Thursday, 24 April 2008

छोटा कितना दर्जा, बड़ा कितना दुख

मधुकर उपाध्याय
...औरतों के खिलाफ जुल्म का मसला कितना बड़ा है, मैं यह महसूस करके भौचक्की रह जाती हूं। हर उस औरत के मुकाबले, जो जुल्म के खिलाफ लड़ती है और बच निकलती है, कितनी औरतें रेत में दफन हो जाती हैं, बिना किसी कद्र और कीमत के, यहां तक कि कब्र के बिना भी। तकलीफ की इस दुनिया में मेरा दुख कितना छोटा है।...
पाकिस्तान की मुख्तारन माई का ये दुख दरअसल उतना छोटा नहीं है। बहुत बड़ा है। इसकी कई मिसालें इस्लामी देशों में फैली हुई मिलती हैं। एशिया से अफ्रीका तक। ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब इस्लामी देशों की औरतों की बात किताबों की शक्ल में लिख कर कही गई है। इनमें से कई किताबें औरतों की लिखी हुई हैं।

मुख्तारन माई की किताब ...इन द नेम ऑफ ऑनर... तकरीबन दो साल पहले आई थी। उसी के साथ सोमालिया की एक लड़की अयान हिरसी अली की किताब आई ...इनफिडेल... और उसके बाद खालिद हुसैनी की किताब ... थाउजेन्ड स्प्लैंडिड सन्स...। इस बीच दो किताबें और आईं। जॉर्डन की एक महिला नोरमा खोरी ने ...फोरबिडन लव... और इरान की अज़र नफ़ीसी ने ...रीडिंग लोलिता इन तेहरान... लिखी। एक और किताब नार्वे की आस्ने सेयरेस्ताद की थी, ...द बुकसेलर ऑफ काबुल...।

इन किताबों को एक धागा जोड़ता है- इस्लामी देशों में औरतों की स्थिति। इस पर पहले भी काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन इन किताबों को एक साथ पढ़ना तस्वीर को बेहतर ढंग से सामने रखता है। शायद इसलिए भी कि इन्हें महिलाओं की स्थिति बयान करने के मूल इरादे से नहीं लिखा गया। उनके सामने देश, समाज और दुनिया के समीकरण थे, जिसे उन लेखकों ने अपने ढंग से सामने रखा। महिलाएं पात्रों की तरह आईं और अंत तक आते-आते उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि इनमें से खालिद हुसैनी को छोड़कर बाकी सब लेखिकाएं हैं। महिलाओं की जटिल दुनिया तक उनकी पहुंच संभवतः इसीलिए आसान रही होगी।
अयान हिरसी अली का उपन्यास ... इनफिडेल... आत्मकथात्मक है। सोमालिया में उसके जन्म से लेकर अमेरिका जाने तक। किताब कई जगह इतनी तीखी है कि पढ़ते हुए झुंझलाहट होती है, गुस्सा आता है और सवाल उठता है कि जो जैसा है, वैसा क्यों है?
अयान का बचपन, जाहिर है, सोमालिया में गुजरा। पिता बहुत संपन्न नहीं थे लेकिन हालात बहुत खराब भी नहीं थी। इतना जरूर था कि अयान को इस्लामी जीवन जीने की तालीम मिली थी। सिर पर दुपट्टा, बदन पूरा ढ़का हुआ और सवाल करने पर एक अघोषित पाबंदी। अब्बा ने कनाडा के एक लड़के के साथ उसका निकाह तय कर दिया पर अयान को पूरी ज़िंदगी की गुलामी पसंद नहीं थी। किसी तरह वह सोमालिया से निकलकर हालैंड पहुंच गई। जान पर खतरा होने की गलतबयानी करके उसने शरणार्थी का दर्जा हासिल किया और उसके बाद उसने जिंदगी के नए अर्थ ढूंढ़े। सोमालिया की दूसरी महिलाओं की मदद के लिए डच भाषा सीखी और हॉलैंड की नागरिकता हासिल की। दुभाषिये की तरह सरकारी नौकरी की। एक राजनीतिक दल के नेता की शोध सचिव बनी। चुनाव लड़ी और संसद सदस्य बन गई। महिलाओं की स्थिति पर हिरसी के बयानों ने उसके इतने दुश्मन बना दिए कि उसे कड़ी सुरक्षा में रहने के अलावा कई बार दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ी। अंततः शरणार्थी का दर्जा हासिल करने के समय बोला गया झूठ सामने आया और हिरसी की नागरिकता छीन ली गई। संसद सदस्यता भी चली गई, लेकिन तब तक उसे अमेरिका में काम मिल गया था। अयान के लिए सांसद बनने से ज्यादा महत्वपूर्ण इस्लाम में महिलाओं के अधिकार और उनकी स्थिति का मुद्दा था और नए काम में उसे यही करने का मौका मिल रहा था। ...इनफिडेल... में हिरसी अली ने अपनी बात बहुत बेबाकी औऱ ईमानदारी से रखी है। नतीजतन वह विवादों के घेरे में आ गई।
कठिन स्थितियों, विपन्नता और रूढ़ मानसिकता से जूझने और कामयाब होने की इस अद्भुत आत्मकथा के कई हिस्से निश्चित रूप से विवादास्पद हैं, लेकिन शायद साफगोई की अपेक्षा करने वालों को वे उस तरह नहीं अखरेंगे।
आस्ने सेयरेस्ताद की ...द बुकसेलर ऑफ काबुल... भी आत्मकथात्मक है। पत्रकार की तरह काम करने वाली आस्ने रिपोर्टिंग के लिए काबुल पहुंची तो एक दुकान देखकर हैरान रह गईं। रूसी, तालिबानी, मुजाहिदीन और अमेरिकी हमलों से तबाह अफगानिस्तान की राजधानी में किताब की एक बड़ी दुकान। आस्ने को समझ में नहीं आया कि ऐसी ध्वस्त अर्थव्यवस्था, तनाव और लगातार बम धमाकों के बीच आखिर कौन किताब खरीदता और पढ़ता होगा।
उसने यह सवाल दुकान के मालिक मोहम्मद शाह रईस से पूछा। जवाब संतोषजनक नहीं लगा। फिर उसने रईस के सामने एक प्रस्ताव रखा कि वह चार महीने उसके परिवार के साथ रहना चाहती है। उसके घर में। रईस राजी हो गया। नॉर्वे लौटकर उसने अपनी किताब पूरी की। किताब में रईस का नाम बदलकर सुल्तान खान कर दिया लेकिन घटनाक्रम नहीं बदला।
पूरी किताब में सुल्तान खान एक पढ़े-लिखे अंग्रेजी बोलने वाले संपन्न अफगानी की तरह आता है, लेकिन घर की चहारदीवारी के भीतर उसका रूप बदला हुआ होता है। अपने परिवार, पत्नी और बेटियों के साथ वह अक्सर क्रूर होता है और कई बार आक्रामक भी। बहन घर में गुलाम की तरह रहती है। औरतों को टूटे फर्नीचर की तरह इधर-उधर फेंक दिया जाता है। किसी संमृद्ध अफगानी के घर के अंदर का ऐसा विवरण इससे पहले उपलब्ध नहीं था।
मैं काबुल के इंटरकांटिनेंटल होटल में रईस से मिला। उनकी एक दुकान होटल में भी है। जिक्र ...द बुकसेलर ऑफ काबुल... का आया तो रईस बिफर पड़े। कहा, ... आस्ने ने बहुत नाइंसाफी की है। सुल्तान खान मैं ही हूं। आस्ने की वजह से मैं पूरी दुनिया में बदनाम हो गया। उसने न सिर्फ मुझे, बल्कि मेरे मुल्क को भी बदनाम किया है। मैं उस पर मुकदमा करूंगा।... रईस से काफी देर बातचीत होती रही। उसी दौरान पता चला कि उन्होंने एक बार खुद किताब लिखकर उस किताब का जवाब देने के बारे में सोचा था। नॉर्वे के कई नाकामयाब चक्कर लगाने के बाद अब शायद उन्होंने अपनी किताब पूरी कर ली है।
अपने पहले उपन्यास ...काइट रनर... से चर्चा में आए खालिद हुसैनी की नई किताब ...थाउजेंड स्प्लेंडिड संस... की पृष्ठभूमि भी अफगानिस्तान ही है। पूरा बचपन काबुल और हेरात के आसपास बिताने वाले खालिद इस समय अमेरिका में रहते हैं। उनकी किताब एक तरह से अफगानिस्तान की पिछले तीस साल की कहानी है। सोवियत आक्रमण से लेकर तालिबान और उसके बाद तक।
दो पीढ़ियों की यह कहानी लगभग जादुई सम्मोहन के साथ पाठक को बांधे रखती है, जिसमें तबाही, बर्बादी और दुखद घटनाक्रमों के बीच ज़िंदगी और खुशियां तलाश करते चरित्र हैं। यानी कि तकरीबन हर पन्ने पर इतिहास और ज़िंदगी साथ-साथ चलते हैं। किताब चार हिस्सों में बंटी हुई है। पहला हिस्सा एक महिला चरित्र मरियम, दूसरा और चौथा हिस्सा एक अन्य महिला चरित्र लैला पर है और तीसरा मरियम और लैला की साझा कहानी है।
पश्चिमी अफगानिस्तान में हेरात के एक गांव में मरियम अपनी मां के साथ रहती है। पिता ने दूसरी शादी कर ली है। अमीर है और हेरात में रहता है। वह मरियम से मिलने तक से इनकार कर देता है। बाद में मरियम की शादी काबुल के एक मोची रशीद से होती है। मरियम शादी करके काबुल आती है। उसी के घर की गली में लैला रहती है, एक ताजिक लड़की। उसका एक दोस्त है तारिक। उसके संबंध बहुत करीबी हैं, शारीरिक तक। कुछ दिन के बाद तारिक का परिवार काबुल से चला जाता है। लैला के मां-बाप काबुल छोड़ने को होते हैं कि एक बम धमाके में मारे जाते हैं। घायल लैला को रशीद बचाता है। अपने घर में रखता है और बाद में उससे शादी कर लेता है। इसलिए कि मरियम उसके बच्चे की मां नहीं बन सकती। मरियम के साथ उसका व्यवहार दिन-ब-दिन खराब और क्रूर होता जाता है। लैला मां बनती है, लेकिन वह जानती है कि पिता रशीद नहीं, तारिक है। एक दिन तारिक अचानक लौट आता है। बाद में रशीद को सच्चाई पता चलती है और वह लैला के साथ भी उसी तरह क्रूर हो जाता है। एक रोज जब वह लैला को जान से मारने पर आमादा होता है, मरियम बेलचे से रशीद की हत्या कर देती है। बाद में वह खुद को तालिबान को सौंप देती है और उसे फांसी हो जाती है। तारिक लैला को लेकर हेरात जाता है, जहां मरियम को दफनाया गया था। दोनों वहीं अपनी बेटी का नामकरण करते हैं- मरियम।
वह चाहे लैला और तारिक हों या सुल्तान खान की अनाम बीवी और बहन, या फिर अयान हिरसी अली- उनका दुख और समाज में उनका दर्जा नहीं बदलता। भौगोलिक परिवर्तनों से उसमें कोई फर्क नहीं आता। सोमालिया के रेगिस्तान से लेकर अफगान पहाड़ियों तक।
क्या समाज में वाकई नई सोच की जगह नहीं बची है? या फिर यथास्थितिवादी और कठमुल्ला इस कदर हावी हैं कि नई रोशनी वहां तक पहुंच नहीं पा रही।

2 comments:

  1. बेहतरीन समीक्षा, तमाम किताबों के माध्यम से दुनिया भर के समाज की कुरीतियों की कलई खोलता लेख। हालांकि बुद्धिजीवी ब्लॉगर्स का इसके प्रति कोई उत्साह नजर नहीं आता। इससे ब्लॉग्स पर फालतू बहस और उसकी हकीकत का भी पता चलता है।

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