Tuesday, 2 December 2008

सभीको सलाम कर.. अपने माई बाप हैं

ये जमूरे
हां उस्ताद
जो पूछूंगा वो बोलेगा
बालूंगा
तो बता मेरे हाथ में क्या है
डुगडुगी
बजाऊ
बजाओ उस्ताद
डुग डुग डुग डुग डुग...
तो भाइयों तमाशा शुरु होता है...चल जमूरे सभी लोगों को सलाम करे...ये अपने माई बाप है....हम तमाशा दिखाते हैं और ये हमारा पेट पालते हैं..
...लेकिन तुम्हारी डुगडुगी सुनकर तो कोई नहीं आया...
...जमूरे ये क्या हो रहा है, समझ में नहीं आ रहा...
...कोई आएगा कैसे उस्ताद। अब तमाशा तो ऊपर हो रहा है....
... क्या मतलब...
उस्ताद, टेलीविजन वाले अब रियल ड्रामा दिखा रहे हैं, नेता लोग शहीदों को कुत्ते बता रहे हैं..पाटिल जा रहे हैं, चिंदबरम आ रहे हैं..देशमुख अपने बेटे का फिल्मी कैरियर बनाने के लिए रियल लोकेशन खोज रहे हैं...ये सारा ड्रामा पूरा देश रखा है उस्ताद...अब हमें कौन देखेगा...
...जमूरे यह तू क्या बोले जा रहा है....
....मुंबई में आतंकियों ने जो ड्रामा दिखाया है उसके आगे सबकुछ फीका है...और रहा सहा कसर हमारे हमारे हाई प्रोफाइल पर्लनाल्टी लोग पूरा कर कर दे रहे हैं....
...अरे जमूरे मैंने तुझे ये सब तो नहीं सिखाया था, कहां से सीखा.....
उस्ताद दुनिया चांद पर नगर बसाने जा रही है....और एक राज की बात बताऊं, इसके साथ आतंकवादी चांद को भी उड़ाने की योजना बना रहे हैं....
...बेवकूफ बंद कर अपनी जुबान...फिर उन शायरों का क्या होगा जो लिखते थे चांद सी महबूबा हो अपनी ...
....उस्ताद अपने आप को नये जमाने में बदलो....
....वो कैसे...
...अंडरवल्र्ड ज्वाइन कर लो...
....अबे चूप, अब क्या मुझे मरवाएगा...
....फिर कोई पोलिटिकल पार्टी ज्वाइन कर लो...राज नेता बन जाओ..
....ये कैसे हो सकता है....
.....क्यों नहीं हो सकता है...तमाशा दिखाना तो तुम्हारा खानदानी पेशा है....बस थोड़े राजनीति के हथकंडे सीखने होंगे.....
..वो क्या...?
...अब मुंबई में बहुत लोग मरे हैं....तुम आतंकियों के गुणगान करने लगो...रातो रात हिट हो जाएंगे और चैनल वाले भी तुम्हे घेर लेंगे...टीवी पर नजर आने लगोगे...उन्हें मसाला चाहिए...रातो रात मामला फीट हो जाएगा.
--अबे कुत्ते...नमक हरामी करता है....भारत के लोग मेरी बोटी -बोटी नोच लेगी....
-भारत के लोगों के सामने तो पाटी पेट का सवाल है..इसके सामने सारे सवाल भूरभूरा जाएंगे...बस अपना मामला चोखा करो, कुछ नहीं होगा....बताऊं टीवी वालों के सामने क्या कहना--क्या...ताज सांप्रदयिकता की निशानी थी....जिन नौजवानों ने इसे जलाया है वो धर्मनिरपेक्ष थे...
....अबे ये क्या बात हुई....
.उस्ताद धर्मनिरपेक्षता एक कटी हुई पतंग का उलझा हुआ धागा है...इसे जैसे मन हो वैसे लपेटो.....
....जमूरे मुझे तू पाकिस्तान का एजेंट लग रहा है....
...अरे उस्ताद तूने बहुत जल्दी राजनीति का पहला सबक लिया...सरकारी भाषा पकड़ लिया....तेरी तो बारात निकालू,चल कुछ खाते हैं बड़ी जोड़ की भूख लगी है...
..उस्ताद मुझे भूख नहीं हैं......मेरी भूख तो अपने देश में चलने वाला यह तमाशा खा गया है.आओ हम मजमा लगाते रहे..सहमे हुये लोगों का दिल बहलाते रहे....

2 comments:

  1. बहुत खूब भाई! जोरदार व्यंग्य है और कड़वा सच. काश की यह सच अप्रासंगिक हो जाता!

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  2. जोरदार व्यंग्य है और कड़वा सच.बहुत खूब भाई...

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