Friday, 6 March 2009

गीत

कैसा बसंत
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ।
कागसंघ छीन लिया कोयल की कूक
मंजरियाँ सेंक रहीं अनजानी धूप
चक्रवाक चंदा को देख , रहा पूछ
बोल प्रिये प्रीति मेरी कहाँ गई चूक ?
खुशियों को छोड़ गए अलबेले कंत,
जीवन की बगिया में कैसा बसंत !
फूलों को फूंक त्वचा गरमाते लोग
शूलों को नित्य नमन कर जाते लोग
भ्रमर बने सन्यासी सिखलाते योग
कौन नहीं झेल रहा ख़ुद का वियोग ?
चोली और दामन में हो गया संघर्ष
जीवन की बगिया में कैसा बसंत !
सपनों के सेंधमार हैं मालामाल
डोम बने हरिश्चंद करते सवाल
दिग्दिगंत फ़ैल रहा एक महाजाल
दुर्योधन नृत्य करे शकुनी दे ताल
तक्षक जन्मेजय में दोस्ती बुलंद !
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ?

2 comments:

  1. वहुत ही सुंदर बात कही आप ने आज के समय के बारे अपने इस गीत मै.
    धन्यब्वाद

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  2. भ्रमर बने सन्यासी सिखलाते योग
    कौन नहीं झेल रहा ख़ुद का वियोग ?
    ...वाह.
    शेर अर्ज किया है-
    यही कहूंगा कि चुपचाप डूबते जाओ
    बहुत हैं यूं तो फनी शायरी के दावेदार.

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