Saturday, 19 January 2008

ghazel

सजा अपनी

बचा के आप भी रखिये अभी दुआ अपनी ।
दरख्त ढूंढ रहा है अभी हवा अपनी ।
वो क्या हुई जो बनाया था कभी
ढूंढ कर हार गया वह जमीं खुदा अपनी ।
एक फरिश्ता जिसे था सच का गुमा
काट कर दे गया जुबा अपनी ।
तमाम लोग हमारे ही राज करते हैं
यही उम्मीद है अपनी यही सजा अपनी ।
इन अंधेरों की बात मानी तो
खुद बुझा दोगे तुम शमां अपनी ।
अगले सावन को भी वो जेठ बना जाएगा
भूल कर भी न उसे तश्नागी दिखा अपनी ।
मेरी बस्ती की तरफ चाँद अब नहीं आता
सहम के उसने बदल दी है अब दिशा अपनी ।
हमारे अश्क हैं Rarhi और खरीदार हमीं
चलेगी कब तलक दुकान ये भला अपनी ।

1 comment:

  1. एक पंक्ति और जोड़ लें :
    कुछ सिरफिरे हैं जो कहते हैं कि राढ़ी आदमी अच्छा है
    चलें अच्छा हुआ ये ग़ज़ल पढ़कर दूर हुई गुमां अपनी

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