Wednesday, 14 January 2009

खबर टीआरपी के लिए की फिलॉसफी नहीं चलेगी

मीडिया अपनी विश्वनीयता किस कदर खो चुकी है इसका अंदाज लगाना सहज है। आंकड़ों की भाषा में बात करें तो, आप प्रत्येक दसवें आदमी से पूछे,दस में से आठ लोग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का मुंह बंद करने के पक्ष में मजबूती से खड़ा मिलेगा।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति आम जनता का यह तत्कालिक गुस्सा नहीं है, यह वर्षों से धीरे-धीरे पल रहा है। वर्षों से ये लोग अपने को खुदा समझने की गलती कर रहे थे। अभी सुनने में आया है कि इनलोगों ने अपने लिए एक गाइड लाइन तैयार किया है। यदि वास्तव में एसा कुछ हुआ है, तो सूचन के अधिकार के तहत उस गाइडलाइन को सार्वजनिक किया जाये। और साथ ही ये लोग यह भी बताये कि इस गाइड लाइन को पूरी मजबूती से लागू करने की क्या व्यवस्था है।
पहले ये लोग जनहित को परिभाषित करे। टीआरपी के चक्कर में पड़े, जरूर पड़े (वैसे टीआरपी के मैकेनिज्म को भी परखने की जरूरत है। ),लेकिन जनहित को अनदेखी कर के नहीं। ये तभी होगा जब ये लोग जनहित को परिभाषित करेंगे। चिरकुटई की सारी सीमा ये लोग पार कर चुके है। चैन से सोना है तो जागते रहो,कहीं भी हो सकता है क्रिमिनल..ये सब क्या है। लोगों के दिमाग में खौफ भरने वाली बात है। किसी भी खबर या कार्यक्रम को लेकर यदि किसी आदमी का दिमाग डिस्ट्रक्ट होता है,तो स्पष्टतौर से वह कार्यक्रम जनहित में नहीं है। जनहित को लेकर सार्वजिनक मुद्दों पर तो और भी सावधानी बरतने की जरूरत है। किसी भी खबर को प्रसारित करने के पहले उसके इफेक्ट के विषय में जरूर सोचे। एक प्रश्न अपने आप से जरूर पूछे, इस खबर को क्यों प्रसारित कर रहे हैं। इस खबर का उदेश्य क्या है। यदि खबर को लेकर आपका उदेश्य स्पष्ट नहीं है और आपको यह लगता है कि इससे आपकी टीआरपी बढ़ने वाली है,तो रुक जाइये। प्रत्येक खबर का एक उद्देश्य होता है। अब खबर खबर के लिए या खबर टीआरपी के लिए की फिलॉसफी नहीं चलने वाली है।
इस दरिंदे की दरिंदगी देखकर आपके रोंगटे खड़े जाएंगे..इस तरह केजुमले का इस्तेमाल न करे। आपराध से संबंधित खबरों को सहज खबर की तरह प्रस्तुत करे। घिनौने अपराध को महिमामंडित करके आम जनता को डराना छोड़े। खबरों को ब्रेक करने की मानसिकता से भी निकले। खबरों को ब्रेक करने के चक्कर में ही आम जनता के दिल और दिमाग के साथ बलात्कार हो रहा है।
लादेनवादियों के कारनामों को सनसनी अंदाज में तो बिल्कुल ही प्रेषित न करें। खबर देने के नाम पर आंतक को फैलाने का माध्यम न बने। वैसे यकीनन लादेनवादियों से अभी सामना होता रहेगा, उनकी हरकते जारी रहेगी। इस तरह की खबरों को कवर करने के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित रिर्पोटर को ही लगाये। एसे मौकों पर न्यूज रूम की जिम्मेदारी भी किसी दिमाग वाले अधिकारी को संभालनी चाहिये। दूसरे टीवी वाले क्या दिखा रहे हैं इससे कतई प्रभावित न हो। इतना तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों को करना ही होगा,किसी भी कीमत पर। जनता इससे कम पर मानने वाली नहीं है।
वैसे आप एसा नहीं करेंगे तो जनता तत्काल तो आपका कुछ नहीं उखाड़ सकेगी, लेकिन लॉंग टर्म में अपने तमाम तामझाम के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खुद कब्र में पहुंच जाएगी, और यकीन मानिये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कब्र में पहुंचाने वालों की कमी नहीं है। यह मत भूलिये की आपके खिलाफ पूरा देश खड़ा है। जिस तरह से आप लोग सरकार को ज्ञापन दे रहे हैं और प्रदर्शनबाजी कर रहे हैं, उसके खिलाफ करोड़ों लोग हस्ताक्षर करके सीधे राष्ट्रपति को पोस्ट और मेल भेजने के लिए तैयार हैं। जनमत का सम्मान करना सीखिये, और हो सके तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रमुख पदों पर बैठे सीईओ टाइप के लोग या फिर संपादक टाइप के चीज अपने-अपने टीवी चैनलों पर दो मिनट देकर आम जनता से माफी मांगे, भाई लोग ! आपलोग जनता का विश्वास खो चुके हैं। सरकार चाहे कुछ करे,वैसे आप लोग हैं इसी काबिल, आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती है जनता का विश्वास हासिल करना। भारत की जनता कितने उच्चकों को माफ कर चुकी है, आप तो फिर मीडिया वाले हैं, चौथा स्तंभ है। देश को आपके सकारात्मक भूमिका की जरूरत है, अनावश्यक बुराई न बने।

6 comments:

  1. लोग जनहित को परिभाषित करे। टीआरपी के चक्कर में न पड़े, सहमत हूँ . सटीक लेख धन्यवाद्.

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  2. बिल्कुल सही, आपसे शत प्रतिशत सहमत हूँ| अभी बी बी सी पर भी पाठकों की राय में पुछा गया था, "टीवी न्यूज़ चैनलों पर नियंत्रण कितना सही?" और यदि आप इस लिंक पर जाकर देखें तो पाएंगे कि लगभग सभी पाठक राय रखते हैं कि जल्दी से जल्दी मीडिया पर अंकुश लगाया जाए|
    http://newsforums.bbc.co.uk/ws/hi/thread.jspa?forumID=7941

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  3. Ekdum 100 fisadi sach!
    10 me se 8 jan bhale hi roothe hon,10 me se 20 neta media ke chichaaledar aur stingon ki maar se bimaaar rehte hain.Kaanoon ke lambe haathon se fisal jaane waale neta logon kaa bukhaar chudaane waali ekmaatr media ki bolti band karne kaa maukaa in netaaon ko mil sakta hai.Ati astitva kaa new khodne lagti hai aur yeh khatarnaak maukaa media ne khud diyaa hai .
    Print aur web media to kaafi had tak maryaadit hain.Par mumbai charampanthi humlon me live aur suraksha balon ki ranniti ke pol kholne waale prasharan news channelon ki nirankushta kaa hi parichay dete hain.Inke hissab se jisase TRP barhe wohi khabar hai.Do chaar sansanikhez khabar,bhay,andhwishwaas aur draamon ko bar bar ghashitate ye news channel swantrata ki simaa rekha laanghh kar apne uddesyon se bhatak gaye the.
    Lekin media par kya sarkaar ko niyantran lagaana chahiye ?ye to theek waisi baat hui jaise chunaav aayog par sarkaari niyantran ki baat!.....
    Sach ki kadwaahat badhaane yaa ghataane ke liye kritrimtaa kaa istemaal nahi honaa chahiye.Media kaa antim uddesya janhit hi hotaa hai aur media kaa kaam bolnaa hi hotaa hai isiliye media ko apni bolti band nahi karni chahiye.Par Media ko TRP ko jyada tarjih na de janhit ,deshhit,sachhai ko sarwopari rakhkar aur har umar ke logon par padne waale manowaigyaanik prabhav ko dhayan me rakhkar khabron ko wiwechanaa ke baad hi prasaarit karnaa chahiye

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  4. आप ने जो जो बाते लिखी है सब सही है लेकिन मिडिया को शायद यह सब नही समझ आये,इसी लिये तो लोगो के दिल से उतर गया,
    बहुत सटीक लेख लिखा आप् ने धन्यवाद

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  5. आपकी बात से सहमत हूं...

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  6. पिछले साल श्रीपंथ की एक किताब आई थी 'ठग'. पुराने जमाने के ठगों के बारे में बड़ी छानबीन ke बाद लिखी गयी है ये किताब. इसके अनुसार ठगों की भी अपनी गाइड लाइन होती थी. आज भी चोरों, गिरहकटों, डकैतों और यहाँ तक की आतंकवादियों की भी अपनी गाइड लाइन होती है. हाँ, एक बात जरूर है की ये सब एक कटेगरी की गाइड लाइनें हैं. ये इलेक्ट्रोनिक मीडिया वाले भी अपनी गाइड लाइन ख़ुद ही बना रहे हैं तो इसे भी इसी कटेगरी में शामिल किया जाएगा या किसी और में? माफ़ कीजिए. अन्यथा न लीजिएगा. ये मैं सिर्फ़ संशय समाधान के लिहाज से पूछ रहा हूँ!

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