Sunday, 8 February 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-13

इन मुश्किल कलाओं में विशेषज्ञता हमें ऐसे ही नहीं मिल गई है. अगर ग़ौर से देखें तो इसकी जडें हमारी शिक्षा व्यवस्था के प्राथमिक स्तर से ही मिलनी शुरू हो जाती है. हम उस शिक्षा व्यवस्था की बात नहीं कर रहे हैं जो गाँवों में तथाकथित शिक्षा मित्रों के भरोसे टाट-पट्टी पर चलती है. वह शिक्षा तो सिर्फ़ कहने के लिए शिक्षा है. इसे लेकर भविष्य में सरकार की जो योजनाएं हैं उनसे ही आप इसका अन्दाजा लगा सकते हैं. कौन नहीं जानता कि आने वाले दिनों में इसे ग्रामसभाओं के हवाले कर दिया जाना और वह भी पूरी तरह उनके अपने ख़र्चे-पानी के भरोसे. ज़रा सोचिए, जो अपना ख़र्चा नहीं चला सकता वह मास्टरों और बच्चों का ख़र्च भला किस बूते संभालेगा? ज़ाहिर है, शिक्षा की यह व्यवस्था सिर्फ़ नाम की है. असली शिक्षा व्यवस्था तो वही है जो पूरी तरह अभिभावकों के ख़र्चे पर उनके ही दम से चलती है. हर वह शख़्स जो चाहता है कि उसके बच्चे किसी लायक बन सकें, शिक्षा की उसी प्रणाली का अनुसरण करता है. भले इसके लिए उसे अपने अन्य ज़रूरी ख़र्चों में कटौती करनी पडे.

उस शिक्षा व्यवस्था की ख़ूबी यही है कि उसमें किताबें और कॉपियां तो सिर्फ़ बच्चों को स्पॉंडिलाइटिस जैसे गम्भीर रोगों का शिकार बनाने के लिए बोझ के रूप में होती हैं. बाक़ी पढाई-लिखाई पर कितना ध्यान दिया जाता है, इसका पता उनकी कॉपियां देख कर चल जाता है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वहाँ ध्यान दिया ही न जाता हो. ध्यान वहाँ दिया जाता है बच्चों के यूनिफॉर्म पर और यूनिफॉर्म में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है जूते की. अगर एक दिन भी उनके जूते चमकते हुए न मिले तो फाइन. ज़ाहिर है, अगर उन्हें फाइन से बचना है तो अपने जूते रोज़ चमकाने ही होंगे. तो वे अपने जूते रोज़ चमका कर ही स्कूल जाते हैं.

यह इस कला का पहला सबक है. हर अच्छी सीख की शुरुआत अपने-आप से. तो वे सबसे पहले अपने जूते चमकाने सीखते हैं. जूते चमकाने की यह सीख तेरह-चौदह सालों तक चलती है. हालांकि शुरुआत में तो चार-छ: वर्षों तक माता-पिता ही उनके जूते चमकाते हैं. फिर धीरे-धीरे वे ख़ुद अपने जूते चमकाना सीख जाते हैं.

इतने दिनों में उन्हें यह भी पता चल जाता है कि सिर्फ़ चमकाने से काम चलने वाला नहीं है. इससे तो केवल वर्जित फल का स्वाद ही मिल सकता है और वह भी दूसरों की कृपा से. इसके बाद वाली यानी ख़ुद उस पेड का मालिक बनने की व्यवस्था जूते चाटने की कला से ही आनी है. इसके लिए उन्हें प्रोफेशनल कोर्सों में दाख़िला लेना पडता है. दाख़िले की यह प्रक्रिया ही अब इतनी जटिल हो चुकी है कि चाटे बिना न मिले. ये अलग बात है पहले चाटने वाला यह काम बच्चों को नहीं, उनके पैरेंटों को करना पडता है.

क्योंकि अब जो भी प्रोफेशनल कहे जाने वाले कोर्स हैं, वे सरकार के खाते में केवल कुछ ख़ास लोगों के लिए रह गए हैं. तो आम आदमी के आम बच्चों को निजी क्षेत्र के इंस्टीट्यूटों या यूनिवर्सिटियों में जाना पडता है. वहाँ डोनेशन से लेकर फीस तक कुल मिलाकर इतना पैसा भरना पडता है कि बेचारे पैरेंटों को ही छठी का दूध याद आ जाता है. फिर भी मामला पूरा नहीं पडता और तब उन्हें वही करना पडता है. अपने जूते घिसने से लेकर नाक रगडने यानी दूसरों के जूते चाटने तक की कवायद. अब ऐसे कपूत-कपूतियां तो इस घोर कलिकाल में भी अभी भारत में नहीं पाए जाते जो माँ-बाप की ऐसी मशक्कत को तुरंत भुला दें. लिहाजा उन बेचारों को भी माता-पिता की नाक रखने के लिए वह सब करना पडता है, जो पहले उनके माता-पिता कर चुके होते हैं. मतलब यह कि थ्योरी से लेकर सेशनल और प्रेक्टिकल तक में अच्छे मार्क्स सुनिश्चित करने के लिए गुरुजनों और प्रबन्धकों से लेकर इक्ज़ामिनरों तक के जूते चाटने की क्रिया. क्रिया-प्रतिक्रिया के इस दौर में ही वे वह सब सीख जाते हैं, जिसकी ज़रूरत कालांतर मे बडा आदमी बनने के लिए पडती है.

(चरैवेति-चरैवेति....)

अथातो जूता जिज्ञासा-12

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7 comments:

  1. जूता पहने/चलने/चलाने से चाटने की बात भी आ गयी। प्रगति संतोषजनक है।:)

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  2. aapne to jute ke baare me itna likha ki parhne wale thak gaye.

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  3. aapne to jute ke baare me itna likha ki parhne wale thak gaye.

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  4. bahut si jaankari de dali hai aapne ......kya baat hai....

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  5. aascharya hai itne bahoopyogi joote ki upayogita ke darshan pehle kyu nahi huye!
    khaao,odho-pehno,uchhaalo,maaro,ghiso,haar banao,uske tale sabko raundo,...
    waah log isey pairo me kyu rekhte hain isey mukut ke sthaan par hona chahiye,
    joote ko charansparsh...waah!

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