Friday, 21 November 2008

बोले तो बिंदास लाइफ है मुंबई का

बोले तो बिंदास लाइफ है मुंबई का,सबकुछ चकाचक। सड़ेले नाले के ऊपर झुग्गियों की कतार और उस कतार के दरबे में जानवरों की तरह ठूंसे हुये लोग, हर किसी को अपनी पेट की जुगाड़ खुद करनी पड़ती है। सुबह उठकर कोकिल बच्चों के झुंड के साथ कचड़े के पास जाकर यूज्ड कॉन्डमों को लोहे की छड़ से अलग करते हुये अपने लिए इन कॉन्डमों के साथ फेके हुये जूठे भोजन निकालने की कला सीख चुकी है, हालांकि इसके लिए बच्चों के साथ-साथ कुत्तों के झुंड से भी निपटना पड़ता है। भोजन उठाने के क्रम में लोहे के छड़ को कुत्तों पर तानते हुये कहती है, साला अपुन से पंगा....देखता नहीं है घुसेड़ दुंगी।
रज्जो अभी अभी दुबई से लौटी है...मुंबई में ढल चुकी बार बालायें उसे घेरे हुये है...उसकी किस्मत से सब को जलन हो रहा है, उनकी जवानी को साला मुंबई ने चूस लिया...रज्जो की किस्मत अच्छी थी दुबई निकल गई...शेखों के नीचे लेटकर खूब माल कमाया है.
...अरे मेरे लिए कुछ लाई..
हां...लाई ना..ये है घड़ी, ये है हार और ये है चुडि़या...रुक रुक...तेरे बच्चों के लिए टेडी बीयर लेकर आई हूं...
काहे के मेरे बच्चे...किसी हरामी ने मेरे पेट में छोड़ दिया था। चल दे दे साला खुश होगा...वैसे बड़ा होकर इसे भी अपनी बहनों की दलाली करनी होगी...
रुनझुन सिलीगुड़ी से आई थी...जवान और खूबसूरत थी...किसी ने कह दिया मुंबई चली जाओ, हीरोइन बनकर खूब नाम और पैसे कमाओगी...आ गई...प्रोडक्शन हाउस के चक्कर लगाते-लगाते कितने बिस्तर से होकर गुजरी उसे भी पता नहीं...घर परिवार सब पीछे छूट गये...बालों में आ रही सफेदी को देखते हुये, एक शादी-शुदा अमीर बुढ़े का दामन थाम लिया...जब तक उसके नसों में गरमी रही गिद्ध की तरह नोचा...पैसे के दम पर। अब एक कोने में पड़ा अंतिम सांसे गिन रहा है। हालांकि उसके नाम एक खोली कर गया...रहने का ठौर मिल गया है, जीवन कट जाएगा।
ये लंगड़ा साला किसी प्रोडक्शन हाउस में फिल्मों का पोस्टर बनाने का काम करता था। चालू चीज है। एक लौंडिया को झांसा में लिया..खुद फिल्म बनाने की बात कही...गांव की राधा...उस लौंडिया को हीरोइन बनाने का लालच देकर उसके साथ खूब रासलीला रचाई...फिल्म गई तेल लेने।
नाइट कल्बों में वोदका, जीन, रम आदि के साथ मादकता खूब छलछलाती है..पैसे हैं तो जमकर पीयो, डिस्कोथेक पर एक दूसरे को सूंघों, सेटिंग करो और ले जाओ....यहां एक फामूला चलता है...मैं हूं दुल्हन बस एक रात की।
ये बुढा साला ठरकी है...गाड़ी के अंदर ही लौंडिया को दबोचे हुये है....साली कितनी कम उम्र की है । अरे भाई यहां माल है तो कमाल है...ई है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ, सोने चांदी की डगरिया तू देख बबुआ।
दारू के नशे में धुत्त होने के बाद परलोकी चड्डा बड़बड़ता है...भंसाली की एसी की तैसी...इस फिल्म नगरी से बहुत कमाया...उसकी एक फिल्म खरीदी...गाना था उसका आज मै ऊपर, आज मैं नीचे...आज तक ऊपर नीचे हो रहा हूं...70 लाख एक बार में घुस गये।
अबे लड़कों क्या कर रहे हो, अपने गैरेज के पास चार लोगों के साथ बैठा हुआ अहमद मियां चिल्लाता है।
कुछ नहीं बस कंठ गीली कर रहे हैं, अंदर में कुछ दूरी पर एक टूटे-फूटे कार के बोनट पर बैठकर बीयर की बोतले गटकते हुये छोकरें जवाब देते है।
जहाज उड़ा रहे हो, उड़ाओ, उड़ाओ खूब ऊंची उड़ना।
देर रात गये डगमगाते कदमों से शराबियों का झूंड सड़के के किनारे एक मछली की दुकान पर आते हैं। कोकिल कड़ाही में तली जा रही मछली को ध्यान से देख रही है। नशे में धुत्त ये लोग मछली खाकर कांटो को सड़क पर फेंकते है, कोकिल बड़े सलीके से उन कांटो के बीच फंसे हुये बचे मांस को चट करती जाती है।
ये लड़की तो जूठे खा रही है,...ये कैसी जिंदगी है, उनमें से एक कहता है।
ज्याद फिलॉसफर मत बन, दूसरा घुड़की देता है। तीसरा गुनगुनाता है, दुनिया ये दुनिया, है कैसी ये दुनिया।

3 comments:

  1. बहुत बढिया शब्दचित्र खींचा है।बेबसी का।

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  2. चमकती बम्बई में क्या क्या सड़ रहा है! सड़ता तो कुछ गांव में भी होगा, पर वहां ताजा हवा होती है सड़ांध को छितरा देने को।
    बम्बई में तो लगता है सड़ांध ठस और व्यापक है।

    नायाब लेखन है मित्रवर।

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  3. यह सब तो पुरे भारत मै ही हो रहा होगा, आप ने एक नंगा सच ऊडेल दिया. बहुत ही उमदा लेख.
    धन्यवाद

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