Wednesday, 4 February 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-10

हालांकि शादियों में सालियों द्वारा जूते चुराए जाने की परम्परा बहुत लम्बे अरसे से चली आ रही है. यह एक सुखद बात है कि 21वीं शताब्दी जबकि ख़ुद शादी की परम्परा यानी विवाह संस्था ही ख़तरे में है, तो भी अगर कहीं कोई नौजवान विवाह का रिस्क लेता है, तो वह बडी ख़ुशी से इस परम्परा का निर्वाह करता है. संगीता पुरी जी ने इस ओर ख़ास तौर से मेरा ध्यान दिलाते हुए इस पुनीत परम्परा पर प्रकाश डालने आदेश किया है. अब उन्हें जूती चुराने का अनुभव है या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता, पर मुझे ख़ुद अपने जूते चुराए जाने का प्रीतिकर-सह-त्रासद अनुभव ज़रूर है. साथ ही, पूरे 14 साल बीत जाने के बावजूद अभी तक यह भी याद है कि अपने वे नए और परमप्रिय जूते वापस कैसे पाए और उतनी देर में मैंने क्या-क्या सोच डाला. अब देखिए कि 14 वर्षों में भगवान राम का वनवास और 13 वर्षों में ही पांडवों का वनवास व अज्ञातवास दोंनों बीत गए थे, पर मेरा अहर्निश कारावास अभी तक जारी ही है और कब तक जारी रहेगा, यह मैं तो क्या कोई भी नहीं जानता है.

मेरे घबराने की एक बडी वजह यह थी कि मुझे पहले से इस बारे में कोई आभास नहीं था. असल में हमारे यहाँ जब कोई नया योद्धा विवाह के मैदान में उतरने वाला होता है तो सभी भूतपूर्व योद्धा, जो तब तक खेत हो चुके होते हैं, उसे अपने-अपने अनुभवों के बारे में बता देते हैं. वे सभी आसन्न ख़तरों और उनसे बचने के उपायों का भी पूरा ब्यौरा नए बघेरे को दे देते हैं. मेरे मामले में यह मसला थोडा गड्बडा गया. या तो मेरे क़रीबी वरिष्ठ योद्धा यह बताना भूल गए या फिर उन्होने जान-बूझ कर बताया ही नहीं. क्या पता वे क्राइसिस मैनेजमेंट की मेरी एबिलिटी देखना चाहते रहे हों या फिर यह भी हो सकता है कि वे मजे लेना चाहते रहे हों कि लो अब फंसे बच्चू. बहुत बनते थे बहादुर, अब बचो तो जानें.

तो नतीजा यह हुआ कि मुझे अपने जूते चुराए जाने का ज्ञान ठीक उस वक़्त हुआ जब मैं मंडप से उठा और पहनने के लिए जूते तलाशे तो पता चला कि ग़ायब. पहले तो मैं इस उम्मीद में इधर-उधर तलाशता रहा कि शायद कहीं मिसप्लेस हो गए हों और लोग मुसकराते रहे. आख़िरकार जब मैंने निर्लज्ज होकर (जो मैं पहले से ही था, पर नई जगह पर दिखना नहीं चाह रहा था) पूछ ही लिया तो लोग ठठा कर हंसने लगे. ख़ास तौर से युवतियां व महिलाएं मुँह ढक कर हंसते हुए मुझे जिस दया भाव से देख रहीं थीं उसका साफ़ मतलब यही था- कैसा घुग्घू है. एकदम घोंघा बसंत. इसे इतना भी पता नहीं कि जूते शादी में पहनने के लिए नहीं, साली द्वारा चुराए जाने के लिए होते हैं.

अंतत: एक साली टाइप देवी जी ने ही बताया, "जीजा जी वो तो चुरा लिए गए."

"चुराया किसने?"

"आपकी साली ने."

"लेकिन अब मैं जनवासे तक कैसे जाऊंगा?"

"वह आप जानें" एक साथ कई आवाज़ें आईं और खिलखिलाहट हवा में गूंज उठी. मैं सचमुच सांसत में पड चुका था. पहले तो मुझे लगा कि शायद यह लोग मजाक कर रही हैं.

फिर भी मैंने कहा, "तो थोडी देर के लिए किसी की चप्पल ही दे दें. मैं अपने लोगों के बीच तो पहुंच जाऊँ सुरक्षित."

"जी चप्पल तो अब अगर आप हमें छेडेंगे तो भी आज हम आपको नहीं देने वाले हैं."

मेरे मूढ्पन और अपनी लडकियों के ढीठपन का मसला गम्भीर होते देख आख़िरकार ससुराल पक्ष की ही कोई बुज़ुर्ग महिला मेरे बचाव में सामने आईं. वहाँ मौज़ूद लडकियों को प्रत्यक्ष रूप से डाँटते और परोक्षत: और अधिक चंटपने के लिए ललकारते हुए उन्होने मुझे समझाया, "अरे बाबू ई रिवाज है. आपको पता नहीं है?"

"ऐं! यह कैसी रिवाज?" मुझे तो सचमुच पता नहीं था.

"तो आपको पता ही नहीं कि यह भी एक रिवाज है?" उधर से पूछा गया. "ना, सचमुच नहीं पता." मेरे इस जवाब से वहाँ मौजूद रीति-रिवाज विशेषज्ञों को मेरे घुग्घूपने का पक्का भरोसा हो गया. फलत: एक और सवाल उछला' "पता नहीं इसके बाद वाली बातों का भी पता है या नहीं. कहीं ऐसा न हो कि उसके लिए एक जन इनके साथ यहाँ से और भेजना पडे."

"जी वैसे तो बाद वाली जानकारी के लिए आप लोग एक जन भेज ही रहे हैं, पर अगर भेजना ही चाहें तो एक और भेज सकती हैं. मुझे ख़ुशी ही होगी." मेरे इस जवाब ने उन्हें थोडी देर के लिए लाजवाब तो किया, पर अब सोचता हूँ कि अगर कहीं एक जन और उन्होंने भेज दिया होता तो मेरा क्या हाल होता? जब एक ने ही नाक में बेतरह दम कर रखा है, तो भला डबल को सम्भालने में क्या हाल होता?   

हालांकि यह चुप्पी देर तक टिकी नहीं. उधर से हुक़्म आया, "जनाब अब ऐसा करिए कि नेग दीजिए और अपने जूते लीजिए."

ग़जब! यहाँ तो जूते लेने के लिए भी नेग देना पडता है और वह भी अपने ही.... मैंने सोचा और इसके साथ ही एक दूसरा ख़याल मन में कौंध गया ... कहीं ऐसा तो नहीं कि अगर नेग देकर तुरंत जूते न लिए तो फिर मियाँ की जूती मियाँ के सिर वाली कहावत चरितार्थ होने लगे. क्या पता जूते का रिवाज इसीलिए हो कि आगे चलकर गाहे-बगाहे जब जैसी ज़रूरत पडे पत्नी मेरे सिर उन्हीं जूतों का इस्तेमाल करती रहे. अगर वास्तव में ऐसा हुआ तब तो वास्तव में यह बहुत ही कष्टप्रद मामला होगा. यह विचार मन में आते ही जो कुछ हाथ में आया वह सब मैंने तुरंत साली साहिबा को सौंप दिया.

इतने लम्बे समय तक बेशर्त कारावास झेलने के बाद अब मुझे इस रिवाज का गहरा अर्थ समझ में आया है. साली जूते झटक कर आपको सन्देश मूलत: यही देती है कि देखो अब आज से न तुम कुछ और न तुम्हारा कुछ. जो कुछ भी है वह सब मेरी दीदी का और तुम बस एक अदद घुग्घू. इस जीजा शब्द का मतलब भी बस यही है कि जब मैं कहूँ तो जी जाओ वरना टें बोले रहो. ठीक इसी तरह, अब तुम्हारा जीना-मरना सब मेरी दीदी के इशारों पर निर्भर होगा. सचमुच इसका अभिप्राय यही है कि अब तुम जो कुछ भी कमा कर लाना वह दीदी के हाथों में रख देना और बदले में अगर उम्मीद भी करना तो किसी और चीज़ की नहीं, सिर्फ़ एक जोडी जूतों की.

(वीर तुम बढे चलो.........)

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5 comments:

  1. जूत्तियां चुराने का पूरा अनुभव है मुझे ......या हम सभी बहनों को ......तभी तो इस ओर ध्‍यान आकृष्‍ट करवाया आपका.... लडकियों के विवाह में जूत्‍ते चुराने और लडको के विवाह में चुराए हुए जूत्‍ते पाने की एक एक कहानी बन जाती है हमारे यहां ।

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  2. जूता भी क्या चीज है तुम क्या जानो यार,
    जूते पर ही चल रहा है सारा संसार ।
    है सारा संसार पहनता कोई खाता ,
    कोई इसको हाथ में ले हथियार बनाता ।
    बदकिस्मत है वो जो इससे रहे अछूता,
    बुश को जैसे मिला मिले सबको यह --- ।
    - ओमप्रकाश तिवारी

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  3. इस कड़ी का भी वचन कर लिया. रोचकता बनी हुई है. आभार.

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  4. सचमुच इसका अभिप्राय यही है कि अब तुम जो कुछ भी कमा कर लाना वह दीदी के हाथों में रख देना और बदले में अगर उम्मीद भी करना तो किसी और चीज़ की नहीं, सिर्फ़ एक जोडी जूतों की.
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    सही है, जूते मिलते रहें, यही सौभाग्य रहे! :)

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  5. सचमुच आप बहुत समझदार हैं कि जूता पुराण का यह अध्‍याय आपको आनन-फानन में समझ आ गया और इतने सालों बाद आज तक समझे हुए हैं।

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सुस्वागतम!!