Saturday, 2 May 2009

खजूर से इतर

यह कहानी मैंने बहुत पहले लिखी थी. शायद सन 2000 में और मन में चल तो यह उसके भी बहुत पहले से रही थी. लेकिन लिखने के बाद भी केवल आलस्यवश मैंने इसे भेजा कहीं नहीं. बहुत दिनों बाद मैंने इसे एक जगह भेजा भी तो लंबे अरसे तक कोई जवाब नहीं आया और न मैंने कोई पूछताछ ही की. फिर पिछले साल इसे भाई फ़ज़ल इमाम मल्लिक ने मांगा तो मैंने उन्हें दे दी. तब यह सनद में छप कर आई. मुझे लगता है अब इसे दुबारा पढ़ा जाना चाहिए. शायद इसे पढ़े जाने के लिए यह एक मुफ़ीद वक़्त है. तो लीजिए आप भी देखिए और अपनी राय भी दीजिए. 

                                                                                                       इष्ट देव सांकृत्यायन
                                               
बहुत गहरा कुआं था. कुआं जितना गहरा था, उतना ही संकरा. कुएं में ढेर सारे मेढक थे. बहुत बड़ा तालाब था. तालाब जितना बड़ा था, उतना ही छिछला. तालाब में ढेर सारी मछलियां थीं. यूं उनमें कोई रिश्ता न था. तालाब न तो कुएं का पड़ोसी था और न कुआं तालाब का. संबंध फिर भी दोनों में थे और गहरे थे. ऐसे ही मछलियां न तो मेढकों की पड़ोसी थीं और न मेढक मछलियों के. संबंध फिर भी दोनों में थे और बहुत उथले थे. हुआ यह कि अपने-आपमें सिमटे-सिकुड़े मेढकों ने एक दिन आकाश देख लिया. मछलियां यूं तो आकाश देख नहीं सकीं पर मेढकों ने उन्हें दिखाई आकाश की परछाईं. परछाईं भी यूं ही नहीं दिखाई. दरअसल आकाश देखते ही उनमें उस पर फ़तह का सपना जाग उठा था. वह आकाश जिस पर बगुलों का पूरा क़ब्जा था और आकाश पर क़ाबिज होने के नाते बगुले उन्हें बिराते हुए से लगे. उन्हें लगा गोया गरमी के दिनों में यह अपना कुआं जो काफ़ी कुछ सूख जाता है, इन बगुलों के नाते सूखता है और बिलकुल ऐसे ही बरसात के दिनों में जो बाढ़ का शिकार सा हो जाता है, वह भी इन बगुलों के नाते होता है. बिलकुल वैसे ही जैसे मछलियों का तालाब उनके ही नाते सूखे और बाढ़ का शिकार हुआ करता है.
उधर तालाब में डूबती-उतराती मछलियों ने भी एक दिन देख लिया पाताल. पाताल पर उनने सांपों का क़ब्जा देखा. सांपों को देखते ही वे गहन सम्मान के भाव से सिहर उठीं. मेढक भी ऐसे ही कभी-कभी सम्मान के भाव से सिहर उठते थे, बगुलों के प्रति. कभी-कभी ऐसे ही वे मछलियों के प्रति अपने अगाध स्नेह का कहर भी बरपाते थे.
अब जब उनके मन में आकाश पर क़ब्जे का भाव जग ही गया तो बगुलों से जंग अपरिहार्य हो गई. इस जंग में वे जानते थे कि उनमें से तमाम खेत रहते और अपने में से एक का भी खेत होना उन्हें मंजूर न था. इस संकट से निज़ात के तरीक़े सोचने के लिए मेढकों की एक सभा हुई और आख़िरकार तय पाया गया कि इस जंग में सिर कटाने के लिए मछलियां तैयार की जाएं. यूं भी कुछ बड़ी मछलियां इस जंग में पहले से जुटी थीं. पर उनमें से ज़्यादातर अपने सिर कटा चुकी थीं और जो नहीं कटा सकीं वे थक-हार गई थीं.
'पर इस तरह तो हमारी भूमिका पर सवाल उठाया जाएगा. आख़िर हम क्या करेंगे जब सिर मछलियां ही कटाएंगी?' उनमें से एक युवा पर समझदार मेंढक ने सवाल उठाया.
'करेंगे, करेंगे', एक बूढ़े मेढक ने अपने पिछले दोनों पैरों पर खड़े होने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा और धप्प से बैठ गया.
'क्या करेंगे?' युवा मेढक ने फिर सवाल उछाला.
'नेतृत्व' बूढ़े मेढक ने बताया.
'वाह भाई! मरेंगी मछलियां और नेतृत्व करेंगे हम?' युवा मेढक ने कहा, 'भला कौन स्वीकार करेगा ऐसे नेतृत्व को?' उसने सवाल उछाला.
'करेंगे, सभी करेंगे', बूढ़े मेढक ने एक बार फिर बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा, 'ये मछलियां होती ही इसीलिए हैं बालक. भूल गए आकाश के उसे कोने की बात जहां मछलियों के उत्सव तक की अगुवाई बगुले करते हैं और वह भी अपने पूरे साजो-सामान के साथ. ऐसे ही हम भी करेंगे. लड़ेंगी मछलियां और मरेंगी भी वही, पर फ़तह हमारी होगी. उन्हें मिलेगा स्वर्ग का राज्य और हमें धरती का', कहते हुए उसने ठहाका लगाया.
दरअसल वे दोनों बगुलों के पैरों से चिपटकर आसमान की सैर एक बार कर आए थे. और उनमें से बूढ़ा तो यह प्रयोग भी कर चुका था.
अब युवा मेढक के पास समझौते के मुताबिक चुप रह जाने के अलावा कोई चारा न था. अंतत: तय पाया गया कि सभी मिलकर बूढ़े मेढक को भगवान के अवतार और उसकी हर बात को आत्मा की आवाज़ के रूप में प्रचारित करेंगे. वह जितने झूठ बोले उसे सत्य के साथ प्रयोग कहा जाए.
हुआ भी यही. सत्य की बारहां कचूमर निकालते हुए मछलियों की जान की क़ीमत पर उनने जंग फ़तह की और राज्य हासिल किया. हालांकि उन्हें आसमान पर आधिपत्य नहीं मिल सका पर तालाब पर वे पूरी तरह क़ाबिज थे. उसमें सीधी दख़ल देने अब कोई बगुला आने वाला नहीं था.
उधर उनके लिए एक नई मुसीबत पैदा हो गई. बगुलों से आसमान साफ़ कराने में सारा ख़ून-पसीना चूंकि मछलियों का ही बहा था, लिहाज़ा उन्हें सत्ता में भागीदारी तो नहीं पर इसका भ्रम देना अब उनकी मजबूरी बन गई थी. भ्रम भी उनने रच ही डाला. हुआ यह कि बूढ़े मेढक की मदद से एक पेड़ उगाया गया, खजूर का. इस पेड़ की जड़ें तो उस कुएं में दबी थीं, जहां मेढक रहते थे पर शाखाएं तान दी गईं मछलियों के तालाब पर. फिर एक भ्रम यह भी पैदा किया गया कि दरअसल यह जो कुआं है वही पूरा तालाब है और जो तालाब है वह भी असल में तो कुआं है. गोया यह कि यह जो कुआं है वही तालाब है और जो तालाब है वही कुआं है.
पर बात इससे भी नहीं बनी. वजह यह कि कुछ मछलियां जो समझदार थीं और जिनने बगुलों से मेढकों की नूरा कुश्ती की असलियत को भांपते हुए उनके नेतृत्व में लडऩे से इनकार कर दिया था, उनने बगुलों को भगाने के बाद बगुलों के ही इशारों पर चलते रह जाने वाले मेढकों की नहीं बल्कि मछलियों की सत्ता की बात की थी. वे ग़रीब मछलियों के लिए मुकम्मिल धरती और मुकम्मिल आसमान बनाना चाहती थीं, जहां थोड़ा-थोड़ा ही सही, पर सभी मछलियों को बराबर का हक मिलता. अब यह तो वे यूं दे नहीं रहे थे. आखिरकार तय हुआ कि इसका भी हकीकत के बजाय सिर्फ़ भ्रम दे दिया जाए. ताकि मछलियां यूं ही दबी-कुचली और बहकी रहें.
हुआ यह कि खजूर का जो वह पेड़ बनाया गया था उस पर आधिपत्य में मछलियों की भागीदारी तय की गई. इसके लिए मछलियों में एक और भ्रम पैदा किया गया. यह कि दरअसल मेढक और मछलियां कुछ अलग-अलग नहीं, बल्कि सारी की सारी जो मछलियां हैं वे मेढक हैं और सारे के सारे जो मेढक हैं वे मछलियां हैं. गर्ज़ यह कि मछलियां ही मेढक और मेढक ही मछलियां हैं.
पर इसमें भी भय यह था कि किसी दिन मछलियां सचमुच उस पेड़ की दावेदार हो सकती थीं और अगर इसमें कहीं ईमानदारी बरत दी जाती तो उनका उस पेड़ पर आधिपत्य भी हो जाता. भय दरअसल ऐसे में यह था कि अगर मछलियों का आधिपत्य उस पेड़ पर हो जाता तो एक दिन वे उस पेड़ का मूल ढूंढने लगतीं और जब उन्हें वह मिल जाता तो या तो वे उसे खोद डालतीं या फिर उसे उस कुएं से निकाल कर पूरे तालाब पर फैला देतीं. और तब मेढकों के लिए कहीं कोई जगह नहीं बचती.
लिहाजा तय किया गया कि ऐसा भी कभी ईमानदारी से होने नहीं दिया जाएगा. मछलियों को दिया जाएगा सत्ता में भागीदारी का सिर्फ़ भ्रम और इसी बहाने ऐसे जैसे मेढक-मछली भाई-भाई करते-करते मेढकों को मछली और मछलियों को मेढक साबित कर दिया बिलकुल ऐसे ही केकड़े, घोंघे, कौवे और यहां तक कि शेर, चीते और लकड़बग्घे तक को मछलियों के बराबर का दर्जा देते हुए सबको एक साथ नाप दिया जाएगा. इसमें बस इतना ही तो ध्यान रखना है कि मगरमच्छ, केकड़े, घोंघे, घडिय़ाल, सूंस, हिप्पोकैंपस, ऊदबिलाव, वाइपर या फिर केंचुए ही क्यों न आएं, पर बस मछलियां इस खजूर के शीर्ष तक न पहुंचने पाएं. और हां!  उन्हें यह भी कभी न लगने पाए कि वे इसके शीर्ष तक कभी पहुंच ही नहीं सकतीं.
सत्य, प्रेम और अहिंसा की भाषा में उस तालाब का अपना एक क़ायदा बना. यह क़ायदा दरअसल तो बगुलों की देखरेख में और उनके मुताबिक बना, पर इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि इससे कहीं से भी ऐसी कोई बू न आए. क्योंकि बदले जमाने में अब उन्हें आसमान में बैठे-बैठे कुएं पर पूरा आधिपत्य रखना था और इसी तरह तालाब की सारी संपदा हासिल करते रहनी थी. बस यही वजह थी कि मेढकों की सफलता की शुभकामना करते हुए उनके सिंहासनारूढ़ होने और अरसे तक बने रहने का पूरा इंतज़ाम करते हुए बगुलों ने मेढकों से विदा ली.
खजूर के पेड़ की इस चढ़ाई के मुकाबले पर नज़र रखने के लिए भी एक महकमा बनाया गया. उसके भी अपने क़ायदे-क़ानून बने और ये क़ायदे-क़ानून भी बिलकुल वैसे ही बने, जैसे ताल, कुएं और आकाश के उस समुच्चय का क़ायदा. ऐसा कि जिसमें जो करने को लिखा था, बस वही छोड़कर और सब हो इसकी पूरी गारंटी थी.
तब से लेकर अब तक मछलियां तीन खेमों में बंट चुकी हैं. एक वे जो पूरे भ्रम में जी रही हैं, दूसरी वे जो थोड़ी भ्रम में हैं और थोड़ी निभ्रम भी और तीसरी वे जिनका भ्रम टूट चुका है. और हां! जिनका भ्रम जितना गहरा है वे उतने ही मजे में हैं. क्योंकि वे लगातार खजूर पर चढऩे की कोशिश में हैं. उनका ख़याल है कि इस खजूर पर चढ़ते ही आसमान पर उनका राज हो जाएगा. यह जानते हुए भी कि उनकी कोशिश कभी सफल नहीं होनी, वे लगातार कोशिश में लगी हैं और इस कोशिश में उनका पूरा शरीर, मन और यहां तक कि आत्मा भी छिली जा रही है. दूसरी वे हैं जो रह रही हैं तालाब में 'कोउ नृप होय हमें का हानी' के से भाव से.
तीसरी वे जो जान गई हैं कि उन्हें किस तरह बेवकूफ़ बनाकर उनसे उनकी जमीन, ताल और यहां तक कि आसमान सब कुछ छीन लिया गया. किस तरह बगुले और केकड़े और कई और जंतु 'अहिंसा परमो धर्म:' और 'सत्यमेव जयते' रटते-रटते उनके ताल पर क़ाबिज हो गए और अब उसे खाए जा रहे हैं. किस तरह उन्हें आसमान दिखाकर न तो ताल में रहने दिया गया, न ज़मीन पर और न आसमान तक पहुंचने ही दिया गया. हुआ यह कि उन्हें उस खजूर पर न मालूम कहां लटका दिया गया जहां कुछ भी नहीं है ... न तो फल, न जल और न छाया ही.
बस वे मछलियां हैं, जिनमें अब शेष है सिर्फ बेचैनी और उन्हें है सिर्फ़ तलाश. बेचैनी, उस आधे-अधूरे जगत से निकल एक नई दुनिया बनाने और अपना हक़ हासिल करने की. तलाश है एक ऐसे रास्ते की, जो उनको वहां से निकालने में मददगार बन सके. जहां से उन्हें थोड़ी सी सचमुच की रोशनी मिल सके. जी हां, जनाब! उन्हें तो है ही तलाश, आप भी देखिए और अगर कोई रास्ता दिखे तो हमें भी ज़रूर बताएं. कौन जाने आप भी उनमें से ही एक हों.

9 comments:

  1. लोक कथा का टच लेती बहुत सुन्‍दर कहानी है। इसे हमारे साथ साझा करने के लिए आभार।

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    TSALIIM
    SBAI

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  2. अब तो सुना है कछुओ ,घोंघों ,आदि इत्यादि ने अपने अपने हिस्से बाँट लिए है......

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  3. आपने ठीक ही सुना है डॉक्टर साहब. अब बारी मछलियों की है, यह सोचने की अपने हिस्से की इस बन्दरबांट से कैसे निबटें? कैसे बचाएं अपने तालाब का अस्तित्व.

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  4. इष्ट देव सांकृत्यायन जी।
    कहानी बहुत अच्छी है।
    मेरे नये ब्लाग पर भी एक प्रेरक कथा लगी है।
    http://uchcharandangal.blogspot.com/

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  5. I had read this Story in SANAD but obviously this is an appropriate opportunity to post it while democratic drama is on climax. Prima facie, the artcle looks a fable but it gives a serious experience of an allegory.Nothing can be more ironical and tragic than to see lions legislating laws for deer,frogs and cranes doing to the fish as well. Nowdays cranes and frogs are preaching. Can anyone save fish from attending SATSANGS.

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  6. कहानी उद्वेलित करती-सी और कहने की कला आपकी दिल तक पहुँचती हुई...

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  7. पता नहीं, हम भी मछली हुआ करते थे। अब बगुला भये हैं - शाकाहारी बगुला। हमें तो अब भी यकीन है कि मछलियां म्यूटेट हो कर बगुला बनेंगी।

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  8. sateek aur samyik yatharth se roobroo karatee rochak katha !! bhut khoob !!

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सुस्वागतम!!