Sunday, 1 February 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-8

यक़ीन मानें, तबीयत सिर्फ़ आदमियों की ही नहीं, कुछ जूतों की भी बहुत रंगीन होती है. एक बात मैं पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि यहाँ मैं केवल कुछ जूतों की बात कर रहा हूँ. मेरी इस बात को पूरी जूता बिरादरी पर किसी आक्षेप के रूप में क़तई न लिया जाए. और फिर हमारे समाज में तो रंगीन मिज़ाज़ होना कुछ ग़लत समझा भी नहीं जाता है. अव्वल तो इसे एक उपलब्धि समझा जाता है. क्योंकि पहली तो बात यह कि रंगीन मिज़ाज़ी के लिए आदमी के भीतर बहुत दमखम होने की ज़रूरत होती है और दूसरी यह कि मर्दानगी सिर्फ़ रंगीन मिज़ाज़ होने में नहीं, अपितु अपनी रंगीनमिज़ाज़ी को मेंटेन करने में है. एक ऐसे समय में जबकि सादा मिज़ाज़ को मेंटेन करने में ही तमाम लोगों की नसें ढीली हो जा रही हैं, भला रंगीनमिज़ाज़ी कोई क्या मेंटेन करेगा?

हालात पर नज़र डालें तो पता चलता है कि रंगीनमिज़ाज़ी मेंटेन कर पाना तो अब केवल जूतों के ही बस की बात रह गई है. (जूतों की सामर्थ्य के बारे में अगर आपको कोई संशय रह गया हो तो कृपया इसी महान ग्रंथ के पन्ने पलट कर सिंहावलोकन कर लें). हालांकि जूतों में भी रंगीनमिज़ाज़ी सबके बस की बात नहीं है. अरे भाई बिलकुल वैसे ही जैसे आदमियों में यह सबके बस की बात नहीं है. जिन जूतों के मिज़ाज़ में रंगीनी होती है, उनकी एक अलग कटेगरी होती है. कटेगरी का यह भेद जूतों के बीच वैसे ही चलता है, जैसे मनुष्यों के बीच जातियों, रंगों, नस्लों या फिर वर्गों का भेद चलता है. जैसे ऊंची नस्ल का उल्लू छोटी नस्ल के उल्लू से बात करना पसन्द नहीं करता है, वैसे ही हाई क्लास का जूता भी लो क्लास के जूते से बात करना कभी पसन्द नहीं करता है और अगर मजबूरी में उसे कभी बात करनी भी पडे तो वह उससे 'जूते' से ही 'बात' करता है.

ऊँची नस्ल के जूतों का दाम भी सचमुच बहुत ऊंचा होता है. उल्लूगिरी के मामले में अगर आप हमारी कटेगरी के होंगे तो आपके तो दाम सुनकर ही प्राण पखेरू हो जाएंगे. एक बार मेरे एक मित्र ने अपना जूता दिखाया. (कृपया जूता दिखाने की बात को मुहावरे के अर्थ में न लें). मैने उनसे दाम पूछा तो उन्होने बताया आठ हज़ार रुपये. मेरा तो मुँह खुला का खुला रह गया यह दाम सुन कर. बिना सोचे-समझे मैं पूछ बैठा, "यार पहनने के लिए ही लिया है या खा....." ख़ुदा की फ़ज़ल से इसके पहले कि वाक्य पूरा होता मुझे अपनी कही जाने वाली बात का मुहावराना अर्थ ध्यान आ गया और हालाँकि मैं वैसा कुछ सोच कर कह नहीं रहा था, इसके बावजूद अचानक सम्भल गया.

यह अलग बात है कि मेरा संभलना किसी काम आया नहीं. उन मित्र ने ख़ुद ही हंसते हुए कहा, "हाँ-हाँ, आप ठीक समझ रहे हैं. खाने के लिए ही लिया है." वह जिस अन्दाज में कह रहे थे उससे यह ज़ाहिर हो रहा था कि वह 'खाने' वाले मामले का प्रयोग मुहावरे के ही रूप में कर रहे हैं और वह भी बडी ख़ुशी से. इस ख़ुशी का कारण पूछने पर मालूम हुआ कि बहुत जल्दी ही उनकी कुड्माई होने वाली है और यह जूता उन्होंने ख़ास उसी अवसर के लिए लिया है. संयोग से अथातो जूता जिज्ञासा के पांचवे खंड पर टिप्पणी करते हुए ज्ञानदत्त जी ने हुक़्म किया था कि मैं जूता जी के प्रकारों के बारे में बताऊँ. मैं निश्चित रूप से उनके आदेश के अनुपालन की पूरी कोशिश कर सकता हूँ, लेकिन मेरा वादा इस मामले में सिर्फ़ कोशिश तक ही सीमित रहेगा. पक्का वादा इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि भाई 'जूता अनंत जूता प्रकार अनंता' का एहसास मुझे इसी घटना से हुआ.

जूता दाम की चर्चा प्रकरण से मैं यह समझ सका कि जूतों का वर्गीकरण सिर्फ़ नस्लों-किस्मों के आधार पर ही नहीं, बल्कि अवसरों के अनुसार भी होता है. बाद में मैने ग़ौर किया तो पाया कि जूतों के मामले में अवसरों का यह मामला सिर्फ आंगलिक और मांगलिक ही नहीं, दांगलिक और कांगलिक आयोजनों तक व्यापक है. शादी-ब्याह वाले जूते अलग तरह के हैं, स्कूल वाले अलग और कॉलेज वाले अलग, खेलकूद के अलग और कचहरी के अलग, यहाँ तक कि विधान सभा के अलग और संसद के अलग. यही नहीं विधानसभा और संसद में पहन कर जाने के अलग और जनहित के मुद्दों सत्तापक्ष द्वारा विपक्ष और विपक्ष द्वारा सत्तापक्ष पर चलाने के अलग.

(.... अभी और भी हैं जहाँ आगे-आगे)

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अथातो जूता जिज्ञासा-7

8 comments:

  1. जिसके पास आठ हजार होते हैं जूते के लिए, वो क्या और क्यों लिखेगा जूते पर!
    जूते पर लिखने वाले का जूता बार बार सोल चढाया होता है!
    मजेदार है जूता-जिज्ञासा!

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  2. रंगीनमिज़ाज़ी मेंटेन कर पाना तो अब केवल जूतों के ही बस की बात रह गई है.

    --आह्ह!! कितना गहन अध्ययन है भई आपका. अभिभूत से हो लिए हम ( इस अभिभूतायमान अवस्था मे कभी अहसास होता है कि या तो हम जूता हैं या चमार..वरना अभिभूत होने सी क्या बात है..अचरज बस होना चाहिये था. :))

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  3. जूता परसाद की जय...। क्या खूब ठेल रहें हैं!

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  4. जूते पर जितना ज्ञान आपने दिया है उतना हमें जीवन में और कहीं से नहीं मिला...आप का जूता ज्ञान ब्लॉग जगत की धरोहर है...इसे संभल कर रखना चाहिए.
    नीरज

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  5. बहुत खूब। दिल जूतायमान हो गया।

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  6. siriman mahodayji
    jutey par aapki gahari pakad hai.vaise achchhe vyangya aisee cheejon par hi nikalte hain.
    hari shanker rarhi

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  7. siriman mahodayji
    jutey par aapki gahari pakad hai.vaise achchhe vyangya aisee cheejon par hi nikalte hain.
    hari shanker rarhi

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