Thursday, 7 February 2008

ये पोस्ट आपकी आंखों में अंगुली डालकर कुछ कह रही है!

दिलीप मंडल

कितने आदमी थे? दरअसल एक भी नहीं! सवाल तो आसान था और जवाब भी उतना ही आसान हो सकता था। सवाल था - आपकी जानकारी में क्या कोई ऐसा दलित पत्रकार है जो किसी मीडिया संस्थान में महत्वपूर्ण पद पर हो। महत्वपूर्ण पद पर का मतलब क्या? फैसला लेने वाले ऊपर के बीस पदों को महत्वपूर्ण मान लीजिए। ये सवाल एक साथ मोहल्ला, कबाड़खाना, इयत्ता और रिजेक्टमाल पर डाला गया था।

जवाब में आए तीन नाम- बनवारी जी, गंगा प्रसाद और ए एल प्रजापति। बनवारी जी अरसा पहले रिटायर हो गए हैं, गंगा प्रसाद जी जनसत्ता में पटना कॉरेसपॉंडेंट हैं और ए एल प्रजापति जी ओबीसी हैं। मुझे अलग अलग संस्थानों में इन तीनों के साथ काम करने का मौका मिला है। दरअसल इस सवाल का जवाब सीधा और आसान-सा है। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के उत्तरार्ध में लोकतांत्रिक देश भारत की मीडिया में एक भी दलित किसी महत्वपूर्ण पद पर नहीं है। दलित मतलब क्या? दलित यानी इस देश का हर छठा आदमी। तो इसमें क्या बात हो गई? बात तो है। इसका असर दरअसल उस कंटेंट पर पड़ता है जो मीडिया बनाता है। सवाल विश्वसनीय होने का है। सवाल उस प्रामाणिकता का है, जिसका मीडिया में दूसरे कई और कारणों से भी क्षरण हो रहा है।

चलिए हम आपको डेढ़ साल पीछे ले चलते हैं। हमने 28 मई, 2006 का दिन चुना और दिल्ली से छपने वाले उन आठ अखबारों केस स्टडी के तौर पर लिया, जो सबसे ज्यादा बिकते हैं। हिंदी और इंग्लिश के इन अखबारों में पहले पेज की हेडलाइन पर नजर डालिए :
- आत्मदाह के प्रयास से जाग उठा अतीत
- आरक्षण की आग-आत्मदाह पर उतरे आंदोलनकारी
- आरक्षण-दो ने किया आत्मदाह का प्रयास
- आरक्षण के विरोध में आत्मदाह की कोशिश
- कटक में मेडिकल छात्र ने किया आत्मदाह का प्रयास
- एंटी रिजर्वेशन स्टर गेट्स फायरी
- मंडल वन-रिरन
- इमोलिशन बिड्स एट कटक, डेल्ही


28 मई, 2006 का अखबार इसलिए क्योंकि 27 मई वो तारीख है जब आरक्षण विरोधी आंदोलन की सबसे बड़ी सभा दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई थी। ये हेडलाइंस और उनकी भाषा जो कह रही है वो तो आप देख पा रहे हैं, लेकिन ये हेडलाइंस कई बातें नहीं बता रही हैं। टेलीविजन की पुरानी खबरों का रिकॉर्ड रखना थोड़ा मुश्किल होता है। लेकिन टेलीविजन कोई अलग कहानी नहीं कह रहे थे। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के रेकॉर्ड से निकालकर उस दिन के टेप देखे जा सकते हैं।

27 तारीख को खुद को जला लेने के दो मामले हुए और दोनों को मीडिया ने आरक्षण विरोधी आंदोलन का हिस्सा बताया। पहला केस तो रामलीला मैदान का ही है। उस दिन जो ऋषि गुप्ता जला था वो बिहार का रहने वाला और हलवाई (अतिपिछड़ी जाति) का है। मैट्रिक फेल ऋषि छात्र नहीं है बल्कि वो पूर्वी दिल्ली में छोटी सी दुकान चलाता था।

ये बात मैं इसलिए जानता हूं क्योंकि जले हुए ऋषि से मिलने 28 मई की रात मैं खुद सफदरजंग अस्पताल पहुंचा था और वहां उसके पिता मुझे वार्ड में रोते हुए मिले। मुझसे जितना बन पड़ा, उनकी उतनी मदद मैंने की थी। वो चाहते थे कि उनके बेटे पर आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा कायम न किया जाए। उन्होंने बिहार के एक बड़े नेता से मुलाकात कराने के लिए कहा था और वो काम हो गया था। यूथ फॉर इक्वेलिटी के टॉप नेता और एम्स के रेडियोथेरेपी डिपार्टमेंट के डॉक्टर हर्ष मेरे अच्छे और पुराने परिचित हैं। उन्होंने मीडिया को बाइट दी और लिखित बयान भी जारी किया कि जलने वाले युवक का आरक्षण विरोधी आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

इसके अलावा कटक में जिस छात्र के आत्मदाह की खबर छपी उसके बारे में अखबारों में ही अंदर के पन्नों पर छपा था कि वो डिप्रेशन का शिकार था और उसे अस्पताल में भर्ती इसी वजह से कराना पड़ा था। वहां आत्मदाह की कोई कोशिश ही नहीं हुई थी और ये रिजर्वेशन से जुड़ी घटना नहीं है। इसके बावजूद मीडिया ने इन घटनाओं को खास तरह से देखा और दिखाया।

क्या ये सिर्फ संयोग है? क्या आपने सोचा है कि मीडिया में आरक्षण के पक्ष में कोई संयोग कभी क्यों नहीं होता। धर्म या जाति के सवाल पर जब इस पार या उस पार जैसे सवाल आते हैं तो मीडिया के पैर हमेशा फिसलते क्यों नजर आते हैं? क्या है इसकी वजह? सोचकर बताइए और हां, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्त। आप सिर्फ ये बताइए कि और सुनने का धैर्य और साहस आपमें है या नहीं। अगर नहीं है तो आपके सुंदर मंगलमय जीवन में उथलपुथल मचाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। बगल के कमरे में लाश सड़ रही हो तो भी आपको नींद आ सकती है।

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