Tuesday, 30 December 2008

पढ़ती थी तूम मेरे लिये किताबें

पढ़ती थी तूम मेरे लिये किताबें
अच्छी किताबें,सच्ची किताबें,
मेरा होता था सिर तेरी आगोश मे
तेरे बगल में होती थी किताबें।

हंसती थी तू उन किताबों के संग
रोती थी तू उन किताबों के संग,
कई रंग बदले किताबों ने तेरे
कई राज खोले किताबों ने तेरे।

जब किताबों से होकर गुजरती थी तुम
चमकती थी आंखे,और हटाती बालें,
शरारतों पर मुझको झिड़कने के बाद
फिर तेरी आंखों में उतरती थी किताबें।

होठों से तेरी झड़ती थी किताबें
मेरे अंदर उतरती थी किताबें,
डूबी-डूबी सी अलसायी हुई
हाथों में तू यूं पकड़ती थी किताबें ।

चट्टानों से अपनी पीठ लगाये हुये
सुरज ढलने तक तूम पढ़ती थी किताबें,
अंधरे के साया बिखरने के बाद
बड़े प्यार से तुम समेटती थी किताबें ।

उलटता हूं जब अपनी दराजों की किताबें
हर किताब में तेरा चेहरा दिखता है,
चल गई तुम, पढ़ कर मेरी जिंदगी को
मेरे हिस्से में रह गई तेरी किताबें।

शब्द गढ़ता हूं मैं तेरी यादों को लेकर
तेरी यादों से जुड़ी हैं कई किताबें,
मेरे प्यार का इन्हें तोहफा समझना
तेरी याद में लिख रहा हूं कई किताबें।

Monday, 29 December 2008

थिंकर की बीवी

क्या सभ्यता के विकास की कहानी हथियारों के विकास की कहानी है ? इनसान ने पहले पत्थरों को जानवरों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया,फिर लोहे को और अब आणविक शक्तियों से लैस है,यह क्या है? हथियारों के विकास की ही तो कहानी है !!! पृथ्वी पर से अपने वजूद को मिटाने के लिए इनसान वर्षो् से लगा हुआ है। थिंकर की आंखे दीवार पर टीकी थी, लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। दीमाग में एक साथ कई बातें घूम रही थी।
गैस बंद कर देना, दूध चढ़ा हुआ है,बाथरूम से पत्नी की आवाज सुनाई दी। गैस चूल्हे की तरफ नजर पड़ते ही उसके होश उड़ गये। सारा दूध उबल कर चूल्हे के ऊपर गिर रहा था। सहज खतरे को देखते हुये उसने जल्दी से चूल्हा बुताया और गिरे हुये दूध को साफ एक कपड़े से साफ करने लगा। लेकिन किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया और बीवी उसके सिर पर आकर खड़ी हो गई।
तुम्हारी सोचने की यह बीमारी किसी दिन घर को ले डूबेगी। तुम्हारे सामने दूध उबल कर गिरता रहा और तूम्हे पता भी नहीं चला...हे भगवान मेरी किस्मत में तुम्ही लिखे थे। घर में दो छोटे-छोटे बच्चे हैं..अब खड़ा खड़ा मेरा मूंह क्या देख रहे हो। जाओ, जाकर दूध ले आओ।
बीवी की फटकार सुनने के बाद वह कपड़े पहनकर दूध लाने निकल पड़ा।
यदि इनसान को बचाना है तो हथियारों को नष्ट करना होगा, लेकिन कैसे? हथियारों को बनाने के उद्देश्य क्या है,इसकी जरूरत क्या है ? कौन लोग हथियार बनाने के धंधे में लगे हुए हैं? वह सोंचते हुये सड़क पर चला जा रहा था। दूध के बूथ पर पहुंचा और पैसा दुकानदार की ओर बढ़ा कर बोला,एक पैकेट दूध देना।
इनसान को हथियारों से मुक्त करना जरूरी है। लेकिन यह कुछ लोगों के लिए मुनाफे का धंधा है। वे लोग कभी इस धंधे को बंद करना नहीं चाहेंगे। वे लोग एसा सोचते भी नहीं होंगे। हथियार उत्पान दुनिया की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। घर में प्रवेश करने के बाद अपनी मेज पर रखी हुई तोलोस्तोव की पुस्तक युद्ध और शांति के पन्ने पलटने लगा। एक अंडरलाइन किये हुये वाक्य पर उसकी नजरे जाकर टिक गई, इनसान के नसों से खून निकाल कर पानी भर दो फिर युद्ध नहीं होंगे।
दूध कहां है, ड्रेसिंग टेबल छुटकारा मिलते ही बीवी ने पूछा।
दूध !! उसे समझ में नहीं आया कि बीवी उससे क्या पूछ रही है।
अरे उल्लू की तरह इधर उधर क्या देख रहे हो...तुम्हें दूध लाने भेजा था...
वो तो मैं ले आया..किचन में देखो..
कुछ देर तक किचन में दूध खोजने के बाद वह दनदनाती हुई फिर आई, किचन में दूध नहीं है.
.लेकिन मैंने दुकानदार को पैसे तो दिये थे
और दूध नहीं लाये..हे भगवान कैसे आदमी से पाला पड़ा है..दुकानदार को पैसे दे आया और दूध नहीं लाया...यह सब तुम्हारे सोंचते रहने की वजह से होता है...लेकिन...अब यहां खड़े-खड़े मेरा मुंह क्या देख रहे हो...जाकर दूध लाओ...

Saturday, 27 December 2008

युद्ध ! युद्ध !! युद्ध !!!

बहुत बकबास सुनाई दे रहा है चारो तरफ, युद्ध युद्ध युद्ध ! क्या होता है युद्ध? तीन घंटे की फिल्म,ढेर घंटे का नाटक, ट्वेंटी-ट्वेंटी का क्रिकटे मैच, कविता पाठ ? क्या होता है यह युद्ध?
युद्ध में मौत तांडव करता है और खून बहती है, गरम-गरम। इनसानी लोथड़े इधर से ऊधर बिखरते हैं और धरती लाल होती है। युद्ध ब्लॉगबाजी नहीं है। एक बार में सबकुछ ले उड़ेगी। जमीन थर्रायेगा, आसमान कांपेगी और हवाएं काली हो जाएगी, क्योंकि दुनिया परमाणु बम पर बैठी हुई है। लोग सांस के लिए तरसेंगे।
चलो माना कि रगो में लहू दौड़ रही है। और जब लहू उफान मारेगी तो युद्ध का उन्माद खोपड़ी पर चढ़ेगा ही। कोई समझा सकता है कि युद्ध का उद्देश्य क्या है??? अब यह मत कहना कि पाकिस्तान को सबक सीखाना है। यह सुनते-सुनते कान पक चुका है। जिस वक्त पाकिस्तान का जन्म हो रहा था, उसके बाद से ही उसे सबक सीखाने की बात हो रही है। अब यह सबक सीखाने का तरीका क्या होगा ? सेना लेकर पाकिस्तान के अंदर घुस जाना और कत्लेआम करते हुये इस्लामाबाद की ओर बढ़ना ? यह सबकुछ करने में कितना समय लगेगा ?
सेना में जमीन स्तर पर रणनीति तैयार करने वालों से पूछों। वो भी दावे के साथ कुछ नहीं बता पाएंगे। यदि थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाये कि सेना 40 घंटे में इस्लामबाद तक पहुंच जाती है, हालांकि इसकी संभावना न के बराबर है, फिर आगे क्या करना है ??? युद्ध के उद्देश्य को लेकर दिमाग में कोई स्पष्ट सी बात है ??? युद्ध करेंगे !!! सरकार में बैठे लोगों को भी होश नहीं है कि वो क्या बक रहे हैं। वो जो कुछ भी बक रहे हैं, जनता के उन्माद के दबाव में बक रहे हैं।
नीत्शे कहता है, शांति चाहो, लेकिन अल्पकालीन,वह भी इसलिए कि एक नई युद्ध की तैयारी कर सको। दुनियां में जो कुछ श्रेष्ठ है सब युद्ध की बदौलत ही है। युद्ध साध्य है, साधन नहीं। बकबासियों यदि नीत्से की बात नहीं मानते हो, तो जरा समझाओ कि इस युद्ध का उद्देश्य क्या है ? बेशक युद्ध करो, लेकिन उसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताओ। क्या इस युद्ध के बाद दुनिया के नक्शे से पाकिस्तान का नाम हमेशा के लिए गायब हो जाएगा?? यदि नहीं, तो नहीं चाहिए युद्ध। और यदि हां,तो थोड़ा सब्र करना होगा। सीधे सरकार बदलो, और एक नई सरकार बनाओ, जो पूरी तरह से युद्ध के लिए ही बनी हो। दो साल तक व्यवस्थित तरीके से जनता को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करो, हर स्तर पर। और फिर युद्ध शुरु करो,तब तक लड़ो जब तक भारत का प्राचीन नक्शे को मू्र्तरूप न दे दो, अथक और अविराम लड़ने की क्षमता चाहिये। दुनिया के अन्य मुल्कों से डिप्लोमैटिक वार और इकोनॉमिक ब्लॉकेज के लिए पूरी तरह से कमर कसो।
यदि ये सब नहीं हो सकता, तो चूपचाप अपना काम करते रहो, जो कर रहे हो। घर के लिए सब्जी लाओ, बच्चों को अपनी बीवी के साथ घूमाने ले जाओ, नौकरी धंधा करो, और अपना जीवन चलाओ। छोड़ दो यह युद्ध उनके लिए, जो एसा करने का मादा रखते हैं, और इंतजार करो, क्योंकि युद् तो प्रकृति का स्वभाव है। प्रकृति खुद उनलोगों का चयन करेगी, जो उसके स्वभाव के अनुरूप अनवरत युद्द के लिए कमर कसे हुये है। गौर से देखो अपने अगल-बगल,यदि तूम अपने आप को युद्ध में खड़े देख रहे हो तो,समझो प्रकृति ने तुम्हारा चयन कर लिया है। यदि नहीं तो बकबासियों की तरह मत चिल्लाओं कि सबक सीखाना है।

न तुमने निभाई,न हमने निभाया

कसमें खाई थी संग-संग हमने
न तुमने निभाई,न हमने निभाया ।
एक अनजानी डगर पे संग चले थे मीलों
न तुझे होश थी,न मैं कुछ जान पाया।
दुरियों के साथ मिटते गये फासले
मैं जलता गया,औ तुम पिघलती गई।
तुझे आरजू थी,मेरी नम्र बाहों की
मुझे आरजू थी तेरी गर्म लबों की।
दामन बचाना मुश्किल हुआ
तूम बहती रही, हम बहकते रहे।
टपकता रहा आंसू तेरी आंखों से
मेरी रातों की नींद जाती रही ।
चांद तले हम संग सफर में रहे
न मैं कुछ कहा, न तू कुछ कही ।
तेरी धड़कन मेरी सांसों में घुली
खामोश नजरों ने सबकुछ कहे ।
नये मोड़ पर नई हवायें बही
मैं भी ठिठका,और तू भी सिहरी ।
छुड़ाया था दामन हौले से तुमने
मैंने भी तुझको रोका नहीं था ।
हवाओं के संग-संग तू बह चली थी
घटाओं में मैं भी घिरता गया था।
बड़ी दूर तक निकलने के बाद
खाली जमीं थी,खुला आसमां था।
गुजरे पलों को समेटू तो कैसे
आगे पथरीला रास्ता जो पड़ा है ?
तुझे भी तो बढ़ना है तंग वादियों
जमाने की नजरे तुझपे टिकी है
मोहब्बत की मर्सिया लिखने से पहले
दफन करता हूं मै तेरी हर वफा को
तुमसे भी ना कोई उम्मीद है मुझको
लगाये न रखो सीने से मेरी खता को
कसमें खाई थी संग-संग हमने
न तुमने निभाई, न हमने निभाया।

Tuesday, 16 December 2008

कामांध समूह की लौंडी है सेक्यूलरिज्म

इंग्लैंड के एक राजा परकामुकता सवार होती है,
एक महिला को पाने की जिद।
इसायित को संगठन के तौर पर इस्तेमाल कर रहा
एक गिरोह उसकी राह में खड़ा होता है.
हर तरह की तिकड़मबाजी और घूसखोरी
चलती है,लेकिन अंदर खाते।
नीति, कूटनिती को ताक पर रखकरवह राजा आगे बढ़ता है
इसायित की चाबूक से त्रस्त जनताराजा के पक्ष में कमर कसती है।
धर्म को राजनीति से बेदखल करते हुये राजा
अपनी जिद पूरा करता है..
अपनी मन पसंद महिला को अपनी
बाहों में भरता है, वैधानिक तरीके से।
और इसके साथ ही धर्म पर
राज्य की विधि स्थापित होती है
और यहीं से सेक्यूलरिज्म का बीज छिटकता है.
सेक्यूलरिज्म एक कामांध राजा के दिमाग की उपज है..
.और अब इसका इस्तेमाल
सत्ता के लिए कामांध समूह कर रहा है..अनवरत।
विज्ञान कहता है,कोई भी चीज निरपेक्ष नहीं होती
सेक्यूलरिज्म कामांध समूह की लौंडी है, बजाते रहो.

Saturday, 13 December 2008

इसे मैंने भी चुराई थी

वो रसियन जूते थे, भूरे-भीरे। उनके फीतों में लोहे के बोल्ट लगे थे। दाये पैर के जूते के मुंह पर एक बड़ा सा छेद था, जॉन बनार्ड शा की काली कोट की तरह। याकोब उन जूतों से बेहद प्यार करता था। उन जूतों ने दुनियाभर की घाटियों में उसका खूब साथ दिया था। महानगरों की सड़कों पर चलने में उसे मजा नहीं आता था। याकोब से कई बार दोनों जूतों ने एक साथ शिकायत किया था कि महानगरों की हवायें उसे उच्छी नहीं लगती, उन्हें खुली हवायें चाहिए। लेकिन याकोव के सिर पर महानगरों में रहने की जिम्मेदारी थी, और इस जिम्मेदारी से वह चाहकर भी नहीं भाग सकता था। एक दारूखाने में उसे रात गुजरानी थी,छककर शराब पीते हुये, चार लोगों के साथ। बड़ी मुश्किल से इस बैठक में शामिल होने की उसने जुगत लगाई थी। चेचेन्ये में एक थियेटर को कैप्चर करने की योजना पर बनाई जा रही थी। याकोब जमकर उनके साथ पीता रहा। सुबह उसके जूते गायब हो चुके थे। उनचारों में से किसी एक ने चुरा लिया था। वे जूते उससे बातें करती थी, जंगलों में, घाटियों में, दर्राओं में, नदियो में।
कमांडर, क्या सोंच रहों हों, एक साथी ने पूछा।
अपनी जूतों के विषय में, वो तूम्हारे पैरों में है।
मेरे जूते,यह तो मैंने चुराई थी, एक कमांडर की थी।
मैंने चुराई थी.

Thursday, 11 December 2008

चोरी के मामले में इस्लाम वाला कानून सही

ले लोटा, इ बतवा तो बिल्कूल सही है कि यहां लोग बिजली के तरवे काट लेता है,और उसको गला-गुलाकर के बेचकर दारू पी जाता है या सोनपापड़ी खा जाता है। इहां के अदमियन के कोई कैरेक्टरे नहीं है। लगता नहीं कि बिना डंडा के ये सुधरेंगा सब.
मेरे गंऊआ में एक पहलवान जी थे, किसी को भी दबाड़ देते थे। उन्हीं की कृपा से आज तक मेरे गंऊआ बिजली नहीं आयी, जबकि सरकार ने सबकुच पास कर दिया था, यहां तक की तार और पोल भी गिर गये थे। पहलवान जी की अपनी समस्या थी। अपनी बीवी की जब और जैसे इच्छा होती थी भरमन कुटाई करते थे। उनकी कुटाई से त्रस्त आकर वह कई बार कुइंया में छलांग मार चुकी थी, लेकिन हर बार पहलवान जी रस्सी डोल डालकर उसे निकाल लेते थे, और फिर कूटते थे, दे दना, दे दना, दे दना दन।
जब गांव में बिजली आने की बात हुई तो किसी ने पहलवान जी के कान में यह बात डाल दी कि गांव में जितनी भी औरतों की कुटाई हो रही है वो बिजली का बहुत बेसब्री से इंतजार कर रही हैं, क्योंकि बिजली के तार में लटककर मरना आसान है। फिर क्या था पहलवान जी ने बिजली के खिलाफ शंख फूंक दिया। कसकी मजाल जो पहलवान जी से पंगा ले....गांव वालों ने समझाया, इंजीनियरों ने समझाया...सब बेकार। ऊ पहनवान जी की बुद्दि के कारण आज तक मेरा गंउया बिजली के लिए तरस रहा है।
लगता है कि यहां के आदमी के कैरक्टरे में कुछ गड़बड़ी है, सही चीज को उलटे तरीके से ही सोचेगा। भारत में अइसा कोई गांव नहीं है जहां पर लोग अकुसा फंसाकर बिजली नहीं चुराता है, गांव तो छोड़ दीजिये...शहरों में भी एक से एक तुरमखान हैं।
दिल्ली के लक्ष्मी नगर में मेरा मकान मालिक की बेटी रात होते ही मीटर से कनेक्शन हटाकर अकुसा सटा देती थी, और सुबह-सुबह बदल देती थी...ना, यहां के लोगों में करेक्टरे नहीं है...हर जगह के लोगों में एक नेशनल कैरक्चवा होता है....शायद यहां के लोगों का नेशनल करेक्टरवा यही है....इसका कराण क्या है. चिंता के बात है, यही करेक्टरवा नेतवन सब में दिखाई देता है. रास्ता तो निकालना है....अपने लेवह पर पूरी कोशिश करनी है...कोई कोर कसर नहीं छोड़ना है...कभी-कभी लगता है कि चोरी के मामले में देश में इस्लाम वाला कानून लागू कर देने से एक ही बार में सब ठीक हो जाएगा।

Wednesday, 10 December 2008

एक धारधार हथियार के तौर पर उभर रहा है ब्लॉग

डॉ.भावना की कविता पर प्रतिक्रया देते हुये संतोष कुमार सिंह ने एक सवाल उठाया है कि भारत की कोख से गांधी, नेहरू, पटेल और शात्री जैसा नेता क्यों पैदा नहीं हो रहे है। अन्य कई ब्लॉगों पर की गई टिप्पणियों में भी बड़ी गंभीरता के साथ भारत की वर्तमान व्यवस्था पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं। एक छटपटाहट और अकुलाहट ब्लॉग जगत में स्पष्टरूप से दिखाई दे रहा है। विभिन्न पेशे और तबके के लोग बड़ी गंभीरता से चीजों को ले रहे हैं और अभिव्यक्त कर रहे हैं।
डा. अनुराग, ज्ञानदत्त पांडे, ताऊ रामपुरिया, कॉमन मैन आदि कई लोग हैं, जो न सिर्फ अपने ब्लॉग पर धुरन्धर अंदाज में की-बोर्ड चला रहे हैं, बल्कि अन्य ब्लॉगों पर पूरी गंभीरता के साथ दूसरों की ज्वलंत बातों को पूरी शालीनता से बढ़ा भी रहे हैं। प्रतिक्रियाओं में चुटकियां भी खूब ली जा रही हैं, और ये चुटकियां पूरी गहराई तक मार कर रही हैं।
सुप्रतिम बनर्जी ने एक सचेतक के अंदाज में अभी हाल ही में एक आलेख लिखा है दूसरो का निंदा करने का मंच बनता ब्लॉग। यानि ब्लॉगबाजी को लेकर हर स्तर पर काम हो रहा है, और लोग अपने खास अंदाज में बड़ी बेबाकी से सामने आ रहें हैं। अभिव्यक्ति का दायरा बड़ा हो गया है। पिछले कई दिनों से मैं ब्लॉगबाजी कर रहा हूं और दूसरों के ब्लॉग को देख सुन भी रहा हूं। अभिव्यक्ति का एक नया अंदाज सामने आ रहा है। एक नई स्टाईल और नई उर्जा प्रवाहित होने लगी है, जो शुभ है-ब्लॉगबाजों के लिए भी और देश और समाज के लिए भी।
नीलिमा अपने आलेख मुझे कुछ कहना है में जाने अनजाने तानाशाही सिस्टम की ओर प्रोवोक कर रही हैं। मौजूद हालात में देश का एक तबका एसा चाह भी रहा है। नीलिमा के ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रियाओं में डेमोक्रेसी को लेकर लोगों ने बहुत सारी बातें कहीं हैं। कमोबेश सभी डेमोक्रेसी को पसंद कर रहे हैं,तले दिल से। वाकई में डेमोक्रेसी तहे दिल से पसंद करने वाली चीज भी है, हालांकि इसके नाम पर बहुत प्रयोग और खून खराब हुआ है। इतिहास इस बात का गवाह है। जिस रूप में इस वक्त डेमोक्रेसी हमारे देश में मौजूद है, उस रूप को तोड़ने की जरूरत मैं नहीं समझता। हां, इतना जरूर है कि डेमोक्रेसी को चलाने वाले प्रतिनिधियों में कहीं कोई गड़बड़ी जरूर हो सकती है। हो सकता है इसके लिए हमारा सामाजिक बुनावट जिम्मेदार हो, हो सकता है हम खुद जिम्मेदार हो। कहीं कुछ चूक हो रही है। हो सकता है विभिन्न दलों की कार्यप्रणाली पुरानी पड़ गई हो,निसंदेह कहीं कोई गलती हो रही है। एक आम धारणा पिछले कई वर्षों से भारत में दौड़ रही है,अच्छे लोग राजनीति से दूर है,और अच्छे लोग आज की राजनीति में टिक नहीं सकते, आज की राजनीति अच्छे लोगों के लिए नहीं है। तो क्या यह मानकर बैठ जाना चाहिए भारत की राजनीति बूरे लोगों के हाथ में है और ये बुरे लोग ही भारत की दिशा तय करते रहेंगे?
भारत के अन्य संचार माध्यमों में व्यवसायिकता हावी हो गई है,खबरों को लाभ और हानि के दृष्टिकोण से तौला जाता है,गंभीर बहसों की गुंजाईश न के बराबर है। एसे में ब्लॉग एक धारधार हथियार के तौर पर उभरकर सामने आ रहा है। गहरी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करने के साथ-साथ इसका इस्तेमाल जीवन और समाज, राष्ट्र, धर्म, अर्थ और संस्कृति से जुड़े गंभीर पहलुओं की पड़ताल करने के लिए भी किया जा रहा है। उम्मीद है कि समय के साथ जनमत निर्माण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी यह बखूबी निभाने लगेगा।

Monday, 8 December 2008

ये सच दिखाते हैं,हर कीमत पर

सूनो, सूनो, सूनो
कान खोल कर सूनो
दिल थाम कर सुनो
टीवी चैनलों के खिलाफ
देश में एक गहरी साजिश
चल रही है.
आतंकियों ने इनके कनपटे पर
बंदूक ताना था,लेकिन मारा नहीं
क्योंकि ये प्रेस-प्रेस चिल्लाये थे .
इनके अगल-बगल से गोलियां गुजरती रही
लेकिन सीने से एक भी गोली नहीं टकरायी
क्योंकि गोलियों को पता था ये प्रेस है.
सड़कों पर फटा ग्रेनेड के छींटे इनके
कैंमरे से होते हुये,न्यूजरूम में पहुंच गये
दो सकेंड के लिए थम गई इनकी सांसे
साठ घंटे तक ये लोग डटे रहे
टीआरपी के लिए नहीं,पत्रकारिता के लिए
खूब की पत्रकारिता, आतंकवाद के
कवरेज पर इन्हें गर्व है
अपनी जान जोखिम में
डालकर इन्होंने सच परोसा
इन्हें किसी की सर्टिफिकेट
की जरूरत नहीं है
क्योंकि ये सच दिखाते
हैं,हर कीमत पर।
सरकार में बैठे हुये लोगों ने इनकी सराहना की है
...जिम्मेदारी के साथ काम किया इन लोगों ने.
अपनी पीठ थपथपाने के बाजाये
भाई लोग, शीशे के कमरे से बाहर निकलो
आम आदमी की आंखों में झांको
और पता लगाओ कौन से सवाल तैर रहे हैं
उनकी आंखों में
मैं बताता हूं 12 घंटे तक एक ऑफिस में
काम करने वाले एक व्यक्ति का सवाल
सूनो यह मासूम सवाल....
यदि मेरी अंतोनोयोत को आंतकी उठा ले जाये
तो राष्ट्र कहां तक समझौता करेगा ?
अब तो मुंबई की आग भी ठंडी पड़ चुकी है
बैठाओ पैनल न्यूजरूम में
नेताओं को बुलाओ,विशेषज्ञों को बुलाओ,
और बिना कुर्तक किये पूछो उनसे
आम आदमी का यह मासूम सवाल।
क्योंकि टीवी चैनलों के खिलाफ
साजिश में,यदि तुम्हे लगता है कि यह
साजिश है,इस देश का आम आदमी शामिल है.
यदि बात समझ में नहीं आये
तो एक बार रूसो का जेनरल विल उलटकर देख लेना
शायद दिमाग में यह बात घुसे कि
कि टीवी चैनलों के खिलाफ
इस साजिश में यकीनन इस देश
का आम आदमी शामिल है ....यकीनन.

Saturday, 6 December 2008

घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का

सलाखों के पीछे बंद सुकरात से
पहरे पर खड़े एक सैनिक ने कहा था,
तुम इस जेल से भाग जाओ,क्योंकि मुझे पता
हैं कि ये लोग जघन्य अपराध कर रहे हैं।
मुस्कराते हुये सुकरात ने जवाब दिया था,
लोकतंत्र के इन पहरेदारों को पता होना चाहिए
कि मेरी मौत से यह डेमोक्रेसी और मजबूत होगी।
सुकरात की मौत पूरी तरह से डेमोक्रेटिक थी
मतदान हुये थे---मौत के पक्ष और विपक्ष में।
अंतिम फैसला के बाद सुकरात ने विष के रूप
में अपने लिए मौत का प्याला खुद चुना था
---------एक सच्चे डेमोक्रेट की तरह।
बंदुक के साये में घूमने वाले नेताओं की
रखैल नहीं है डेमोक्रेसी...
इसके नाम पर अब और दलाली
और धंधेबाजी नहीं, बस बहुत हुआ।
डेमोक्रेसी मेरी बीवी है, जो लड़ती है, झगड़ती है
और मुझे प्यार करती है।
और मैं भी इससे प्यार करता हूं,
डेमोक्रेसी को मैं हाथ में विष का प्याला लिये
सुकरात के मुस्कराते हुये होठों पर देखता हूं
और उनलोगों के चेहरे को भी पहचानता हूं
जो डेमोक्रेसी को उसी के नाम पर जहर दे रहे हैं
इन चेहरों को नोंचने से घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का।

अब तुम्हारे होने का अहसास नहीं होता

(अपनी प्रेयसी के लिए)
अब तुम्हारे होने का अहसास नहीं होता
तुम्हारी आंखों से टपकती थी जिंदगी
और अधखुले होठों से फूल बरसते थे
तुम्हारे गेसुओं की महक
मुझे खींच ले जाती थी परियों के देश में
रुनझून रुनझून सपने,गहरे चुंबन
फिजा में तैरती हुई सर्द हवायें
और इन सर्द हवाओं में तेरी सांसों की गरमी
रफ्ता-रफ्ता बढ़ती हुई जिंदगी
और उफान मारता प्यार का सैलाब
हां दोस्त,तुने मुझसे बेपनाह मोहब्ब्त की
और मैंने भी तुझे हर ओर से समेटा
लेकिन अब तुम्हारे होने का अहसास नहीं होता

ताज की गुंबदों से निकलने वाली लपटों ने
मेरे जेहन में तेरे वजूद का स्थान ले लिया है
गगनगनाकर निकलती हुई गोलियां और लोगों की चीखे
सड़कों पर फैले हुये खून,और सिसकियों
ने तुझे मेरे दिल से बेदखल कर दिया है
मैं चाहता हूं, तू एक बार फिर सिमटे मेरी बाहों में
और एक बार फिर मैं तेरी गहराइयों में डूबता जाऊं
लेकिन आने वाले समय की पदचाप सुनकर
मैं ठिठक जाता हूं,और शून्य में निहारता हूं
फिर रिसने लगता है खून मेरी आंखों से
तुम डूबती थी मेरी आंखों में,यह कहते हुये
कितनी अच्छी और सच्ची है तुम्हारी आंखे
क्या मेरी आंखों से रिसते हुये खून को तुम देख पाओगी
शायद तुम देख भी लो,लेकिन मैं प्यार का गीत नहीं गा पाऊंगा
मेरे होठों से बस प्रलय नाद ही निकलेंगे,
जो तुम्हे भी बहा ले जाएंगे, एक अनवरत संघर्ष की ओर
वैसे भी तेरे साथ रह कर भी मैं तेरा नहीं रहूंगा
क्योंकि अब तुम्हारे होने का अहसास नहीं होता

Friday, 5 December 2008

वो दढ़ियल पत्रकार भाई क्या बोलता है

बाप अपुन जो भी बोलेगा बिंदास बोलेगा,क्या ? वो क्या बोलता है, किसी को मिर्ची लगती है तो लगे। साला तुम नेता लोग अपुन लोग का हड्डी तक तक को चूस गया है। अपुन तो पब्लिक है, कुछ भी बोल सकता है , और क्यों नहीं बोलने का ? साला तुम लोग चुनाव कराता है, देश में दंगा करता है ऊधर संसद में जाकर नंगा होता है, अपुन सब समझता है, लेकिन तेरे का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।
लेकिन आपुन को भौंकने से तू नहीं रोक सकता है। आपुन भौंकेगा और खूब जोर जोर से भौकेगा और आपुन के साथ-साथ अखा पब्लिक भौंकेगा, तेरे को मालूम होना मांगता कि जब एक कुत्ता भौंकता है तो उसके साथ साला अखा कुत्ता भौंकता है। साला इस बार सड़को पर दिखाई देगा ना, तो अपुनलोग तेरे को काटेगा भी, ये देख,एसा दांत गड़ाएगा, बिंदास।
वो दढ़ियल पत्रकार भाई क्या बोलता है, साला तुमलोग सुरक्षा में घूमता है, ब्लैक कैट लेकर,लेकिन अपुन लोग डॉग है, डॉग ! जब आपुन लोग भौंकेगा तो सारा ब्लैक कैट भाग जाएगा। यईच बात है। और साला तेरे को काटेगा भी, दौड़ा-दौड़ा कर काटेगा।
तुम लोग साला हलकट है, हलकट। अपुन साला कमर तोड़ करके काम करता है, चोरी नहीं करता,हराम की नहीं खाता। दारू पीता है, लेकिन अपनी कमाई का। तेरी तरह धंधा नहीं करता। अपुन को मालूम है तूमलोग साला फाइल इधर उधर करने का पैसा लेता है, साला डेवलमपेंट के हर काम में कमिशन खाता है, साला तुमलोगों ने देश के हर सरकारी आदमी को कमिशनखोर बना देला है। साला तुम लोग सड़ेला है, सड़ेला। गटर के माफिक बास मारता है।
आपुन साला पब्लिक है, पब्लिक। आपुन को हरीच बात याद है। कुछ बात अपुन के बाप ने अपुन को बताया था, तुमलोगों ने उसको बोला था कि गरीबी हटाएगा, तेरे लोगों के बातों पर उसने यकीन किया साला गरीबी तो नहीं हटा, लेकिन साला वो खुद हट गया। तुमलोगों ने बोला टोटल रिवोल्यूशन लाएगा, आपुन लोगों का दिन फिरेगा, लेकिन साला अखा चारा खा गया। तूम लोगों ने बोला साला राम मंदिर बनाएगा, लेकिन साला दलाली करता रहा और बाद में बोला फील गुड कर। पेट में रोटी और दारू न हो तो आदमी फील गुड कैसे करेगा? साला तुम सब लोग एक ही जात का है। अब अपुन लोग भौंकेंगा और काटेगा, जरूर काटेगा।
साला तेरे लोगों का पेट कितना बड़ा है समझ में ही नहीं आता ? अखा इंडिया तो तू खा गया, अब साला अपुन लोग की हड्डी चूस रहा है। अपुन के पैसे पर साला ब्लैक कैट लेकर घूमता है, दड़ियल पत्रकार सही बोलता है, लेकिन वह यह नहीं बोलता कि अपुन को करना क्या है। वैसे आपुन को पता है कि आपुन को करना क्या है। आपुन को भौंकना और काटना है। साला आपुन तेरा खद्दड़वाला धोती फाड़ डालेगा और अंदर तक दांत गड़ाएगा।
साला तुम लोग देश का कइसा हलकट नेता है रे ? बाबा रे बाबा! वो साला तेरा पार्लियामेंट में घुस गया, फिर भी साला तू लोग धोती झाड़कर घूमता है,ब्लैक कैट लेकर। और वो दढ़ियल पत्रकार क्या बोलता है, देश को चलाना एक बड़ा धंधा है और तू लोग धंधेबाज है।
तेरे इस धंधे को उखाड़ फेंकेगा। आपुन पब्लिक है, पब्लिक। देखते जा तेरी बारात में कैसे भौंकता है। साला चुनाव जीतकर माला पहनकर घूमता है ना, इस बार आ, तेरे को माला अपन पहनाएगा।
आपुन तो साला पागल कुत्ता हो गेयला है बाप !!!!, खूब भौंकेगा...भौं...भौं...भौं और अपुन के साथ अखा देश भौंकेगा..साला तूने अखा देश को कुत्ता बना देयला है।

Thursday, 4 December 2008

आतंकवाद का जूठन खाकर मोटी होती मीडिया

यदि गौर से देखा जाये तो आतंकवाद और मीडिया दोनों विश्वव्यापी है और विश्व व्यवस्था में दोनों के आर्थिक तार एक दूसरे से जुड़े हुये है। मीडिया को खाने और उगलने के लिए दंगे, फसाद और युद्ध चाहिये और इसी जूठा भोजन के सहारे मीडिया पल बढ़ कर मोटी होती है।
आतंकवाद एक तरफ जहां शहरों और लोगों को निशाना बनाकर अपने संगठनों के लिए अधिकतम संशाधनों की जुगाड़ करता है वहीं मीडिया आतंकवाद के जूठे को परोसकर उसे महिमामंडित करते हुये अपने लिए अधिक से अधिक से कमाई करती है। वैश्विक स्तर पर दोनों एक दूसरे को पाल पोस रहे हैं, हालांकि इस जुड़ाव का अहसास मीडिया को नहीं हैं और हो भी नहीं सकता, क्योंकि मीडिया के पास ठहरकर सोचने का वक्त कहां हैं।
वैसे मीडिया में आर्थिक मामलों (मैनेजमेंट)से जुड़े लोगों को इस बात का पूरा अहसास है कि मुंबई में हुये हमलों के बाद मीडिया में बूम आ रहा है और इसी तरह के दो चार हमलें और हो गये तो कम से कम मीडिया का धंधा तो आर्थिक मंदी के दौर से निकल हीजाएगा। मीडिया एक संगठित उद्योग की तरह पूरी दुनिया में काम कर रही है।
मुंबई हमले के बाद मीडिया के शेयरों में उछाल की खबरें आ रही हैं। चूंकि मीडिया के धंधे में बहुत बड़े पैमाने पर एफडीआई लगा हुआ है, इसलिए यह पूरी तरह से लाभ और हानि के गणित से संचालित हो रही है। राष्ट्रीयता जैसी चीज मीडिया के लिए कोई मायने नहीं रखती है। मीडिया पूरी तरह से इस धंधे में निवेश करने वाले लोगों और इस धंधे को संचालित करने वाले बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के प्रति जिम्मेदार हैं,आम लोगों के हितों से उनका कोई लेना देना नहीं हैं। मीडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में वही लोग बैठे हुये जिन्होंने इस धंधे में मोटा माल लगा रखा है। उन्हें तो बस मुनाफा चाहिए,हर कीमत पर।
मीडिया को चलाने वाले विशुद्ध रूप से मुनाफेबाज लोग हैं। आतंकवाद के पीछे भी मुनाफेबाजी की एक थ्योरी काम कर रही है। आमलोगों के असंतोष और गरीबी को बहुत ही व्यवस्थित तरीके से धार्मिक सांचे में ढालकर वैश्विक स्तर पर जेहाद के कारवां को आगे बढ़ाया जा रहा है। जेहाद के कारवां को आगे बढ़ाने लोग अफगानिस्तान के तालिबानी स्कूल की उपज है। मुल्ला उमर और लादेन नेपथ्य में बैठकर एसे तमाम लोगों को हर तरह की सहायता उपलब्ध करा रहे हैं,जो क्षेत्रीय स्तर पर आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को अपनी फौज में भर्ती करने में सक्रिय हैं। और इस काम के लिए उनसे मिलने वाले पैसों से अपनी खुद की जेबे भी भर रहे हैं,जैसे मीडिया में बैठे मेडियोकर लोग कर रहे हैं।




Wednesday, 3 December 2008

मुंबई पुलिस का मोबाईल संदेश

मुंबई पुलिस की ओर से एक मोबाइल संदेश जारी किया गया है जो इस प्रकार है...एसएमएस के जरिये स्कूलों और अस्पतालों पर संभावित आतंकी हमलों को लेकर अफवाह फैलाये जा रहे हैं। हम सभी शहरी को शहर की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करते हैं। शहर पूरी तरह से सुरक्षित है। चिंता न करे और अफवाह को फैलने से रोके।
यदि आतंकियों के विषय में इस तरह के एसएमएस किसी के पास आते हैं तो उन्हें इधर-उधर फेंकने के बजाय, प्रोपर ऑथोरिटी तक पहुंचाना बेहतर होगा, संदेश को इधर-उधर फेंकना या चेपना एक गैरजिम्मेदार कदम है। यदि दिल्ली में इस तरह का कोई एसएमएस दौड़ रहा है तो अधिक सावधानी की जरूरत है। यदि वहां की ऑथोरिटी पर यकीन नहीं है तो खुद जाकर देखें....राष्टीय सुरक्षा के नाम पर इतनी ड्यूटी तो की ही जा सकती है, लेकिन प्लीज पब्लिक फोरम पर एसी खबरे न प्रेषित करें। मुंबई में एसे एमएमएस पिछले कई दिनों से हवा में तैरते हुये मोबाईल सेट पर धावा बोल रहे हैं। स्टाप इट !!!

डर गये है गांधी

मुंबई पर आतंकी हमले के बाद गांधी फिल्म में गांधी की भूमिका के लिए ऑस्कर पुरस्कार हथियाने वाले बेन किंग्सले डरे हुये हैं और इसी कारण वह अपनी फिल्म बुद्ध की शूटिंग को टालने की बात कर रहे हैं। बुद्ध फिल्म की शूटिंग अगले साल भारत में किये जाने की योजना बहुत पहले से बन रही थी और इस फिल्म से जुड़ी पूरी यूनिट भारत आने की तैयारी में थी।
ब्रिटिश इंडेपेंडेंड फिल्म अवार्ड में एक रेडियो से बातचीत के दौरान मुंबई में आतंकी हमले से हैरान परेशान बेन किंग्सले ने कहा है कि इस घटना से हमारा प्रोजेक्ट बूरी तरह से प्रभावित हुआ है और फिलहाल हम भारत नहीं जा रहे हैं। अब प्रोजेक्ट को भारत में शूट करने का निर्णय हमारे फायनेंसर और प्रोड्यूसर करेंगे। यह फिल्म उद्योग पर आतंकवाद की एक बहुत बड़ी मार है। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से मुंबई का फिल्म उद्योग पहले से चरमराया हुआ है। बेन किंग्सले भारत में बुद्ध फिल्म भी शूटिंग के अलावा यहां पर और भी दो फिल्मों की शूटिंग की योजना बना रहे थे। अपनी अगली दो फिल्मों के विषय में फिलहाल वह कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं हैं।
इस मामले पर कुछ बोलने की स्थिति में तो अभी गांधी जी भी नहीं होंगे। वैसे भी आजादी के अंतिम दिनों में लोगों ने उनकी बाते सुननी बंद कर दी थी। महानता के लेबल कभी-कभी इनसान को लाचार कर देता है, अंतिम दिनों में गांधी इसी लाचारी के शिकार हुये थे।

फ्रेश लीडरशीप की बात कर रहे हैं आमिर खान

आमीर खान अपने ब्लॉग पर वर्तमान हालात को लेकर गंभीर चिंता करते हुये दिख रहे हैं। फिल्मी दुनियां में काम करने वाले लोग जानते हैं कि आमीर एक गंभीर इनसान हैं और कई बार बड़ी बेबाकी से सार्वजिनक जीवन पर टिप्पणी करने के कारण उनकी खूब टांग खीचाई भी हो चुकी है। उनको लेकर लोगों की चाहे जो अवधारणा हो,लेकिन उनकी बातों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।
वे देश में आतंकवाद के लिए सीधेतौर पर प्रमुख राजनीतिक दलों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। वह लिखते हैं कि मुंबई में जो कुछ भी हुआ उसके लिए सीधे तौर पर नपुंसक कांग्रेस जिम्मेदार है। इसके पहले इंडियन एयरलायंस 814 के अपहरण के समय भाजपा ने तीन आतंकियों को छोड़कर आतंकवाद को लेकर अपनी नपुंसकता जाहिर कर चुका है।
इन घटनाओं से वह सबक सीखने की बात करते हुये कहते है कि आतंकवादियों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाना चाहिए। सभी आतंकियों को यह स्पष्ट संदेश दे देना चाहिए कि भारत उनसे किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा।
आगे वह लिखते हैं कि भविष्य में मुझे परिवार के साथ यदि आतंकी बंधक बना लेते हैं तो मुझे छुड़ाने के लिए उनसे किसी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें तत्काल मार गिराया जाना चाहिए। देश की सुरक्षा की खातिर मैं अपना और अपने परिवार का बलिदान करने के लिए तैयार हूं। अपने ब्लॉग पर आमिर खान आतंकवाद को व्यापक रूप में परिभाषित करते हुये लिखते हैं कि आतंकवाद की परिभाषा सिर्फ एके 47 तक ही सीमित नहीं है किसी भी जरिये लोगों के दिल में भय बिठाने को आतंकवाद माना जाये।
वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में होने वाले गिरावट के लिए वह आम जनता को दोषी करार देते हुये लिखते हैं कि राजनीतिक मार्स और ज्यूपीटर से नहीं आते वे हमारे और हमारे समाज के बीच से आते हैं उनका चयन एक डेमोक्रेटिक सिस्टम के तहत हमलोग करते हैं। एक सवाल उछालते हुये वह पूछते हैं, कुछ देर रुककर आप सोचीये कि दोषी कौन है? आमिर खान अपने बच्चों को एक बेहतर व्यवस्था देने के लिए देश में एक युवा राजनीतिक पार्टी को उभरते हुये देखने की इच्छा व्यक्त करते हैं। एक फ्रेश लीडरशीप की बात करते हैं, जिसे हम सभी लोग समर्थन दे सके।

Tuesday, 2 December 2008

पत्नी का अंतिम मिस कॉल

दो दिसंबर को इंग्लैंड से निकलने वाले एक अखबार सन में कवर पेज पर एक तगड़ी खबर छपी है। इस खबर में कहा गया है कि आजम ने बताया है कि उसे किस तरह आर्डर अपने आका से दिये गये थे। उसे दो मकदस दिये गये थे। पहला, किसी गोरे को उड़ाना, दूसरा ताज को जलाना। गोरे में खासतौर पर अमेरिकन और ब्रिटेनवासियों पर जोर दिया गया था।
यह खबर चीख-चीख कर यह कह रही है कि शैतानों का पहला टारगेट अमेरिका और इंग्लैंड के लोग थे,चूंकि युद्ध क्षेत्र भारत था इसलिए इसलिए यहां पर उत्पात मचाना जरूरी था, और दूसरा टारगेट- ताज-को हिट करने के बाद उन्होंने यहां पर जमकर उत्पाद मचाया। एक तरह से अपने दोनों टारगेटों को हिट करने के बाद वे भारत के साथ गिल्ली डंडा खेल रहा थे।
यह एक सफल हमला है, भारत पर नहीं बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन पर। भारत तो सिर्फ रणभूमि है। रणभूमि के तौर पर इसका चयन काफी सोंच समझ कर किया जा रहा है। अभी कुछ देर पहले असम भी फिर एक विस्फोट की खबर मिली है,यह गिल्ली डंडा का खेल नहीं है तो और क्या है।
निक पार्कर मुंबई से अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि मुंबई पर हमला करने वाले गिरोह में दो लड़को संबंध इग्लैंड के लीड्स से है। इंग्लैंड की खुफिया एजेंसिया इस बात की जांच कर रही है। उनलोगों ने भारत से भी सारे नमूने बटोर लिये हैं। ब्रिटेन का विदेश मंत्रालय अभी कुछ भी कहने से हिचक रहा है। ब्रिटेन पुष्टि का इंतजार कर रहा है। अमेरिका से हिलैरी के विदेशमंत्री बनने की खबर है। महिला कर्टसी में माहिर ओबामा की क्लिपिंग हिलैरी के साथ खूब दिखाये जा रहे हैं। इराक से अमेरिकी सेना हटते ही वहां पर वहा के लोकल लड़ाके बेरोजगार हो जाएंगे। उनकी रणभूमि तब्दील हो सकती है और हो रही है।
जूनियर बुश ने आतकंवाद के खिलाफ युद्ध की घोषणा की थी। ओबामा किधर जाएंगे, यह तो समय ही बताएगा। हिलैरी के हाथ में विदेश मंत्रालय आने के बाद, भारत को थोड़ी राहत महसूस करनी चाहिए क्योंकि बिल क्लिंटन भारत में नाच गा चुके हैं, यहां के लोगों के साथ यहां के लोगों के बीच। अभी सबसे बड़ी चुनौती है भारत को वार जोन में तब्दील होने से रोकने की। इसके लिए हर लेवल पर सिस्टमैटिक होना होगा। आजम को अंतिम सांस तक लड़ने के लिए कहा गया था, यानि फाइट टिल डेथ।
5000 शहरी आबादी इन लौंडे के निशाने पर थे। प्रत्येक शहर का सैनिकीकरण होगा,सीमाओं से इतर। सीमायें सेना के हाथों में सुरक्षित है, बस अंदर से सैनिकीकरण करने की जरूरत है, ताकि इनसे लड़ने के लिए सेना नहीं बुलाना पड़े। प्रत्येक शहर को इसका सलीका सीखना पड़ेगा, नहीं तो जख्म पर जख्म मिलते रहेंगे। करोड़ों लोगों के हाथों में मोबाईल नहीं है, उन्हें न तो अपने दोस्त का एसएमएस दिखाई देगा और न हीं अपनी पत्नी का अंतिम मिस कॉल, भारत वार जोन में तब्दील हो चुका है, अघोषित।

सभीको सलाम कर.. अपने माई बाप हैं

ये जमूरे
हां उस्ताद
जो पूछूंगा वो बोलेगा
बालूंगा
तो बता मेरे हाथ में क्या है
डुगडुगी
बजाऊ
बजाओ उस्ताद
डुग डुग डुग डुग डुग...
तो भाइयों तमाशा शुरु होता है...चल जमूरे सभी लोगों को सलाम करे...ये अपने माई बाप है....हम तमाशा दिखाते हैं और ये हमारा पेट पालते हैं..
...लेकिन तुम्हारी डुगडुगी सुनकर तो कोई नहीं आया...
...जमूरे ये क्या हो रहा है, समझ में नहीं आ रहा...
...कोई आएगा कैसे उस्ताद। अब तमाशा तो ऊपर हो रहा है....
... क्या मतलब...
उस्ताद, टेलीविजन वाले अब रियल ड्रामा दिखा रहे हैं, नेता लोग शहीदों को कुत्ते बता रहे हैं..पाटिल जा रहे हैं, चिंदबरम आ रहे हैं..देशमुख अपने बेटे का फिल्मी कैरियर बनाने के लिए रियल लोकेशन खोज रहे हैं...ये सारा ड्रामा पूरा देश रखा है उस्ताद...अब हमें कौन देखेगा...
...जमूरे यह तू क्या बोले जा रहा है....
....मुंबई में आतंकियों ने जो ड्रामा दिखाया है उसके आगे सबकुछ फीका है...और रहा सहा कसर हमारे हमारे हाई प्रोफाइल पर्लनाल्टी लोग पूरा कर कर दे रहे हैं....
...अरे जमूरे मैंने तुझे ये सब तो नहीं सिखाया था, कहां से सीखा.....
उस्ताद दुनिया चांद पर नगर बसाने जा रही है....और एक राज की बात बताऊं, इसके साथ आतंकवादी चांद को भी उड़ाने की योजना बना रहे हैं....
...बेवकूफ बंद कर अपनी जुबान...फिर उन शायरों का क्या होगा जो लिखते थे चांद सी महबूबा हो अपनी ...
....उस्ताद अपने आप को नये जमाने में बदलो....
....वो कैसे...
...अंडरवल्र्ड ज्वाइन कर लो...
....अबे चूप, अब क्या मुझे मरवाएगा...
....फिर कोई पोलिटिकल पार्टी ज्वाइन कर लो...राज नेता बन जाओ..
....ये कैसे हो सकता है....
.....क्यों नहीं हो सकता है...तमाशा दिखाना तो तुम्हारा खानदानी पेशा है....बस थोड़े राजनीति के हथकंडे सीखने होंगे.....
..वो क्या...?
...अब मुंबई में बहुत लोग मरे हैं....तुम आतंकियों के गुणगान करने लगो...रातो रात हिट हो जाएंगे और चैनल वाले भी तुम्हे घेर लेंगे...टीवी पर नजर आने लगोगे...उन्हें मसाला चाहिए...रातो रात मामला फीट हो जाएगा.
--अबे कुत्ते...नमक हरामी करता है....भारत के लोग मेरी बोटी -बोटी नोच लेगी....
-भारत के लोगों के सामने तो पाटी पेट का सवाल है..इसके सामने सारे सवाल भूरभूरा जाएंगे...बस अपना मामला चोखा करो, कुछ नहीं होगा....बताऊं टीवी वालों के सामने क्या कहना--क्या...ताज सांप्रदयिकता की निशानी थी....जिन नौजवानों ने इसे जलाया है वो धर्मनिरपेक्ष थे...
....अबे ये क्या बात हुई....
.उस्ताद धर्मनिरपेक्षता एक कटी हुई पतंग का उलझा हुआ धागा है...इसे जैसे मन हो वैसे लपेटो.....
....जमूरे मुझे तू पाकिस्तान का एजेंट लग रहा है....
...अरे उस्ताद तूने बहुत जल्दी राजनीति का पहला सबक लिया...सरकारी भाषा पकड़ लिया....तेरी तो बारात निकालू,चल कुछ खाते हैं बड़ी जोड़ की भूख लगी है...
..उस्ताद मुझे भूख नहीं हैं......मेरी भूख तो अपने देश में चलने वाला यह तमाशा खा गया है.आओ हम मजमा लगाते रहे..सहमे हुये लोगों का दिल बहलाते रहे....