Friday, 17 April 2009

गांधी इज ग्रेट ...अपने पीछे यह गधों की फौज छोड़कर जाएंगे : फिराक

भारत की असली पराजय अध्यात्म के धरातल पर नहीं बल्कि युद्ध के मैदान में हुई है...इतिहास चीख-चीख कर यही कह रहा है...सिकदंर की सेना के यहां पर हाथ पाव फूल गये थे...और उसे अपने सैनिक अभियान को बीच में छोड़कर लौटना पड़ा था...मगध की सेना के नाम से यवन सेना नायकों को अपने बीवी बाल बच्चों की याद आने लगी थी।....उसके बाद हमला पर हमला हुआ...युद्ध तकनीक में भारत मात खाया...
भारत में न जाने कैसे और कब युद्ध देवता इंद्र की पूजा बंद हो गई...कहा जाता है गौतम ऋषि का शाप था इंद्र को...उनकी पत्नी गौतमी पर बुरी नजर डाली थी इंद्र ने....कहानी जो भी हो लेकिन इंद्र की पूजा बंद हो गई..मुझे इंद्र का मंदिर आज तक कहीं नहीं मिला है....यकीनन कहीं न कहीं होगा ही....लेकिन सार्जनिक तौर पर इंद्र की पूजा नहीं होती है...भारत के पतन को इंद्र के पतन के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिये...इंद्र एक प्रैक्टिकल देवता था...जो युद्ध में खुद लड़ता था, चाहे वह युद्ध किसी के भी खिलाफ क्यों न हो, और उस युद्ध का उद्देश्य कुछ भी क्यों न हो....इंद्र युद्ध का देवता था....इंद्र की पूजा न करके भारत में युद्ध के देवता की अवहेलना की गई...और भारत निरंतर युद्ध के मैदान में मात खाता रहा....
यदि बुद्ध का संबंध राज परिवार से नहीं होता, तो बौद्ध धर्म इतनी तेजी से कभी नहीं फैलता...बुद्ध के चेहरे पर राज परिवार की चमक थी...और यही चमक लोगों के साथ-साथ उस समय के तमाम राज घरानों को अपनी ओर आकर्षित करती थी...यही कारण है कि बौद्ध धर्म को राजपरिवारों की प्रश्रय मिला...बुद्ध और महावीर के नेतृत्व में देश में अहिंसा की बीमारी तेजी फैली...इधर सीमओं के पार से आक्रमण पर आक्रमण होते रहे....बुद्ध की फिलौसफी और जीवन को सलाम है, भरी जवानी में विश्व कल्याण की भावना से ओतप्रोत होकर सबकुछ छोड़ा....मजे की बात है कि लोग बुद्ध के बताये हुये मार्ग पर भी ठीक से नहीं चल सके...मूर्ति पूजा के खिलाफ उन्होंने बहुत कुछ कहा और उनके चेले चपाटी उनके मरने के बाद उन्हीं की मूर्ति बनाके उनकी पूजा करने लगे....बुद्ध को पत्थरों में तराशा गया....इंद्र पीछे छूटता चला गया...चार्वाक से ज्यादा उलटी खोपड़ी किसकी होगी....
पिछले हजारों वर्षों में बहुत कुछ हुआ है...उनको कुरेदने से शायद कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है...बहुत सारे जख्म एक साथ बहने लगते हैं...
यदि हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने ब्रिटेन समेट दुनिया के सभी साम्राज्यवादी देशों को जमीनी स्तर पर ध्वस्त नहीं किया होता तो भारत की आजादी दूर कौड़ी होती...लगता है मैं बहक रहा हूं....बहकू भी क्यों नहीं....गांधी की गतिविधि पूरी तरह से पैसिव थी...गांधी की खासियत यह थी कि उन्होंने अपने पैसिव एनर्जी से यहां के लोगों को एक्टिवेट किया था....अभी कुछ दिन पहले दारू के नशे में फिराक साहेब के रिकार्ड हुये कुछ दुर्लभ शब्द सुनने को मिले थे...उन्हीं के शब्दों में...गांधी इज ग्रेट ..लेकिन अपने पीछे यह गधों की एक पूरी फौज छोड़कर जाएंगे...गधे गांधीयन पैदा होंगे और वे देश पर शासन करेंगे...खादी आज एक महंगा आइटम हो गया है,और यह सत्ता का प्रतीक है....एसा क्यों हुआ...पंचवर्षीय योजना नेहरू को रूस से उधार लेनी पड़ी थी...गांधी के ग्रामिण माडल को पूरी तरह क्यों नहीं अपनाया...जबरदस्त खिचड़ी पकाई गई है....पूरा संविधान खिचड़ी है...कसाब जैसे लोगों का भी यहां ट्रायल चलता है...हद हो गई है..
नई फसल के लिए पूरी खेत को जोता और कोड़ा जाता है....चीन की सांस्कृतिक क्रांति कई मायने में बेहतर है...कम से कम चीन की नई पीढ़ी इतिहास के काले भूत से तो मुक्त हो गई है....भले ही माओ को कितनी भी गालियां दी जाये, चीन जैसे अफमीची देश की तकदीर उसने बदल दी है....कभी सारा चीन अफीम के नशे में झूमता रहता था...नायक हमेशा किसी खास देश में होते हैं..उसके बाद ही उसे विश्व नायक का दर्जा मिलता है...वैसे गांधी का इफेक्ट अपने समय पर जबरदस्त था...लोगों को लाठी खाने के लिये तैयार करना भी एक मादा की बात है...गांधी का मूवमेंट इस लिये चला क्योंकि उनके मूवमेंट का सीधा असर अंग्रेजों पर नहीं पड़ता था...खैर अब इन बातों को याद करने का अब कोई तुक नहीं है....
किताबों से इतर आम जनता के बीच गांधी पर इतने चुककुले सुनने को मिले हैं कि उन्हें मेरे लिये गिन पाना भी मुश्किल है...इन चुटकुलों को जनरलविल के साथ जोड़कर देखने पर एक नई तस्वीर ही खुलती है...मामला वाद का नहीं है...असल बात है उस लक्ष्य को पाना, जिसके लिये किसी राष्ट्र विशेष का जन्म हुआ है....भारत का आध्यात्मिक लक्ष्य अस्पष्ट है...वैसुधव कुटुंबकम...लेकिन इस लक्ष्य की आधारशीला सैनिक तंत्र ही हो सकता है....भारत में सैनिक शिक्षा पहली क्लास से ही लागू कर देना चाहिये....हालांकि यह संभव नहीं है क्योंकि शिक्षा पर मुनाफाखोर माफियाओं का कब्जा है...और सरकारी शिक्षा की तो बाट पहले से ही लगी हुई है...शिक्षा में लाइफस्टाईल को तवज्जो दिया जा रहा है...भारत रोगग्रस्त है...और अभी तक इसकी बीमारी की पहचान भी नहीं पाई है...इलाज की बात तो दूर है...वैसे खून किसी भी बीमार देश के लिये बेहतर दवा का काम करता है...दिनकर याद रहा है...
क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो,
वो क्या जो विषहीन,
दंतहीन विनित सरल हो..
.अब उर्वशी भी याद रही है... लगता है है देश में जूता एक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है...देखते हैं आगे-आगे होता है क्या।

7 comments:

  1. आप की बात सही लगती है लेकिन जूता एक अंदोलन बन पाएगा इस मे शक है.....इस जूते का असर कांग्रेस पर बिल्कुल नही हुआ ऐसा ही लगता है तभी तो उसने जूता खानें के बाद भी सज्जन कुमार के भाई को टिकट देना स्वीकार कर लिया।.......

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  2. हमारे यहाँ भांग और गांजे की खपत बढ़ रही है।

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  3. चीन जापान कोरिया ,जर्मनी या रशिया आज भी अपनी मात्रभाषा का सम्मान करते है ओर अपने व्योव्हार में उसे ही इस्तेमाल में लाते है ,यहाँ पढ़ा लिखा होना मतलब अंग्रेजी बोलना है ...भारत के पतन का कारण भारतीयों का निकम्मा ओर आलसी होना है ..ओर भगवान् के सहारे बैठना है ... इतनी बड़ी जनसँख्या के बावजूद आज भी सड़क में बड़ी गाड़ी वाला सबसे पहले अनुशासन तोड़ता दिखाई देगा...आत्म केन्द्रित ओर स्वार्थ पूर्ण होना है ...
    पहले राजनीती में वही लोग जाते थे जिनका चरित्र होता था ,आजकल वही जाते है जिनके पास इसके सिवा बाकि सब कुछ होता है ...
    बुद्दिजीवी खामोश है चुनाव का वक़्त है एक पूर्व जज ने मुहिम चलायी है की दागदार लोगो को वोट न करो...मीडिया उसे तवज्जो न देकर आई पी एल का रोना रो रहा है ..बाजारीकरण हम पर हावी है ...

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  4. परमजीत भाई

    जूता आन्दोलन तो बन ही गया है. रही बात कॉंग्रेस की तो उसकी बात अलग है. वह ऐसे लोगों का गिरोह है जो मान-अपमान, जूता-चप्पल जैसी चीज़ों से बहुत पहले ही ऊपर उठ गए हैं. अगर उनमें ज़रा सी भी शर्म होती तो क्या वे एक ही खानदान को इतने दिनों तक बतौर आका झेल पाते. लेकिन उन पर भी असर होगा, तब जब पब्लिक बरसाएगी.

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  5. मामला वाद का नहीं है

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  6. मामला गंभीर है .
    लेकिन ये बात सत्य है :
    क्षमा शोभती उस भुजंग को,
    जिसके पास गरल हो,
    वो क्या जो विषहीन,
    दंतहीन विनित सरल हो..

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  7. चीन की आर्थिक नीतियों का नक़ल तो भारत में हो गया पर माओवादी सिस्टम के लाभकारी पक्षों का नक़ल कब होगा यहाँ ?भारत के बाद आजाद हुआ चीन आज भारत से काफी आगे निकल चुका है .और चीन का स्वाभिमान ...मजाल है कोई छेछेडा उसे बुरी नज़र से गुरेडे ?आँखें ही नोच लेगा.
    भारत को भ्रस्टाचार और पौरुषविहीनता के ऐड्स ने ICU में भरती दुर्बल मरीज़ बना दिया है . विघटनकारी रोगाणुओं के खिलाफ इसकी प्रतिरोधक क्षमता लगातार घटती जा रही है .
    बुरा न माने कोई पर एक शक्तिशाली चीन के उत्थान में माओवाद की अहम् भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता .भारत की अक्षुणता के लिए जल्द से जल्द कुछ ऐसा ही बहुत जरूरी है .

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