Tuesday, 5 February 2008

एक दलित पत्रकार की तलाश है...

...जो किसी मीडिया संस्थान में महत्वपूर्ण पद पर हो। आप पूछेंगे ये एक्सरसाइज क्यों? बारह साल पहले वरिष्ठ पत्रकार बी एन उनियाल ने यही जानने की कोशिश की थी। 16 नवंबर 1996 को पायोनियर में उनका चर्चित लेख इन सर्च ऑफ अ दलित जर्नलिस्ट छपा था। उस समय उन्होंने प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के एक्रिडेटेड जर्नलस्ट की पूरी लिस्ट खंगाल ली थी। प्रेस क्लब के सदस्यों की सूची भी देख ली। लेकिन वो अपने मित्र विदेशी पत्रकार को मुख्यधारा के किसी दलित पत्रकार से मिलवा नहीं पाए। उनियाल साहब के काम को पाथब्रेकिंग माना जाता है और इसकी पूरी दुनिया में चर्चा हुई थी।

1996 के बाद से अब लंबा समय बीत चुका है। क्या हालात बदले हैं? यकीन है आपको? जूनियर लेवल पर कुछ दलितों की एंट्री का तो मै कारण भी रहा हूं और साक्षी भी। लेकिन क्या भारतीय पत्रकारिता में समाज की विविधता दिखने लगी है? अभी भी ऐसा क्यों हैं कि जब मैं पत्रकारिता के किसी सवर्ण छात्र को नौकरी के लिए रिकमेंड करके कहीं भेजता हूं तो उसे कामयाबी मिलने के चांस ज्यादा होते हैं। दलित और पिछड़े छात्रों को बेहतर प्रतिभा के बावजूद नौकरी ढूंढने में अक्सर निराशा क्यों हाथ लगती है? क्या जातिवाद की बीमारी मीडिया के बोनमैरो में घुसी हुई है। क्या हम इसके लिए शर्मिंदा है? क्या हम इस पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए तैयार हैं?

( आज ये लिखते हुए मुझे एस पी सिंह याद आ रहे हैं, पत्रकारिता में सामाजिक विविधता लाने के लिए वो हमेशा सचेत रहे। मेरा और मेरी तरह के कुछ दर्जन लोगों का पत्रकारिता में आना उनकी ही वजह से हो पाया। मुझे याद है कि मंडल कमीशन विरोधी आंदोलन के समय उन्होंने आरक्षण के पक्ष में स्टैंड लिया था और टाइम्स हाउस में इस बात के पोस्टर लगे थे कि एसपी सिंह चमार हैं। विरोधों से टकराने की वजह से ही एसपी सिंह एसपी बन पाए। टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के हर बैच में किसी न किसी मुसलमान और अवर्ण छात्र का होना कोई सामान्य बात नहीं है। एसपी सिंह और राजेंद्र माथुर को इसके लिए कितना विरोध झेलना पड़ा होगा, इसकी कल्पना मैं नहीं कर सकता। लेकिन जो धारा के साथ बहे उन्हें कौन याद रखता है? देखिए मरे हुए एसपी का नाम जिंदा लोगों से ज्यादा चर्चा में रहता है)

नस्लवाद की आदिभूमि अमेरिका के फॉक्स और सीएनएन में आपको ब्लैक, हिस्पैनिक और जैना विरजी, अंजली राव और मोनिता राजपाल जैसे भारतीय दिख जाएंगे। ये चेहरे वहां इसलिए नहीं है कि वो अनिवार्य रूप से सबसे टैलेंटेड हैं। दरअसल नस्लभेदी अतीत को लेकर अब वहां पश्चाताप है। इसलिए अब सचेत ढंग से ये कोशिश हो रही है कि अमेरिकी समाज के अलग अलग तरह के चेहरे सभी क्षेत्रों में दिखें। वहां के बड़े कॉरपोरेट गर्व के साथ कहते हैं कि उसके स्टाफ में ब्लैक की संख्या उनकी आबादी से ज्यादा है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए एक मिली जुली नस्ल का शख्स आगे बढ़ रहा है और उसे श्वेतों का भी समर्थन है। भारत कब बदलेगा? और क्या आपका भी इसमें कोई योगदान होगा?

2 comments:

  1. दलित वर्ग के लोग पत्रकारिता में हैं भी तो बड़ी बेचारगी की हालत में। जब तक वे जाति छिपाए रहते हैं, बहुत अच्छे पत्रकार होते हैं, लेकिन जाति का खुलासा होते ही वे दीन-हीन-उपेक्षित हो जाते हैं। इसका सीधा असर आप देख सकते हैं कि स्वतंत्रता के पहले से ही तमाम जातियां अपने टाइटिल बदलकर दूसरे शहरों में रहती हैं। विदेशों में जाने वाले मज़दूर भी ज्यादातर दलित ही थे जो आज उन छोटे-छोटे देशों के राष्ट्राध्क्ष बन गए, लेकिन उनकी पीढ़ी भी नहीं जानती कि वे किस जाति के हैं।
    इस तरह से पत्रकारिता में दलित ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेंगे। उच्च पदों पर बैठे लोग (दलित) ही उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं और वे हमेशा बचाव की मुद्रा में होते हैं कि कहीं उसे नौकरी दे दी तो दलित समर्थक का आरोप लग जाएगा। कहां हैं आप मंडल जी, अपने आसपास ही देखिए। दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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  2. सत्येंद्र जी का अनुभव एक तथ्य हो सकता है. इसका मैं खंडन नहीं कर रहा हूं. मेरी एक परिचित महिला हैं, महाराष्ट्र की. वहां वह लेक्चरर है. दलित हैं. एक बार मेरे गाव आईं. मैंने उन्हें गांव घुमाया. दलित बस्ती में ले गया. वहां वह बस्ती के लोगों को देखकर न केवल नाक मुंह सिकोरने लगी बल्कि बोली भी कि अरे ए सब बडे गन्दे होते हैं. नीची जाति के हैं. वह मेरे गांव की अतिथि थीं मैने ज्यादा कुछ नही कहा पर इतना पूछ दिया कि आप भी तो दलित हैं. इसपर उन्होंने कहा कि हां हैं लेकिन मैं दलितों की तरह नहीं रहती हूं. खैर.
    आपने बंगारू लक्ष्मण के बारे में मायावती की टिप्पणी भी सुनी होगी कि वह मुझसे नीचा दलित है.
    लेकिन सत्येंन्द्र जी, इतने से जो समाज में परिवर्तन चाहने वाले हैं, उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं.अगर तथ्य को स्वीकार कर इसे नियति मान बैठ जाएं तो बुद्ध से लेकर कबीर, विवेकानंद गांधी अम्बेदकर सबका प्रयास व्यर्थ साबित हो जाएगा. विषम्रता जब तक रहेगी संघर्ष तब तक जारी रहना चाहिए. विफ़लताएं आती रहेंगी लेकिन बदलाव भी तभी होगा.
    धन्यवाद
    अतुल

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