Thursday, 5 February 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-11

पाणिग्रहण यानी विवाह जैसे संस्कार में हमारे यहाँ फ़ालतू टाइप की चीज़ों को कतई जगह नहीं दी जाती. इस संस्कार में  हम उन्हीं चीज़ों को अहमियत देते हैं जो हमारे जीवन से साँस की तरह जुडी हैं और जिनका बहुत गहरा अर्थ होता है. अब जिस चीज़ का इतना गहरा अर्थ है कि वह विवाह जैसे संस्कार से जुडी है, वह जीवन के अन्य हिस्सों से जुडी न हो, ऐसा कैसे हो सकता है! पढाई से जूतों का कितना गहरा जुडाव है यह हम आपको पहले ही बता चुके हैं. हमारे सुधी पाठकगण को याद भी होगा. हमारे ज़माने में तो माता-पिता, चाचा-ताऊ और गुरुजी से लेकर बडे भाई-बहन और यहाँ तक कि कभी-कभी अन्य क़रीबी रिश्तेदार भी पढाई के मामले में बच्चों पर इसका इस्तेमाल कर लिया करते थे. नतीजा आप देख ही रहे हैं - हम 12 माइनस 1 भेड और 1 प्लस 1 शेर वाले सवाल भी आज तक ठीक-ठीक हल कर सकते हैं. दूसरी तरफ़ आज का ज़माना है. टीचरों और अन्य लोगों की तो बात ही छोडिए, यहाँ तक कि माता-पिता भी अब जूता जी का इस्तेमाल नहीं कर सकते. बच्चों की समझदारी है कि बिलकुल भारतीय लोकतंत्र होती जा रही है. भेड का सवाल भी वैसे ही जोडते हैं जैसे बकरी वाला और शेर वाला सवाल भी वैसे ही सॉल्व करते हैं जैसे सियार वाला.

बहरहाल, हम बात जूता जी के सम्बन्धों की कर रहे थे और इस सिलसिले में इस नतीजे तक पहुंचे कि पढाई से उनका संबंध बहुत ही गहरा है. फिर जिस चीज़ का पढाई से संबंध हो, उसका नौकरी से रिश्ता न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. ख़ास तौर से ऐसी स्थिति में जबकि भारतवर्ष में हमारे नीति नियामकों के परमपूज्य लॉर्ड मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा पद्धति का एकमात्र उद्देश्य ही नौकरी हो और और इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का आलम यह हो जो दिल्ली शहर की ब्लू लाइन बसों और ग्रामीण क्षेत्रों की जीपों-टंपुओं को भी पछाड दे. पढे-लिखे फालतुओं यानी शिक्षित बेरोजगारों की तादाद भ्रष्टाचार की तरह बढती जा रही हो और नौकरियों का स्कोप नैतिकता की तरह सिकुडता जा रहा हो. इन हालात में नौकरी के सिलसिले में जूतों की भूमिका दिन-ब-दिन हमारे देश ही क्या, पूरी दुनिया में अत्यंत महत्वपूर्ण होती जा रही है.  

ख़ास तौर से हमारे देश में  तो नौकरी सिर्फ़ उन्हीं लोगों को मिलती है जिनके पास बहुत मजबूत किस्म के जूते हों और जो उन्हें घिसने का  अदम्य साहस भी रखते हों. यह घिसना सिर्फ़ चल-चल कर घिसने वाला नहीं होता है. घिसना इसे कई तरह से पडता है. नौकरी पाने के लिए जूतों को धरती पर तो घिसना ही होता है, कई बार आसमान में भी घिसना पडता है. यहाँ तक कि ख़ुद अपने मुँह पर भी घिसना होता है. जूते घिसने की यह प्रक्रिया यहीं ख़त्म नहीं हो जाती है. नौकरी पाने के बाद भी आपको जूते निरंतर घिसते रहने होते हैं. सच पूछिए तो नौकरी में मनोनुकूल तरक़्की और आर्थिक बढोतरी जैसे दुर्लभ फल सिर्फ़ उन्हें ही चखने को मिलते हैं जो बिना किसी शिकवे-शिक़ायत के निरंतर जूते घिसते रहते हैं.

वैसे जूते से जुडी कुछ कलाएं भी हैं. इन कलाओं को जो लोग जानते हैं और उन पर सही तरीके से अमल कर पाते हैं, वे जीवन के सभी क्षेत्रों में लगातार तरक्की ही करते चले जाते हैं. ऐसी ही दो कलाएं हैं - जूते चमकाने और जूते चाटने की. ये अलग बात है कि जूते चाटने की कला चमकाने वाली कला की तुलना में थोडी ज़्यादा कठिन है, पर आप जानते ही हैं, जो कला या तकनीक जितनी ज़्यादा फलप्रद होती है वह उतनी ही कठिन भी होती है. जूते चमका कर तो आप सिर्फ़ दुर्लभ फल ही हासिल कर सकते हैं, लेकिन अगर जूते चाटना सीख जाएं तो स्वर्ग के वर्जित फल का पेड ही आपके किचन गार्डेन की शोभा बढाने लगता है.

इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने इस कला का तकनीकी रूप से इस्तेमाल किया वे हमेशा धन-धान्य-सत्ता और सम्मान से परिपूर्ण रहे. चाहे मुग़ल शासकों का दौर रहा हो या फिर अंग्रेज शासकों का, हर दौर में उनकी चलती रही. और तो और, सुनते हैं कि अब देश में डेमोक्रेसी आ गई है और देखते हैं कि इस डेमोक्रेसी में भी उनकी बीसों उंगलियां घी और सिर कडाही में है. पिछली कई पीढियों से सत्तासुख वैसे ही उनका जन्मसिद्ध अधिकार बना हुआ है, जैसे हमारा-आपका जलालत. ऐसी कोई राष्ट्रीय पार्टी नहीं है, जिसमें उनके परिवार का एक न एक सदस्य महत्वपूर्ण हैसियत में न हो.

सच तो यह है कि उनके परिवार के एक सदस्य का किसी पार्टी में होना ही उसके राष्ट्रीय स्तर पर सफल होने की गारंटी होता है. अगर कोई पार्टी अपने राष्ट्रीय होने का दावा करती है और उसमें उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं है तो यह मानकर चलें कि उसके राष्ट्रीय होने का दावा वैसे ही खोखला है, जैसे भारत में कानून के राज का. अगर किसी पार्टी में उनके परिजन नहीं तो समझिए कि वह पार्टी दो कौडी की, उसके नेता दो कौडी के और वह जनता भी दो कौडी की, जो उस पार्टी के प्रति सहानुभूति रखती है. सत्ता में आने का उस पार्टी का सपना बिलकुल मुंगेरीलाल के  सपनों की तरह हसीन ज़रूर हो सकता है, पर है सिर्फ़ सपना ही.

हैसियत उसी पार्टी की है जिसमें वह हों और उनकी अपनी हैसियत इतनी है कि जब चाहें इतिहास बदल दें. हालांकि कहीं-कहीं इतिहास साहित्य बन जाता है और तब उसमें हेर-फेर की गुंजाइश नहीं बन पाती है. लेकिन तब भी उनके पास रास्ते होते हैं और वह यह कि ऐसे साहित्य को वह कम से कम कोर्स से तो निकाल कर बाहर फेंक ही सकते हैं और फेंक ही देते हैं. अब यह अलग बात है कि इस देश की नामुराद जनता फिर भी ऐसे साहित्य को अपने दिल में जगह देती है. बिलकुल वैसे ही जैसे ग़रीबों के हक़ में लडने वाली भारत की तमाम राजनैतिक पार्टियां उनके जैसे राज परिवारों और बडे-बडे धनकुबेरों को.

याद रखें, यह सब प्रताप है सिर्फ़ एक कला की और वह है जूते चाटने की कला. अब हालांकि बेवकूफ़ लोग इस कला को बहुत मुश्किल समझते हैं, पर वास्तव में यह कला उतनी मुश्किल है नहीं. इसमें दिक्कत सिर्फ़ एक एटीट्यूड की होती है और वह भी सिर्फ़ एक-दो बार के लिए. एक बार निजी और दूसरी बार पारिवारिक तौर पर अगर आपने इस कला का प्रयोग कर लिया तो थोडे ही दिनों में आप इसे सार्वजनिक तौर पर करने के योग्य हो जाते हैं. जहां आपने एक-दो बार सार्वजनिक तौर पर इस कला का इस्तेमाल किया कि फिर तो आप जूते में दाल खाने लायक हो जाते हैं और यह तो आप जानते ही हैं कि दाल आजकल कितनी महंगी चीज़ हो गई है. अनुभवी सूत्रों का तो कहना है कि जूते में दाल खाने का जो स्वाद है, वह चीनी मिट्टी के प्लेट में गोइठे के अहरे पर पकी लिट्टी खाने में भी नहीं मिल सकता.

(चरैवेति-चरैवेति.....)

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4 comments:

  1. सब प्रताप है सिर्फ़ एक कला की और वह है जूते चाटने की कला. :)

    -वाह, कितना गहरा अध्ययन है. आनन्द आ गया. जारी रहिये, जनाब जनहित में.

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  2. बेहतरीन है,अजीबो गरीब चीजों को उड़ेल रहे हैं। लख लख बधाईयां ल

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  3. हम ने बचपन मै एक कहानी पढी थी, कासिम का जुता*, लेकिन आप ने तो इन जुता जी पर एक महा ग्रंथ ही लिख दिया, बहुत ही मेहन से, लेकिन हर शव्द एक दम सटीक, ओर सच से भरपुर.आप की लेखनी मे जरुर कोई जादू है.
    धन्यवाद

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  4. हम 12 माइनस 1 भेड और 1 प्लस 1 शेर वाले सवाल भी आज तक ठीक-ठीक हल कर सकते हैं.
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    महान आधुनिक आर्यभट्ट को सादर प्रणाम!

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सुस्वागतम!!