Saturday, 29 November 2008

.....इससे कुछ भी कम राष्ट्रीय बेशर्मी है

मुंबई में समुद्र के रास्ते कितने लोग घुसे थे इस बात का तो अभी तक पता नहीं चल पाया है,लेकिन हथियार से खेलने वाले सभी शैतानों को ध्वस्त कर दिया गया है। हो सकता है कुछ शैतान बच निकले हो और किसी बिल में घुसे हो। हर पहलु को ध्यान में रखकर सरकारी तंत्र काम कर रहा है। बहुत जल्द मुंबई पटरी पर आ जाएगी। यहां की आबादी की जरूरते मुंबई को एक बार फिर से सक्रिय कर देंगी। फिर से इसमें गति और ताल आ जाएगा। लेकिन क्या अब हम आराम से यह सोच कर बैठ सकते हैं कि गुजरात, बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों का कोई शहर नहीं जलेगा या नहीं उड़ेगा?
आम आदमी रोजी-रोटी के चक्कर में किसी शहर के सीने पर किये गये बड़े से बड़े जख्म सबसे जल्दी भूलता है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले ब्रेकिंग खबरों की होड़ में मस्त हो जाते हैं, और तब तक मस्त रहते हैं जबतक दुबारा इस तरह की घटना किसी और शहर में नहीं घट जाती, नेता लोगों के सिर पर तो पूरा देश ही, क्या क्या याद रखेंगे ???? पढ़े-लिखे लोगों की अपनी सिरदर्दी है, कोई इस ऑफिस में काम कर रहा है, तो कई उस ऑफिस में। अपने बड़े अधिकारियों की फटकार से ही ये लोग भी सबकुछ भूल जाएंगे, और जो बचा-खुचा याद रहेगा वो इनकी बीवियों या तो चुम्मे लेकर या फिर लड़ कर भूला देंगी। हर राष्ट्रीय आपदा के बाद यही भारतीय चरित्र है।
यह कंप्लीट वार है, और इसे एक आतंकी हमला मानकर भूला देना बहुत बड़ी राष्ट्रीय बेशर्मी होगी। और हम से कोई भी इस बात का यकीन नहीं दिला सकता कि अगला निशाना कौन सा शहर होगा, लेकिन हमला होगा और जरूर होगा। ये कंट्री के हेरिटेज पर पर हमला है, जो वर्षों से जारी है और जारी रहेगा। वर्षों से हमारे हेरिटेज पर हमले होता आ रहे है,चाहे वो संसद हो या फिर मुंबई का ताज। यह एक ही कड़ी है। और इस कड़ी का तार लादेनवादियों से जुड़ा है। इस्लाम में फतवे जारी करने का रिवाज है। क्या इसलाम की कोई धारा इनके खिलाफ फतवे जारी करने को कहता है,यदि नहीं कहता है तो इसलाम में संशोधन की जरूरत है। इतना तो तय है कि यह हमला इस्लाम के नाम पर हुआ है। जो धारा जीवित लोगों को टारगेट बना रहा है, उसे मिट्टी में दफना देने की जरूरत है। भारत एक ग्लोबल वार में फंस चुका है, अपनी इच्छा के विरुद्ध। मुंबई घटना को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए।
हां गेस्टापू के बाद बच्चों को गब्बर की जरूरत नहीं पड़ेगी.....मां कहेंगी....बेटा शो जा.......भारत बुद्ध का देश है, गेस्टापू हमारी रक्षा कर रही है....बड़ा होकर तूभी गेस्टापू बनना...ताकि तेरे बच्चे चैन से सो सके, तेरी तरह।
यह वार है और चौतरफा वार है। बस पहचानने की जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे चर्चिल ने हिटलर के ऑपरेशन 16 को पहचाना था, और उसके ऑपरेशन को ध्वस्त करने लिए काउंटर ऑपरेशन लॉयन बनाया था। उन लोगों का टारगेट क्या है ? कभी लंदन को उड़ाते हैं, कभी ट्वीन टावर उड़ाते हैं, कभी जर्मनी को उड़ाते हैं,कभी मुंबई को। ये कौन लोग हैं और क्या चाहते हैं ? इसे आईटेंटीफाई किया जाना चाहिए। और इसके खिलाफ व्यवस्थित तरीके से इंटरनेशनली इनवोल्व होना चाहिए। चीन और जापन में इस तरह के हमले क्यों नहीं हो रहे हैं ??
एनएसजी के मेजर उन्नीकृष्ण को सच्ची श्रद्धांजलि इनलोगों के विनाश से ही होगी। इससे कुछ भी कम राष्ट्रीय बेशर्मी है
....तलाशों और खत्म करो....मोसाद एक बार इस सिद्धांत को प्रैक्टकल रूप दे चुका है।
लोहा लोहे को काटती है, और इसका इस्तेमाल सभ्यता को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। इसमें एक तरफ वो लोग है जो इन्सान को मारते हैं, और दूसरे तरफ वो लोग है जो सभ्यता को बचाने के लिए एसे लोगों को मारते हैं। दुनिया एक नये सेटअप में आ रहा है,एक नेशन के तौर पर भारत को विहैव करना ही होगा,अंदर और बाहर दोनों।
लादेनवादियों को भारत के मस्जिदों से फतवा जारी करके इस्लाम से बेदखल करना ज्यादा अच्छा होगा। क्या मसजिदों से इमाम एसी फतवायें जारी करेंगे ?

झलकियां मुंबई की

श्रद्धांजलि के लिए होड़
मुंबई की सड़कों पर हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे को श्रद्धांजलि देने की होड़ राजनीतिक पार्टियों में होड़ लगी हुई है। भाजपा और समाजवादी पार्टी कुछ ज्यादा तेजी दिखा रहे हैं। कल रात पूरे मुंबई में इन दोनों दलों की ओर से हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे के बड़े-बड़े पोस्टर सड़कों के किनारे लगाये गये। इन पोस्टरों पर मोटे-मोटे अक्षरों में उन्हें श्रद्धांजलि दिया गया है।
शराबखानों में सन्नाटा
मुंबई के शराब खानों में सन्नाटा है। अच्छे-अच्छे शराबियों की फटी पड़ी है। जीभ चटचटाने के बावजूद वे लोग शराबखानों की ओर मुंह नहीं कर रहे हैं। शराब बिक्री 70 फीसदी की कमी आई है। हार्ड कोर दारूबाज ही रिस्क लेकर दारू की दुकानों पर पहुंच रहे है। बारों में तो भूत रो रहा है। तीन दिनों से बारों में चहल-पहल पूरी तरह से ठप्प है। अंधेरी के आर्दश बार में कभी रात भर दारूबाजों की भीड़ लगी रहती थी, खूब बोतले खाली होती थी। अब यह पूरी तरह से ठप्प है।
फुटपाथ की बिक्री ठप्प
चर्चगेट के पास सड़क के किनारे दुकान लगाने वाले लोगों का धंधा पूरी तरह से बंद है। यहां पर करीब दो किलोमीटर तक छोटे-छोटे दुकानदार बैठा करते थे। यहां पर मौसम के मुताबिक हर तरह के कपड़े सस्ते दामों में बेचे जाते थे। मुंबई की आम आबादी यहीं से अपने लिए जरूरी समानों की खरीददारी करती थी। फिलहाल यह कारोबार पूरी तरह से बंद है। यहां पर प्रत्येक दिन लाखों का व्यापार होता था।
खाली खाली सा आजाद मैदान
चर्च गेट के सामने का आजाद मैदान,जो हमेशा लोगों से भरा रहता था,पूरी तरह से खाली है। इस मैदान में एक बार में 20-25 टीमें क्रिकेट खेला करती थी। अब इस मैदान में एक आदमी भी नहीं दिखाई दे रहा है। इस मैदान के अगल-बगल छोटे-मोटे खोमचे वाले भी रोज का धंधा किया करते थे। उनका धंधा भी पूरी तरह से चौपट हो गया है। चर्च गेट के पास सिघनम कॉलेज, केसी कॉलेज, एक महिला कालेज है। ये सब के सब बंद पड़े हैं। इन कालेजों की वजह से यहां पर लड़के और लड़कियों की भीड़ अक्सर होती थी। अब सब गधे के सिर से सिंघ की तरह गायब है।
मुंबई हाईकोर्ट में पसरा सन्नाटा
मुंबई के हाईकोर्ट में भी पूरी तरह से सन्नाटा छाया हुआ है। वकीलों,पेशकारों और मुवक्किलों से भरा रहने वाला यह कोर्ट पूरी तरह से खाली है।
नरीमन प्वाइंट की सभी आफिसे बंद
नरीमन प्वाइंट की सड़कों पर रफ्तार से दौड़ने वाली गाडियों की संख्या पूरी तरह से कम गई है। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा है। समुद्री लहरे अभी भी समुद्र के किनारे बने ढलानों से टकरा रही है, लेकिन इनका संगीत सुनने वाला कोई नहीं है। यहां पर अक्सर युगल प्रेमियों का जोड़े मस्ती में एक दूसरे से लिपटे हुये दिखाई देते थे, लेकिन अब यहां पूरी तरह से विराना पसरा हुआ है। समुद्री हवा के लिए सुबह और शाम को यहां पर टहलने फिरने वाले बुजुर्ग भी घरों में दुबके हुये हैं। यह मुंबई का पारसीबाहुल इराका है, और व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण है। लगभग सभी प्रमुख कंपनियों के दफ्तर इसी इलाके में है, जो फिलहाल पूरी तरह से बंद हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस इलाके में विभिन्न कंपनियों के करीब 25 हजार ऑफिस हैं। यदि कोलाब से नरीमन प्वाइंट तक लिया जाये तो इनकी संख्या 2 लाख से भी अधिक हो जाएगी। सब के सब बंद है। ओबराय होटल तो पूरी तरह से तहस नहस हो चुका है।
खाली दौड़ रही हैं बेस्ट की बसे
मुंबई की सड़कों पर खचाखच भरी रहने वाली बेस्ट की बसे खाली ढनढना रही हैं। कभी बस स्टापों पर भीड़ लगी रहती थी, अब इकादुका सवारी ही बस स्टापों पर नजर आ रहे हैं।

टक्कर लादेनवादियों से है

कुत्ते की तरह पिटाई के बाद अजमल आमिर कमाल ने बहुत कुछ उगला है। यह फरीदकोट का रहने वाला है, जो पाकिस्तान के मुलतान में पड़ता है। इसने बताया है कि पाकिस्तान में 40 लोगों को दो राउंड में ट्रेनिंग दिया गया और मुंबई शहर पर हमला करने की तैयारी पिछले एक साल से चल रही थी। इसके लिए खासतौर पर पाकिस्तान और बांग्लादेश से लोगों को भरती किया गया था। मबई की गहराई से थाह ली गई थी, ये लोग यहां पर कई राउंड आये भी थे।
जिस समय ये सारी योजनाएं बनाई जा रही थी, लगता है उस समय रॉ के अधिकारी घास छील रहे थे। यदि समय रहते वे दूर दराज के मुल्कों में इस तरह की योजनाओं का पता नहीं चला सकते तो उनपर सरकारी पैसा बहाना फिजूल की बात है। रॉ को भंग कर देना बेहतर होगा। एक के बाद एक जिस तरह से भारत के बड़े-बड़े शहरों को निशाना बनाया जा रहा है,उसे देखकर कहा जा सकता है कि रॉ के काम करने के तरीके में कहीं कुछ गड़बड़ी है।
किसी जमाने में हाथों में बैंक के फाइल लेकर इधर से उधर घूमने वाले भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कल आपात बैठक में बैठे हुये थे, भारत की इंटेलिजेंसिया के अधिकारियों के साथ। काफी माथापच्ची करने के बाद किसी लाल बुझ्झकड़ टाइप के सलाहकार ने इन्हें (हालांकि प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह की स्थिति एक सलाहकार से भी बद्तर है। ) स्पेशल कमांडो फोस के गठन की बात कही, ताकि इस तरह के हमलों से तुरंत निपटा जा सके।
खाताबही देखने वाले प्रधानमंत्री की खोपड़ी में यह बात क्यों नहीं घुस रही है कि अब सवाल इस तरह के हमला के बाद की स्थितियों से निपटने का नहीं है, बल्कि इस तरह के हमलों को रोकने का है। कंट्री को डिफेंस की मुद्रा में लेना एक मनोवै्ज्ञानिक भूल है। जरूरत है एक एसे मैकेनिज्म बनाने की जो इस तरह की योजना बनाने वालों के बीच में अपनी पैठ बनाये, और उन्हें लपेट मारे। अपनी गोलपोस्ट को बचाने से अच्छा है गेंद को सामने के गोलपोस्ट में धकेलते रहे, यानि अटैक इज द बेस्ट पोलिसी। जरूरत है आतंकियों को डिफेन्सिव करने का और यह अटैक से संभव हो सकता है।
खाताबही देखने वाले प्रधानमंत्री के बस की बात नहीं है कि वह इतना दूर तक सोच सके। उनकी औकात मदारी वाले बंदर से जादा नहीं है,फर्क सिर्फ इतना है कि उनके गले में रस्सी नहीं है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, दसों इंद्रियों से अपने आका की बात वह खूब समझते है। और नहीं भी समझते है तो अपनी मुंडी का इस्तेमाल वह वैसे ही करते हैं मानों सब समझ रहे हैं।
रूस की खुफिया एजेंसी इस मामले में अलकायदा की ओर इशारा कर रही है। यदि इस पर यकीन करे तो इसके तार सीधे लादेन और उसके गिरोह से जुड़ता है। और इसलामिक पद्धति पर उसका युद्ध का नमूना पूरी दुनिया देख चुका है। ट्वीन टॉवर की लपलपाती लुई लपटों को याद कर लीजिये, और फिर ताज से निकलते लपटों को। टक्कर लादेनवादियों से है। और इनकी चौतरफा पिटाई होनी चाहिए।
नरीमन हाउस में पांच यहूदियो को शैतानों ने मार डाला है, मोसाद वाले भारत आने के लिए छटापटा रहे हैं। मोसद वालों को इस तरह के मामलों से निपटने का अच्छा खासा अनुभव है। इस मुद्दे पर इनके साथ लम्बे समय का घठजोड़ किया जा सकता है, बिना कागज पत्तर के। एफबीआई की एक टीम भी भारत आ रही है। एफबीआई वाले अपने तरीके से इस मामले को समझेंगे, इनसे भारत को कुछ खास लाभ नहीं होने वाला है। औपचारिकता पूरी करके इनको भेज देना चाहिए। एशिया में -खासकर मिडिल ईस्ट में-एफबीआई का खुद का नेटवर्क कमजोर है। अफगानिस्तान और इराक पर हमला के बाद मिडल ईस्ट में इन्हें अपने लिए काम करने वाले एजेंटे नहीं मिल रहे हैं।
मुंबई पर लादेनवादियों शैतानों की एक टुकड़ी ने हमला किया है, यह मान लेना कि और हमले नहीं होंगे, अपने आप को धोखे में रखना है। इससे निपटने के लिए हर लेवल पर कमर कसनी होगी। खाताबही वाले प्रधानमंत्री से कुछ भी उम्मीद करना बेकार है। मैरी अंतोनियोत को डेमोक्रेटिक तरीके से चूल्हे चौकों में लगाने की जरूरत है।

Friday, 28 November 2008

मांद में घुसकर सफाया करने की जरूरत

भारत में आतंकवाद का फन कुचलने के लिए एक लंबी स्ट्रेटजी की जरूरत है,मुंबई पर हुआ संगठित हमला से यही सबक सीखने की जरूरत है। भारतीय नेशन स्टेट को आधुनिक तरीके से काम करना होगा, हर लिहाज से,और पूरी तरह से संगठित होकर। इसके लिए गेस्टापू जैसी कोई चीज चाहिए ही चाहिए। यह कई लेवल पर काम करेगा और बिंदास अंदाज में।
अभी-अभी मुंबई के एक रहने वाले एक यंग लड़के ने संगठिततौर पर ऊंचे लेवर पर काम करने का एक तरीका कुछ इस तरह से बताया।
उसी के शब्दों में...
वे लोग अफजल को मांग रहे हैं...उन्हें दे दो। लेकिन नकली अफजल...साइंस बहुत आगे निकल गया है...चेहरे और हुलिया चुटकियों में बदल जाएंगे...उनके बीच अपने आदमी घुसाने की जरूरत है, जो उनको लीड करे। इसके पहले कांधार में भी जब उन्होंने अपने लोग मांगे थे एसा ही करना चाहिए था...थोड़ा रिस्क है, लेकिन मुझे लगता है कि भारत के नौजवान इस रिस्क को इन्जॉव करेंगे। भारत के नक्शे पर जो कश्मीर दिख रहा है उसकी आधी से अधिक जमीन तो उधर घुसी पड़ी है...पूरे पर कब्जा करने की जरूरत है....वो साले कुछ नहीं कर पाएंगे...एक बार में सूपड़ा साफ हो जाएगा....दुनिया की एसे ही फटी पड़ी है...कोई टांग नहीं अडाएगा...सब साले अपने आप को बचाने में लगे हुये है...चीन को समझा देने की जरूरत है...भारत आपना नक्शा वापस लेने जा रहा है...अपने आप को दूर ही रखो..वे लोग वाउं टाउं माउं बोलेंगे...तो इधर से हमलोग भी वाउं टाउं माउं कर के ठोक देंगे....मामला खलास। यहां तो कुछ भी करने से पहले ऑडर लो...और ऑडर देने वाले पांच साल ऑडर लेने में ही लगा देते हैं...एसे कहीं सिस्टम चलता है....
यह लड़का उत्साह में था, बकवास ही सही, लेकिन अच्छा बकवास कर रहा था। गेस्टापू जैसी चीज की यह एक बानगी सो सकती है...इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ हो सकता है...उनके मांद में घुसकर उनका सफाया किया जा सकता है....गोस्टापू न सही मोसाद जैसा कोई चीज तो बनाया ही जा सकता है...मोसदा भी न सही, अपने चाणक्य ने खुफियागिरी का जो सिस्टम दिया है उसे तो अपनाया ही जा सकता है...विष कन्या से सुपर कंसेप्ट क्या हो सकता है....? कितना पेशेवराना अंदाज था विष कन्या कंसेप्ट का। होने को बहुत कुछ हो सकता है, बस जरूरत है सही दिशा में सोचने की। इन संगठित हमलावरों से पेशेवर अंदाज में ही निपटा जा सकता है....
मुंबई पर भावुक स्टोरियां और विचार पढ़ने से उबकाई आ रही है। जरूरत है जमीन के दो फीट नीचे और आसमान के दो फीट ऊपर से सोचने की....स्ट्रेटजी के तहत, पेशेवर अंदाज में। नहीं तो मुंबई जैसे और भी मंजर देखने को मिल सकते हैं।

राष्ट्रीय मीडिया को वार जोन की तमीज नहीं

समुद्री सुरक्षा को भेदते हुये मुंबई टारगेट को बहुत ही पेशेवराना तरीके से अंजाम दिया गया है। इनकी मंशा चाहे जो भी रही हो, लेकिन हमला का यह अंदाज एक स्पष्ट रणनीति की ओर संकेत कराता है। इनके पास से एक सीडी में बंद मुंबई शहर का पूरा खाका मौजूद था और इनके पास से बरामद राशन पानी से स्पष्ट हो जाता है कि ये लोग फील्ड में अधिक से अधिक समय तक टीक कर हंगामा मचाने के इरादे से लैस थे। इनका एक्शन एरिया पांच किलोमीटर के अंतर था, हालांकि इनके एक्शन एरिया को समेटने के लिए एटीएस ने शानदार तरीके से काम किया। ये लोग एक साथ कई टारगेट को हिट कर रहे थे।
ताज और ओबराय में ए ग्रेट के सिटीजन ही जाते हैं और यहां पर विदेशी आगंतुको का भी भरमार रहता है। यदि ताज से निकलने वाले एक बंदे की बात माने तो ये लोग ये लोग अमेरिकी पासपो्रट धारियों को पकड़ने पर ज्यादा जोर दे रहे थे। वीटी रेल्वे स्टेशन पर इनलोगों ने आम आदमी को टारगेट पर लिया। कोलाबा में उतरने के बाद ये लोग कई टुकडि़यों में बंट गये थे। करकरे,आम्टे और कालस्कर इनके अभियान में इन्हें बोनस के रूप में मिले। अपने इस अभियान के प्रारंभिक दौर में इन्होंने भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बेवकूफियों का भी खूब फायदा उठाया। वारजोन के करीब कैमरा लेकर डटे हुये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों ने अपने कैमरे का मुंह खोलकर ताज और ओबराय के अंदर बैठे इन लौंडों को बाहर की स्थिति से अवगत कराते रहे। टीवी पर चैनल बदलते हुये ये लौंडे बाहर चलने वाली एटीएस की गतिविधियों को देख और समझ रहे थे जबकि एटीएस वाले उस वक्त अपने कमांडर की हत्या के बाद अपने आप को ऑगेनाइज करने की कोशिश कर रहे थे।
ये लौंडे सीमा पार से भी लगातार कम्युनिकेशन में थे और वहां बैठे लोग भी भारत की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कृपा से वार जोन की गतिधियों पर नजर रखते हुये ताज और ओबराय के अंदर बैठे लौडों को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने के लिए हांक रहे थे। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को वार जोन की रपट करने की तमीज नहीं है। चूंकि वार जोन एक शहरी इलाका था,इस लिहाज से चौगुनी सतकता की स्वाभाविक मांग थी। बाद में एटीएस वालों के कहने पर मीडियावालों को भेजे में बात घुसी, जबकि यह पहले ही घुस जानी चाहिए थी। तब तक काफी नुकसान हो गया था। ताज और ओबराय के अंदर बैठे लौंडे मोबाइल फोन से टीवी वालों को धड़ाधड़ फोन करके अपनी बाते रख रहे थे और टीवी वाले यंत्रवत अनजाने में उनकी बातों को बिना कट के लोगों तक कम्युनिकेट कर रहे थे और तरह से उनके मिशन को आगे बढ़ा रहे थे।
रात भर की लड़ाई के बाद हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं की दैनिक अखबारों ने भी खबरों प्रेषण के दौरान अपने हेडलाइनों में आतंकियों की शब्दावली का ही इस्तेमाल किया। कई अखबारों ने मुंबई पर फिदायीन हमला जैसा हेडलाइन हगाया। भाई यह फिदायीन क्या होता है। कम से कम एक बार इस शब्द के मतलब तो देख लिये होते। कम्मीर से निकलने वाले तमाम अखबारों और वहां पर काम करने वाले तमाम पत्रकारों को आतंकियों ने धमका रखा लै कि उनके लिए मुजाहिदीन और फिदायीन जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाये। अपनी शब्दावली वे जबरदस्ती लोगों के जुबान पर चढ़ा रहे है, और हमारे देश की प्रिंट मीडिया भी उन्हीं की शब्दावली ढोकर उनके मिशन को आगे बढ़ाने में लगी है। राष्ट्रीय अखबारों से इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है वे अपनी शब्दावली खुद गढ़े। यदि एसा करने की क्षमता नहीं है तो कम से कम उनकी शब्दावली का तो इस्तेमाल नही करे। बहरहाल जिस तरह से इनलोगों ने पेशेवराना अंदाज में मुंबई में पांच किलोमीटर के दायरे को वार जोन में तब्दील कर दिया, उसे लेकर चिंतित और निराश होने के बजाय की जरूरत नहीं है। चूंकि अभी लड़ाई चल रही है। हर किसी को जो जहां है उन्हें ध्वस्त करने के लिए अपनी पूरी उजा लगानी चाहिए। ताज और ओबराय को तो हमलोग बना लेंगे....लेकिन हमारे शहरों में खेली गई इस खून की होली का, जवाब ठंडे दिमाग से सि्रफ और सिफर् गेस्टापू ही हो सकता है। अपने नेशन को बचाने के लिए हमें भी उसी स्तर पर पेशेवर होना होगा...हो सके तो उनसे भी ज्यादा।

Thursday, 27 November 2008

मुंबई का वार जोन

1.
मुंबई उड़ गई
...अबे साले कहां है
... ....क्या हुआ ? ....
...तेरी मां की...जो पूछ रहा हूं, वो बता....
..साले होश में रह, नहीं तो घुसेड़ दूंगा...
...बेटा मुंबई उड़ गई है....
..हुआ क्या... ..
...तेरी मां की...बेटा मुंबई उड़ गई है,और मझे रिपो्रट चाहिये..और हां कुछ..चल बात में बाद होती है...दीपक के कुछ कहने के पहले ही, उधर से फोन की लाईन कट गई। -
--------------------
2.
--साला, अखबार का सारा स्टॉक की खलास है। रात भर की अफरातफरी के बाद का कुछ आलम यह था। ठसाठस भरी रहने वाली बसे खाली खालीदौड़ रही थीं। ओशिवारा बस डिपों में बसों की कतार लगी हुई थी। रातभर की गतिविधियों के बाद मुंबई की सड़कों पर दीपक चलता जा रहा था। बदलते दृश्यों के बीच दीपक की आंखों के सामने रात की घटनाएं तेजी से तैर रही थी।
3.
....बहन की भूत, कहां पहुंचा,...
...पता नहीं......साले बार जोन में घुस,.....
.लेकिन ये है किधर... .
..बहन की भूत,वहां तू बैठा है...
दीपक के कुछ कहने के पहले ही, उधर से फोन की लाईन एक बार फिर कट गई।............
4.
....अबे साले कहां है.....
...दारू पी रहा हूं.....
...कहां.....
.दारू खाना में....
...निकल वहां से,वार जोन खोज में घुस.....
.वार जोन, ई का होता है...लड़ाई किधर हो रही है.....
...मुंबई में...
..आधा दाड़ू बचा हुआ है......
...गटक और निकल..
फोन पर बकबकाने के बाद दीपक आगे बढ़ता जा रहा था....

यदि संभव हो तो गेस्टापू बनाओ

सडे़-गले हुये एक बर्बर समाज के बीच एक खूबसूरत नौजवान बड़ा होता है, अपने चाचा के धंधे में हाथ बटाते हुये तिजारत की भाषा सीखता है। बाद में एक अमीर विधवा का कारोबार बड़ी मेहनत और लगन से संभालता है। वह अमीर विधवा उसके ऊपर फिदा होती है। उसके साथ शादी करने के बाद उसे दिन प्रति दिन के जीवन की जरुरतों से मुक्ति मिल जाती है।
अब वह अपने अगल बगल के परिवेश को पुरी नंगई में देखता है और आंखे बंद कर सोचता है...बस सोंचता ही जाता है, सोंचता ही जाता है....घंटो, दिनो.. महीनों--वर्षों। लोगों के विकृत जीवन उसकी बंद आंखों में घूमते हैं..बार-बार, लगातार। वह हैलूसिनेशन की स्थिति में आ जाता है...उसे अपने अगल-बगल अनजान सी आवाज सुनाई देती है। पहली बार इस आवाज को सुनकर वह डरता है...अपनी पत्नी को बताता है...उसकी पत्नी उसकी बातों में यकीन करती है और उसे समझाती है इस आवाज को वह लगातार सुने...और समझने की कोशिश करे। बस इसी आवाजा के सहारे वह पैंगम्बर का रूप अख्तियार करता है।
उसके दिमाग में समाज को एक धागे में बांधने का प्रारुप तैयार होता है...उसको अमली जामा पहनाने के लिए उसे तलवार का सहारा लेना पड़ता है...क्योंकि उसे यकीन है कि उसके अगल-बगल बर्बता में डूबे हुये लोग उसकी बात नहीं सूनेंगे। अपनी सोंच को धरती पर उतारने के लिए वह हथियार बंद लोगों की एक फौज तैयार करता है...उनके दिमाग में एकता और समानता की बात कूट-कूट कर भरता है और साथ ही यह भी बताता है कि यह एकता सिर्फ और सिर्फ तलवार से हासिल की जा सकती है। उसके फौज देखते ही देखते धरती के बहुत बड़े भू-भाग को अपने अधिकार में ले लेते हैं और समय के साथ हैलूसिनेशन की अवस्था में कहे गये उसके शब्द एक जिंदा धर्मग्रन्थ का रूप अख्तियार करता है।
पृथ्वी छोड़ने के पहले वह घोषणा करता है कि वह अंतिम बंदा है, जिसके साथ ईश्वर ने अपने रसुल के माध्यम से संवाद स्थापित किया है। अब इन्सान को राह दिखाने वाला कोई नहीं आएगा...और इसी के साथ एक बहुत बड़ी आबादी के अक्ल पर हमेशा के लिए पट्टी बांध देता है। अन्य सभ्यताओं के साथ उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था कई धाराओं में बहती है....आज मुंबई शहर में जो कुछ हुआ है, वह इन्हीं धाराओं में से एक है।
मुंबई के रंगमंच पर अभी-अभी जो दृश्य देखने को मिल रहे हैं, एक अनवरत जारी नाटक के हैं,जिसका क्लामेक्स अपने आप को अंतिम पैंगम्बर घोषित करने वाला नौजवान हैलूसिनेशन की स्थिति में बहुत पहले लिख चुका है। इस नाटक के दायरे में कोई एक देश या सीमा नहीं, बल्कि दुनिया पूरी आबादी आती है...इस नाटक को तबतक चलना है, जबतक पूरी दुनिया उसके हैलूसिनेशन के सामने सिर नहीं झुका देती...इस धारा की सीधी सी फिलॉसफी है या तो सिर झुकाओ या फिर सिर कटाओ।
सभ्यताएं एक दूसरे से टकराते हुये ही आगे बढ़ती हैं...पृथ्वी पर इनसान की कहानी सभ्यताओं के टकराव की कहानी है। नेशन-स्टेट्स की आधुनिक अवधारणा सभ्यताओं के बीच के इस टकराव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दुनिया किसी एक वाद या एक धर्म से चलेगी इससे बड़ी मूर्खता की बात और कुछ नहीं हो सकती। सवाल है इस तरह के वाद पर चलकर आमलोगों को टारगेट बनाने वालों को रोकने का। दुनियाभर के विभिन्न नेशन स्टेट्स अपने-अपने तरीके से इस तरह की खोपड़ी वालों को रोकने के लिए मैकेनिज्म बनाने और उसे सफाई के साथ चलाने में जुटे हुये हैं।
भारतीय नेशन स्टेटे की अपनी खास विशेषताएं और जटिलताएं हैं, इन्हें ध्यान में रखकर ही एक मजबूत मैकेनिज्म को बनाया जा सकता है। लेकिन इस नेशन स्टेट में रहने वाले सभी लोगों को यह स्वीकार करना ही होगा कि अंतिम पैंगम्बर की हैलुसिनेएशन का कट्टरवादी असर इस सभ्यता के वाहकों के एक हिस्से पर मजबूती से है।
सलमान रुश्दी जब सैटेनिक वर्सेज लिखता है तो भारतीय नेशन स्टेट उसकी किताब पर प्रतिबंध लगता है, क्यों ? जबकि यह किताब अमेरिका और ब्रिटेन में धड़ल्ले बिकती है। अंतिम पैंगंबर के हैलूसिनेशन पर तर्क के तलवार तो चलाने ही होंगे।
जो धर्म, चाहे वह कोई भी क्यो न हो, यदि अपने विस्तार के लिए इनसानी खून मांगता है, उसे कब्र में घूसेड़ दिया जाना चाहिए, और घूसेड़ दिया जाएगा। ईश्वर के नाम पर इनसान का खून बहाना,ईश्वर को गाली देना है। यदि कोई ईश्वर और उसके व्यवस्था को बनाने और बनाये रखने के नाम पर खून बहाने की बात करता है, तो एसे लोगों को उसी के हथियार से निपटने की जरूरत है। मुंबई न तो शुरुआत है, न ही मध्य और न ही अंत। अनवरत जारी एक मानवविरोओधी धारा का एक व्यवहारिक पक्ष है। इस धारा को रोकने के लिए वैचारिक स्तर पर खुद पैगंबर के मानवतावादी अनुयायियों को आगे आना होगा, और व्यवाहारिक स्तर पर भारतीय नेशन स्टेट को एक मजबूत मैकेनिज्म बनानी होगी....यदि संभव हो तो गेस्टापू की तरह।

Wednesday, 26 November 2008

लपटों में सबकुछ जलेगा--तेरा झूठ भी

तुमने हमे स्कूलों में पढ़ाया
कि देश को तुमने आजाद कराया,
हमने मान लिया,क्योंकि हम बच्चे थे।

हमारी खोपड़ी में दनादन कूड़ा उड़ेलेते रहे
और उसकी बदबू से उकता कर
जब भी हमने सवाल किया,
तुमने कहा, परीक्षाये पास करनी है तो पढ़ते जाओ,
और हम पढ़ते रहे, क्योंकि परीक्षाये पास करनी थी।


विज्ञान और गणित के सवाल तो ठीक थे,
लेकिन इतिहास के सवाल पर तुम हमेशा मुंह मोड़ते रहे,
और बाध्य करते रहे कि तुम्हारी सोच में ढलू
अच्छे और बुरे की पहचान तुम्हारी तराजू से करूं

कभी तुमने नहीं बताया, लेकिन अब समझ गया हूं
कि इतिहास पढ़ने और पढ़ाने की चीज नहीं है,
यह तो बनाने की चीज है।

मौजूदा सवालों से रू-ब-रू होकर
आज मैं तुमसे पूछता हूं----
देश के टूटते ज्योगरफी की झूठी गौरव गाथा तुने क्यो लिखी ?
क्यों नहीं बताया कि हमारी सीमाओंका
लगातार रेप होता रहा, कभी अंदर से तो कभी बाहर से ?
तुमने सच्चाई को समझा नहीं ?
या तुम्हारे अंदर सच्चाई को बताने का साहस नहीं था?
या फिर सोच समझकर अपनी नायिकी को हमारे उभर थोपते रहे ?

तुमने वतमान के साथ-साथ खुद को धोखा दिया,
अब तेरी झूठी किताबें और नहीं...!!!
तेरी झूठ की कब्र तो खोदनी है,
रेगते हुये जन्तुओं की तरह
इतिहास से तुझे बेदखल तो होना ही पड़ेगा.

सवाल तेरा और मेरा नहीं है,
सवाल है कोटि-कोटि जन के दिमाग
में चिन्गारी छिटकाने की
क्योंकि चिंगारी ही तो लपटे बनती हैं,
और मुझे यकीन है,
इन लपटों में सबकुछ जलेगा---तेरा झूठ भी।

मुंबई में नापतौल की घपलेबाजी

मुंबई के किराना दुकानों में नापतौल के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक तराजुओं में मामूली सी घपलेबाजी है, लेकिन इससे दुकानदारों को अच्छा खासा लाभ हो रहा है। दुकानदार सामानों के नापतौल में 15 से 20 ग्राम का बट्टा मार रहे हैं। चावाल,दाल और गेहू जैसे खाद्य सामग्री पर इनके द्वारा मारे गये बट्टे को तो कोई खास असर नहीं पड़ रहा है, लेकिन जीरा,लाल मिरच, इलायची, दालचीनी, गोलकी, काजू, किसमिस आदि पर ये लोग 15-20 ग्राम का बट्टा मारकर अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं,चूंकि इन सामानों का वजन कम होता है और कीमत ज्यादा।
नापतौल की व्यवस्था पर नजर रखने वाले अधिकारी भी इस बात से अच्छी तरह अवगत हैं कि दुकानदारों ने अपने इलेक्ट्रॉनिक नापतौल की मशीनों गति बढ़ा रखी है। लेकिन दुकानदार इनकी भी जेबे गरम करते रहते हैं, इसलिए ये लोग अपनी इस उपरी कमाई को बंद करना नहीं चाहते हैं। इसके अलावा दुकानदारों से इन्हें कम कीमत पर अपने घरों के लिए महीनवारी सामान भी मिल जाते है।
मीट और मूरगों के दुकानों में इस्तेमाल किये जाने वाले बाटों और तराजुओं में भी 50 से 100 ग्राम के बीच डंडीबाजी चल रही है। ये लोग पैसे चोखे लेकर सामान कम दे रहे हैं। इस मामले में शिकायत करने पर आगे बढ़ो की बात कहकर ग्राहकों का अपमान करने से भी बाज नहीं आते हैं। यहां पर मछली के कई बाजार तो बिन नापजोख के ही चल रहे हैं। आप मछली पसंद कीजिये और उसकी कीमत के मोलभाव में जुट जाइये। एक मछली की कीमत वो 200 सौ से 300 सौ रुपये बताएंगे। यदि मोलभाव में आप माहिर हैं तो यह मछली आपको 50 से 100 रुपये के बीच आपको मिल जाएगी। यह पूरी तरह से आपके मोलभाव के गुण पर निभर करता है।
बड़े-बड़े मॉलों में नापतौल को लेकर तो कोई खास गड़बड़ी नहीं है, लेकिन आद्य-पदाथो को छोड़कर कीचन से संबंधित अन्य सामानों के दाम बहुत ही अधिक है। हालांकि ये सामान आपको ब्रांड का सुकून जरूर देते हैं। वैसे मुंबई की लोयर और मिडिल क्लास आबादी इन मॉलों से दूर ही रहती है। ये लोग मुंबई के गली-कूचों से ही किराना के सामान खरीदने में यकीन रखते हैं। मॉलों में घुसने में ये लोग हिचकते हैं। मुंबई के मिठाई की दुकानों में भी नाम तौल की इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का मीटर फास्ट है।

Monday, 24 November 2008

गोली मारो पोस्टर....झकझोरो मुझे...

लोगों के चेहरे और घटनायें आपस मे गुंथकर तेजी से बदलते हैं, बिना किसी लयताल के।....यह तो मेरी छोटी सी बेटी है...यह मर रही है, लेकिन क्यों ..नहीं नहीं...मैं इसे मरने नहीं दूंगा..अरे यह तो मरी हुई है...इसका तो शरीर ही नहीं है...यह तो छाया है ।
वह क्या है, धूल भरी आंधी...यह तो वही महिला है, जिसके पति को एक पागल भीड़ ने मार दिया था...क्या हुआ था...ओह, अपने काम से लौट रहा था...कितनी निदयता से मारा था लोगों ने.
...रथ दौड़ा था-कसम राम की खाते है, हम मंदिर वहीं बनाएंगे...रथ के बाद खून की लहर...यह क्या बाबरी ढांचा एक बार फिर ढहढहा कर गिर रहा है...साथ में आरक्षण की हवा...भूरा बाल साफ करो...100 में शोषित नब्बे है, नब्बे भाग हमारा है...जो हमसे टकराएगा चूर-चूर हो जाएगा...
...मैं सपना देख रहा हूं...हां, हां, मैं सपना देख रहा हूं...मुझे उठना चाहिए...कमबख्त नींद भी तो नलीं टूट रही है...लेकिन है यह सपना ही...तू कौन है?
तू मुझे नहीं पहचानता...मैं इंदल हूं...तेरा बचपन का दोस्त...और मेरे साथ अजुन है...
लेकिन तूम दोनों तो मर गये थे ?
...हां...मर गया था...मुझे अपनी बेटी की शादी करनी थी...सारा खेत बेच डाला...फिर भी पैसों का जुगाड़ हुआ नहीं हुआ...मरता नहीं तो क्या करता, सल्फास की गोलियां खा ली थी..पेट में बहुत मरोड़ उठ रहे थे, जीने के लिए तरस रहा था, लेकिन सांस टूट गई
...और अजुन तुम...?
अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी और बीवी को भूख से मरते कैसे देखता...खेत-खलिहान और जानवर, सभी कुछ तो गिरवी रख दिये...दिल्ली गया, पंजाब गया ...हाड़तोड़ कर कमाने की कोशिश की...इसी चक्कर में शरीर भी जाता रहा...एक दिन शरीर पर किरासन का तेल उलझकर आग लगा ली....
...अब मेरे पास क्यों आये हो....?
यह बताने की गिद्दों की टोली आसमान में मडरा रही है....गिद्ध अपने बेटे और बेटियों की शादी रचाने की तैयारी में है....उन्हें पूरा यकीन है कि महाभोज का अवसर आ गया है....सियारों और कुत्तों के बीच यही चरचा है...धरती पर गिरने वाले इन्सानी खूनों का गंध उनके नथूनों से टकरा रहे हैं....
....हाय हाय,हाय हाय ...गईया बछड़वा हाय-हाय...
धूं-धूकर जलाता हुआ ऑफिस...हवाओं में सनसनाती हुई गोलियां...धांय, धांय...लोगों की खोपडि़यां उनके कंधे से निकलकर सड़कों पर गिर रहीं हैं...एक जनकवि चौराहे पर खड़ा होकर लोगों के बीच जोर-जोर अपनी कविता पढ़ रहा है...गोली मारो पोस्टर।
हाथों में डंडे लहराते हुये सड़कों पर ठप-ठप कर दौड़ती हुई भारी-भरकम बूटें...
...इंकलाब जिंदाबाद, जिंदाबाद जिंदाबाद...
चौकड़ी...ठेलम ठेल...रैली पर रैला...
...सत्ता में आने के बाद आपका पहला कदम क्या होगा...?
शरमाई सी, सकुचाई सी कठपुतली..लगाम किसी और के हाथ में...
...संपूण क्रांति गईल तेल लेवे...पहीले हमर मेहरारू के सत्ता में आवे दे...
...पक्की बात है सरकार...न खाता न बही, रउआ जे कहब वही सही...रउआ लम्हर नेता बानी...
भाड़ों के नाच गान में डूबा हुआ पूरा तंत्र...खैनी ठोकने वाहे अधिकारियों की फौज...और उनमें हुजूर का खैनी ठोकने के लिए लगा होड़...महिला अधिकारी की आवाज...भौजी चिंता ना करी, हम बानी ना।
जोड़तोड़, खेल पे खेल..कूदाफानी...हई पाटी से खीचों, हउ पाटी से खीचों...जयश्री राम, जयश्रीराम।
रोको इन्हें, फासीवादी है...गठबंधन करो, तालमेल करो, लेकिन रोको इन्हें...
...गठबंधन करो, तालमेल करो, लेकिन सत्ता में आयो......
हूजर, तीनों मुद्दा आड़े आ रहे हैं...लोग तैयार नहीं हो रहे.....
...हटाओ मुद्दे को कन्वेनर बनायो..कन्वे करेगा...सत्ता जरूरी है वाद नहीं...वाद सत्ता में आने का माध्यम है...
...लो बन गई सरकार...अब मंत्री बनाओ संतुलन बैठाओ...
...हूले ले...हूले ले....हूले ले...निकल गया पांच साल...
...लोग जवाब मांग रहे हैं...
...फील गुड कराओ...
अमेरिका में इटली का माफिया डॉन कॉरलियोन.....गॉडफादर...लाइफ इज अलवेज ब्यूटीफूल।...
नहीं, नहीं...मैं सपने देख रहा हूं...कोई मुझे जगाओ...झकझोरो मुझे...।

Sunday, 23 November 2008

लादेन की कविताई

 

इष्ट देव सांकृत्यायन

हाल ही मेँ मैने एक खबर पढी. आपने भी पढी होगी. महान क्रांतिकारी (जैसा कि वे मानते हैँ) ओसामा बिन लादेन की कविताओँ का एक संग्रह जल्दी ही आने वाला है. यह जानकर मुझे ताज्जुब तो बिलकुल नहीँ हुआ. लेकिन जैसा कि आप जानते ही हैँ, कविता का जन्म कल्पना से होता है. पहले कवि कल्पना करता है और फिर कविता लिखता है. इसके बाद कोई सुधी श्रोता उसे पढता है और फिर उसका भावार्थ समझने के लिए वह भी कल्पनाएँ करता है. तब जाकर कहीँ वह उसे समझता है. अपने ढंग से. मुक्तिबोध ने इसीलिए कविता को यथार्थ की फंतासी कहा है.

वैसे कबीर, तुलसी, रैदास जैसे छोटे-छोटे कवियोँ पर समझने के लिए कल्पना वाली शर्त कम ही लागू होती है. सिर्फ तब जब कोई 'ढोल गंवार.....' या 'पंडित बाद बदंते...' जैसी कविताओँ का अर्थ अपने हिसाब से निकालना चाह्ता है. वरना इन मामूली कवियोँ की मामूली कविताओ का अर्थ तो अपने-आप निकल आता है. और जैसा कि आप जानते ही है, नए ज़माने के काव्यशास्त्र के मुताबिक ऐसी रचनाएँ दो कौडी की होती है, जिनका मतलब कोई आसानी से समझ ले. लिहाजा इस उत्तर आधुनिक दौर के बडे कवि ऐसी कविताएँ नही लिखते जिन्हे कोई आसानी से समझ ले. वे ऐसी कविताएँ लिखते है जो सिर्फ आलोचको की समझ मे आती है. वैसी जैसी कि वे समझना चाहते है और समझते ही वे सम्बन्धित कवि को महान रचनाकार घोषित कर देते है.

रचना और रचनाधर्मिता की इसी महत्ता को देखते हुए हाल के वर्षो मे एक नया जुमला आया है. वह यह कि कविता को समझने के लिए कवि जैसी ही संवेदना और चेतना की ज़रूरत होती है. मतलब यह कि अगर आप कविता को नही समझते तो आपकी संवेदना और चेतना का होना भी खारिज.

बहरहाल, कविता का एक सुधी श्रोता और पाठक होने के नाते मैने लादेन साहब की भावी किताब मे आने वाली कविताओ को समझने के लिए खुद को तैयार करने के क्रम मे कल्पना की उडाने भरनी शुरू कर दी. पहली बात तो यह कि आखिर लादेन साहब की कविताओ को हम वादो के हिसाब से किस कोटि मे रखेंगे. विश्व कविता के क्षेत्र मे इधर रोमांसवाद से लेकर एब्सर्डवाद और पोस्टमाडर्नवाद तक आ और जा चुके है. तो क्या अब लादेन साहब के लिए हमे कोई और वाद तलाशना होगा? क्योंकि अब तक के उपलब्ध वादो के दायरे मे तो उनकी कविताए कही फिट बैठेगी नही. गौर से देखा जाए तो 'अहिंसा परमो धर्मः' की घोषणा करने वाले अधिकतर कवि जिन सियासी पार्टियो से जुडे रहे है, वे सिर्फ बातो मे ही अहिंसक रही है. बातो मे तो वे इतनी अहिंसक रही है कि बुद्ध भी शरमा जाए. काव्य ही नही, गद्य मे भी. भूल से भी उन्होने कभी हिंसा की बात नही की. रही बात व्यवहार की, तो उसका जिक्र नही ही किया जाए तो ठीक.

दूसरी तरफ, जो कवि सशस्त्र क्रांति की बाते करते रहे है, व्यवहार मे उनका क्रांति से कुल मतलब केवल विश्वविद्यालयो की पीठो पर जमने और अकादमियो के पेटो मे अपनी जगह बनाने तक सीमित रहा है. जबकि लादेन साहब ने पहले क्रांति (जैसा कि वे मानते है) की है, कविता वे अब लिख रहे है. तो अब कविता मे वह किसी क्रांति या किसी तरह के संघर्ष की बात करेंगे, इसकी उम्मीद कम ही है.

इसकी उम्मीद इसलिए भी बहुत ही कम है क्योंकि अगर शास्त्रकारो की बात मानी जाए तो कविता और कला दोनो एक ही कोटि की चीज़े है और कला के साथ बामियान मे वह जो बर्ताव कर चुके है वह जगजाहिर है. लादेन साहब से बहुत पहले एक बडे दार्शनिक कवियो और पागलो को एक ही कोटि मे रखते हुए यह घोषणा कर चुके है कि उनके रिपब्लिक मे इन दोनो के लिए कोई जगह नही होगी. वैसे दुनिया के सारे कवि चाहे वे किसी भी तरह के क्यो न रहे हो, सबके साथ एक बात ज़रूर रही है और वह यह कि उनकी घोषित विचारधाराए भले ही मनुष्यता के खिलाफ रही हो, पर कविताए उनकी भी कभी मनुष्यता के खिलाफ नही रही है.

कविता मे नए-नए प्रयोग हमेशा पसन्द किए जाते रहे है. चाहे वे कैसे भी क्यो न रहे हो. एब्सर्ड्वाद तक अपनी प्रयोगधर्मिता के नाते ही मान्य हुआ है. कहा भी जाता है - लीक छाँडि तीनो चले शायर सिंघ सपूत. तो लादेन साहब भी लीक तो छोडे ही होंगे. तो छोड कर वे क्या करेंगे? निश्चित रूप से कविता मे अब तक जो एक काम नही हुआ है, यानी मनुष्यता के विरोध का बस वही अब वह करेंगे. हो सकता है कि यह काम वह भी तमाम कवियो की तरह बदले हुए नाम से यानी कि उलटे ढंग से करे. मतलब यह कि उसे नाम मनुष्यतावाद का दे.

एक बात और बचती है उनके तखल्लुस की. जैसा कि आप जानते ही है, दुनिया भर के वीर-जवानो से शेर बनने का आह्वान करने वाले वीर रस के ज़्यादातर कवि हक़ीक़त मे चूहो से डरते है. यह अलग बात है कि सभी अपने तखल्लुस तडाम-भडाम टाइप का कुछ रखते रहे है. तो यही बात शायद लादेन साह्ब के साथ भी होने जा रही है. मुझे पक्का यक़ीन है कि वे अपना तखल्लुस रहमदिल जैसा कुछ रखेंगे और कविताए भी रहमदिली वाली ही लिखेंगे. तो आप भी तैयार हो जाइए लादेन साहब की रहमदिली वाली कविताए पढने के लिए. आमीन.

Saturday, 22 November 2008

बसंती जवान हो रही है


रिपोताज
बसंती जवान हो रही है, उसके अंग फूटने लगे हैं और स्कूल की किताबों को छोड़कर ए गनपत चल दारू ला पर पर कमर लचकाने का निराला अभ्यास करने लगी है। करे भी क्यों नहीं, उसे धंधे में जो आना है, और अब धंधे का गुर सीखने का उसका उमर हो चला है।
उसकी नानी ने उसके नाक में नथिया डाल दी है, इस नथिये को उतारने की अच्छी-खासी कीमत वह उसे सेठ से वसुलेगी,जो पहली बार बार इसके साथ हम बिस्तर होगा। उसकी नानी को सबसे अधिक रकम सुलेखा के समय मिला था, उसे उम्मीद है कि बसंती सुलेखा के रिकाड को तोड़ देगी। और तोड़ेगी क्यों नहीं, देखो तो कैसे खिल रही है।
यह खानदानी धंधा है जिसपर दुनिया की आथिक मंदी का मार कभी नहीं पड़ने वाला।
बसंती अपने नानी की तरह गुटखा खाती है, घंटों आइने के सामने खड़ी होकर अपने सीने पर आ रहे उभार को देखती है, और खुद पर फिदा होती है। कच्ची उम्र की कसक उसके आंखों में देखी जा सकती है। गाली निकालने में तो उसने अपने नानी को भी मीलों पीछे छोड़ दिया है, तेरी मां की साले....अबे चुतिये तुझे दिखाई नहीं देता...तेरी बहन की बारात निकाल दूंगा...उसके होठों पर हमेशा बजते रहते हैं। जबरदस्त निकलेगी।
मुंबई में बार-बालाओं पर प्रतिबंध के बाद बसंती की बड़ी बहन कम्मो दुबई निकल गई है और अभी उसी की कमाई पर पूरा घर चल रहा है। तीन को जूते मारकर भगाने के बाद उसकी मां ने चौथा आदमी रख छोड़ा है। चाम की दलाली करने के साथ-साथ घर में नौकरों की तरह काम करता है, शाम को उसे गोस्त और दाड़ू मिल जाते हैं। कभी कभार उसकी लतम जुत्तम भी हो जाती है, जिसे वह माइंड नहीं करता, मुंबई में एसा ठिकाना मिलता कहां है ? और बसंती की मां से उसकी एक बेटी भी है, जिसे पढ़ाने लिखाने पर वह ध्यान दे रहा है। वह नहीं चाहता कि उसकी बेटी कम्मो और बसंती की तरह इसी धधे में उतरे, हालांकि उसे पता है इस घर में होगा वही जो बसंती की नानी चाहेगी। वह अपने खानदानी धंधे से कभी मुंह मोड़ने वाली नहीं है, तभी तो बसंती को तैयार करने पर पूरा ध्यान दे रही है।
कम्मो जब दुबई से आती है तो उसके मोबाइल फोन पर बहुत सारे मैसेज आते है। डालिंग रात में जब भी बिस्तर पर अकेला लेटता हूं तो तेरी बहुत याद आती है...यार तू तो धोखेबाज निकली, तेरी याद में तड़प रहा हूं और तेरा पता नहीं...पिछले कई दिनों से तबीयत खराब है, एक फकीर के पास गया था, उसने कहा किसी पापिन को एसएमएस कर, नजर उतर जाएगी, अब चैन महसूस कर रहा हूं। इन मैसजों को पढ़ने की काबिलियत कम्मो में नहीं है। बसंती फिर भी स्कूल गई है, लेकिन कम्मो ने तो कभी स्कूल का दरवाजा तक नहीं देखा।
इन मैसेजो को पढ़वाने के लिए कम्मो के कहने पर बसंती सामने की खोली में रह रहे फिल्म लाइन के छोकरों की ओर भागती है, जो इन मैसजों को पढ़ने के साथ-साथ बसंती में पूरा रस लेते हैं। इन छोकरों को अपने फूटते अंगों की गरमी का अहसास कराने में बसंती को मानसिक सुकून मिलता है। ये छोकरे अपनी भाषा में कहते हैं कि साली फुदफुदा रही है, लेकिन आटे में नहीं आएगी।
मौका मिलने पर बसंती दारू गटकने से भी बाज नहीं आती, दारू का चस्का उसे लग गया है। एक बार में ही पूरा गिलास गटक जाती है। इस गली में रहनेवाली धंधेबाज औरतों के बच्चों की वह अघोषित नेता है। टीनू, टप्पर, रुमकी, झुमकी उसे मॉडल के रूप में देखते है और उनमें उसके हाव-भाव का अनुकरण करने की होड़ लगी रहती है।
दरदे डिस्को पर जिस तरह से वह थिरकती है उसे देखकर इस गली की थकेली रंडियों की भी सांसे रुक जाती है। वो कहती है, ये लड़की तो इस धंधे में बहुत आगे जाएगी...बड़ो-बड़ो का कान काटेगी। थकेली रंडियो की बयानबाजी पर उसकी नानी हौले से मुस्कराकर गुटका का पॉच फाड़कर एक बार में ही पूरा मसाला अपने मुंह में घुसेड़ लेती है। अपने कुनबे की इस नगीना पर उसे गर्ऱव है। बसंती की नथिया उतारने के कई ऑफर उसके पास आ रहे हैं, लेकिन उसे पता है सब्र का फल मीठा होता है।

मुंबई में काली हवाओं और टोटको का मायाजाल

मुंबई में काली हवाओं और टोटको का भी खूब मायाजाल है। नीचले तबके की बहुत बड़ी आबादी को ये गिरफ्त में लिये हुये। आधी रात को एक महिला अपने कमरे में चिल्लाने लगती है, मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा, बहुत दिन के बाद तू मेरी गिरफ्त में आई है। उसके पति की फट कर हाथ में जाती है। शोर मचाकर वह अगल-बगल के लोगों को एकत्र करता है, लेकिन वह महिला काबू ने नहीं आती, मरदाना अंदाज में लगातार चिल्लाती जाती है, तुने मुझे बहुत तरसाया है, आज तुझे कोई नहीं बचा सकता। यह नाटक रात भर चलता है और सुबह उसका पति उस महिला को किसी फकीर के पास ले जाता है। फकीर मोटा माल एठकर उसकी झाड़फूंक करता है। टूटी हुई हालत में वह अपने घर में आती है और बेसुध पड़ जाती है। झाड़फूंक का यह क्रम एक सप्ताह तक चलता रहता है।
शंकर जी के बसहा बैल को लेकर चंदनधारी लोगों के झूंड भी यहां गली-चौराहों में दर-दर भटकते हुये मिल जाएंगे। लोगों के अंदर साइकोलॉजिकल भय पैदा करके उनसे माल खींचना इन्हें खूब आता है। अपनी डफली-डमरू के साथ ये लोग कहीं भी घूस जाते हैं और कुछ न कुछ लेकर ही निकलते हैं। बड़ी चालाकी से लोगों के हाथों में ये लोग तावीज और भभूति पकड़ा कर दो-चार सौ खींच ले जाएंगे।
मरे हुये लोगों से मिलाने वाले तांत्रिकों का धंधा भी यहां खूब फल-फूल रहा है। सड़क किनारे दीवारों पर इससे संबंधित पोस्टर खूब देखने को मिलते हैं। इन्हें बहुत ही आकरषक शब्दों में तैयार किया जाता है, मरे हुये लोगों की आत्मा से मिलाने की गारंटी के साथ।
फिल्म लाइन में भी ऊंचे से लेकर नीचले स्तर पर खूब टोटकेबाजी है। फिल्मों के मुहरत से लेकर रिलीजिंग तक टोटके का खेल हर स्तर पर चलता रहता है। गुरचरण जी अपने टोटके के बल पर फिल्मी दुनिया के लोगों से खूब माल खींच रहे हैं। शाम को लोखंडवाला के अपने फ्लैट में यह दरबार लगाते हैं और रुहानी शक्तियों के सहारे सब का भला करने का दावा करते हैं। अब कितने लोगों का भला हो रहा है यह तो नहीं पता, लेकिन महंगी सिगरेट धूंकते हुये, महंगी गाडि़यों पर इन्हें चलते हुये देखा जा सकता है।
टोटेकेबाजी की सबसे अधिक शिकार मुंबई की बीमार बस्तियां हैं, जहां दवा-दारू के साथ-साथ जीवन की मौलिक आवश्यकताओं का अभाव है। किसी तहर की शारीरिक या मानसिक कष्ट होने की स्थिति में इन बीमार बस्तियों के लोग डॉक्टरों के बजाय पीरो-फकीरों के पास जाना ज्याद पसंद करते है।

एक रुपये की खबर


एक रुपये की खबर है। मुंबई में एयरटेल का 10 रुपये का प्री-पेड काड पर खुदड़ा बिक्रेता एक रुपया ज्यादा ज्यादा ले रहे हैं। यानि 10 रुपये का प्री-पेड काड 11 रुपये में बेचे जा रहे है। अब यह एक रूपये एयरटेल के तंत्र और बिचौलियों के बीच किस अनुपात में बट रहा है, इसका कोई लिखित रिकाड तो नहीं है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक यह एक रुपया का खेल करोड़ों के खेल में तब्दील हो गया है।
महानगरीय आबादी में मोबाईल फोन हर तबके की जरूरत बन चुकी है। गरीबी रेखा पर चलने वाले(यह गरीबी रेखा का कंसेप्ट हमेशा से कन्फ्युजिंग रहा है।)या इस रेखा के नीचे बसर करने वाले लोगों की अरथ व्यवस्था पर इस एक रुपये की कालाबाजारी का सीधा मार पड़ रहा है। ये लोग अक्सर अपने मोबाईल में 10 रुपये के प्री-पेड काड का इस्तेमाल करते हैं।
एयरटेल के 10 रुपये की प्री-पेड पर एक रुपया अतिरिक्त कमाने के लिए एयटेल के तंत्र से जुड़े आला अधिकारियों और खुदड़ा बिक्रेताओं के बीच गहरी सांठ-गांठ हुई है। पहले बहुत सलीके से 10 रुपये के प्री-पेड काड को मारकेट से गायब किया गया। इसकी स्कारसिटी बताई गई। कुछ दिन के बाद इसे 11 रुपये में बेचा जाने लगा।
आथिक मंदी के कारण लोगों की क्रयशक्ति कम हो गई है। 10 रुपये का यह प्री-पेड काड उन्हें सहजता से दूर-दराज के लोगों से जोड़ता है। इसकी खूब बिक्री होती है। एयरटेल के इस प्री-पेड काड की बिक्री से संबंधित कोई डाटा तो उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन कुल गणित अरबो-खरबों का है। लोग इस 10 रुपये के काड के लिए बड़ी सहजता से 11 रुपये दे रहे हैं।
खुदड़ा बिक्रताओं का कहना है कि इस एक रुपये में से 50 पैसे उन्हें एयरटेल के संचालकों को अंदरखाते देने पड़ रहे हैं। कहीं यह ग्लोबलाजेशन का साइड इफेक्ट तो नहीं है। बहरहाल मामला जो हो, कालाबाजारी का यह खेल मुंबई में खुल कर खेला जा रहा है। चुंकि एयरटेल की कालाबाजारी का यह प्रयोग देश की आथिक राजधानी में सफल हो रहा है, इसलिए निसंदेह इसका इस्तेमाल देश के अन्य हिस्सों में भी किया जाएगा।

Friday, 21 November 2008

बोले तो बिंदास लाइफ है मुंबई का

बोले तो बिंदास लाइफ है मुंबई का,सबकुछ चकाचक। सड़ेले नाले के ऊपर झुग्गियों की कतार और उस कतार के दरबे में जानवरों की तरह ठूंसे हुये लोग, हर किसी को अपनी पेट की जुगाड़ खुद करनी पड़ती है। सुबह उठकर कोकिल बच्चों के झुंड के साथ कचड़े के पास जाकर यूज्ड कॉन्डमों को लोहे की छड़ से अलग करते हुये अपने लिए इन कॉन्डमों के साथ फेके हुये जूठे भोजन निकालने की कला सीख चुकी है, हालांकि इसके लिए बच्चों के साथ-साथ कुत्तों के झुंड से भी निपटना पड़ता है। भोजन उठाने के क्रम में लोहे के छड़ को कुत्तों पर तानते हुये कहती है, साला अपुन से पंगा....देखता नहीं है घुसेड़ दुंगी।
रज्जो अभी अभी दुबई से लौटी है...मुंबई में ढल चुकी बार बालायें उसे घेरे हुये है...उसकी किस्मत से सब को जलन हो रहा है, उनकी जवानी को साला मुंबई ने चूस लिया...रज्जो की किस्मत अच्छी थी दुबई निकल गई...शेखों के नीचे लेटकर खूब माल कमाया है.
...अरे मेरे लिए कुछ लाई..
हां...लाई ना..ये है घड़ी, ये है हार और ये है चुडि़या...रुक रुक...तेरे बच्चों के लिए टेडी बीयर लेकर आई हूं...
काहे के मेरे बच्चे...किसी हरामी ने मेरे पेट में छोड़ दिया था। चल दे दे साला खुश होगा...वैसे बड़ा होकर इसे भी अपनी बहनों की दलाली करनी होगी...
रुनझुन सिलीगुड़ी से आई थी...जवान और खूबसूरत थी...किसी ने कह दिया मुंबई चली जाओ, हीरोइन बनकर खूब नाम और पैसे कमाओगी...आ गई...प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाते-लगाते कितने बिस्तर से होकर गुजरी उसे भी पता नहीं...घर परिवार सब पीछे छूट गये...बालों में आ रही सफेदी को देखते हुये, एक शादी-शुदा अमीर बुढ़े का दामन थाम लिया...जब तक उसके नसों में गरमी रही गिद्ध की तरह नोचा...पैसे के दम पर। अब एक कोने में पड़ा अंतिम सांसे गिन रहा है। हालांकि उसके नाम एक खोली कर गया...रहने का ठौर मिल गया है, जीवन कट जाएगा।
ये लंगड़ा साला किसी प्रोडक्शन हाउस में फिल्मों का पोस्टर बनाने का काम करता था। चालू चीज है। एक लौंडिया को झांसा में लिया..खुद फिल्म बनाने की बात कही...गांव की राधा...उस लौंडिया को हीरोइन बनाने का लालच देकर उसके साथ खूब रासलीला रचाई...फिल्म गई तेल लेने।
नाइट कल्बों में वोदका, जीन, रम आदि के साथ मादकता खूब छलछलाती है..पैसे हैं तो जमकर पीयो, डिस्कोथेक पर एक दूसरे को सूंघों, सेटिंग करो और ले जाओ....यहां एक फामूला चलता है...मैं हूं दुल्हन बस एक रात की।
ये बुढा साला ठरकी है...गाड़ी के अंदर ही लौंडिया को दबोचे हुये है....साली कितनी कम उम्र की है । अरे भाई यहां माल है तो कमाल है...ई है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ, सोने चांदी की डगरिया तू देख बबुआ।
दारू के नशे में धुत्त होने के बाद परलोकी चड्डा बड़बड़ता है...भंसाली की एसी की तैसी...इस फिल्म नगरी से बहुत कमाया...उसकी एक फिल्म खरीदी...गाना था उसका आज मै ऊपर, आज मैं नीचे...आज तक ऊपर नीचे हो रहा हूं...70 लाख एक बार में घुस गये।
अबे लड़कों क्या कर रहे हो, अपने गैरेज के पास चार लोगों के साथ बैठा हुआ अहमद मियां चिल्लाता है।
कुछ नहीं बस कंठ गीली कर रहे हैं, अंदर में कुछ दूरी पर एक टूटे-फूटे कार के बोनट पर बैठकर बीयर की बोतले गटकते हुये छोकरें जवाब देते है।
जहाज उड़ा रहे हो, उड़ाओ, उड़ाओ खूब ऊंची उड़ना।
देर रात गये डगमगाते कदमों से शराबियों का झूंड सड़के के किनारे एक मछली की दुकान पर आते हैं। कोकिल कड़ाही में तली जा रही मछली को ध्यान से देख रही है। नशे में धुत्त ये लोग मछली खाकर कांटो को सड़क पर फेंकते है, कोकिल बड़े सलीके से उन कांटो के बीच फंसे हुये बचे मांस को चट करती जाती है।
ये लड़की तो जूठे खा रही है,...ये कैसी जिंदगी है, उनमें से एक कहता है।
ज्याद फिलॉसफर मत बन, दूसरा घुड़की देता है। तीसरा गुनगुनाता है, दुनिया ये दुनिया, है कैसी ये दुनिया।

Thursday, 20 November 2008

स्टाइललेस स्टाइल से भी आगे थे सत्यजीत रे

इटैलियन नियोरियलिज्म फिल्म मूवमेंट का दुनियाभर के फिल्मों पर जोरदार प्रभाव पड़ा है। इस मूवमेंट को हांकने वाले इटली के फिल्मकारों पर फ्रेंच पोयटिक रियलिज्म का जोरदार प्रभाव था। इटैलियन नियोरिलिज्म को आकार देने वाले मिसेलेंजो एंटोनियोनी और ल्यूसिनो विस्कोंटी फ्रेंच फिल्मकार जीन रिनॉयर के साथ कर चुके थे। जीन रिनॉयर के साथ जुड़ने का मौका भारतीय फिल्मकार सत्यजीत राय को भी मिला था।
जीन रिनॉयर कोलकात्ता में अपनी फिल्म दि रिवर की शूटिंग करने आये थे। उस वक्त सत्यजीत राय ने लोकेशन तलाश करने में उनकी मदद की थी। जिस वक्त इटली में नियोरियलिज्म की नींव रखी जा रही थी, उस वक्त सत्यजीत राय भी इस पैटरन पर गंभीरता से काम कर रहे थे। 1928 में बिभूतिभूषण द्रारा लिखित बंगाली उपन्यास पाथेर पांचाली को फिल्म की भाषा में ट्रांसलेट करने की दिशा में वह गंभीर तरीके से सोच रहे थे। इस बात की चरचा सत्यतीज रे ने कोलकात्ता प्रवास के दौरान जीन रिनॉयार से भी की थी और जीन रिनॉयर ने उन्हें इस पर काम करने के लिए प्रेरित किया था।
उस वक्त सत्यजीत रे कोलकात्ता में लंदन की एड एजेंसी डीजे केमर में काम कर रहे थे। उस एजेंसी की ओर से उन्हें तीन महीने के लिए लंदन के हेडक्वाटर में भेजा गया। यहां पर उन्होंने तीन महीने में दुनियाभर की 99 फिल्में देखी और विश्व परिदृश्य पर फिल्म गतिविधियो के संपक में आये। इसी दौरान उन्हें इटैलियन फिल्मकार विटोरी डी सिका बाइसाइकिल थीफ्स देखने का मौका मिला। और उसी दिन उन्होंने फिल्मकार बनने का निश्चय कर लिया।
इटैलियन नियोरियलिज्म मूवमेंट पर जीन रिनॉयर की फिल्म टोनी (1935)और ब्लासेटी की फिल्म 1860 (1934) का जबरदस्त प्रभाव था। इस मूवमेंट की शुरुआत रॉबट रोसेलिनी की फिल्म रोम,ओपेन सिटी से हुई थी। इस फिल्म की कहानी सेकेंड वल्ड वार के समय अमेरिकी सैनिकों द्वारा रोम को नाजी सेना से मुक्त कराने के पूव रोम में कैथोलिक और कम्युनिस्टों के बीच आपसी गठबंधन पर आधारित थी। इस फिल्म में रोसेलिनी ने नाजी सैनिकों की वापसी के कुछ वास्तविक दृश्य भी दिखाये थे।
नियोरियलिज्म मूवमेंट की अगली कड़ी विटोरियो डी सिका की फिल्म बाइसाइकिल थीफ्स थी। इस फिल्म में सेकेंड वल्ड वार के बाद इटली की सामाजिक, आथिक, राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को बड़ी बेबाकी से उकेरा गया था। इस फिल्म में एक साधारण मजदूर दंपति की कहानी के माध्यम से कोई ठोस समाधान के बजाय वास्तविकता का चित्रण किया गया था। इटली की तमाम राजनीतिक और धामिक संस्थाओं के साथ-साथ उस समय के लोकप्रिय विश्वासो पर प्रश्न उठाया था। कोई ठोस समाधान न देने के कारण इस फिल्म को विभिन्न विचारधाराओं पर बंटे बौद्धिक हलकों में जमकर लताड़ा गया था। इन आलोचनाओ के जवाब में डी सिका ने कहा था, मेरी फिल्म मानवीय सुद्ढता की अनुपस्थिति और समाज में असमानता के खिलाफ एक संधष है। यह गरीब और दुखी लोगो के पक्ष में कहे गये शब्द हैं।
उस दौर में सत्यजीत रे फिल्में भी सामाजिक विषमता को मजबूती से व्यक्त कर करते हुये अंतरराष्ट्रीय फिल्म पटल पर अपनी पहचान बना रही थी। पाथेर पांचाली को देखने के बाद फ्रांकोइस ट्राफाउट ने कहा था, मैं उन किसानों की फिल्म नहीं देखना चाहता, जो हाथ से खाते हैं। सत्यजीत रे की फिल्म मेकिंग स्टाइल पूरी तरह से इटली के नियोरियलिज्म मूवमेंट से प्रभावित थी।
इटली के नियोरियलिज्म के विकास में सिनेमा पत्रिका में काम करने वाले फिल्म समीक्षकों के गुट का महत्वपूण योगदान था। इस पत्रिका का संपादक फासिस्ट पाटी का नेता मुसोलिनी का बेटा विटोरियो मुसोलिनी था। इस पत्रिका के तामाम लोगों को सेकेंड वल्ड वार के बाद अपने राजनीतिक विचारों को अभिव्यक्त करने की आजादी नहीं थी। इसलिए ये लोग छद्मरूप से फिल्मों का सहारा ले रहे थे। मिशेलेंजेलो एंटोनिओनी, ल्यूसीनो विस्कॉन्टी, जियानी पुसीनी, सीजर जावेटीनी,ग्यूसेपे डी सैन्टिस और पियेट्रो इनग्राओ इस मंडली के मुख्य सदस्य थे। उस वक्त सत्यजीत रे भी अपने तरीके से फिल्मों पर आलेख लिख रहे थे। उनकी फिल्मी आलेखों का संकलन आवरस फिल्म, देयरस फिल्म (1976)भारतीय और विदेशी फिल्मों के प्रति उनके स्पष्ट नजरिये का बेहतर प्रमाण है।
डॉक्यूमेटरी और शॉट फिल्मों सहित सत्यजीत रे कुल 37 फिल्में बनाई। अपनी फिल्मों में उन्होंने जीवन को बहुत मजबूती से पकड़ा और प्रदशित किया।उनकी फिल्म मेकिंग स्टाइल पर इटैलियन नियोरियलिज्म मूवमेंट पूरा प्रभाव था। अमीर और गरीब लोगों पर आधारित कहानी, लोकेशन शूटिंग,गैर पेशेवर कलाकारों का इस्तेमाल, प्रतिदिन का जीवन,गरीबी और निराशा इटैलियन नियोरियलिज्म की खास विशेषताएं थी। इटैलियन नियोरियलिज्म स्टाइललेस स्टाइल की फिल्मों से प्रभावित होने के बावजूद वह एक अलग रास्ते पर चल रहे थे। इनकी सभी फिल्मों का टोन इटैलियन नियोरियलिज्म के काफी करीब था,लेकिन इटैलियन नियोरियलिज्म के फिल्मकारों से इतर वह स्क्रीप्ट को सही तरीके से लिखने पर बहुत ज्यादा जोर देते थे। स्क्रीप्ट राइटिंग को वह डायरेक्शन का एक अभिन्न अंग मानते थे।

Saturday, 15 November 2008

ऑटर थ्योरी के ग्रामर पर गुरदत्त

गुरुदत्त के बिना वल्ड फिल्म की बात करना बेमानी है। जिस वक्त फ्रांस में न्यू वेव मूंवमेंट शुरु भी नहीं हुआ था, उस वक्त गुरदत्त इस जेनर में बहुत काम कर चुके थे। फ्रांस के न्यू वेव मूवमेंट के जन्मदाताओं ने उस समय दुनियां की तमाम फिल्मों को उलट-पलट कर खूब नाप-जोख किया, लेकिन भारतीय फिल्मों की ओर उनका ध्यान नहीं गया। गुरदत्त की फिल्मों का प्रदशन उस समय जमनी,फ्रांस और जापान में भी किया जा रहा था और सभी शो फूल जा रहे थे।
गुरुदत्त हर लेवल पर विश्व फिल्म को लीड कर रहे थे। 1950-60 के दशक में गुरु दत्त ने कागज के फूल, प्यासा, साहिब बीवी और गुलाम और चौदंहवी का चांद जैसे फिल्मे बनाई थी, जिनमें उन्होंने कंटेट लेवल पर फिल्मों के क्लासिकल पोयटिक एप्रोच को बरकार रखते हुये रियलिज्म का भरपूर इस्तेमाल किया था, जो फ्रांस के न्यू वेव मूवमेवट की खास विशेषता थी। विश्व फिल्म परिदृश्य में गुरुदत और उनकी फिल्मों को समझने के लिए फ्रांस के न्यू वेव मूवमेवट के थियोरिटकल फामूलों का सहारा लिया जा सकता है, हालांकि गुरु दत्त अपने आप में एक फिल्म मूवमेवट थे। किसी फिल्म मूवमेवट के ग्रामर पर उन्हें नही कसा जा सकता।
फ्रेंच न्यू वेव की बात फ्रांस की फिल्मी पत्रिका कैहियर डू सिनेमा से शुरु होती है। इस पत्रिका का सह-संस्थापक और संपादक एंड्रे बाजिन ने अपने अगल-बगल एसे लोगों की मंडली बना रखी थी, जो दुनियाभर की फिल्मों के पीछे खूब मगजमारी करते थे। फ्रान्कोईस ट्रूफॉट, जीन-लुक गोडारड, एरिक रोहमर, क्लाउड चाब्रोल और जैकस रिवेटी जैसे लोग इस इस मूवमेंट के खेवैया थे और फिल्म और उसकी तकनीक के पीछे थियोरेटिकल लेवल पर हाथ धोकर पड़े हुये थे। ऑटर थ्योरी बाजिन के खोपड़ी की उपज थी, जिसे ट्रूफॉट ने सींच कर बड़ा किया। गुरु दत्त को इस फिल्म थ्योरी की कसौटी पर कसने से पहले, इस थ्योरी के विषय में कुछ जान लेना बेहतर होगा।
ऑटर थ्योरी के मुताबिक एक फिल्मकार एक लेखक है और फिल्म उसकी कलम। यानि की एक फिल्म के रूप और स्वरुप पूरी तरह से एक फिल्म बनाने वाले की सोच पर निभर करता है। इस थ्योरी को आगे बढ़ाने में अलेक्जेंडर अस्ट्रक ने कैमरा पेन जैसे तकनीकी शब्द का इस्तेमाल किया था। ट्राफाट ने अपने आलेख -फ्रांसीसी फिल्म में एक निश्चित चलन-में इस थ्योरी को मजबूती से स्थापित किया था। उसने लिखा था कि फिल्में अच्छी या बुरी नहीं होती है, बल्कि फिल्मकार अच्छे और बुरे होते हैं। फिल्मों में गुरुदत्त के बहुआयामी कामो को समेटने के लिए यह थ्योरी बहुत ही छोटी है, लेकिन इस थ्योरी के नजरिये से यदि हम गुरुदत्त को एक फिल्मकार के तौर पर देखते हैं, तो उनकी प्रत्येक फिल्म बड़ी मजबूती से उनके व्यक्तित्व को बयां करती है।
फ्रेच न्यू वेव के संचालकों की तरह ही गुरुदत्त ने भी सेकेंड वल्ड वार के प्रभाव को करीब से देखा था। अलमोडा का उदय शंकर इंडियन कल्चर सेंटर 1944 में गुरुदत्त के सामने ही सेकेंड वल्ड वार के कारण बंद हुआ था। गुरुदत्त यहां पर 1941 से स्कॉलरशीप पर एक छात्र के रूप में रहे थे। बाद में मुंबई में बेरोजगारी के दौरान उन्होंने आत्मकथात्मक फिल्म प्यासा लिखी। इस फिल्म का वास्तविक नाम कशमकश था। फिल्मों की समीक्षा के लिए कुख्यात ट्रूफॉट को 1958 में जब कान फिल्म फेस्टिवल में घुसने नहीं दिया गया था, तो उसने 1959 में 400 बोल्ट्स नामक फिल्म बनाया था और कान फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म डायरेक्टर का अवाड झटक ले गया था। 400 बोल्ट भी आत्मकथात्मक फिल्म थी, गुरुदत्त के प्यासा की तरह। 400 बोल्ट में एक अटपटे किशोर की कहानी बयां की गई थी, जो उस समय की परिस्थियों में फिट नहीं बैठ रहा था, जबकि प्सासा में शायर युवक की कहानी थी,जिसे दुनियां ने नकार दिया था। अपनी फिल्मों पर पारंपरिक सौंदय के साथ जमीनी सच्चाई का इस्तेमाल करते हुये गुरुदत्त फ्रेच वेव मूवमेंट से मीलों आगे थे।
गुरुदत्त ने 1951 में अपनी पहली फिल्म बाजी बनाई थी। यह देवानंद के नवकेतन की फिल्म थी। इस फिल्म में 40 के दशक की हॉलीवुड की फिल्म तकनीक और तेवर को अपनाया गया था। इस फिल्म में गुरुदत्त ने 100 एमएम लेंस के साथ क्लोज-अप शॉट्स का इस्तेमाल किया था। इसके अतिरिक्त पहली बार कंटेट के लेवल पर गानों का इस्तेमाल फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया था। भारतीय फिल्म में तकनीक और कंटेट के लेवल पर गुरुदत्त की ये दोनों प्रमुख देने है।
बाजी के बाद गुरदत्त ने जाल और बाज बनाया। इन दोनों फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास सफलता नहीं मिली थी। आरपार (1954), मि. और मिसेज 55, सीआईडी, सैलाब के बाद उन्होंने 1957 में प्यासा बनाया था। उस वक्त फ्रांस में ट्रूफॉट का 400 बोल्ट नहीं आया था। प्यासा के साथ रियलिज्म की राह पर कदम बढ़ाने के साथ ही गुरुदत्त तेजी से डिप्रेशन की ओर बढ़ रहे थे। 1950 में बनी कागज के फूल गुरुदत्त की इस मनोवृति को व्यक्त करता है। इस फिल्म में सफलता के शिखर तक पहुंचकर गरत में गिरने वाले डायरेक्टर की भूमिका गुरदत्त ने खुद निभाई थी। यदि ऑटर थ्योरी पर यकीन करे तो यह फिल्म पूरी तरह से गुरुदत्त की फिल्म थी, और इस फिल्म में गुरदत्त का एक फिल्मकार के रूप में सुपर अभिव्यक्ति है। 1964 में शराब और नींद की गोलियों का भारी डोज लेने के कारण गुरदत्त की मौत के बाद देवानंद ने कहा था, वह एक युवा व्यक्ति था, उसे डिप्रेसिव फिल्में नही बनानी चाहिय थी। फ्रेच वेव के अन्य फिल्मकारों की तरह गुरुदत्त सिफ फिल्म के लिए फिल्म नहीं बना रहे थे, बल्कि उनकी हर फिल्म शानदार उपन्यास या काव्य की तरह कुछ न कुछ कह रही थी। वह अपनी खास शैली में फिल्म बना रहे थे, और उस दौर में वल्ड फिल्म जगत में जड़ पकड़ रहे ऑटर थ्योरी को भी सत्यापित कर रहे थे।
साहब बीवी और गुलाम का निदेशन लेखक अबरार अल्वी ने किया था। इस फिल्म पर भी गुरदत्त के व्यक्तित्व के स्पष्ट प्रभाव दिखाई देते हैं। एक फिल्म के पूरा होते ही गुरदत्त रुकते नहीं थे, बल्कि दूसरे फिल्म की तैयारी में जुट जाते थे। एक बार उन्होंने कहा था, लाइफ में यार क्या है। दो ही तो चीज है, कामयाबी और फैलियर। इन दोनों के बीच कुछ भी नहीं है।
फ्रेंच वेव की रियलिस्टिक गूंज उनके इन शब्दों में सुनाई देती है, देखों ना, मुझे डायरेक्टर बनना था, बन गया, एक्टर बनना था बन गया, पिक्चर अच्छे बनाने थे, अच्छे बने। पैसा है सबकुछ है, पर कुछ भी नही रहा। फ्रेच वेव मूवमेंट के दौरान ऑटर थ्योरी को स्थापित करने के लिए बाजिन और उसकी मंडली ने जीन रिनॉयर,जीन विगो,जॉन फॉड, अल्फ्रेड हिचकॉक और निकोलस रे की फिल्मों को आधार बनाया था, उनकी नजर उस समय भारतीय फिल्म के इस रियलिस्टिक फिल्मकार पर नहीं पड़ी थी। हालांकि समय के साथ गुरदत्त की फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान मिली है। टाइम पत्रिका ने प्यासा को 100 सदाबहार फिल्मों की सूची में रखा है।

Friday, 14 November 2008

बात भारतीय फिल्मों पर


पता नहीं किस व्यक्ति ने पहली बार देश में हिन्दी फिल्मों के लिए बॉलीवुड शब्द का इस्तेमाल किया और कैसे यह शब्द फिल्मी पत्रिकाओं और अखबारों से लेकर टीवी बालाओं के होठों पर आ गया। इस पर कभी बात में बात होगी, आज बात भारतीय फिल्मों पर। यूरोप और अमेरिका को बहुत दिनों तक पता ही नहीं था कि भारतीय फिल्मों में नाच गान का इस्तेमाल शानदार तरीके से किया गया था। उस दौर में दुनियां की अन्य फिल्में भारत की फिल्मों से इतर नहीं थी, लेकिन अन्य जगहों पर तकनीक के स्तर पर प्रयोग हो रहे थे, जबकि भारतीय फिल्मकार उन तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल करने की कला के अभ्यास में पारंगत थे। चाहे मूक फिल्मों का ही दौर क्यों न हो, उस समय भारत में बेहतरीन फिल्में बन रही थी।
साउंड फिल्मों के युग में तो भारतीय फिल्मकारों के हाथ में तो एक खजना लग गया था, नाच और गाने स तमाम भारतीय फिल्मी भरी पड़ी है। गीतों के बिना तो भारतीय फिल्म की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती थी।
दादा फालके से लेकर आज तक भारतीय फिल्मकार अपनी फिल्मों में गीतों का भरपूर प्रयोग करते रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में फिल्म कई मूवमेंटों से होकर गुजरा है,जैसे इटली का रियलिज्म मूवमेंट और फ्रांस का वेव मूवमेंट। समुद्र पार के देशों में फिल्म थ्योरी पर खूब काम हुआ, और कई तरह के सिद्धांत भी गढ़े गये, जैसे एपरेटस थ्योरी, ऑटर थ्योरी, Feminist theory, (Feminist theory sub jagah milega, aur bahut hi majbooti se. )।
इन सब को लेकर उन दिनो कैहिस डू सिनेमा नामक एक फ्रांसीसी पत्रिका में खूब मारा मारी होती थी। इस पत्रिका का संपादक बाजिन था। उस समय के सारे छटे हुये फिल्म समीक्षक उस पत्रिका से जुड़े हुये थे। बाद में ये लोग खुद फिल्म बनाने पर उतर आये। फ्रांस वेव मूवमेंट इन्हीं समीक्षकों का दिया हुआ है। भारत में फिल्में से ज्यादा फिल्मों में लगे लोगों पर जोर दिया गया, जिसके कारण भारतीय फिल्म को फिल्म के सही ग्रामर पर नहीं कसा गया। इसका नतीजा यह है कि तकनीक के क्षेत्र में भारतीय फिल्म में कोई क्रांति आज तक नहीं हुई है। अभिनय और कलाकारों की लोकप्रियता में मामले में भारतीय फिल्मों ने जो उछाल मारा है वह दुनिया में किसी फिल्म उद्योग को नसीब नहीं है।
शोले का डायलॉग बच्चा-बच्चा जानता है। मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य मूल्कों की फिल्मों का कोई डायलॉग उस मूल्क का बच्चा बच्चा जानता है। चाहे गुरुदत्त की सैडिस्टिक फिल्में हो चाहे देवानंद की रोमांटिक, भारतीय फिल्म भारतीय फिल्म के हर युग में गीतों और संगीतों करो भरपूर स्थान दिया गया।
जिस वक्त जीन रिनॉयार पोयटिक फिल्म बना कर दुनिया की फिल्म को एक नई दिशा दे रहे थे उस वक्त भारत में भी ताबड़ तोड़ फिल्में बन रही थी और कथ्य के लिहाज से पूरी तरह से भारतीय थी। भारत में फिल्मों के रुपहले चेहरों पर ज्यादा जोड़ दिया गया , तकनीक और कंटेट को हर एंगल से नहीं कसा गया। दुभाग्य की बात रही है कि भारतीय फिल्मों को अंग्रेजी maine समेटा गया है, इसी का नतीजा है कि भारतीय फिल्म अब बॉलीवुड बन गया है।
मजे की बात है कि तमाम भारतीय पत्र पत्रिकाओं ने अचेतन रूप से इस दासता को स्वीकार कर लिया है। इस कल्चरल दासता को फेंके बिना मुझे नहीं लगता कि बंगाल से लेकर मुंबई तक बनने वाली भारतीय फिल्मों का आकलन सही तरीके से किया जाकता है। क्या विमल दा और सत्यजीत रे के बिना भारतीय फिल्म की कल्पना की जा सकती है। उस दौर में मद्रास में भी ताबड़तोड़ फिल्में बनी थी।

Thursday, 13 November 2008

मेरा बच्चा मनमोहन की भाषा नहीं समझेगा

अर्थ विज्ञानियों की भाषा में आथिक मंदी की बात आम लोगों के समझ में नहीं आ रही है। वे दिन प्रति दिन की समस्याओं से रूबरू होते हुए इस मंदी की मार झेल रहे हैं। पिछले आठ महीने में दूध की कीमत में प्रिंट के लेवल पर प्रति लीटर दो रुपये का इजाफा हुआ है, लेकिन खुदरे दुकानदार इस पर प्रिंट लेवल से तीन रूपया जादा कमा रहे हैं। पहले पैकेट वाले दूध की कीमत प्रति आधा लीटर 9 रुपये था, जिसे बढ़ाकर 10 रुपये किया गया। लेकिन मुंबई के बाजार में यह 12 रूपये में बेचा जा रहा है। इसी तरह चावल, दाल, तेल, चीनी, नमक और खाने पीने के वस्तुओं की कीमतों में इजाफा हुआ है। दुकानदार मनमाना रेट लगा रहे हैं और लोग इन आवश्यक वस्तुओं को उनके मनमाना दामों पर खरीदने के लिए मजबूर है। साग सब्जी का भाव भी आसमान छू रहा है। मुंबई की सडकों पर गाजर 80 रुपये प्रति किलो बिक रहे हैं।
खाने पीने के वस्तुओं की कीमतों में जहां उझाल आया है , वहीं प्रोपटी की कीमतों में गिरावट आ रहा है। तमाम बिल्डर फ्लैट बनाकर बैठे हुये हैं, लेकिन उन्हें कोई खरीदने वाला नहीं है। अभी कुछ दिन पहले तमाम बिल्डरों ने ग्राहकों के लिए अपनी अवासीय परियोजनाओं को लेकर एक प्रद्रशनी का आयोजन किया था, जिससे लोग दूर ही रहे। बिल्डरों की बहुत बड़ी रकम निमाण कायो मे फंसा पड़ा है, और जिस तरह से लोगों के पहुंच से साग-सब्जी और नून तेल दूर होता जा रहा है उसे देख यही लग रहा है कि इन बिल्डरों के पैसे लंबे समय तक फंसे रहेंगे।
फिल्म उद्योग का भी बाजा बजा हुआ है। फिल्म से जुड़े लोग सड़कों और चाय टपरियों पर बतिया रहे हैं कि रिलायंस ने अपनी दो महत्वकांक्षी फिल्मी प्रोजेक्टों को फिलहाल बंद कर दिया है। शाहरूख खान भी एक फिल्म की तैयारी में लगे हुये थे, लेकिन अपने वित्तीय सलाहकारों की बात मानकर वह उन्होंने भी इसे बंद कर दिया है। तमाम प्रोडक्शन हाउस वाले छोटी बजट वाली फिल्मों के विषय में गंभीरता से सोचने लगे हैं। आज से कुछेक महीना पहले फोन पर घर बैठे लोन देने वाले चिरकुट बैंकों का खूब फोन आता था, अब इनकी घंटी बजनी बिल्कुल बंद हो गई है। सब गधे के सिर से सिंग की तरह गायब हो गये हैं। क्या भारत फ्रांस में बास्तील किले पर आम जनता के हमले से पहले वाली स्थिति में है ? खाने के लिए साग-सब्जी और दाल चावल नहीं मिलेगा तो लोग क्या करेंगे? नरसिन्हा राव के समय मनमोहन सिंह ने उदारीकरण चालू किया था, अब प्रधानमंत्री बैने बैठे हैं।
मेरी अन्तोन्योत से कुछ उम्मीद करना ही बेकार है....मेरे बच्चे दूध के लिए रो रहे हैं....देखता हूं कि पॉकेट में कुछ पैसे है कि नहीं....मनमोहन सिंह का कैबिनेट तो अथ विज्ञान की भाषा maine बात करेगा, जिसे मेरा बच्चा नहीं समझेगा.

Tuesday, 11 November 2008

नए स्वर में आज की हिंदी कविता

हिन्दी जगत के प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह किताबघर की ओर से आई कवि ने कहा - कविता श्रृंखला की यह समीक्षा युवा रचनाधर्मी विज्ञान भूषण ने की है इकट्ठे दस किताबों पर यह समीक्षात्मक टिप्पणी लम्बी ज़रूर है , पर मेरा ख़याल है की इससे सरासर तौर पर भी होकर गुज़रना आपके लिए भी एक दिलचस्प अनुभव होगा :

हमारी भौतिकतावादी जीवन”ौली और आडंबरों के कपाट में स्वयं को संकुचित रखने की मनोवृत्ति ने हमारी संवेदनाओं को मिटाने का ऐसा कुचक्र रचा है जिससे बचकर निकलना लगभग असंभव सा दिखता है। आज के कठिन समय में आदमी के भीतर का ‘ आदमीपन’ ही कहीं गुम होता जा रहा।है. इससे भी बड़ी हतप्रभ करने वाली बात यह है कि हम अपने भीतर लगातार पिघलते जा रहे आदमीयत को मिटते हुए देख तो रहें हैं पर उसे बचाने के लिए कोई भी सार्थक प्रयास नहीं करते हैं या यद ऐसा कुछ करना ही नहीं चाहते हैं।ऐसे प्रतिकूल समय के ताप से झुलसते आम आदमी की हता”ा होती जा रही जिजीवि’ाा को संरक्षित रखते हुए संघर्’ा में बने रहने की क्षमता सिर्फ साहित्य ही प्रदान कर सकता है। कुछ समय पूर्व किताबघर प्रका”ान ने वर्तमान दौर के कुछ महत्वपूर्ण कवियों की चुनी हुई कविताओं की श्रंखला ‘ कवि ने कहा ’ का प्रका”ान कर इस क्षेत्र में फैल रही निस्तब्धता को दूर करने का सफल प्रयास किया है। प्रस्तुत काव्य श्रंखला के प्रका”ाक के द्वारा चयनित दस रचनाकारों में सम्मिलित एकमात्र कवयित्री ‘ अनामिका ’ का कवि तत्व “ो’ा नौ पुरु’ा कवियों के इस संगमन में भी सर्वथा अलग और वि”िा’ट नजर आता है। कहानियों , उपन्यासों , लेखों और आलोचनाओं के माध्यम से पिछले डेढ़ द”ाक से हिंदी साहित्य में नारी विमर्”ा के स्वर को तीक्ष्णता प्रदान करने वाली रचनाकारों में अनामिका का नाम अगzणी माना जा सकता है। गद्यात्मक रचनाओं में उनकी सघन वैचारिकता और प्रभावी भा’ाा “ौली से पूर्व परिचित पाठकवर्ग, प्रस्तुत काव्य संगzह की कविताओं के माध्यम से उनमें समाई गहरी और बहुअर्थी काव्यात्मकता को देखकर आ”चर्यचकित हो उठता है। बिहार की पृ’ठभूमि से ताल्लुक रखने वाली कवयित्री के भीतरी मन में अव“ाो’िात गँवई और कस्बाई संस्कृतियों का मिश्रित स्वरूप इन कविताओं के द्वारा एक बहुवर्णी रंगोली की तरह हमारे समक्ष प्रकट होता है। वे निर्जीव और अतिसामान्य बिंबों , प्रतीकों के सहारे स्त्रीत्व के स्वर को नई दि”ाा में मोड़कर उसे प्रभावी लोकराग का स्वरूप प्रदान कर देती है। समाज के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले वर्ग से संबंधित होने के बाद भी स्त्री होने के दं”ा को वे ”िाद्यत से महसूस कर, उसे इस तरह अभिव्यक्त करती हैं कि उनका दर्द समस्त नारी समाज की दारुणगाथा बनकर हमारे सामने उपस्थित हो जाता है। उनके संगzह की पहली ही कविता ‘ स्त्रियाँ ’ हमे”ाा से पुरु’ाों द्वारा हीन और उपेक्षित समझी जाने वाली नारी मन की अंधेरी वीथियों में कुछ तला”ा करती हुई नजर आती है। “ाब्दों के चयन के मामले में भी अनामिका स्वयं को किसी भी बने बनाए मानकों से प्रतिबंधित नहीं करती हैं । उनके लिए कविता का लक्ष्य और उसकी मारक क्षमता अधिक महत्वपूर्ण है, न कि भा’ाा या क्षेत्रीयता की लक्ष्मणरेखा का अनुपालन करना।‘ मरने की फुर्सत ’ कविता में स्त्री होने की मर्मान्तक पीड़ा को उन्होनंे नए ढंग से परिभा’िात किया है। इसके उलट ‘ तुलसी का झोला’ “ाीर्’ाक कविता स्त्री मन की अतल गहराइयों से टकराती है। इसकी प्रारंभिक पंक्तियों में पति द्वारा त्याग दिए जाने की कसमसाहट नजर आती है लेकिन कविता के अंतिम चरण में वह अधूरेपन का भाव मिट जाता है और वह स्वयं को पुरु’ाावलंबी सोच से मुक्त कर अपने लिए नया आका”ा तला”ाने की दि”ाा में अगzसर हो जाती है । अनामिका के द्वारा चयनित इन कविताओं से गुजरते हुए यह स्प’ट हो जाता है कि समस्याओं और वि’ामताओं को वे एक नए दृ’िटकोंण से देखती हैं। उनके इस दर्”ान में सदियों से दमित की जा रही स्त्री मन की कड़ियाँ खुलती सी नजर आती हैं। म्ंागले”ा डबराल की कविताओं का कैनवास इतना विस्तृत है कि , कई बार उनके लिए बहुआयामी “ाब्द का इस्तेमाल करना भी अधूरा और अपूर्ण सा लगने लगता है । अपनी कविताओं के माध्यम से वे आम आदमी के जीवन की उन विडंबनाओं की भी पड़ताल करते हैं जिन्हें खोजने का जोखिम उठाने से प्राय: हम सभी कतराते हैं। उनकी कविताओं का तेवर और उनसे उद~घाटित होने वाले अंतर्मन के गहरे अर्थ , हमें मुक्तिबोध और “ाम”ोर बहादुर सिंह की रचनात्मकता से जुड़ने का मार्ग प्र”ास्त कराती है। मंगले”ा ने स्वीकार किया है कि बाजारवाद और कट~टरता की मिलीभगत ने हमारे आत्मिक जीवन को, हमारे मनु’य होने को न’ट कर दिया है। ऐसी वि’ाम परिस्थिति में भी वे कविता से ही यह प्र”न पूछते हैं कि - ‘ तुम क्या कर सकती हो ? ’ उनके लिए कविता कोई धारदार हथियार नहीं जिसे लेकर वे अपने अस्तित्व के चारो ओर उग आई छद~म उपलब्धियों की झाड़ियों को काट देना चाहते हैं । बल्कि कविता तो उनकी सहचरी बनकर पग - पग पर, उन्हें प्रतिकूलताओं से जूझने की ताकत प्रदान करती है । कविता उनके लिए वह जीवन राग है जो दुर्बलतम क्षणों में भी अंतर्मन को झंकृत कर मिटती जा रही जिजीवि’ाा को संजीवनी प्रदान कर देती है-‘ कविता दिन भर थकान जैसी थी@ और रात में नींद की तरह@ सुबह पूछती हुई :क्या तुमने खाना खाया रात को ?’ प्रस्तुत संकलन में उनके द्वारा चयनित जिन कविताओं ने अपने विलक्षण अर्थबोध , गहन वैचारिकता और अद~भुत “ाब्द विन्यास के जरिए हमारे समक्ष एक नए रचनासंसार के कपाट खोल दिए हैं , उनमें ‘ ताना”ााह कहता है , सबसे अच्छी तारीख, ताकत की दुनिया, सोने से पहले’ को सम्मिलित किया जा सकता है। इसके साथ ही साथ कुछ कविताएं हमें संवेदनाओं के उस धरातल पर पहुँचा देती हैं जहाँ कवि और उसकी कविता अपने “ाब्दरथ पर सवार होकर कहीं विलुप्त हो जाते हैं और पाठक उससे उपजे बहुस्तरीय अर्थों को देखकर आ”चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पाता है। ‘दुख’ “ाीर्’ाक कविता में वे अपना परिचय देते हुए कहते हैं -‘मैं एक विरोधपत्र पर उनके हस्ताक्षर हैं जो अब नहीं हैं@ मैं सहेज कर रखता हूँ उनके नाम आने वाली चिट~ठियाँ@मैं">चिट~ठियाँ@मैं दुख हूँ@मुझमें">हूँ@मुझमें एक धीमी काँपती हुई रौ”ानी है।’ कवि होने का दर्द वे ‘ अधूरी कविता ’ में बयान करते हुए कहते हैं-‘ जो कविताएं लिख ली गयीं@उन्हें">गयीं@उन्हें लिखना आसान था@ अधूरी कविताओं को पूरा करना था कठिन ।’ इसी तरह एक स्त्री के वे”या में रूपान्तरण को पुरु’ा की नजर से देखते हुए उसकी पीड़ा को ‘काWलगर्ल’ कविता में व्यक्त किया है। इसी तर्ज पर ‘छुओ’ कविता में वे हर प्रकार के भैातिक संपर्क और रि”ते को निरर्थक घो’िात करते हुए कहते हैं - ‘छूने के लिए जरूरी नहीं कि कोई बिलकुल पास में बैठा हो@बहुत">हो@बहुत दूर से भी छूना संभव है।’ समीक्ष्य संगzह में वि’णु खरे द्वारा चयनित कविताओं को पढ़ते हुए यह आभास होता है कि जिन “ाब्दों को लेकर कवि ने इन कविताओं की रचना की है उनमें समय की क्रूरताओं से टकराने की भरपूर ताकत मौजूद है । यानी ये कविताएं उपदे”ा या नारेबाजी न बनकर आम आदमी की चेतना को नवीन Åर्जा से भर देती हैं। वि’णु खरे की कविताओं के केंदz में, प्राय: अतिसामान्य, गैरजरूरी और परिधि के बाहर रहने वाले लोगों को जगह मिल जाती है। इस नजरिए से ‘वृंदावन की विधवाएं ,लड़कियों के बाप’ और सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा, “ाीर्’ाक कविताओं को “ाामिल कर सकते हैं। यद्यपि इनकी लंबी कविताओं का सबसे चमत्कृत करने वाला तत्व यह है कि उन्हें हम जिस मानसिकता से पढ़ते है , उससे संबंधित बेहिसाब अर्थ हमारे सामंने प्रकट होने लगते हैं। यही वजह है कि उनकी कविताएं सामान्य पाठकों के बीच तो उतनी लोकप्रिय नहीं हो पाती लेकिन साहित्य को”ा की अमूल्य निधि बन जाती हैं। कहना चाहिए कि लगातार मिटते जा रहे जीवन मूल्यों को बचाने के लिए पि’णु खरे की कविता अपना सब कुछ दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटती। आज की कविता में वे स्वयं जीवन और रि”तों के अन्ंात वैविध्य के प्रति उत्सुकता देखना चाहते हैं । इसी लिए उनकी कविताओं में रि”तों में उलझी जिंदगी के विविध स्वर स्प’ट रूप में सुने जा सकते हैं।संभवत: इसीलिए वि’णु खरे के संबंध में आलोचक नंद कि”ाोर नवल ने कहीें लिखा है- ‘ इनकी कविताएं अधिकां”ा वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ जज्बे का इजहार नहीं करतीं, बल्कि अपने साथ सोच को लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्रण होता है और वे सपाट नहीं रह जाती।’ अपनी कविताओं के माघ्यम से व्यवस्था के प्रति गहरा विरोध दर्ज कराने वाले कवि लीलाधर जगूड़ी , अपने द्वारा ईजाद की गई व्यंग्यात्मक ¼मगर गंभीर ½ “ौली में वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक विदzूपता पर पूरी निर्ममता से चोट करते हैं। हिंदी कविता के क्षेत्र में वे एक ऐसे कवि के रूप में पहचाने जाते हैं जो अपनी बात पूरी तरह स्प’ट करने के लिए किसी प्रकार की “ााब्दिक कृपणता नहीं दिखाते, यानी वे ढेरों वाक्यों के सहारे एक बहुआयामी संसार की रचना करते हैं जहाँ पहुंचकर हमें वस्तुएं, समस्याएं, और स्वयं हम भी बिल्कुल नए से नजर आते हैं। दरअसल वे हमारे Åपर लदे दोहरेपन के तमाम आवरणों की चीरफाड़ करने से कभी नहीं हिचकते। लंबी कविताओं के जरिए अपनी पहचान स्थापित करने वाले लीलाधर जगूड़ी द्वारा चयनित इस श्रंखला ¼कवि ने कहा ½ में ‘ बलदेव खटिक ’ और ‘मंदिर लेन’ जैसी महत्वपूर्ण कविताओं का न होना पाठकों को निरा”ा करता है। लेकिन पुस्तक की भूमिका में ही उन्होने स्प’ट कर दिया है कि - ‘ अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृ’िट और संयम आव”यक है, जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परे”ाान किये रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएं ही मेरा सम्यक अभी’ट है ? “ाायद हां , “ाायद नहीं ।’ कहना न होगा वे स्वयं अपने इस चयन से पूरी तरह संतु’ट नहीं दिखते। इसके बावजूद उन्होने जिन कविताओं को इस संचयन में जगह दी है, वे भी अपनी मारक क्षमता के चलते कहीं से भी कमजोर नहीं नजर आती हैं। मानवीय अंतर्मन की गुत्थियों को सुलझाने की को”िा”ा हो या समय की खुरदरी सचाइयों को अपनी जुबान से बयां करने की जिद , किसी भी मानक पर उनकी कविता हता”ा नहीं होती। एक तरफ उनकी कविताओं में ‘ खाली होते जा रहे जंगलों में बढ़ते जंगलीपन’ के प्रति गहरी चिंता का भाव नजर आता है तो दूसरी तरफ बचाने की तमाम को”िा”ाों के बाद भी स्वयं को खो देने का दर्द भी साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है-‘ हमने सब कुछ खो दिया है अपना गांव , अपना झोला, अपना सिर।’ उदय प्रका”ा को वर्तमान हिंदी साहित्य में स”ाक्त कथाकार के रूप में जाना जाता है। जबकि सच ये है कि उनकी सृजनात्मक यात्रा कविता लिखने से ही प्रारंभ हुई। यानी वे स्वयं को मूल रूप से कवि ही मानते हैं। उदय प्रका”ा की नजर में कवि होना एक असामान्य घटना है। इसीलिए कवि होने के उनके अपने वि”िा’ट मानक हैं। जैसे - ‘कवि का “ारीर रात में चंदzमा की तरह चमकना चाहिए, अपने दुखों और निर्वासन में कैद होने के बावजूद उसकी निगाहें एक अपराजेय समzाट की तरह आका”ा की ओर लगी रहनी चाहिए , उसकी ”िाराओं में काल और संसार, दzव की तरह प्रवाहित होना चाहिए।’ जाहिर है उनके द्वारा लिखी गई कविताओं में इन सभी मानकों का यथासंभव पालन किया जाता है। एक और वि”िा’टता जो इनकी कविताओं में दिखती है वह है इनमें उपस्थित किस्सागोई का अंदाज। उदय की कविताओं को न तो पूरी तरह वि’ााक्त कहा जा सकता है और न ही उसे अमृत का प्याला माना जा सकता है। दरअसल उदय प्रका”ा की कविताओं का जन्म, बाहरी जगत की विडंबनाओं और उनके अंतर्मन में उपस्थित नैतिक मूल्यों के मंथन से होता है। इसलिए किसी एक मिजाज की कविता का तमगा लगाना उनकी गहन रचनात्मकता के साथ अन्याय होगा। जाहिर है उनकी कविताओं का मूल्यांकन करने के लिए बने बनाए या पूर्व निर्मित मानक अनुपयुक्त लगते हैं। कहना चाहिए की उनकी कविताएं अपनी समीक्षा के लिए सर्वथा नए मानकों की मांग करती हैं। किसी भी रचना और रचनाकार की यह सबसे बड़ी और वि”िा’ट उपलब्धि होती है जब उनके मूल्यांकन के लिए आलोचकों को नए प्रतिमान गढ़ने पड़ते हैं। प्रस्तुत संगzह कवि ने कहा में उनके द्वारा चयनित ‘ राज्यसत्ता , ताना”ााह की खोज और चौथा “ोर ’ जैसी कविताएं राजनीति के कुत्सित चेहरे पर से नकाब उतार फेंकती हैं। विभिन्न प्रकार के तंत्रात्मक संजाल में उलझा आम आदमी स्वयं को निरीह और बेचारा समझने के लिए विव”ा हो जाता है , जब उसे यह ज्ञात होता है कि उसके संरक्षक ही उसके उबसे बड़े भक्षक हैं । इसी व्यथा को स्वर देती कविता ‘ दो हाथियों की लड़ाई ’ में वे लिखते हैं कि -‘ दो हाथियों की लड़ाई में @ सबसे ज्यादा कुचली जाती है@ घास , जिसका@ हाथियों के समूचे कुनबे से @ कुछ भी लेना देना नही।’ एक स्त्री को अपने दैनिक जीवन में किस तरह के बाहरी संघर्’ा और कितने स्तरों पर अंतद्र्वंद से जूझना पड़ता है , इसका मार्मिक चित्र ‘ औरतें ’ “ाीर्’ाक कविता में उकेरने का प्रयास किया है। उदय की कविताओं की सबसे बड़ी वि”ो’ाता यह है कि वह बड़ी ही सहजता से आम आदमी के संघर्’ा से जुड़ जाती है। प्रस्तुत काव्य श्रंखला का प्रका”ान उस दौर में किया गया है जब यह दु’प्रचारित किया जा रहा है कि साहित्य ¼ और वि”ो’ा रूप से कविता ½ पढ़ने वालों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। कम से कम समय में बिना श्रम किए अधिक से अधिक बटोरने की मानसिकता और आपाधापी भरी हमारी जीवन”ैाली में साहित्य को एक गैरजरूरी तत्व बनाकर हा”िाए पर धकेला जा रहा है। इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि ‘ कवि ने कहा ’ श्रंखला के माध्यम से वर्तमान दौर के दस महत्वपूर्ण और चर्चित कवियों की चुनी हुई कविताओं के इस प्रका”ान ने जहाँ एक ओर यह प्रमाणित कर दिया है कि , किसी भी विधा में लिखे गए अच्छे साहित्य को अपने पाठक की तला”ा में भटकना नहीं पड़ता है बल्कि पाठकवर्ग स्वयं भी ऐसी रचनाओं का स्वागत करने के लिए तत्पर दिखता है। वहीं दूसरी ओर श्रंखला प्रका”ाक के इस साहसिक प्रयास ने अन्य दूसरे प्रका”ाकों केा भी भवि’य में इसी तरह के ‘ साहित्यिक जोखिम ’ उठाने के लिए प्रेरणासzोत का कार्य किया है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगा पाठक, साहित्यकार और साहित्य के लिए भी । इन सभी कवियों की भा’ाा “ैाली में कुछ भिन्नता को महसूस किया जा सकता है, चीजों और समस्याओं को देखने और महसूस करने का उनका दृ’िटकोंण भी अलग नजर आता है इसके बावजूद इन सभी रचनाकारों की कविताओं का सरोकार एकसमान है। परिस्थितियों की जटिलताओं से जूझते मनु’य के भीतर की मनु’यता को बचाने के लिए सभी एक पक्ष में खड़े दिखाई पड़ते हैं। इस प्रकार उपजा इन कवियों का समवेत स्वर हिन्दी काव्य धारा को नई दि”ाा देने में पूर्णत: समर्थ है , इसमें संदेह नहीं.
पुस्तक - कवि ने कहा (दस कवियों की चुनी हुई कविताएं, दस खंडों में)
मूल्य - 150 रु , प्रत्येक
प्रकाशक- किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली

Thursday, 6 November 2008

कश्मीर पर ओबामा को रोकने की जरूरत

कश्मीर क्राइसिस को लेकर डेमोक्रेट प्रत्याशी के तौर पर ओबामा ने एमएसएनबीसी न्यूज चैनल के राशेल मिडो के साथ बातचीत के दौरान कहा था, हमलोगों को भारत और पाकिस्तान के बीच में कश्मीर क्राइसिस को हेकर बेहतर समझ बनाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। ताकि भारत पर नहीं,बल्कि कश्मीर में मिलिटेंट पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। ओबामा का कहना था कि एक बार कश्मीर समस्या का समाधान हो जाने के बाद पाकिस्तान अपने क्षेत्र के अंदर मिलिटेंट से निपटने पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा।
जनरल आम्स कंट्रोल को 25 सितंबर को दिये गये एक साक्षात्कार में ओबामा ने कहा था, भारत और पाकिस्तान के बीच हथियारों की दौड़ के राजनीतिक जड़ों को संबोधित करने के लिए कश्मीर समस्या के समाधान के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाले प्रयासों का मैं लगातार समथन करुंगा। ओबामा के राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद कश्मीरी नेताओं को अपनी नेतागिरी चमकाने का मौका मिल गया है। ऑल पाटीज हूरियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन मीरवाइज उमर फारुख ने कहा है, हमें लगता है कि कश्मीर समस्या के समाधान में अमेरिका की भूमिका है और हमें उम्मीद है कि ओबामा अपने उत्तरदायित्व को पूरा करेंगे। हमें उम्मीद है कि प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने कश्मीर के संबंध में जो उत्साहजनक बयान दिया था उसे व्यवहारिक रूप प्रदान करेंगे। ओबामा के राष्ट्रपति बनने से उत्साहित हूरियत नेता सय्यीद अली गिलानी ने कहा है, अमेरिक राष्ट्रपति भारत पर कश्मीर के लोगों से किये गये वादे स्व-निणय का अधिकार देने के लिए दबाव बनाएंगे। इसी तरह के बयान कश्मीर के बहुत सारे छोटे-बड़े संगठनों के नेताओं ने दिये हैं। जम्मू-कश्मीर हाई कोट बार एसोसिएशन उन्हें एक पत्र लिखने जा रहा है। इस पत्र में वह कश्मीर समस्या के समाधान के लिए ओबामा से हस्तक्षेप करने का अनुरोध करने वाले हैं। ये लोग ओबामा से कहेंगे कि कश्मीर के संबंध में यूनाइटेड नेशन के प्रस्ताव को लागू करने के लिए नई दिल्ली से कहे।
इन सारी खबरों का लब्बोलुआब यह है कि ओबामा के व्हाइट हाउस में जाते ही कश्मीर समस्या का एक बार फिर अंतरराष्ट्रीयकरण करने की साजिश तेज होने वाली है। भारतीय कूटनयिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है आधिकारिकतौर पर व्हाइट हाउस से कश्मीर के संबंध में किसी भी तरह की बयानबाजी को रोकना। इसके लिए अंदरखाते ओबामा के लोगों के बीच मजबूत घेराबंदी करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को लेकर व्हाइट को एक्टिवेट करने से कश्मीर के जिन्न को काबू करने में मदद मिलेगी। इस मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ बैठकर चाय-पानी करने का कोई मायने नहीं है। यदि ओबामा खुले तौर पर इस तरह की कोई कोशिश करते हैं तो उन्हें रोका जाना चाहिए।