. शानदार पोस्ट.
    पालनी जाने की ज़रुरत शायद नहीं थी. परिक्रमा करके ही निपटा डालना चाहिए.

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  7. बात तो आप बिलकुल सही कह रहे हैं शिवकुमार जी. लेकिन क्या बताएं, वो कहा जाता है न, विनाशकाले विपरीतबुद्धि. बस यही हो गया मेरे साथ और ऐसा अकसर होता ही रहता है मुझसे.

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  8. एक सांस में पढ़ गया...बहुत ही रोचक ढंग से लिखी अद्भुत पोस्ट...आपका लेखन पर कितना जबरदस्त अधिकार है ये सिद्ध करने को आप की ये पोस्ट ही काफी है... बधाई स्वीकारें...
    नीरज

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  9. यूं लगा जैसे सारी घटनाएं मेरे सामने हो रही हैं।

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    SBAI TSALIIM

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  10. हा हा हा हा हा !!

    बड़ा ही मजेदार यात्रा वृतांत !!
    पूरा लुत्फ़ उठाया आपके कष्टों की अभिव्यक्ति पर !!


    प्राइमरी का मास्टरफतेहपुर

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  11. रेल में इस तरह की बात आम है,यह आपकी पीड़ा नहीं है, बल्कि इससे सभी लोग किसी न किसी रूप में जुड़े हुये है...दर असल लोग रेल को अपनी संपत्ति जरूरत से कुछ ज्यादा ही समझते हैं...खैर इस फिर ज्ञान जी बेहतर प्रकाश डालेंगे...एसा यकीन है।

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  12. हो आओ पलनी-फिर ससुराल भी हो लेना. दोनों भगवान खुश हो लेंगे.

    वैसे पी एम के लिए तो मैडम के घर की परिक्रमा का प्रयोजन बताया गया है वेदों में.

    बेहतरीन लेखन के लिए बधाई.

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  13. भगवान कार्तिकेय तो वहीं थे - विजिलेंसाधिकारी के वेश में। आप उनसे मिले-पहचाने नहीं?!।

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  14. prabhu,
    maine to pehle hi badi sanjidagi se aagaah kar diya tha-
    "ab nikalna nahin bigadi hui haalat lekar."
    par jo log samajhdaaron ki baat maante hain ve aur hote hain.
    hari shanker rarhi

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  15. बिलकुल ठीक कहा पांडे जी आपने. और भाई समीर लाल जी व राढ़ी जी आपकी बात भी बिलकुल सही है.

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सुस्वागतम!!