The term IYATTA means the essence of existence. I think this is nothing, but an exploration. Exploration for absolute pleasure of human being. Not for a person, but for entire world. Let us be together, for a great exploration. May we be associates of one another!
Saturday, 29 November 2008
.....इससे कुछ भी कम राष्ट्रीय बेशर्मी है
झलकियां मुंबई की
मुंबई की सड़कों पर खचाखच भरी रहने वाली बेस्ट की बसे खाली ढनढना रही हैं। कभी बस स्टापों पर भीड़ लगी रहती थी, अब इकादुका सवारी ही बस स्टापों पर नजर आ रहे हैं।
टक्कर लादेनवादियों से है
Friday, 28 November 2008
मांद में घुसकर सफाया करने की जरूरत
राष्ट्रीय मीडिया को वार जोन की तमीज नहीं
ताज और ओबराय में ए ग्रेट के सिटीजन ही जाते हैं और यहां पर विदेशी आगंतुको का भी भरमार रहता है। यदि ताज से निकलने वाले एक बंदे की बात माने तो ये लोग ये लोग अमेरिकी पासपो्रट धारियों को पकड़ने पर ज्यादा जोर दे रहे थे। वीटी रेल्वे स्टेशन पर इनलोगों ने आम आदमी को टारगेट पर लिया। कोलाबा में उतरने के बाद ये लोग कई टुकडि़यों में बंट गये थे। करकरे,आम्टे और कालस्कर इनके अभियान में इन्हें बोनस के रूप में मिले। अपने इस अभियान के प्रारंभिक दौर में इन्होंने भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बेवकूफियों का भी खूब फायदा उठाया। वारजोन के करीब कैमरा लेकर डटे हुये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों ने अपने कैमरे का मुंह खोलकर ताज और ओबराय के अंदर बैठे इन लौंडों को बाहर की स्थिति से अवगत कराते रहे। टीवी पर चैनल बदलते हुये ये लौंडे बाहर चलने वाली एटीएस की गतिविधियों को देख और समझ रहे थे जबकि एटीएस वाले उस वक्त अपने कमांडर की हत्या के बाद अपने आप को ऑगेनाइज करने की कोशिश कर रहे थे।
ये लौंडे सीमा पार से भी लगातार कम्युनिकेशन में थे और वहां बैठे लोग भी भारत की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कृपा से वार जोन की गतिधियों पर नजर रखते हुये ताज और ओबराय के अंदर बैठे लौडों को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने के लिए हांक रहे थे। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को वार जोन की रपट करने की तमीज नहीं है। चूंकि वार जोन एक शहरी इलाका था,इस लिहाज से चौगुनी सतकता की स्वाभाविक मांग थी। बाद में एटीएस वालों के कहने पर मीडियावालों को भेजे में बात घुसी, जबकि यह पहले ही घुस जानी चाहिए थी। तब तक काफी नुकसान हो गया था। ताज और ओबराय के अंदर बैठे लौंडे मोबाइल फोन से टीवी वालों को धड़ाधड़ फोन करके अपनी बाते रख रहे थे और टीवी वाले यंत्रवत अनजाने में उनकी बातों को बिना कट के लोगों तक कम्युनिकेट कर रहे थे और तरह से उनके मिशन को आगे बढ़ा रहे थे।
रात भर की लड़ाई के बाद हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं की दैनिक अखबारों ने भी खबरों प्रेषण के दौरान अपने हेडलाइनों में आतंकियों की शब्दावली का ही इस्तेमाल किया। कई अखबारों ने मुंबई पर फिदायीन हमला जैसा हेडलाइन हगाया। भाई यह फिदायीन क्या होता है। कम से कम एक बार इस शब्द के मतलब तो देख लिये होते। कम्मीर से निकलने वाले तमाम अखबारों और वहां पर काम करने वाले तमाम पत्रकारों को आतंकियों ने धमका रखा लै कि उनके लिए मुजाहिदीन और फिदायीन जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाये। अपनी शब्दावली वे जबरदस्ती लोगों के जुबान पर चढ़ा रहे है, और हमारे देश की प्रिंट मीडिया भी उन्हीं की शब्दावली ढोकर उनके मिशन को आगे बढ़ाने में लगी है। राष्ट्रीय अखबारों से इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है वे अपनी शब्दावली खुद गढ़े। यदि एसा करने की क्षमता नहीं है तो कम से कम उनकी शब्दावली का तो इस्तेमाल नही करे। बहरहाल जिस तरह से इनलोगों ने पेशेवराना अंदाज में मुंबई में पांच किलोमीटर के दायरे को वार जोन में तब्दील कर दिया, उसे लेकर चिंतित और निराश होने के बजाय की जरूरत नहीं है। चूंकि अभी लड़ाई चल रही है। हर किसी को जो जहां है उन्हें ध्वस्त करने के लिए अपनी पूरी उजा लगानी चाहिए। ताज और ओबराय को तो हमलोग बना लेंगे....लेकिन हमारे शहरों में खेली गई इस खून की होली का, जवाब ठंडे दिमाग से सि्रफ और सिफर् गेस्टापू ही हो सकता है। अपने नेशन को बचाने के लिए हमें भी उसी स्तर पर पेशेवर होना होगा...हो सके तो उनसे भी ज्यादा।
Thursday, 27 November 2008
मुंबई का वार जोन
...अबे साले कहां है
यदि संभव हो तो गेस्टापू बनाओ
Wednesday, 26 November 2008
लपटों में सबकुछ जलेगा--तेरा झूठ भी
कि देश को तुमने आजाद कराया,
हमने मान लिया,क्योंकि हम बच्चे थे।
हमारी खोपड़ी में दनादन कूड़ा उड़ेलेते रहे
और उसकी बदबू से उकता कर
जब भी हमने सवाल किया,
तुमने कहा, परीक्षाये पास करनी है तो पढ़ते जाओ,
और हम पढ़ते रहे, क्योंकि परीक्षाये पास करनी थी।
विज्ञान और गणित के सवाल तो ठीक थे,
लेकिन इतिहास के सवाल पर तुम हमेशा मुंह मोड़ते रहे,
और बाध्य करते रहे कि तुम्हारी सोच में ढलू
अच्छे और बुरे की पहचान तुम्हारी तराजू से करूं
कभी तुमने नहीं बताया, लेकिन अब समझ गया हूं
कि इतिहास पढ़ने और पढ़ाने की चीज नहीं है,
यह तो बनाने की चीज है।
मौजूदा सवालों से रू-ब-रू होकर
आज मैं तुमसे पूछता हूं----
देश के टूटते ज्योगरफी की झूठी गौरव गाथा तुने क्यो लिखी ?
क्यों नहीं बताया कि हमारी सीमाओंका
लगातार रेप होता रहा, कभी अंदर से तो कभी बाहर से ?
तुमने सच्चाई को समझा नहीं ?
या तुम्हारे अंदर सच्चाई को बताने का साहस नहीं था?
या फिर सोच समझकर अपनी नायिकी को हमारे उभर थोपते रहे ?
तुमने वतमान के साथ-साथ खुद को धोखा दिया,
अब तेरी झूठी किताबें और नहीं...!!!
तेरी झूठ की कब्र तो खोदनी है,
रेगते हुये जन्तुओं की तरह
इतिहास से तुझे बेदखल तो होना ही पड़ेगा.
सवाल तेरा और मेरा नहीं है,
सवाल है कोटि-कोटि जन के दिमाग
में चिन्गारी छिटकाने की
क्योंकि चिंगारी ही तो लपटे बनती हैं,
और मुझे यकीन है,
इन लपटों में सबकुछ जलेगा---तेरा झूठ भी।
मुंबई में नापतौल की घपलेबाजी
Monday, 24 November 2008
गोली मारो पोस्टर....झकझोरो मुझे...
...मैं सपना देख रहा हूं...हां, हां, मैं सपना देख रहा हूं...मुझे उठना चाहिए...कमबख्त नींद भी तो नलीं टूट रही है...लेकिन है यह सपना ही...तू कौन है?
तू मुझे नहीं पहचानता...मैं इंदल हूं...तेरा बचपन का दोस्त...और मेरे साथ अजुन है...
...और अजुन तुम...?
अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी और बीवी को भूख से मरते कैसे देखता...खेत-खलिहान और जानवर, सभी कुछ तो गिरवी रख दिये...दिल्ली गया, पंजाब गया ...हाड़तोड़ कर कमाने की कोशिश की...इसी चक्कर में शरीर भी जाता रहा...एक दिन शरीर पर किरासन का तेल उलझकर आग लगा ली....
...अब मेरे पास क्यों आये हो....?
यह बताने की गिद्दों की टोली आसमान में मडरा रही है....गिद्ध अपने बेटे और बेटियों की शादी रचाने की तैयारी में है....उन्हें पूरा यकीन है कि महाभोज का अवसर आ गया है....सियारों और कुत्तों के बीच यही चरचा है...धरती पर गिरने वाले इन्सानी खूनों का गंध उनके नथूनों से टकरा रहे हैं....
धूं-धूकर जलाता हुआ ऑफिस...हवाओं में सनसनाती हुई गोलियां...धांय, धांय...लोगों की खोपडि़यां उनके कंधे से निकलकर सड़कों पर गिर रहीं हैं...एक जनकवि चौराहे पर खड़ा होकर लोगों के बीच जोर-जोर अपनी कविता पढ़ रहा है...गोली मारो पोस्टर।
...इंकलाब जिंदाबाद, जिंदाबाद जिंदाबाद...
चौकड़ी...ठेलम ठेल...रैली पर रैला...
...सत्ता में आने के बाद आपका पहला कदम क्या होगा...?
भाड़ों के नाच गान में डूबा हुआ पूरा तंत्र...खैनी ठोकने वाहे अधिकारियों की फौज...और उनमें हुजूर का खैनी ठोकने के लिए लगा होड़...महिला अधिकारी की आवाज...भौजी चिंता ना करी, हम बानी ना।
जोड़तोड़, खेल पे खेल..कूदाफानी...हई पाटी से खीचों, हउ पाटी से खीचों...जयश्री राम, जयश्रीराम।
रोको इन्हें, फासीवादी है...गठबंधन करो, तालमेल करो, लेकिन रोको इन्हें...
...गठबंधन करो, तालमेल करो, लेकिन सत्ता में आयो......
...लो बन गई सरकार...अब मंत्री बनाओ संतुलन बैठाओ...
...हूले ले...हूले ले....हूले ले...निकल गया पांच साल...
...लोग जवाब मांग रहे हैं...
...फील गुड कराओ...
अमेरिका में इटली का माफिया डॉन कॉरलियोन.....गॉडफादर...लाइफ इज अलवेज ब्यूटीफूल।...
Sunday, 23 November 2008
लादेन की कविताई
इष्ट देव सांकृत्यायन
हाल ही मेँ मैने एक खबर पढी. आपने भी पढी होगी. महान क्रांतिकारी (जैसा कि वे मानते हैँ) ओसामा बिन लादेन की कविताओँ का एक संग्रह जल्दी ही आने वाला है. यह जानकर मुझे ताज्जुब तो बिलकुल नहीँ हुआ. लेकिन जैसा कि आप जानते ही हैँ, कविता का जन्म कल्पना से होता है. पहले कवि कल्पना करता है और फिर कविता लिखता है. इसके बाद कोई सुधी श्रोता उसे पढता है और फिर उसका भावार्थ समझने के लिए वह भी कल्पनाएँ करता है. तब जाकर कहीँ वह उसे समझता है. अपने ढंग से. मुक्तिबोध ने इसीलिए कविता को यथार्थ की फंतासी कहा है.
वैसे कबीर, तुलसी, रैदास जैसे छोटे-छोटे कवियोँ पर समझने के लिए कल्पना वाली शर्त कम ही लागू होती है. सिर्फ तब जब कोई 'ढोल गंवार.....' या 'पंडित बाद बदंते...' जैसी कविताओँ का अर्थ अपने हिसाब से निकालना चाह्ता है. वरना इन मामूली कवियोँ की मामूली कविताओ का अर्थ तो अपने-आप निकल आता है. और जैसा कि आप जानते ही है, नए ज़माने के काव्यशास्त्र के मुताबिक ऐसी रचनाएँ दो कौडी की होती है, जिनका मतलब कोई आसानी से समझ ले. लिहाजा इस उत्तर आधुनिक दौर के बडे कवि ऐसी कविताएँ नही लिखते जिन्हे कोई आसानी से समझ ले. वे ऐसी कविताएँ लिखते है जो सिर्फ आलोचको की समझ मे आती है. वैसी जैसी कि वे समझना चाहते है और समझते ही वे सम्बन्धित कवि को महान रचनाकार घोषित कर देते है.
रचना और रचनाधर्मिता की इसी महत्ता को देखते हुए हाल के वर्षो मे एक नया जुमला आया है. वह यह कि कविता को समझने के लिए कवि जैसी ही संवेदना और चेतना की ज़रूरत होती है. मतलब यह कि अगर आप कविता को नही समझते तो आपकी संवेदना और चेतना का होना भी खारिज.
बहरहाल, कविता का एक सुधी श्रोता और पाठक होने के नाते मैने लादेन साहब की भावी किताब मे आने वाली कविताओ को समझने के लिए खुद को तैयार करने के क्रम मे कल्पना की उडाने भरनी शुरू कर दी. पहली बात तो यह कि आखिर लादेन साहब की कविताओ को हम वादो के हिसाब से किस कोटि मे रखेंगे. विश्व कविता के क्षेत्र मे इधर रोमांसवाद से लेकर एब्सर्डवाद और पोस्टमाडर्नवाद तक आ और जा चुके है. तो क्या अब लादेन साहब के लिए हमे कोई और वाद तलाशना होगा? क्योंकि अब तक के उपलब्ध वादो के दायरे मे तो उनकी कविताए कही फिट बैठेगी नही. गौर से देखा जाए तो 'अहिंसा परमो धर्मः' की घोषणा करने वाले अधिकतर कवि जिन सियासी पार्टियो से जुडे रहे है, वे सिर्फ बातो मे ही अहिंसक रही है. बातो मे तो वे इतनी अहिंसक रही है कि बुद्ध भी शरमा जाए. काव्य ही नही, गद्य मे भी. भूल से भी उन्होने कभी हिंसा की बात नही की. रही बात व्यवहार की, तो उसका जिक्र नही ही किया जाए तो ठीक.
दूसरी तरफ, जो कवि सशस्त्र क्रांति की बाते करते रहे है, व्यवहार मे उनका क्रांति से कुल मतलब केवल विश्वविद्यालयो की पीठो पर जमने और अकादमियो के पेटो मे अपनी जगह बनाने तक सीमित रहा है. जबकि लादेन साहब ने पहले क्रांति (जैसा कि वे मानते है) की है, कविता वे अब लिख रहे है. तो अब कविता मे वह किसी क्रांति या किसी तरह के संघर्ष की बात करेंगे, इसकी उम्मीद कम ही है.
इसकी उम्मीद इसलिए भी बहुत ही कम है क्योंकि अगर शास्त्रकारो की बात मानी जाए तो कविता और कला दोनो एक ही कोटि की चीज़े है और कला के साथ बामियान मे वह जो बर्ताव कर चुके है वह जगजाहिर है. लादेन साहब से बहुत पहले एक बडे दार्शनिक कवियो और पागलो को एक ही कोटि मे रखते हुए यह घोषणा कर चुके है कि उनके रिपब्लिक मे इन दोनो के लिए कोई जगह नही होगी. वैसे दुनिया के सारे कवि चाहे वे किसी भी तरह के क्यो न रहे हो, सबके साथ एक बात ज़रूर रही है और वह यह कि उनकी घोषित विचारधाराए भले ही मनुष्यता के खिलाफ रही हो, पर कविताए उनकी भी कभी मनुष्यता के खिलाफ नही रही है.
कविता मे नए-नए प्रयोग हमेशा पसन्द किए जाते रहे है. चाहे वे कैसे भी क्यो न रहे हो. एब्सर्ड्वाद तक अपनी प्रयोगधर्मिता के नाते ही मान्य हुआ है. कहा भी जाता है - लीक छाँडि तीनो चले शायर सिंघ सपूत. तो लादेन साहब भी लीक तो छोडे ही होंगे. तो छोड कर वे क्या करेंगे? निश्चित रूप से कविता मे अब तक जो एक काम नही हुआ है, यानी मनुष्यता के विरोध का बस वही अब वह करेंगे. हो सकता है कि यह काम वह भी तमाम कवियो की तरह बदले हुए नाम से यानी कि उलटे ढंग से करे. मतलब यह कि उसे नाम मनुष्यतावाद का दे.
एक बात और बचती है उनके तखल्लुस की. जैसा कि आप जानते ही है, दुनिया भर के वीर-जवानो से शेर बनने का आह्वान करने वाले वीर रस के ज़्यादातर कवि हक़ीक़त मे चूहो से डरते है. यह अलग बात है कि सभी अपने तखल्लुस तडाम-भडाम टाइप का कुछ रखते रहे है. तो यही बात शायद लादेन साह्ब के साथ भी होने जा रही है. मुझे पक्का यक़ीन है कि वे अपना तखल्लुस रहमदिल जैसा कुछ रखेंगे और कविताए भी रहमदिली वाली ही लिखेंगे. तो आप भी तैयार हो जाइए लादेन साहब की रहमदिली वाली कविताए पढने के लिए. आमीन.
Saturday, 22 November 2008
बसंती जवान हो रही है
रिपोताज
मुंबई में काली हवाओं और टोटको का मायाजाल
एक रुपये की खबर
एक रुपये की खबर है। मुंबई में एयरटेल का 10 रुपये का प्री-पेड काड पर खुदड़ा बिक्रेता एक रुपया ज्यादा ज्यादा ले रहे हैं। यानि 10 रुपये का प्री-पेड काड 11 रुपये में बेचे जा रहे है। अब यह एक रूपये एयरटेल के तंत्र और बिचौलियों के बीच किस अनुपात में बट रहा है, इसका कोई लिखित रिकाड तो नहीं है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक यह एक रुपया का खेल करोड़ों के खेल में तब्दील हो गया है।
Friday, 21 November 2008
बोले तो बिंदास लाइफ है मुंबई का
Thursday, 20 November 2008
स्टाइललेस स्टाइल से भी आगे थे सत्यजीत रे
Saturday, 15 November 2008
ऑटर थ्योरी के ग्रामर पर गुरदत्त
फ्रेच न्यू वेव के संचालकों की तरह ही गुरुदत्त ने भी सेकेंड वल्ड वार के प्रभाव को करीब से देखा था। अलमोडा का उदय शंकर इंडियन कल्चर सेंटर 1944 में गुरुदत्त के सामने ही सेकेंड वल्ड वार के कारण बंद हुआ था। गुरुदत्त यहां पर 1941 से स्कॉलरशीप पर एक छात्र के रूप में रहे थे। बाद में मुंबई में बेरोजगारी के दौरान उन्होंने आत्मकथात्मक फिल्म प्यासा लिखी। इस फिल्म का वास्तविक नाम कशमकश था। फिल्मों की समीक्षा के लिए कुख्यात ट्रूफॉट को 1958 में जब कान फिल्म फेस्टिवल में घुसने नहीं दिया गया था, तो उसने 1959 में 400 बोल्ट्स नामक फिल्म बनाया था और कान फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म डायरेक्टर का अवाड झटक ले गया था। 400 बोल्ट भी आत्मकथात्मक फिल्म थी, गुरुदत्त के प्यासा की तरह। 400 बोल्ट में एक अटपटे किशोर की कहानी बयां की गई थी, जो उस समय की परिस्थियों में फिट नहीं बैठ रहा था, जबकि प्सासा में शायर युवक की कहानी थी,जिसे दुनियां ने नकार दिया था। अपनी फिल्मों पर पारंपरिक सौंदय के साथ जमीनी सच्चाई का इस्तेमाल करते हुये गुरुदत्त फ्रेच वेव मूवमेंट से मीलों आगे थे।
साहब बीवी और गुलाम का निदेशन लेखक अबरार अल्वी ने किया था। इस फिल्म पर भी गुरदत्त के व्यक्तित्व के स्पष्ट प्रभाव दिखाई देते हैं। एक फिल्म के पूरा होते ही गुरदत्त रुकते नहीं थे, बल्कि दूसरे फिल्म की तैयारी में जुट जाते थे। एक बार उन्होंने कहा था, लाइफ में यार क्या है। दो ही तो चीज है, कामयाबी और फैलियर। इन दोनों के बीच कुछ भी नहीं है।
फ्रेंच वेव की रियलिस्टिक गूंज उनके इन शब्दों में सुनाई देती है, देखों ना, मुझे डायरेक्टर बनना था, बन गया, एक्टर बनना था बन गया, पिक्चर अच्छे बनाने थे, अच्छे बने। पैसा है सबकुछ है, पर कुछ भी नही रहा। फ्रेच वेव मूवमेंट के दौरान ऑटर थ्योरी को स्थापित करने के लिए बाजिन और उसकी मंडली ने जीन रिनॉयर,जीन विगो,जॉन फॉड, अल्फ्रेड हिचकॉक और निकोलस रे की फिल्मों को आधार बनाया था, उनकी नजर उस समय भारतीय फिल्म के इस रियलिस्टिक फिल्मकार पर नहीं पड़ी थी। हालांकि समय के साथ गुरदत्त की फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान मिली है। टाइम पत्रिका ने प्यासा को 100 सदाबहार फिल्मों की सूची में रखा है।
Friday, 14 November 2008
बात भारतीय फिल्मों पर
पता नहीं किस व्यक्ति ने पहली बार देश में हिन्दी फिल्मों के लिए बॉलीवुड शब्द का इस्तेमाल किया और कैसे यह शब्द फिल्मी पत्रिकाओं और अखबारों से लेकर टीवी बालाओं के होठों पर आ गया। इस पर कभी बात में बात होगी, आज बात भारतीय फिल्मों पर। यूरोप और अमेरिका को बहुत दिनों तक पता ही नहीं था कि भारतीय फिल्मों में नाच गान का इस्तेमाल शानदार तरीके से किया गया था। उस दौर में दुनियां की अन्य फिल्में भारत की फिल्मों से इतर नहीं थी, लेकिन अन्य जगहों पर तकनीक के स्तर पर प्रयोग हो रहे थे, जबकि भारतीय फिल्मकार उन तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल करने की कला के अभ्यास में पारंगत थे। चाहे मूक फिल्मों का ही दौर क्यों न हो, उस समय भारत में बेहतरीन फिल्में बन रही थी।
Thursday, 13 November 2008
मेरा बच्चा मनमोहन की भाषा नहीं समझेगा
Tuesday, 11 November 2008
नए स्वर में आज की हिंदी कविता
हिन्दी जगत के प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह किताबघर की ओर से आई कवि ने कहा - कविता श्रृंखला की यह समीक्षा युवा रचनाधर्मी विज्ञान भूषण ने की है इकट्ठे दस किताबों पर यह समीक्षात्मक टिप्पणी लम्बी ज़रूर है , पर मेरा ख़याल है की इससे सरासर तौर पर भी होकर गुज़रना आपके लिए भी एक दिलचस्प अनुभव होगा :
हमारी भौतिकतावादी जीवन”ौली और आडंबरों के कपाट में स्वयं को संकुचित रखने की मनोवृत्ति ने हमारी संवेदनाओं को मिटाने का ऐसा कुचक्र रचा है जिससे बचकर निकलना लगभग असंभव सा दिखता है। आज के कठिन समय में आदमी के भीतर का ‘ आदमीपन’ ही कहीं गुम होता जा रहा।है. इससे भी बड़ी हतप्रभ करने वाली बात यह है कि हम अपने भीतर लगातार पिघलते जा रहे आदमीयत को मिटते हुए देख तो रहें हैं पर उसे बचाने के लिए कोई भी सार्थक प्रयास नहीं करते हैं या यद ऐसा कुछ करना ही नहीं चाहते हैं।ऐसे प्रतिकूल समय के ताप से झुलसते आम आदमी की हता”ा होती जा रही जिजीवि’ाा को संरक्षित रखते हुए संघर्’ा में बने रहने की क्षमता सिर्फ साहित्य ही प्रदान कर सकता है। कुछ समय पूर्व किताबघर प्रका”ान ने वर्तमान दौर के कुछ महत्वपूर्ण कवियों की चुनी हुई कविताओं की श्रंखला ‘ कवि ने कहा ’ का प्रका”ान कर इस क्षेत्र में फैल रही निस्तब्धता को दूर करने का सफल प्रयास किया है। प्रस्तुत काव्य श्रंखला के प्रका”ाक के द्वारा चयनित दस रचनाकारों में सम्मिलित एकमात्र कवयित्री ‘ अनामिका ’ का कवि तत्व “ो’ा नौ पुरु’ा कवियों के इस संगमन में भी सर्वथा अलग और वि”िा’ट नजर आता है। कहानियों , उपन्यासों , लेखों और आलोचनाओं के माध्यम से पिछले डेढ़ द”ाक से हिंदी साहित्य में नारी विमर्”ा के स्वर को तीक्ष्णता प्रदान करने वाली रचनाकारों में अनामिका का नाम अगzणी माना जा सकता है। गद्यात्मक रचनाओं में उनकी सघन वैचारिकता और प्रभावी भा’ाा “ौली से पूर्व परिचित पाठकवर्ग, प्रस्तुत काव्य संगzह की कविताओं के माध्यम से उनमें समाई गहरी और बहुअर्थी काव्यात्मकता को देखकर आ”चर्यचकित हो उठता है। बिहार की पृ’ठभूमि से ताल्लुक रखने वाली कवयित्री के भीतरी मन में अव“ाो’िात गँवई और कस्बाई संस्कृतियों का मिश्रित स्वरूप इन कविताओं के द्वारा एक बहुवर्णी रंगोली की तरह हमारे समक्ष प्रकट होता है। वे निर्जीव और अतिसामान्य बिंबों , प्रतीकों के सहारे स्त्रीत्व के स्वर को नई दि”ाा में मोड़कर उसे प्रभावी लोकराग का स्वरूप प्रदान कर देती है। समाज के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले वर्ग से संबंधित होने के बाद भी स्त्री होने के दं”ा को वे ”िाद्यत से महसूस कर, उसे इस तरह अभिव्यक्त करती हैं कि उनका दर्द समस्त नारी समाज की दारुणगाथा बनकर हमारे सामने उपस्थित हो जाता है। उनके संगzह की पहली ही कविता ‘ स्त्रियाँ ’ हमे”ाा से पुरु’ाों द्वारा हीन और उपेक्षित समझी जाने वाली नारी मन की अंधेरी वीथियों में कुछ तला”ा करती हुई नजर आती है। “ाब्दों के चयन के मामले में भी अनामिका स्वयं को किसी भी बने बनाए मानकों से प्रतिबंधित नहीं करती हैं । उनके लिए कविता का लक्ष्य और उसकी मारक क्षमता अधिक महत्वपूर्ण है, न कि भा’ाा या क्षेत्रीयता की लक्ष्मणरेखा का अनुपालन करना।‘ मरने की फुर्सत ’ कविता में स्त्री होने की मर्मान्तक पीड़ा को उन्होनंे नए ढंग से परिभा’िात किया है। इसके उलट ‘ तुलसी का झोला’ “ाीर्’ाक कविता स्त्री मन की अतल गहराइयों से टकराती है। इसकी प्रारंभिक पंक्तियों में पति द्वारा त्याग दिए जाने की कसमसाहट नजर आती है लेकिन कविता के अंतिम चरण में वह अधूरेपन का भाव मिट जाता है और वह स्वयं को पुरु’ाावलंबी सोच से मुक्त कर अपने लिए नया आका”ा तला”ाने की दि”ाा में अगzसर हो जाती है । अनामिका के द्वारा चयनित इन कविताओं से गुजरते हुए यह स्प’ट हो जाता है कि समस्याओं और वि’ामताओं को वे एक नए दृ’िटकोंण से देखती हैं। उनके इस दर्”ान में सदियों से दमित की जा रही स्त्री मन की कड़ियाँ खुलती सी नजर आती हैं। म्ंागले”ा डबराल की कविताओं का कैनवास इतना विस्तृत है कि , कई बार उनके लिए बहुआयामी “ाब्द का इस्तेमाल करना भी अधूरा और अपूर्ण सा लगने लगता है । अपनी कविताओं के माध्यम से वे आम आदमी के जीवन की उन विडंबनाओं की भी पड़ताल करते हैं जिन्हें खोजने का जोखिम उठाने से प्राय: हम सभी कतराते हैं। उनकी कविताओं का तेवर और उनसे उद~घाटित होने वाले अंतर्मन के गहरे अर्थ , हमें मुक्तिबोध और “ाम”ोर बहादुर सिंह की रचनात्मकता से जुड़ने का मार्ग प्र”ास्त कराती है। मंगले”ा ने स्वीकार किया है कि बाजारवाद और कट~टरता की मिलीभगत ने हमारे आत्मिक जीवन को, हमारे मनु’य होने को न’ट कर दिया है। ऐसी वि’ाम परिस्थिति में भी वे कविता से ही यह प्र”न पूछते हैं कि - ‘ तुम क्या कर सकती हो ? ’ उनके लिए कविता कोई धारदार हथियार नहीं जिसे लेकर वे अपने अस्तित्व के चारो ओर उग आई छद~म उपलब्धियों की झाड़ियों को काट देना चाहते हैं । बल्कि कविता तो उनकी सहचरी बनकर पग - पग पर, उन्हें प्रतिकूलताओं से जूझने की ताकत प्रदान करती है । कविता उनके लिए वह जीवन राग है जो दुर्बलतम क्षणों में भी अंतर्मन को झंकृत कर मिटती जा रही जिजीवि’ाा को संजीवनी प्रदान कर देती है-‘ कविता दिन भर थकान जैसी थी@ और रात में नींद की तरह@ सुबह पूछती हुई :क्या तुमने खाना खाया रात को ?’ प्रस्तुत संकलन में उनके द्वारा चयनित जिन कविताओं ने अपने विलक्षण अर्थबोध , गहन वैचारिकता और अद~भुत “ाब्द विन्यास के जरिए हमारे समक्ष एक नए रचनासंसार के कपाट खोल दिए हैं , उनमें ‘ ताना”ााह कहता है , सबसे अच्छी तारीख, ताकत की दुनिया, सोने से पहले’ को सम्मिलित किया जा सकता है। इसके साथ ही साथ कुछ कविताएं हमें संवेदनाओं के उस धरातल पर पहुँचा देती हैं जहाँ कवि और उसकी कविता अपने “ाब्दरथ पर सवार होकर कहीं विलुप्त हो जाते हैं और पाठक उससे उपजे बहुस्तरीय अर्थों को देखकर आ”चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पाता है। ‘दुख’ “ाीर्’ाक कविता में वे अपना परिचय देते हुए कहते हैं -‘मैं एक विरोधपत्र पर उनके हस्ताक्षर हैं जो अब नहीं हैं@ मैं सहेज कर रखता हूँ उनके नाम आने वाली चिट~ठियाँ@मैं">चिट~ठियाँ@मैं दुख हूँ@मुझमें">हूँ@मुझमें एक धीमी काँपती हुई रौ”ानी है।’ कवि होने का दर्द वे ‘ अधूरी कविता ’ में बयान करते हुए कहते हैं-‘ जो कविताएं लिख ली गयीं@उन्हें">गयीं@उन्हें लिखना आसान था@ अधूरी कविताओं को पूरा करना था कठिन ।’ इसी तरह एक स्त्री के वे”या में रूपान्तरण को पुरु’ा की नजर से देखते हुए उसकी पीड़ा को ‘काWलगर्ल’ कविता में व्यक्त किया है। इसी तर्ज पर ‘छुओ’ कविता में वे हर प्रकार के भैातिक संपर्क और रि”ते को निरर्थक घो’िात करते हुए कहते हैं - ‘छूने के लिए जरूरी नहीं कि कोई बिलकुल पास में बैठा हो@बहुत">हो@बहुत दूर से भी छूना संभव है।’ समीक्ष्य संगzह में वि’णु खरे द्वारा चयनित कविताओं को पढ़ते हुए यह आभास होता है कि जिन “ाब्दों को लेकर कवि ने इन कविताओं की रचना की है उनमें समय की क्रूरताओं से टकराने की भरपूर ताकत मौजूद है । यानी ये कविताएं उपदे”ा या नारेबाजी न बनकर आम आदमी की चेतना को नवीन Åर्जा से भर देती हैं। वि’णु खरे की कविताओं के केंदz में, प्राय: अतिसामान्य, गैरजरूरी और परिधि के बाहर रहने वाले लोगों को जगह मिल जाती है। इस नजरिए से ‘वृंदावन की विधवाएं ,लड़कियों के बाप’ और सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा, “ाीर्’ाक कविताओं को “ाामिल कर सकते हैं। यद्यपि इनकी लंबी कविताओं का सबसे चमत्कृत करने वाला तत्व यह है कि उन्हें हम जिस मानसिकता से पढ़ते है , उससे संबंधित बेहिसाब अर्थ हमारे सामंने प्रकट होने लगते हैं। यही वजह है कि उनकी कविताएं सामान्य पाठकों के बीच तो उतनी लोकप्रिय नहीं हो पाती लेकिन साहित्य को”ा की अमूल्य निधि बन जाती हैं। कहना चाहिए कि लगातार मिटते जा रहे जीवन मूल्यों को बचाने के लिए पि’णु खरे की कविता अपना सब कुछ दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटती। आज की कविता में वे स्वयं जीवन और रि”तों के अन्ंात वैविध्य के प्रति उत्सुकता देखना चाहते हैं । इसी लिए उनकी कविताओं में रि”तों में उलझी जिंदगी के विविध स्वर स्प’ट रूप में सुने जा सकते हैं।संभवत: इसीलिए वि’णु खरे के संबंध में आलोचक नंद कि”ाोर नवल ने कहीें लिखा है- ‘ इनकी कविताएं अधिकां”ा वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ जज्बे का इजहार नहीं करतीं, बल्कि अपने साथ सोच को लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्रण होता है और वे सपाट नहीं रह जाती।’ अपनी कविताओं के माघ्यम से व्यवस्था के प्रति गहरा विरोध दर्ज कराने वाले कवि लीलाधर जगूड़ी , अपने द्वारा ईजाद की गई व्यंग्यात्मक ¼मगर गंभीर ½ “ौली में वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक विदzूपता पर पूरी निर्ममता से चोट करते हैं। हिंदी कविता के क्षेत्र में वे एक ऐसे कवि के रूप में पहचाने जाते हैं जो अपनी बात पूरी तरह स्प’ट करने के लिए किसी प्रकार की “ााब्दिक कृपणता नहीं दिखाते, यानी वे ढेरों वाक्यों के सहारे एक बहुआयामी संसार की रचना करते हैं जहाँ पहुंचकर हमें वस्तुएं, समस्याएं, और स्वयं हम भी बिल्कुल नए से नजर आते हैं। दरअसल वे हमारे Åपर लदे दोहरेपन के तमाम आवरणों की चीरफाड़ करने से कभी नहीं हिचकते। लंबी कविताओं के जरिए अपनी पहचान स्थापित करने वाले लीलाधर जगूड़ी द्वारा चयनित इस श्रंखला ¼कवि ने कहा ½ में ‘ बलदेव खटिक ’ और ‘मंदिर लेन’ जैसी महत्वपूर्ण कविताओं का न होना पाठकों को निरा”ा करता है। लेकिन पुस्तक की भूमिका में ही उन्होने स्प’ट कर दिया है कि - ‘ अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृ’िट और संयम आव”यक है, जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परे”ाान किये रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएं ही मेरा सम्यक अभी’ट है ? “ाायद हां , “ाायद नहीं ।’ कहना न होगा वे स्वयं अपने इस चयन से पूरी तरह संतु’ट नहीं दिखते। इसके बावजूद उन्होने जिन कविताओं को इस संचयन में जगह दी है, वे भी अपनी मारक क्षमता के चलते कहीं से भी कमजोर नहीं नजर आती हैं। मानवीय अंतर्मन की गुत्थियों को सुलझाने की को”िा”ा हो या समय की खुरदरी सचाइयों को अपनी जुबान से बयां करने की जिद , किसी भी मानक पर उनकी कविता हता”ा नहीं होती। एक तरफ उनकी कविताओं में ‘ खाली होते जा रहे जंगलों में बढ़ते जंगलीपन’ के प्रति गहरी चिंता का भाव नजर आता है तो दूसरी तरफ बचाने की तमाम को”िा”ाों के बाद भी स्वयं को खो देने का दर्द भी साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है-‘ हमने सब कुछ खो दिया है अपना गांव , अपना झोला, अपना सिर।’ उदय प्रका”ा को वर्तमान हिंदी साहित्य में स”ाक्त कथाकार के रूप में जाना जाता है। जबकि सच ये है कि उनकी सृजनात्मक यात्रा कविता लिखने से ही प्रारंभ हुई। यानी वे स्वयं को मूल रूप से कवि ही मानते हैं। उदय प्रका”ा की नजर में कवि होना एक असामान्य घटना है। इसीलिए कवि होने के उनके अपने वि”िा’ट मानक हैं। जैसे - ‘कवि का “ारीर रात में चंदzमा की तरह चमकना चाहिए, अपने दुखों और निर्वासन में कैद होने के बावजूद उसकी निगाहें एक अपराजेय समzाट की तरह आका”ा की ओर लगी रहनी चाहिए , उसकी ”िाराओं में काल और संसार, दzव की तरह प्रवाहित होना चाहिए।’ जाहिर है उनके द्वारा लिखी गई कविताओं में इन सभी मानकों का यथासंभव पालन किया जाता है। एक और वि”िा’टता जो इनकी कविताओं में दिखती है वह है इनमें उपस्थित किस्सागोई का अंदाज। उदय की कविताओं को न तो पूरी तरह वि’ााक्त कहा जा सकता है और न ही उसे अमृत का प्याला माना जा सकता है। दरअसल उदय प्रका”ा की कविताओं का जन्म, बाहरी जगत की विडंबनाओं और उनके अंतर्मन में उपस्थित नैतिक मूल्यों के मंथन से होता है। इसलिए किसी एक मिजाज की कविता का तमगा लगाना उनकी गहन रचनात्मकता के साथ अन्याय होगा। जाहिर है उनकी कविताओं का मूल्यांकन करने के लिए बने बनाए या पूर्व निर्मित मानक अनुपयुक्त लगते हैं। कहना चाहिए की उनकी कविताएं अपनी समीक्षा के लिए सर्वथा नए मानकों की मांग करती हैं। किसी भी रचना और रचनाकार की यह सबसे बड़ी और वि”िा’ट उपलब्धि होती है जब उनके मूल्यांकन के लिए आलोचकों को नए प्रतिमान गढ़ने पड़ते हैं। प्रस्तुत संगzह कवि ने कहा में उनके द्वारा चयनित ‘ राज्यसत्ता , ताना”ााह की खोज और चौथा “ोर ’ जैसी कविताएं राजनीति के कुत्सित चेहरे पर से नकाब उतार फेंकती हैं। विभिन्न प्रकार के तंत्रात्मक संजाल में उलझा आम आदमी स्वयं को निरीह और बेचारा समझने के लिए विव”ा हो जाता है , जब उसे यह ज्ञात होता है कि उसके संरक्षक ही उसके उबसे बड़े भक्षक हैं । इसी व्यथा को स्वर देती कविता ‘ दो हाथियों की लड़ाई ’ में वे लिखते हैं कि -‘ दो हाथियों की लड़ाई में @ सबसे ज्यादा कुचली जाती है@ घास , जिसका@ हाथियों के समूचे कुनबे से @ कुछ भी लेना देना नही।’ एक स्त्री को अपने दैनिक जीवन में किस तरह के बाहरी संघर्’ा और कितने स्तरों पर अंतद्र्वंद से जूझना पड़ता है , इसका मार्मिक चित्र ‘ औरतें ’ “ाीर्’ाक कविता में उकेरने का प्रयास किया है। उदय की कविताओं की सबसे बड़ी वि”ो’ाता यह है कि वह बड़ी ही सहजता से आम आदमी के संघर्’ा से जुड़ जाती है। प्रस्तुत काव्य श्रंखला का प्रका”ान उस दौर में किया गया है जब यह दु’प्रचारित किया जा रहा है कि साहित्य ¼ और वि”ो’ा रूप से कविता ½ पढ़ने वालों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। कम से कम समय में बिना श्रम किए अधिक से अधिक बटोरने की मानसिकता और आपाधापी भरी हमारी जीवन”ैाली में साहित्य को एक गैरजरूरी तत्व बनाकर हा”िाए पर धकेला जा रहा है। इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि ‘ कवि ने कहा ’ श्रंखला के माध्यम से वर्तमान दौर के दस महत्वपूर्ण और चर्चित कवियों की चुनी हुई कविताओं के इस प्रका”ान ने जहाँ एक ओर यह प्रमाणित कर दिया है कि , किसी भी विधा में लिखे गए अच्छे साहित्य को अपने पाठक की तला”ा में भटकना नहीं पड़ता है बल्कि पाठकवर्ग स्वयं भी ऐसी रचनाओं का स्वागत करने के लिए तत्पर दिखता है। वहीं दूसरी ओर श्रंखला प्रका”ाक के इस साहसिक प्रयास ने अन्य दूसरे प्रका”ाकों केा भी भवि’य में इसी तरह के ‘ साहित्यिक जोखिम ’ उठाने के लिए प्रेरणासzोत का कार्य किया है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगा पाठक, साहित्यकार और साहित्य के लिए भी । इन सभी कवियों की भा’ाा “ैाली में कुछ भिन्नता को महसूस किया जा सकता है, चीजों और समस्याओं को देखने और महसूस करने का उनका दृ’िटकोंण भी अलग नजर आता है इसके बावजूद इन सभी रचनाकारों की कविताओं का सरोकार एकसमान है। परिस्थितियों की जटिलताओं से जूझते मनु’य के भीतर की मनु’यता को बचाने के लिए सभी एक पक्ष में खड़े दिखाई पड़ते हैं। इस प्रकार उपजा इन कवियों का समवेत स्वर हिन्दी काव्य धारा को नई दि”ाा देने में पूर्णत: समर्थ है , इसमें संदेह नहीं.
पुस्तक - कवि ने कहा (दस कवियों की चुनी हुई कविताएं, दस खंडों में)
मूल्य - 150 रु , प्रत्येक
प्रकाशक- किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली