Thursday, 23 April 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-30

यक़ीन मानें आम जनता जो  जूता चला रही है, असल में वह जूता है ही नहीं. यह तो वह खड़ाऊं है जो भगवान राम ने दिया था भरत भाई को. भरत भाई ने यह खड़ाऊं अपने लिए नहीं लिया था, उन्होंने यह खड़ाऊं लिया था आम जनता के लिए. इसीलिए उनके समय में उस खड़ाऊं का इस्तेमाल उनके मंत्रियों, अफ़सरों और निजी सुरक्षाकर्मियों ने नहीं किया. यही वजह थी जो ख़ुद भरत राजधानी के बाहर कुटी बना कर रहते रहे और वहां से राजकाज चलाते रहे. जनता की व्याकुलता की वजह इस दौरान राम की अनुपस्थिति भले रही हो, पर शासन या व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी कतई नहीं थी. और सबसे बड़ी बात तो यह कि अधिकारों के उस खड़ाऊं में भरत के लिए कोई रस भी नहीं था. उनकी रुचि अगर थी तो उस ज़िम्मेदारी में जो राम की अनुपस्थिति के कारण उन पर आ पड़ी थी.

जबकि अब के शासकों की रुचि अपनी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी में कभी ग़लती से भी दिख जाए तो यह एक असामान्य बात मानी जाती है. क्योंकि सामान्यतया उनकी कुल रुचि केवल उस अधिकार में है जो उन्होंने जनता को बहला-फुसला कर या डरा-धमका कर अपने ही जैसे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से छीना है. नतीजा यह है कि आपके जनप्रिय नेताओं के बंगलों के बिजली-पानी-टेलीफोन जैसी सुविधाओं के बिल ही हर महीने लाखों में होते हैं. यह सब कहीं और से नहीं, आपकी ही जेब से आता है. हवाई सैर, अपनी ही नहीं बाल-बच्चों की अय्याशी का इंतज़ाम, पांचसितारा जीवनशैली के ख़र्चे ... आदि सब आपकी ही जेब से निकलते हैं.  इस पर ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह सब आप जान चुके हैं.

क्या आज के राजनेता उतनी ही आसानी से खड़ाऊं लौटा देने वाले हैं, जितनी आसानी से भरत ने लौटा दिया था? भरत ने जिस खड़ाऊं को ख़ुद अपने सिर पर रखा, वह आज के राजनेताओं के गुर्गों के पैरों में है और उसका इस्तेमाल आम जनता यानी आपको रौंदने के लिए किया जा रहा है.   बहुत दिनों बाद इस बात को जनता ने समझ लिया है और इसीलिए अब वह इस खड़ाऊं के इस्तेमाल के लिए बेचैन हो उठी है. उसने देख लिया है कि अपने लिए छोड़ी गई खड़ाऊं का सदुपयोग जब तक वह स्वयं नहीं करेगी तब तक उसका प्रयोग उसके ही सिर पर होता रहेगा. कभी महंगाई के रूप में, तो कभी छोटी-छोटी रोज़मर्रा इस्तेमाल की चीज़ों की अनुपलब्धता और कभी भ्रष्टाचार के रूप में. इसीलिए अब  उसे जहां कहीं भी मौक़ा मिल रहा है और जैसे ही वह ज़रा सा भी साहस जुटा पा रही है, तुरंत खड़ाऊं उठा रही है और दे दनादन शुरू हो जा रही है, अपने परम प्रिय नेताओं पर.

लेकिन जैसा कि आम तौर पर होता है बेचैनी में बड़ा जोश होता है. वह आज के इस नए जनता जनार्दन में भी साफ़ तौर पर दिखाई पड़ रहा है. अपने यहां कहावत है - बहुत जोश में लोग होश खो बैठते हैं. यह सही है कि किसी व्यक्ति पर जूता फेंकना उसके प्रति प्रबल विरोध जताने का एक प्रतीकात्मक तरीक़ा है, लेकिन अगर हमें प्रतीकात्मक विरोध ही जताना है, यानी अपनी नाराज़गी ही व्यक्त करनी है तो उसके और भी बहुत तरीक़े हैं. जूता फेंकना इसका इकलौता तरीक़ा नहीं है और न जूता इसका असली रूप ही है. अभी जगह-जगह जूते फेंकने की जो यह हड़बड़ी दिखाई दे रही है, इसकी असली वजह आपको अपने असली खड़ाऊं की सही पहचान न होना है. तो आप अपना हक़ हासिल कर सकें इसके लिए सबसे पहली ज़रूरत यह है कि आप अपने खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान करें. यह जानें कि वह खड़ाऊं कौन सा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए. सच-सच बताइए, क्या आप सचमुच जानना चाहते हैं कि वह खड़ाऊं कौन सा है, कैसा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए? तो बने रहिए इयत्ता के साथ और अपने उस परम पवित्र खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान के लिए इंतज़ार करिए इस अथातो जूता जिज्ञासा की अगली कड़ी का.

अथातो जूता जिज्ञासा-29

8 comments:

  1. shoe anant, shoe katha ananta...khool chal rahi hai yeh shoe-mala. das kadam aage tak ki badhai.
    arj kiya hai-
    wo jab bhi mane hain, mane hain joote ke hee boote se.
    kabhi chandi ke joote se, kabhi chamade ke joote se.
    -suryakumar pandey

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  2. वैचारिक deflation में जी जब सबकुछ का मूल्य गिर जाए तो रोजमर्रा के सामानों के साथ साथ जूता का भी मूल्य बढ़ जाता है .जूते का मूल्य हमे हर हाल में उचित और स्थिर बनाये रखना होगा .भाई आखिर इससे जूते बनाने वालों की खुशहाली का सीधा सम्बन्ध है .
    जी जनता जनार्दन के लिए जोश में होश ठिकाने लगाने के उपदेश के लिए धन्यवाद .

    जी आप जो भी बताते हैं उसे सबको अटाने और जताने की ख्वाइश रहती ही है .

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  3. परम पवित्र खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान के लिए इंतज़ार करिए....जरूर, यह तो रहस्योद्घाटन होने जा रहा है।

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  4. अब वो जमाना आ जायेगा की किसी सभा समारोह में मंदिर की तरह जूते बाहर उतारकर लोग टोकन जेब में रख कर अन्दर जायेगे.....

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  5. 'यह सही है कि किसी व्यक्ति पर जूता फेंकना उसके प्रति प्रबल विरोध जताने का एक प्रतीकात्मक तरीक़ा है, लेकिन अगर हमें प्रतीकात्मक विरोध ही जताना है, यानी अपनी नाराज़गी ही व्यक्त करनी है तो उसके और भी बहुत तरीक़े हैं. जूता फेंकना इसका इकलौता तरीक़ा नहीं है और न जूता इसका असली रूप ही है. अभी जगह-जगह जूते फेंकने की जो यह हड़बड़ी दिखाई दे रही है, इसकी असली वजह आपको अपने असली खड़ाऊं की सही पहचान न होना है. तो आप अपना हक़ हासिल कर सकें इसके लिए सबसे पहली ज़रूरत यह है कि आप अपने खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान करें.'
    - आपके इस कथ्य से पूर्ण सहमति है. लेकिन सही खडाऊं की पहचान और उसके इस्तेमाल का अनुमान नहीं लग पा रहा है. प्रतीक्षा रहेगी.

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  6. आइये ना.....एक-एक जूता हम सब चलायें.....!!
    दोस्तों एक कलमकार का अपनी कलम छोड़ कर किसी भी तरह का दूसरा हथियार थामना बस इस बात का परिचायक है कि अब पीडा बहुत गहराती जा रही है और उसे मिटाने के तमाम उपाय ख़त्म....हम करें तो क्या करें...हम लिख रहें हैं....लिखते ही जा रहे हैं....और उससे कुछ बदलता हुआ सा नहीं दिखाई पड़ता....और तब भी हमें कोई फर्क नहीं पड़ता तो हमारी संवेदना में अवश्य ही कहीं कोई कमी है... मगर जिसे वाकई दर्द हो रहा है....और कलम वाकई कुछ नहीं कर पा रही....तो उसे धिक्कारना तो और भी बड़ा पाप है....दोस्तों जिसके गम में हम शरीक नहीं हो सकते....और जिसके गम को हम समझना भी नहीं चाहते तो हमारी समझ पर मुझे वाकई हैरानी हो रही है....जूता तो क्या कोई बन्दूक भी उठा सकता है.....बस कलेजे में दम हो.....हमारे-आपके कलेजे में तो वो है नहीं....जिसके कलेजे में है.....उसे लताड़ना कहीं हमारी हीन भावना ही तो नहीं...........??????
    .............दोस्तों हमारे आस-पास रोज-ब-रोज ऐसी-ऐसी बातें हो रही हैं और होती ही जा रही हैं,
    जिन्हें नज़रंदाज़ कर बार-बार हम अपने ही पैरों में कुल्हाडी मारते जा रहे हैं....और यह सब वो लोग अंजाम दे रहे हैं, जिन्हें अपने लिए हम अपना नुमाइंदा "नियुक्त" करते हैं....!!यह नुमाइंदा हमारे द्वारा नियुक्त होते ही सबसे पहला जो काम करता है,वो काम है हमारी अवहेलना....हमारा अपमान....हमारा शोषण....और हमारे प्रत्येक हित की उपेक्षा.....!!.........दोस्तों यहाँ तक भी हो तो ठीक है.....लेकिन यह वर्ग आज इतना धन-पिपासू....यौन-पिपासू.... जमीन-जायदाद-पिपासू.....इतना अहंकारी और गलीच हो चुका है कि अपने इन तीन सूत्री कार्यक्रम के लिए हर मिनट ये देश के साथ द्रोह तक कर डालता है....देश के हितों का सौदा कर डालता है....यह स्थिति दरअसल इतने खतरनाक स्तर तक पहुँच चुकी है कि इस वर्ग को अब किसी का भय ही नहीं रह गया है....पैसे और ताकत के मद में चूर यह वर्ग अब अपने आगे देश को भी बौना बनाए रखता है.....निजी क्षेत्र के किए गए कार्यों की भी यह ऐसी की तैसी किए दे रहा है.....निजी क्षेत्र ने इस देश की तरक्की में जो अमूल्य योगदान सिर्फ़ अपनी मेहनत-हुनर और अनुशासन के बूते दिया है.....यह स्वयम्भू वर्ग उसके श्रेय को भी ख़ुद ही बटोर लेना चाहता है....और यहाँ तक कि यह वर्ग अपने पद और रसूख के बूते उनका भी शोसन कर लेता है.....यानी कि इसकी दोहरी मार से कोई भी बचा हुआ नहीं है......!!
    यह स्थिति वर्षों से जारी है...और ना सिर्फ़ जारी है....बल्कि आज तो यह घाव एक बहुत बड़ा नासूर बन चुका है...अब इसे अनदेखा करना हमारे और आप सबके लिए इतनी घातक है कि इसकी कल्पना तक आप नहीं कर सकते........आन्दोलन तो खैर आने वाले समय में होगा ही किंतु इस समय इस लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है.....इस महापर्व का अवसान फिजूल में ही ना हो जाए....या कि यह एक प्रहसन ही ना बन जाए.....इसके लिए सबसे पहले हम जैसे पढ़े-लिखे लोगों को ही पहल करनी होगी.....क्योंकि मैं जानता हूँ कि सभ्य-सुसंस्कृत और पढ़े-लिखे माने जाने वाले सो कॉल्ड बड़े लोगों में अधिकाँश लोग अपने मत का प्रयोग तक नहीं करते....लम्बी लाईनों में लगना....धूप में सिकना....गंदे-संदे लोगों के साथ-साथ खड़े होना......घर की महिलाओं को इस गन्दी भीड़ का हिस्सा होते हुए ना देख पाना.....या किसी काल्पनिक हिंसा की आड़ लेकर चुनाव से बचना हमारा शगल है....!! मज़ा यह कि हम ही सबसे वाचाल वर्ग भी हैं.....जो समाज में सबसे ज्यादा हल्ला तरह-तरह के मंचों से मचाते रहते हैं.....कम-से-कम अपने एक मत (वोट)का प्रयोग कर ख़ुद को इस निंदा-पुराण का वाजिब हक़ दिला सकते हैं....वरना तो हमें राजनीति की आलोचना करने का भी कोई हक़ नहीं हैं......अगर वाकई मेरी बात सब लोगों तक पहुँच रही हो....तो इस अनाम से नागरिक की देश के समस्त लोगों से अपील है.....बल्कि प्रार्थना हैं कि इस चुनाव का वाजिब हिस्सा बनकर.....और कर्मठ लोगों को जीता कर हमारी संसद और विधान-सभाओं में पहुंचाएं.....और आगे से हम यह भी तय करें कि यह उम्मीदवार जीतने के पश्चात हमारे ही क्लच में रहे.....हमारे ही एक्सीलेटर बढ़ाने से चले.......!!
    दोस्तों बहुत हो चुका....बल्कि बहुत ज्यादा ही हो चुका......अब भी अगर यही होता दीखता है तो फिर तमाम लोग सड़क पर आने को तैयार हो जाए.....अब तमाम "गंदे-संदे.....मवालियों....देश के हितों का सौदा करने वालों.....जनता की अवहेलना करने वालों.....और इस तरह की तमाम हरकतें करने वालों को आमने-सामने मैदान में ही देख लिया जाए.....!!
    .........तो फिर यह तय रहा कि चल रहे चुनाव में आप अपनी भागेदारी निश्चित करेंगे....संसद और विधान-सभाओं को अपराधियों और देश-द्रोहियों से मुक्त करायेंगे......फिर भी कोई अपराधी इन जगहों पर पहुँच ही जाते हैं.....तो इनका वाजिब इलाज भी करायेंगे.....यह निश्चित करें कि हम सब देश के हक़ लिए काम करें......तथा ऐसा ना करने वालों को सार्वजनिक दंड भी दें.........इसी आशा और मंगलकामना के साथ.....आपका भूतनाथ....एक अनजान नागरिक.....एक अनाम आवाज़.......!!......लेकिन ऐसी जो आपकी ही लगे.......!!!......सच.....!!!!

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  7. भाई भूतनाथ जी
    आपकी बात बिलकुल सही है. धन्यवाद स्वीकार करें. मैं सौ फ़ीसदी सहमत हूं आपकी बात से और आपके आह्वान से, लेकिन दिक्कत यह है कि यह तभी सफल होगा जब इसे अक्षरश: माना जाए. यानी कम से कम देश की 60 फ़ीसदी जनता जूता उठा ले. जूता का मतलब यहां शाब्दिक रूप में न लें. यहां जूते का मतलब लाठी भी हो सकता है, लात-मुक्का और बन्दूक भी हो सकता है. हालांकि उतनी जनता अगर समझदार हो जाए और अपने वोट का उपयोग बिना निजी लालच के क्षुद्र स्वार्थों को दरकिनार करके करे तो वह उठाने की ज़रूरत ही नहीं होगी. इसी वोट के दम पर हम यह व्यवस्था बदल देंगे. अब यह न कहें कि कोई प्रत्याशी ईमानदार बचा ही नहीं है. अगर ऐसा लगता है तो आप अपने बीच से ईमानदार लोगों को चुनिए, उनके पक्ष में जनमत बनाइए और उन्हें चुनाव लड़ाइए. बेशक़ शुरुआत बड़ी संघर्षपूर्ण होगी. धमकी से लेकर प्रलोभन तक आपको झेलने होंगे और सबसे बचना होगा. स्थितियों में बदलाव इसी रास्ते से होगा. यह रास्ता लम्बा है, लेकिन पुख्ता है और याद रखें ज़िन्दगी का कोई शॉर्टकट नहीं होता. पुनश्च, अगर जनता समझदार नहीं हुई तो जूता-लात-गोली-बन्दूक के बावजूद सिर्फ़ नाम और चेहरे बदल जाएंगे, व्यवस्था तो वही रहेगी. बिलकुल वैसे ही जैसे कि आज़ादी की लड़ाई के नाम पर हुआ. अभी बहुत दिन नहीं बीते, मुश्किल से 60 साल में हम नाम तक भूल गए उनके जिन्होंने वास्तव में लड़ाई लड़ी. इसके बजाय आज हम दल्लों के कृतज्ञ हो रहे हैं. इस भ्रम में कि उन्होंने लड़ाई लड़ी. दो सौ सालों की लड़ाई सिर्फ़ 20 साल में हाइजैक हो गई. यही फिर हो जाएगा. अगर इससे बचना चाहते हैं, तो लड़ाई को सही दिशा दें. दुश्यंत कुमार की पंक्तियां याद आती हैं :
    पीर पर्बत हो गई है, अब पिघलनी चाहिए.
    सचमुच पीर पर्बत हो गई है. अब यह पिघलेगी ही. पर पिघलने के क्रम में कहीं क्षरित न हो जाए, यह ध्यान रखना पड़ेगा. इसका उपाय यही है कि हम इसे सही दिशा दें. और देखिएगा, इसके नेतृत्व के लिए हमारे-आपके बीच से ही लोग आएंगे. पर इसमें जुटना हमको-आपको भी होगा. ऐसे ही, भीड़ का इंतजार मत करिए. एक-एक व्यक्ति को 5-5 मिनट में समझाते चलें. यह न सोचें कि आप एक को बता रहे हैं. याद रखें, चेतना दिए की जलती है. यह तरीक़ा भी काम आएगा.
    आशा है, संवाद बनाए रखेंगे.
    आदर सहित
    इष्ट देव सांकृत्यायन

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  8. सब कहते हैं इमानदार को वोट दो या सबसे कम बेईमान को .काश मेरे क्षेत्र में कोई सबसे कम बेईमान होता .अरे भयिवा मेरे कोई इमानदार जैसी दुर्लभ वस्तु ढूंढ के तो लाओ .बेईमान कचडों की मात्रा इतनी बढ़ गयी है की इन्होने इमानदारों का श्रोत और प्रवाह मूंद दिया है.
    4th स्टेज के भ्रष्टाचारनुमा कैंसर से पीड़ित मरीज़ को लोग टेबलेट से ठीक कर देने की हसरत पाले हुए हैं .कैंसरकारक कोशिकाएं अन्धरूनी उतकों तक फ़ैल चुकी हैं अब बिना गामा बन्दूक और अंग विछ्छेद के काम चल सकेगा क्या ?

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सुस्वागतम!!