Saturday, 22 November 2008

बसंती जवान हो रही है


रिपोताज
बसंती जवान हो रही है, उसके अंग फूटने लगे हैं और स्कूल की किताबों को छोड़कर ए गनपत चल दारू ला पर पर कमर लचकाने का निराला अभ्यास करने लगी है। करे भी क्यों नहीं, उसे धंधे में जो आना है, और अब धंधे का गुर सीखने का उसका उमर हो चला है।
उसकी नानी ने उसके नाक में नथिया डाल दी है, इस नथिये को उतारने की अच्छी-खासी कीमत वह उसे सेठ से वसुलेगी,जो पहली बार बार इसके साथ हम बिस्तर होगा। उसकी नानी को सबसे अधिक रकम सुलेखा के समय मिला था, उसे उम्मीद है कि बसंती सुलेखा के रिकाड को तोड़ देगी। और तोड़ेगी क्यों नहीं, देखो तो कैसे खिल रही है।
यह खानदानी धंधा है जिसपर दुनिया की आथिक मंदी का मार कभी नहीं पड़ने वाला।
बसंती अपने नानी की तरह गुटखा खाती है, घंटों आइने के सामने खड़ी होकर अपने सीने पर आ रहे उभार को देखती है, और खुद पर फिदा होती है। कच्ची उम्र की कसक उसके आंखों में देखी जा सकती है। गाली निकालने में तो उसने अपने नानी को भी मीलों पीछे छोड़ दिया है, तेरी मां की साले....अबे चुतिये तुझे दिखाई नहीं देता...तेरी बहन की बारात निकाल दूंगा...उसके होठों पर हमेशा बजते रहते हैं। जबरदस्त निकलेगी।
मुंबई में बार-बालाओं पर प्रतिबंध के बाद बसंती की बड़ी बहन कम्मो दुबई निकल गई है और अभी उसी की कमाई पर पूरा घर चल रहा है। तीन को जूते मारकर भगाने के बाद उसकी मां ने चौथा आदमी रख छोड़ा है। चाम की दलाली करने के साथ-साथ घर में नौकरों की तरह काम करता है, शाम को उसे गोस्त और दाड़ू मिल जाते हैं। कभी कभार उसकी लतम जुत्तम भी हो जाती है, जिसे वह माइंड नहीं करता, मुंबई में एसा ठिकाना मिलता कहां है ? और बसंती की मां से उसकी एक बेटी भी है, जिसे पढ़ाने लिखाने पर वह ध्यान दे रहा है। वह नहीं चाहता कि उसकी बेटी कम्मो और बसंती की तरह इसी धधे में उतरे, हालांकि उसे पता है इस घर में होगा वही जो बसंती की नानी चाहेगी। वह अपने खानदानी धंधे से कभी मुंह मोड़ने वाली नहीं है, तभी तो बसंती को तैयार करने पर पूरा ध्यान दे रही है।
कम्मो जब दुबई से आती है तो उसके मोबाइल फोन पर बहुत सारे मैसेज आते है। डालिंग रात में जब भी बिस्तर पर अकेला लेटता हूं तो तेरी बहुत याद आती है...यार तू तो धोखेबाज निकली, तेरी याद में तड़प रहा हूं और तेरा पता नहीं...पिछले कई दिनों से तबीयत खराब है, एक फकीर के पास गया था, उसने कहा किसी पापिन को एसएमएस कर, नजर उतर जाएगी, अब चैन महसूस कर रहा हूं। इन मैसजों को पढ़ने की काबिलियत कम्मो में नहीं है। बसंती फिर भी स्कूल गई है, लेकिन कम्मो ने तो कभी स्कूल का दरवाजा तक नहीं देखा।
इन मैसेजो को पढ़वाने के लिए कम्मो के कहने पर बसंती सामने की खोली में रह रहे फिल्म लाइन के छोकरों की ओर भागती है, जो इन मैसजों को पढ़ने के साथ-साथ बसंती में पूरा रस लेते हैं। इन छोकरों को अपने फूटते अंगों की गरमी का अहसास कराने में बसंती को मानसिक सुकून मिलता है। ये छोकरे अपनी भाषा में कहते हैं कि साली फुदफुदा रही है, लेकिन आटे में नहीं आएगी।
मौका मिलने पर बसंती दारू गटकने से भी बाज नहीं आती, दारू का चस्का उसे लग गया है। एक बार में ही पूरा गिलास गटक जाती है। इस गली में रहनेवाली धंधेबाज औरतों के बच्चों की वह अघोषित नेता है। टीनू, टप्पर, रुमकी, झुमकी उसे मॉडल के रूप में देखते है और उनमें उसके हाव-भाव का अनुकरण करने की होड़ लगी रहती है।
दरदे डिस्को पर जिस तरह से वह थिरकती है उसे देखकर इस गली की थकेली रंडियों की भी सांसे रुक जाती है। वो कहती है, ये लड़की तो इस धंधे में बहुत आगे जाएगी...बड़ो-बड़ो का कान काटेगी। थकेली रंडियो की बयानबाजी पर उसकी नानी हौले से मुस्कराकर गुटका का पॉच फाड़कर एक बार में ही पूरा मसाला अपने मुंह में घुसेड़ लेती है। अपने कुनबे की इस नगीना पर उसे गर्ऱव है। बसंती की नथिया उतारने के कई ऑफर उसके पास आ रहे हैं, लेकिन उसे पता है सब्र का फल मीठा होता है।

2 comments:

  1. केसे अजीब लोग है ना. धन्यवाद

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  2. मनुष्यता के खिलाफ जो कुछ भी हो रहा है, उस पर किसी आर्थिक मन्दी की मार कभी नही पडने वाली है.

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