Monday, 3 March 2008

गीत

कैसा बसंत
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ?
काग संघ छीन लिया कोयल की कूक
मंजरियाँ सेक रहीं अनजानी धूप
चन्दा को देख, रहा चक्रवाक पूछ
बोल प्रिये प्रीति मेरी कहाँ गयी चूक ?
खुशियों को छोड़ गए अलबेले कंत
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ?
फूलों को फूंक त्वचा गरमाते लोग
शूलों को नित्य नमन कर जाते लोग
भ्रमर बने सन्यासी सिखलाते योग
कौन नहीं झेल रहा खुद का वियोग ?
चोली और दामन में हो गया संघर्ष
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ?
सपनो के सेंध मार हैं माला मॉल
डोम बने हरिश्चंद करते सवाल
दिग्दिगंत फ़ैल रहा एक महाजाल
दुर्योधन नृत्य करे शकुनी दी ताल ,
तक्षक जनमेजय में दोस्ती बुलंद
जीवन की बगिया में कैसा बसंत ?

No comments:

Post a Comment

सुस्वागतम!!