Thursday, 30 April 2009

मुल्ला और इंसाफ़

इधर बहुत दिनों से मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी याद आ रही है. मित्रों से निजी बातचीत के क्रम में उनका जिक्र भी अकसर होता रहा है. पढ़ता भी ख़ूब रहा हूं, गाहे-बगाहे जब भी मुल्ला के बारे में जो कुछ भी मिल गया. पर उधर जूते ने ऐसा परेशान कर रखा था कि मुल्ला को इयत्ता पर याद करने का मौक़ा ही नहीं मिल सका. आज एक ख़ास वजह से उनकी याद आई. एक बात आपसे पहले ही कर लूं कि मुल्ला से जुड़े इस वाक़ये को किसी अन्यथा अर्थ में न लें. कहा यह जाता है कि यह एक चुटकुला है, लिहाजा बेहतर होगा कि आप भी इसे एक चुटकुले के ही तौर पर लें. अगर किसी से इसका कोई साम्य हो जाता है तो उसे बस संयोग ही मानें.


तो हुआ यह कि मुल्ला एक बार कहीं जा रहे थे, तब तक सज्जन दौड़ते-दौड़ते आए और उन्हें एक चाटा मार दिया. ज़ाहिर है, मुल्ला को बुरा लगना ही चाहिए था तो लगा भी. लेकिन इसके पहले कि मुल्ला उन्हें कुछ कहते, वह मुल्ला से माफ़ी मांगने लगे. उनका कहना था कि असल में उन्होंने मुल्ला को मुल्ला समझ कर तो चाटा मारा ही नहीं. हुआ यह कि मुल्ला को आते देख दूर से वह किसी और को समझ बैठे थे और इसी धोखे में उन्होंने चाटा मार दिया. पर मुल्ला तो मुल्ला ठहरे. उनकी नाराज़गी कम नहीं हुई. उन्होंने उन सज्जन की कॉलर पकड़ी और उन्हें घसीटते हुए पहुंच गए शहरक़ाज़ी की अदालत में. क़ाज़ी को पूरा वाक़या बताया. तो क़ाज़ी ने कहा, ‘भाई मुल्ला साहब, आप बदले में इन्हें एक चाटा मारें.’
लेकिन मुल्ला इस न्याय से भी संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने कहा, ‘क़ाज़ी साहब देखिए, इन महोदय ने 20 आदमियों के बीच मेरी इंसल्ट की है. सों ये मामला इतने से निपटने वाला नहीं है.’
‘तो, आख़िर आप क्या चाहते हैं?’ क़ाज़ी ने पूछा.
‘इनकी इस हरकत से मेरी इज़्ज़त का जो नुकसान हुआ है आख़िर उसका क्या होगा?’ मुल्ला ने सवाल उठाया.
शहरक़ाज़ी समझदार थे और मुल्ला को जानते भी थे. लिहाजा मामला जल्द से जल्द रफ़ा-दफ़ा करने के इरादे से उन्होंने मुल्जिम पर एक स्वर्णमुद्रा का दंड लगाया और कहा कि वह अभी अदालत के सामने ही मुल्ला को इस रकम का भुगतान करे. बेचारा वह तुरंत भुगतान करने की हैसियत में था नहीं. सो उसने थोड़ा मौक़ा चाहा. यह कहकर कि हुज़ूर अभी मैं स्वर्णमुद्रा लेकर आपकी ख़िदमत में हाज़िर होता हूं, वह अदालत से बाहर चला गया और देर तक नहीं लौटा. जब और इंतज़ार करना मुल्ला के लिए नामुमकिन हो गया तो वह अपनी जगह से उठे. शहरक़ाज़ी की गद्दी के पास पहुंचे और उनसे मुखातिब हुए, ‘अब क़ाज़ी साहब ऐसा है कि मुझे कहीं जाना है, ज़रूरी काम से. लिहाजा मैं इससे अधिक देर तक इंतज़ार तो कर नहीं सकता. अब ऐसा करिएगा कि जब वह आए तो रकम उससे आप वसूल लीजिएगा और तब तक ये रसीद मैं आपको काटकर दिए जा रहा हूं.’ और लगा दिया एक झन्नाटेदार तमाचा. फिर चलते बने.

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8 comments:

  1. बहुत मजा आया. यदि मुल्ला नसरुद्दीन के और भी किस्से पोस्ट करें तो वाकई दिल बाग़ बाग़ हों जायेगा.

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  2. मतलब अब जूता युग के बाद तमाचा युग शुरू ही होना चाहता है -हो गयी भविष्यवाणी ! हे राम ! अब क्या होगा ??

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  3. वाह...वाह।
    मजा आ गया।
    करे मुल्ला, भरे काजी।

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  4. क्या ढेर सारे काजी ऐसे ही होते हैं? मुल्ला जी टाइप और भी होने चाहिए.....

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  5. रसीद वाली किताब - पूरी की पूरी रसीद होनी चाहिये स्वात घाटी के काजी को! :-)

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  6. बहुत सही ,आनंद आ गया .

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