Friday, 6 March 2009

अँधेरा मिटेगा एक न एक दिन

विज्ञान भूषण

कहते हैं कि अँधेरा कितना भी गहरा और भयावह क्यों न हो उसे भी एक न एक दिन मिटना ही होता है। रोशनी की एक किरण चारो ओर बिखरे असीमित तमस को चीरकर जीवन ऊर्जा का संचार कर देती है। प्रकृति का यह नियम हम सबके जीवन पर भी अक्षरश: लागू होता है। इसे हमारे समाज की विडंबना ही कहना चाहिए कि वैज्ञानिक और आर्थिक स्तर पर विकास के उच्चतम सोपानों पर पहँुचने के बाद भी हमारी सोच, आज भी पुरुषवादी मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है। सार्वजनिक स्थलों और मीडिया में हम भले ही नारी स”ाक्तिकरण  के बड़े-बड़े दावे क्यों न कर लें लेकिन इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि घर के भीतर और बाहर  स्त्री नाम के जीव को अपना अस्तित्व और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए हर क्षण जूझना पड़ता है। शारीरिक और उससे बहुत ज्यादा मानसिक स्तर पर होने वाले इस संघर्ष की पीड़ा को कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है।
कथाक्रम जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़ी रचनाकार रजनी गुप्त का तीसरा उपन्यास ‘एक न एक दिन’ हाल में ही किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका ने नारी मन में घटित होने वाली उस टूटन-फूटन को बहुत शिद्दत से महसूस किया है, जो अक्सर हमारे आसपास होती रहती है लेकिन पौरुष के दंभ में उसका रंच मात्र भी एहसास नही होता है। उपन्यास की दो प्रमुख स्त्री पात्र कृति और अनन्या हैं , जो अलग अलग परिस्थितियों के चलते अपने दांपत्य जीवन से विमुख हो जाती हैं। जहाँ एक तरफ कृति को उसके पति चौहान साहब ने तानाशाही प्रवृत्ति के चलते छोड़ दिया वहीं दूसरी तरफ अपने काम में मशगूल रहने वाले और पिता बनने में अक्षम राजीव, अनन्या से अपना रिश्ता तोड़ लेते हैं। अपने पति से अलग होने के बाद भी दोनों स्त्री पात्र अपनी अलग पहचान बनाने में सफल भी हो जाती हैं। लेकिन बार-बार स्वयं में एक अपूर्णता का एहसास दिलाने वाले उनके जज्बात और पुरुष को प्राप्त करने की उनकी तड़प आ”चर्यचकित करती है। कृति की यह परावलंबी सोच , ‘कितनों के मुँह से चौहान साहब की लंपटता के किस्से सुनती रही फिर भी मन में एक ही खयाल मंडराता रहा-  काश! कि वह एक बार सिर्फ और सिर्फ एक बार फिर से उस पर पूर्ववत भरोसा कर पाते। देखिए चौहान साहब मैने सबका साथ खारिज कर दिया, यही तो चाहते थे न आप?’
पढ़कर पाठकों के मन में प्रश्नो की ढेरों काँटेदार झाडियाँ उगने लगती हैं। जिस पुरुष ने स्त्री के वजूद को हमेशा अपने पैरों तले कुचलना चाहा उसी के प्रति यह मोह यह आसक्ति आखिर क्यों है ? जो तुम्हारे अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं कर रहा है उसके आगे गिड़गिड़ाना  कहाँ तक उचित है ? मगर समीक्ष्य पुस्तक में इन प्रश्नों के कोई सार्थक जवाब नजर नहीं आए हैं। संभवत: रचनाकार की ऐसी ही मन:स्थिति को समझते हुए चेखव ने कहीं लिखा है कि -‘ लेखक का मुख्य कार्य  सवाल को सही ढंग से समाज के सम्मुख रखना होता है , उसका समाधान तलाशना नहीं।’
आरंभ से लेकर अंत तक पूरी रचना में एक उम्मीद पाठक को जरूर बाँधे रखती है कि एक न एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। और यही वो चैतन्य तत्व है जो पाठक को पूरा उपन्यास पढने के लिए प्रेरित करता है । इस उपन्यास के माघ्यम से लेखिका ने स्त्रीविमर्श से जुड़े सदियों पुराने घावों को पहले पूरी सावधानी के साथ उधाड़ा फिर वर्तमान परिवेश के अनुसार विचारों और तर्कों का मरहम लगाकर उस घाव पर फिर से टांका लगा दिया, इस उम्मीद के साथ कि पुरुषप्रधान इस समाज को स्त्री के वजूद का एहसास भी जरूर होगा -  एक न एक दिन।                     

पुस्तक     एक न एक दिन (उपन्यास)
लेखिका    रजनी गुप्त
प्रकाशक   किताबघर प्रकाशन , नई दिल्ली
मूल्य       425 रु मात्र

6 comments:

  1. पुस्‍तक की समीक्षा पढकर पुस्‍तक को पढने की ललक जाग उठी है। जानकारी के लिए आभार।

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  2. इस पुस्तक की जानकारी के लिए शुक्रिया

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  3. सुन्दर!
    रोशनी पूंजी नहीं है जो तिजोरी में समाये।
    तिमिर अन्तत: दूर होगा ही।
    देखते हैं यह उपन्यास।

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  4. बहूत बढिया समीक्षा है और उत्साहित करती है एक ना एक दिन की प्रति खरीदने के लिए

    मुद्दा वही पुराना है
    जिस पुरुष ने स्त्री के वजूद को हमेशा अपने पैरों तले कुचलना चाहा उसी के प्रति यह मोह यह आसक्ति आखिर क्यों है?

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  5. बहुत बहुत आभार ,ऐसे ही हमे आगे भी श्रेष्ट लेखकों की उत्तम कृतियों से रु ब रु कराते रहिएगा ,धन्यवाद

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सुस्वागतम!!