Wednesday, 23 July 2008

ये चुनने का हक़ तुम्हे

 

इष्ट देव सांकृत्यायन

'ये बताओ तुम किससे लुटना चाहोगे?'

'क्या मतलब?'

'मतलब! अभी तुम्हे मतलब समझाना पडेगा?... हा-हा-हा....'

'हा भाई! आपकी बात मेरी समझ मे नही आई..'

'हा-हा-हा ... बहुत भोले हो. अच्छा चलो हम तुम्हे एक बार समझा ही देते है. देखो हम सात है और तुम एक. रास्ता सुनसान है और भरपूर अन्धेरा. तो अब लुटना तो तुम्हे है, इसमे कोई दो राय नही है. तुम्हारे पास न लुटने का कोई विकल्प नही है. विकल्प सिर्फ यह है कि तुम किससे लुटोगे. कैसे लुटोगे, यह भी इसी बात पर निर्भर है कि तुम किससे लुटोगे. चूकि हम कभी किसी को भी उसकी मर्जी के खिलाफ नही लूटते, लिहाजा तुम्हे यह विकल्प दे रहे है कि तुम खुद चुन लो कि तुम्हे किससे लुटना है. तो बोलो तुम्हे किससे लुटना है?'

'लेकिन.....'

'देखो भाई, लेकिन-वेकिन कुछ नही चलेगा. हम किसी को इतने सवाल पूछने का मौका भी नही देते है. पर तुम चूकि भोले लगते हो ... ऐसा लगता है कि तुम पहली ही बार हमारे ज़द मे आ रहे हो, लिहाजा हम तुम्हे यह भी बता देते है कि हममे से कौन कैसे लूटता है.

अब देखो, ये सफेद पैंट वाले चाचा है न अपने, ये अत्यंत शांतिप्रिय है. इन्होने कभी किसी को सताया नही. देखो इन्होने सिर्फ पैंट पहन रखी है. यहा तक के शर्ट भी नही पहनी. ये बेहद दयालु और चरित्रवान है. इन्होने कभी किसी को थप्पड तक नही मारा. ये बहुत सुकून पसन्द है और भले तो इतने कि जानते भी नही कि बुराई है क्या चीज़. इन्होने कभी बुराई देखी तक नही. जो भी देखते है, ये मान कर चलते है कि भगवान की दया से सब अच्छा ही हो रहा है. कभी कुछ बुरा इन्होने सुना नही और बुरा कहना तो ये जानते भी नही कि क्या होता है. तो अब करने के बारे मे तो तुम खुद समझ सकते हो. ये तुम्हे बिल्कुल आराम से लूटेंगे. सीधे तुम्हारी जान नही लेंगे. पहले तुम्हारा घर छीनेंगे, फिर कपडे, फिर रोटी और फिर भी अगर तुम ज़िन्दा रह सके तो ये तुम्हारी रीढ की हड्डी छीन लेंगे. वैसे इन्हे रीढ वालो से कोई नफरत नही है. इन्हे नफरत सिर्फ रीढ से है. इसके बाद भी अगर तुम ज़िन्दा रहना चाहो तो सचमुच इन्हे तुम्हारे ज़िन्दा रहने पर कोई एतराज नही है.     

और देखो ये जो हरे कुर्ते वाले भाई साहब है न! ये पूरी तरह समाज को समर्पित है. लूटपाट का काम भी ये बहुत सामाजिक तरीके से करते है. सामाजिक तो ये इतने है कि इनका अपना कुछ भी नही है. स्व और आत्म शब्दो से इनका दूर-दूर तक से परिचय नही है. आत्मा इनके पास जन्म से ही नही है. इसलिए उसके दबाए या मारे जाने का तो सवाल ही नही उठता. और चूंकि इनके पास अपना कुछ भी नही लिहाजा ये पूरे समाज मे जिसके पास जो कुछ भी है उसे अपना ही मानते है. जो शराफत से दे देता है, उसे शुक्रिया कहते है और जो चू-चपड करता है उसके सिर के दो टुकडे कर देते है. फिर उसका सब कुछ समाज का हो जाता है और तुम तो जानते हो समाज यही है.

इधर देखो, ये जो लाल टोपी वाले साथी है न! ये बाते तो बडी खतरनाक करते है. कहते तो ये है कि बडो को लूटेंगे और छोटो को बांट देंगे. फिर सब बरोब्बर. कोई छोटा नही और कोई बडा नही. ये लूट-मार की बाते करते है. मरने-मारने की बाते करते है. पर हक़ीक़त ये है कि अभी ये खुद ही लुट गए है. सफेद पैंट वाले चाचा ने लूट ली है इनकी पूरी इज़्ज़त. देखो न इनके सिर पर सिर्फ टोपी बची है और बाक़ी कपडे गायब. तो अभी तो फिलहाल इन्हे अपने लिए कपडो की ज़रूरत है. और अभि ये तुम्हे कोई नुकसान नही पहुचाएंगे, सिर्फ कपडे उतार लेंगे ताकि खुद को छिपा सके.

और ये जो नारंगी लुंगी वाले दादा जी है, इनकी तो बात ही मत पूछो. कमल का फूल इन्हे बेहद पसन्द है. उस पर लक्ष्मी जी का वास होत है न, इसीलिए. अब कमल के फूल की बात तुम जानते ही हो. उसे खिलने के लिए हमेशा कीचड की ज़रूरत होती है. इसीलिए ये हमेशा कीचड से सराबोर रहते है. अगर कोई बहर से कीचड नही उछालता तो ये अपने घर मे ही कीचड-कीचड खेल लेते है. लूटने के लिए भी ये अपने शिकार पर पहले कीचड उछालते है. उसे बताते है कि देखो अतीत मे तुम्हारे भगवान को लूटा गया और तब तुमने कुछ नही किया. इसलिए अब हम तुम्हे लूटना चाहते है और हम जो भी करते है वह भगवान का ही काम होता है लिहाजा यह लूट भी भगवान के खाते मे.'

इसके पहले कि वह मुझे बाकी लुटेरो के बारे मे बताते और मै लुटने के बारे मे अपनी पवित्र राय देता गिरोह के बाक़ी सदस्यो का धैर्य टूट चुका था और वे सभी मिलकर मुझे लूटना शुरू कर चुके थे. ये तो आप जानते ही है कि मुझ दरिद्र को लूट कर उन्हे कुछ खास मिलेगा नही, लिहाजा आगे आप अपनी राय देने के लिए तैयार रहे. बाक़ी समय बता ही देगा.

      

                     

                                         क्रि 

11 comments:

  1. बहुत बढ़िया व्यंग्य !
    घुघूती बासूती

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  2. सॉलिड कटाक्ष...क्या बात है, बेहतरीन!!

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  3. इयत्ता पर अब गर्मी आयी।
    और क्या जबरदस्त लूटक पोस्ट। हमसे तो वाहावाही की बड़ी खेप लूट ले गयी!

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  4. भाई
    बहुत धारदार व्यंग रचना लिखी है आपने...कितना बड़ा अभिशाप है की हम सब लुटने के लिए ही बने हैं..जिसे जैसा चाहे हमें लूटता है और चल देता है...
    इतनी समसामयिक व्यंग रचना लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई
    नीरज

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  5. vayang ki shuruat bahut achi hai aur gati bhi, lekin ant me thora aur kasrat ki jaruat thi...aapako lutatne ki prakriay dekhane me shayad mujhe jayada maja aata...
    alok nandan

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  6. bahut din ke baad likha aapne, behtareen hai

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  7. Back to senses again!Congrates on revival.Oxygen kya rate hai?
    also visit my comments on Nandan,s poem Failure!
    hari shanker rarhi.

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  8. wa kya baat.tichhan wyang...


    ...kya main aapko apne blogroll par rakh sakti hun??


    LOVELY
    sanchika.blogspot.com

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  9. धारदार! बहुत बढिया!

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सुस्वागतम!!