Friday, 21 March 2008

चढत चइत चित लागे न रामा......


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चढत चइत चित लागे न रामा


बाबा के भवनवा......


उपशास्त्रीय संगीत मे अधिक्रित घुसपैठिए के रूप मे प्रतिष्ठित लोकसंगीत की अत्यंत लोकप्रिय विधा के साथ मुश्किल यह है इसे साल मे सिर्फ एक महीने ही गाया-सुना जा सकता है. ऐसा नही कि बाकी समय इसकी धुन बजने से मना कर देती हो, पर इसे ठीक नही समझा जाता. यह वह वक़्त है जब फागुन जाने को तैयार है और चैत बिल्कुल द्स्तक ही दे रहा है. ऐसे समय मे कही चैता की धुन भी भोजपुरिया कान मे पड जाए तो सीधे दिल मे उतरती चली जाती है. ऐसे समय मे होरी और चैता दोनो साथ-साथ सुनने का मौका मिले तो भला कौन छोड्ना चाहेगा.


कुछ ऐसा ही आज हुआ. मौका था बनारस घराने की प्रसिद्ध शास्त्रीय गयिका पद्मभूषण गिरिजा देवी के सम्मान का. दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर मे सखा क्रिएशंस की ओर से आज उन्हे द ग्रेट मास्ट्रोज़ एवार्ड भेट किया गया. एवार्ड दिया पंडित बिरजू महराज ने और इसी मौके पर अपना गायन प्रस्तुत किया अप्पा यानी गिरिजा देवी की शिष्या मालिनी अवस्थी ने.


'उडत अबीर गुलाल' शीर्षक इस आयोजन का श्रीगणेश उन्होने किया एक ठुमरी से. "नदिया धीरे-धीरे बहो ..." पहली ही प्रस्तुति से समा ऐसा बन्धा कि नदिया ने धीरे-धीरे बहना शुरू कर दिया. सुरो की सरिता जब एक बार बह चली तो फिर उसने रुकने का नाम भी नही लिया. उपस्थिर श्रोता समुदाय उसके साथ-साथ बहता रहा, तब तक जब तक कि सुरो की सागर त्रिवेणी मे वह विलीन नही हो गई.


इस ठुमरी के बाद कार्यक्रम की धारा तुरंत मौसम के अनुकूल होरी की ओर मुडी- "रे रसिया तेरे कारन ब्रिज मे भई बदनाम...." एक और होरी "बरजोरी करो न मोसे होरी मे ...." भी उन्होने सुनाया. और फिर वह चैता जिसका जिक्र पहले ही हो चुका है. और समापन हुआ क्रिष्ण भक़्ति के रस मे पगे एक ब्रज गीत " ब्रिज के बिरही लोग बिचारे ...." से. मालिनी के साथ तानपूरे पर संगत कर रही थी उनकी ही गुरुभगिनी पियाली. जबकि तबले पर उनका साथ दिया अख्तर हसन और हारमोनियम पर ज़मील अहमद ने. जाहिर है, कार्यक्रम की सफलता मे इनका योगदान भी कुछ कम उल्लेख्य नही है, पर क्या कर सकते है, शब्दकारो की सीमा यही है कि इनके बारे मे इससे ज्यादा कुछ कहा नही जा सकता.

3 comments:

  1. धन्‍यवाद चैतयी समाचार के लिए

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  3. बहुत अच्छा लगा यह पढ़ कर जानना।

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