Thursday, 15 January 2009

मोदी के सामने बुजुर्गों का आर्शिवाद पाने की चुनौती


आद्योगिक समूहों की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का जिस तरह से नाम उछाला गया है,वह निसंदेह भाजपा के ऊपर दबाव बनाने का एक तरीका है,जो आगामी लोकसभा चुनाव में नेतृत्व को लेकर अंतकलह के दौर से गुजर रही है। निसंदेह इससे प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की दावेदारी को मजबूती मिलेगी, और पार्टी में हर स्तर पर मोदी को लेकर लॉबिंग तेज होगी।
प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पर सार्वजनिकतौर पर मुहर लगाने के पहले नरेंद्र मोदी को अभी भाजपा के अंदर ही नाना प्रकार के खेल खेलने होंगे।

वाजपेयी जेनरेशन के कई नेता इस पद के इंतजार में बुढ़े हो चुके हैं और आसानी से मोदी के नाम पर सहमति के लिए तैयार नहीं होंगे। मोदी को पूरे सम्मान के साथ इन थके हुये नेताओं के साथ जुगलबंदी करते हुये आगे बढ़ना होगा। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि एक बहुत बड़ा तबका मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखने का न सिर्फ सपना देख रहा है,बल्कि इस सपने को जमीन पर उतारने के लिए कमर कसे हुये है। भाजपा के थके हुये नेताओं पर इस तबके को अब यकीन नहीं है,क्योंकि विगत में सत्ता में आने के बाद उन्होंने जो कुछ किया है वह शर्मनाक है।

मोदी राष्ट्रीय स्तर पर एक बहुत बड़े तबके की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं,जो इसके पहले भाजपा के नेतृत्व में बनने वाली गठबंधन सरकार के कारनामों से कुंठित रहा है। मोदी के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के अंदर से है। उद्योगपति समूहों का जिस तरह से मोदी को सर्मथन मिल रहा है,उससे मोदी कहां तक लाभ उठा पाते हैं यह तो समय ही बताएगा,लेकिन फिलहाल प्रधानमंत्री के पद के लिए उनकी दावेदारी को बल मिला है,हालांकि अभी तक सार्वजनिक तौर पर उन्होंने इस तरह की दावेदारी नहीं की है।

एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर सामने आने के लिए मोदी गुजरात में कड़ी मेहनत कर चुके हैं,और अब गुजरात को राष्ट्रीय स्तर पर एक रोल मॉडल स्टेट के तौर पर देखा जा रहा है,हालांकि उन्हें फासीवादी नेता कहने वाले उनके विरोधियों की भी कमी नहीं है। पार्टी के अंदर भी दबी जुबान से मोदी के लिए इस तरह के जुमले का इस्तेमाल हो सकता है। पार्टी के बाहर तो मोदी के विरोधी उन्हें स्पष्टतौर पर फासीवादी करार देंगे,और चुनाव प्रचार में उनकी पूरी कोशिश होगी कि मोदी को इसी रूप में चित्रित करे। यह बाद की बात है,अभी सबसे पहले मोदी को अपने घर में नेता के तौर पर अपने आप को स्थापित करना होगा। यदि भाजपा के सभी बुजुर्ग नेताओं का आर्शिवाद लेते हुये मोदी इस लक्ष्य को पा लेते हैं,तो यह उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। आगमी लोकसभा चुनाव पूरी तरह से मोदी पर केंद्रित हो जाएगा और पार्टी की ओर से प्रचार की दशा और दिशा तय करने में आसानी होगी।

पार्टी मैनिफेस्टो को लेकर भी जोरदार तरीके से मंथन करने की जरूरत है। पार्टी मैनिफेस्टो में सिविल संहिता और अनुच्छेद 370 तो हर हालत में होना ही चाहिये। भारत पर लादेनवादी हमलों के इस दौर में मोदी निसंदेह एक मजबूत राष्ट्र का सपना देखने वालों को आकर्षित करेंगे,अपने सपनों के भारत पर मोदी को खुलकर बोलना होगा। भारत के भव्य विकास की रूपरेखा को रखते हुये,आक्रमक तरीके से लादेनवादियों के हमलों से भारत को मुक्ति दिलाने की बात कहनी होगी। आज उद्योग जगत के साथ-साथ संपूर्ण भारत की चिंता देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे लादेनवादी हमले हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलाने के लिए मोदी को हुंकार लगाना होगा,इसको लेकर कांग्रेसी डिप्लोमेसी बुरी तरह से असफल हो चुकी है। अब लोकसभा के चुनाव में राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समग्र रूप से क्षितिज पर देखने की बात जरूर रंग दिखाएगी,नई उर्जा के साथ,नये नारे गढ़े जाएंगे। क्या सम्मान के साथ भाजपा की पुरानी पीढ़ी मोदी को आगे आने के लिए रास्ता देगी....या फिर....। घर के अंदर जीत के बाद,सूचनाओं का एक महाजाल बनाना होगा,जो मोदी के खिलाफ बहने वाली हर हवा को उड़ा दे...प्रचार तंत्र को एकीकृत तरीके से चलाना होगा...तबतक जबतक कि भारत मोदी के नेतृत्व में स्थायी तौर पर सुरक्षा परिष्द में बैठ न जाये। भारत के लिए फील गुड जैसे नारे गढ़ने वालों को भगवान सदबुद्धि दे। पांच साल काफी होते हैं,स्वर्णिम इतिहास के लिए।

6 comments:

  1. काश मोदी ऐसा कर पाने में सफल हो पाते। आडवानी की घोषित दावेदारी और राजनाथ सिंह की संकुचित दृष्टि से भाजपा को बाहर निकालकर राष्ट्रीय परिदृश्य पर पहले अपनी पार्टी और फिर अपने बहुलवादी देश का सर्वमान्य नेता बनना असम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है।

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  2. dekhnaa hoga warshon se sanjoye sapnon kaa balidaan kaise dega koi.aashirwaad mil bhi jaye to apne ittihaas aur wipaksh ke kaaton se pind chudaana tedhi kheer hoga.inke faasiwaad ko auron ki fusswaaditaa se acchaa samajhne waale logon ki kami nahi hi hogi.

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  3. भाई हम मोदी के बारे ज्यादा तो नही जानते, एक दो बार यहां भारतीया टी वी पर देखा, सुलझा हुआ नेता लगा, बाकी बात यह है इस बार जो भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आये, वो कुछ कर के भी दिखाये,
    इस देश ने बहुत देख लिये झुठे सपने, हमे झुठे सपने , नही देखने, लाशो पर जन्मदिन नही मनाना, बल्कि इस देश को मान ओर सम्मान से ऊंचा लेजाना है, इस बार जो भी आये, शेर आये,
    बहुत बहुत धन्यवाद

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  4. हमारे यहाँ प्रधान मंत्री बनने के लिए जनता के अनुमोदन की परम्परा पूरी तरह ख़त्म ही हो रही है क्या? पहले गठबंधन, फ़िर पार्टी और अब कारपोरेट घराने ... गजब! अब यही लोग मिलकर तय करेंगे की कौन लोग हमारे प्रधान मंत्री हों और कौन राष्ट्रपति? अगर यही लोकतंत्र है, फ़िर तो भाई बढ़िया था की हम पुराने ज़माने के राजतंत्र में ही ठीक थे.

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  5. हमलोगों का संविधान ही एसा है। जनता को सीधे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री का चुनाव जनता द्वारा संसद में भेजे गये प्रतिनिधि करते हैं, और यही प्रतिनिधि लोग राष्ट्रपति को भी चुनते हैं,यह गजब नहीं है। संसदीय मॉडल इंग्लैंड का है,जबकि राष्ट्रपति का मॉडल अमेरिका का है और इसी से गड्डमगड्ड होती है। अमेरिका में तो राष्ट्रपति के प्रतिभागी आपस में डिबेट करते हैं, यहां एसा कुछ नहीं होता है, सीधे ऊपर से थोप दिया जाता है। प्रधानमंत्री का मामला भी कुछ एसा ही है. यहां कि पार्टिया प्रधानमंत्री के तौर पर व्यक्ति को जनता के सामने प्रस्तुत करती है, कांग्रेस के बारे में तो सर्वविदित है कि गांधी परिवार से से ही प्रधानमंत्री आएगा...मनमोहन जी को प्रधानंत्री मानने की इच्छा नहीं होती है, वैसे मेरे मानने या ना मानने से कुछ नहीं होने वाला है। कॉरपोरेट भी इस डेमोक्रेटिक (यदि इसे डेमोक्रेटिक माना जाये)तंत्र का एक हिस्सा है, यदि वह मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर देख रहे हैं तो मैं नहीं समझता कि इसमें कोई बुराई है। कॉरपोरेट एक प्रेसर ग्रुप की तरह है, यदि यह प्रेसर ग्रुप के तौर पर भाजपा के ऊपर मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर खड़ा करने की बात कर रहा है,तो इसमें कहीं भी डेमोक्रेटिक नार्म का उल्लंघन नहीं हो रहा है। क्या आनेस्टली इस बात को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक सवेक्षण हो सकता है कि भारत में मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर कितने लोग चाह रहे हैं। इससे देश के नब्ज को टटोलने में मदद मिलेगा...हमें हर स्तर पर सर्तक रहना है,क्योंकि लादेनवादी अभी सबसे बड़ा खतरा है...लादेनवाद के खिलाफ कोई व्यक्ति ही खड़ा हो सकता है...भारत का पूरा सिस्टम विकेंद्रिति है...मांटेस्क्यू के शक्ति पृथककरण सिद्धात की यहां रेड लगा दी गई है...सिस्टम लादेनवाद वादी हमलों से लड़ने में कारगर नहीं है...यह लड़ाई पूरी तरह से व्यक्ति विशेष द्वारा लड़ी जाएगी...वैसे भी दुनिया में बड़ी-बड़ी लड़ाइयां व्यक्ति विशेष द्वारा ही लड़ी गई हैं...भारत में छद्म डेमोक्रेसी है,शासन और प्रशासन के स्तर पर। इसे एक करने के लिए भी मजबूती मेजोरिटी चाहिये, कॉरपोरेट भी मजबूत मेजोरिटी का एक हिस्सा है। बंगाल से नयनों को क्यों उखाड़ा गया...देश को लखटकिया कार की जरूरत थी,उद्योग जगत के लोग भी देश के औद्योगिक एकीकरण की ओर हैं,संगठित भारतीय कॉरपोरेट दुनिया के मार्केट को उड़ा सकता है, बर्शते उसे जनता का आधार दिया जाये, राष्ट्रीय स्तर पर कॉरपोरेट जगत को जनहित में मजबूत करने से डेमोक्रेसी उनके हाथों में नहीं जाएगी,बल्कि वे डेमोक्रेसी के एक मजबूत अंग के तौर पर काम करने में सक्षम हो जाएगी। अभी उन्हें आर्थिकमंदी से निबटना है,राष्ट्रीय स्तर पर इस मंदी से निपटने के लिए वे जनस्तर पर मजबूत हाथ की तलाश कर रहे हैं। मनमोहन साहब ने इकोनॉमिक ग्लोबलाइजेशन को भारत की मजबूरी बना दिया है। बंगाल से लखटकिया कार को हटाने के बाद, मार्क्सवादी इकोनोमी पर संदेह होता है,कम से कम देशहित के संदर्भ में। लखटकिया कार का प्रोजेक्ट वहां से हटकर कहां गया है। यदि उस प्रोजेक्ट को नहीं लगाना था तो यह निर्णय पहले क्यों नहीं हुआ। भारत के औद्योगिक विकास के फाल्ट का यह बेहतर नमूना है। औद्योगिक रूप से देश को एकीकृत करने की जरूरत है, और इसी मानसिकता के तहत देश में कॉरपोरेट जगत से मोदी का नाम उछल रहा है। देश की जनता को भी इस औद्योगिक एकीकरण और आद्योगिक सुरक्षा के हक में खड़ा होना ही होगा, मुंबई हमला पूरी तरह से आर्थिक हमला है, उद्योग जगत आर्थिक सुरक्षा चाह रहा है।

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  6. अज्ञात भाई,
    आप भूत हो, अदृशय रहकर लंटोगी खिंचा करते हो।
    इतिहास की गलती को ठीक करना वर्तमान का काम है, राह में पड़े कांटों में चाणक्य ने मट्ठा झोंक दिया था...वह तक्षशिला से पठकर निकला था। खींचते रहो लंगोटी...लंगोटी पहनकर व्यास नदी की धारा में कूदना वाला नेता भारत को चाहिये....एक दो नहीं एसे हजारों नेता चाहिये...इस देश का प्रसव पीड़ा खत्म हो चुका है...

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